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कमरा भर आकाश
कमरा भर आकाश
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© Namita Sunder

Fantasy Romance

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मौली मौली....” अम्मा नीचे आंगन से गला फाड़ फाड़ आवाजे लगा थक गईं, लेकिन मौली तक उनकी आवाज न पहुंचनी थी, न पहुंची। मौली जब ऊपर के कमरे की छत पर होती है तो नीचे की दुनिया  तो उसके लिए जैसे कहीं बिला जाती है। बस वह होती है और उसके चारों ओर दूर दूर तक  आसमान ही आसमान। मौली सर के पीछे हाथ बांध कर पीठ के बल छत पर लेट जाती है और फिर उसके सामने होती है, सबसे अलग, एक नई सुहानी दुनिया। नीले नीले चमकते आकाश में कपास के फूल से तिरते बादल आपस में गुंथ उसके लिए हिंडोला बना देते हैं और वह पलक झपकते ही पहुंच जाती है दूर ऊपर सपनों के देश में, जहां हवाएं केवल उसके लिए ही राग मल्हार छेड़ती हैं, अपनी रेशमी छुअन से उसके पोर-पोर में उल्लास के अनगिनित छंद लिख जाती हैं, और बारिशों के मौसम की संझा जब लाल, नारंगी, गुलाबी, सुनहरे, नीले रंगों में नहाया आसमान उसे देख प्यार से मुस्कुराता तो उसे लगता सूरज ने अपने सीने में इक नन्हा सा झरोखा खोल दिया है, केवल उसके दुबक कर जा बैठने के लिए।

मौली को अपनी इस दुनिया से बेइन्तहा प्यार है--- किताबें, कवितायें, आकाश, चांदनी, बारिश, फूल, ढेरों ढेर खिलखिलाते हुए रंग। उसका बस चले तो इससे इतर न कुछ सोचे, न कुछ जिए। पर कहां हो पाता है ऐसा। दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, छः-सात कजिन्स और ढेरों ढेर आने जाने वाले रिश्तेदारों वाले इस भरे-पूरे घर में दिन भर इतनी गहमा-गहमी रहती है कि अकेले दो पल केवल अपने लिए जुटाने के लिए उसे कितनी जोड़ तोड़ करनी पड़ती है, वही जानती है। उस पर भी थोड़ी ही देर में मां, ताई की आवाजें आने लगती और दादी..........दादी तो केवल आवाजें दे कर ही चुप नहीं बैठती घर की सारी चिल्लर पलटन को ऊपर भेज देती और मौली कभी भी यह नहीं चाहती कि इस कमरे की छत पर उसके रहते कोई दूसरा पांव भी धरे, उसका सारा तिलस्म एक झटके से टूट न जाएगा....... इसीलिए सीढ़ियों पर धपर-धपर की आवाजों के सुनाई देते ही वह लपक कर बांस की सीढ़ी से नीचे वाली छत पर आती और सीढ़ी कमरे में बंद कर देती। वह भगवान को हमेशा उलाहना देती कि उसे गलत पते पर क्यों पोस्ट कर दिया। मिन्नी की तरह केवल मम्मी-पापा वाले घर का पता नहीं लिख सकते थे। ऐसा नहीं था कि उसे अपने घर वालों से प्यार नहीं था या घर वाले उसे प्यार नहीं करते थे पर क्या करे मौली उसे अपना ये संसार केवल बेहद अपना सा ही नहीं लगता था बल्कि यह उसके वजूद के एक हिस्सा जैसा था, उसकी एक बहुत बड़ी जरूरत।

आज भी मौली को छत पर पहुंचे कुछ ही देर हुई थी। अभी आंख भर नीला आसमान देख पलकें झपकी ही थीं, कीट्स की लाइन “माइ बाउल इज द स्काई, एंड आई ड्रिंक एट माई आई.....”  इतना भर ही मन ही मन बोल पाई थी....अभी तो बादलों के उस पार “आन द ग्रीन आफ द हिल” पहुंचना था, “गोल्डेन सनशाइन” को जी भर पीना था कि अम्मा ने आवाजें लगाना शुरू कर दिया। अम्मा थमीं नहीं कि दादी की मौली ओ मौली, मौलिया रे....और फिर चिंटू दीदी,  नीचे आ रही हो या मैं ऊपर आऊं.......अब मौली के लिए सब कुछ परे कर अपनी दुनिया में बने रहना सम्भव नहीं रह गया।

वह झटके से उठी और धड़ाधड़ सिढ़ियां उतरती नीचे आंगन में आ खड़ी हुई। “क्या हुआ अम्मा, अभी अभी तो गए थे”, खीझ भरी रुआंसी आवाज में बोली मौली।

और कोई दिन होता तो अम्मा तेज आवाज में शुरू हो गई होती.....”तो क्या हुआ, तुझसे कितनी बार मना किया है कि यूं सरी शाम अकेले इतनी ऊपर जा कर मत टंग जाया कर”। उनकी हां में हां मिलाती ताई शुरू हो जाती....”किसी जिन्न प्रेत का साया पड़ा लगता है मुझे तो इस लड़की पर। बाकी हमउम्र लड़कियों जैसे कोई लच्छन ही नहीं है इसके”। इस सब के बीच भला दादी कैसे चुप रह जातीं, वो भी अपना भाषण शुरू कर देतीं और मौली को बुलाया किस लिए गया होता यह बात पीछे रह जाती। पर आज तो माहौल ही कुछ अलग था।

अम्मा आवाज में ढेर सा दुलार भर बोलीं....”अरे,रे.. गुस्सा आ रहा है हमारी बिटिया रानी को”। तख्त पर पैर फैलाए बैठी दादी अपनी दोनों बांहें फैलाए बोली, “आजा आजा मेरे पास आ जा, देख तो एक सांस में सारी सीढ़ियां उतर कर आ रही है, कैसे तो हांफ रही है”। इतना जैसे मौली को बौखला देने को काफी नहीं था कि कमरे से बाहर आती ताई जी ने फरमाया, “देखो तो बाल कैसे रूखे हो रहे हैं। इस लड़की को तो अपनी कोई फिकर ही नहीं रहती, आज रात मैं अच्छी तरह से इसके बालों में तेल लगाऊंगीं, और सुन री मौली! तेरी कोई न नुकर नहीं चलने वाली”।

हुआ क्या है इन सब को आज? इतना लाड़ क्यों लड़ाया जा रहा है? कुछ तो कहीं गड़बड़ है। इस पहेली के उत्तर का कोई सिरा पकड़ने की उम्मीद से मौली ने छोटी चाची की ओर देखा। उनकी आंखों में कुछ असमंजस, कुछ कौतुहल जैसा कुछ छलक रहा था और जब तक मौली कुछ समझती हमेशा की तरह चाची ने चट से पलकें झुका लीं। छोटी चाची की आंखों में उनका मन खुली किताब सा पढ़ा जा सकता है और यह बात वह खुद भी बखूबी जानती हैं इसीलिए उनकी दृष्टि अधिकतर समय जमीन की ओर ही होती है। दादी अभी भी उसे अपने पास बुलाने को बांहें फैलाएं थी। कुछ झुंझलाती सी पैर घसीटती मौली उनके पास जा बैठी।

“क्या अम्मा....हमारे ऊपर बैठने से तुम लोगों को इतनी क्या परेशानी है”।

“परेशानी न होगी.....न जाने वहां कौन कौन नजरें गड़ाए रहता होगा”।

“हां, सारी दुनिया के पास जैसे और कोई काम तो है नहीं। बस तुम्हारी बिटिया को ताकते बैठे रहेंगे और अम्मा इतनी ऊंची चारदीवारी है उस छत पर, हम किसी को दिख नहीं सकते वहां पर”।

“अरे, तुझे क्या पता कौन तुझे कब, कहां, तकता रहता है......”, ताई की आवाज का चुहलपना मौली को चौंका गया। और फिर अम्मा, दादी, ताई की हंसी देर तक आंगन में गूंजती रही। फिर कुछ रुक कर अम्मा बोलीं....”मौली, वह बड़ी बाजार में जो आकर्षक ज्वैलर्स है न, आज उसके मालिक अपनी पत्नी के साथ अपनी दुकान पर आए थे, अपने इकलौते बेटे के लिए तेरा हाथ मांगने”।

“मतलब...!!!!!” मौली अचकचा कर बोली।

“मतलब क्या.....उन लोगों ने तुझे कालेज के सालाना जलसे में कविता वगैरह पढ़ते देखा था पहली बार और उसके बाद तेरी सहेली शुभा की शादी में। तेरी सादगी बहुत भा गई उन लोगों को और सबसे ज्यादा तो उनके बेटे को”।

“लेकिन अम्मा वो लोग तो इतने बड़े लोग हैं, इतने पैसे वाले। हम लोग तो उनके स्तर से बहुत नीचे हैं”।

“ठीक कह रही हो बिटिया, हम लोग पैसे रुपए में उनके सामने कहीं नहीं ठहरते, रहन-सहन में भी बहुत अंतर है, पर उनके बेटे को तुम पसंद आ गई और फिर मां-बाप को भी लगा होगा कि पढ़ी- लिखी संस्कारी लड़की है”।

“पर अम्मा शादी अभी....अभी तो हम पढ़ाई कर रहे हैं ना”।

“लो और सुनो लड़की की बात....”, प्यार से उसके सर पर चपत लगाते हुए दादी शुरू हुईं, “इतना अच्छा रिश्ता खुद चल कर दहलीज पर आया है और हमारी लाड़ो को और पढ़ने की पड़ी है, कौन सा तुझे पढ़ लिख कर कलक्टरी करनी है”।

“अच्छा ठीक है, बातों बातों में तेरी आगे पढ़ने की इच्छा का भी जिक्र कर के उनका मन टटोलेंगे.....”, ताई ने जैसे उसका मन रखने को कहा। “अभी तो तू कल की तैयारी कर, वे लोग कल शगुन ले कर आएंगें”।

“इतनी जल्दी....यानी सब कुछ तय भी हो गया”।

“लो और बताओ...तय न करने का कोई कारण भी तो हो। इतना अच्छा घर परिवार और तेरे ताऊ जी कह रहे थे लड़का भी गोरा चिट्टा सुदर्शन है”।

मौली तख्त पर से उठी तो अम्मा बोली कि अब छत पर मत जाना।

“नहीं कमरे में जा रहीं हूं....”, धीरे से कहती हुई मौली कमरे में आ पलंग पर लेट गई।

अपने जीवन में आने वाली इतनी बड़ी तब्दीली के विषय में सोच उसके मन में अजब सी उठा-पटक चल रही थी। अभी तक तो घर में इतने लोग होते हुए भी वह बस अपनी ही दुनिया में रहती थी। कालेज में भी... उसकी बातचीत तो हो जाती थी और लड़कियों से पर बस मतलब भर की। वह क्लास के अलावा या तो लाइब्रेरी में बैठी पाई जाती या फिर लॉन के किसी फूलों वाले कोने में  किताब में डूबी।

लेकिन इतना तो मौली को भी मालूम था कि यह परिवर्तन तो जीवन में आना ही था, आज नहीं तो कल।

और परिवर्तन जो आया तो जिंदगी पहले से भी ज्यादा खुशगवार हो गई, और भी ज्यादा सपनीली। मौली क्या किसी के मन में भी भूले से भी यह विचार नहीं आया होगा कि उसकी ससुराल में उसके दिन ऐसे गुजरेगें जैसे हथेली में रखी नियामतें, जैसे सच हुआ सपना। 

पहली रात जब सात्विक की कजिन्स उसे उसके कमरे में छोड़ कर गईं तो कुछ पल तो वह बंद दरवाजे से पीठ टिका ठिठकी रह गई। जैसा घर पर रिश्ते की भाभियों, दीदियों ने खाका खींचा था, ऐसा कमरे में कुछ भी नहीं था। न जगर मगर बत्ती, न फूलों से सजा बिस्तर, न लाल गुलाबों के फूलों का बड़ा सा बुके, न रजनीगंधा की महमहाती नाजुक डालियां। कमरे में हल्की बहुत हल्की सी नीली रौशनी पसरी थी, इतनी हल्की रौशनी कि मौली की आंखों को कमरे के अंधेरे का अभ्यस्त  होने में थोड़ा समय लगा तब कहीं जा कर कमरे में रखी चीजों का आकार थोड़ा स्पष्ट होना शुरू हुआ। बहुत बड़ा कमरा, मौली के अपने घर की छत से भी बड़ा, कमरे के एक कोने में खिड़की के पास बड़ा सा बेड, जहाज जित्ता। मौली के मन में ख्याल आया कि इस पर तो वे सारे भाई बहन सो जाएंगे फिर भी जगह बची रहेगी। पर शायद यह कमरे का खुलापन ही था जिसने मौली को एक आश्वस्ति के भाव से भर दिया। वह अपना भारी भरकम लहंगा घसीटती हुई खिड़की तक आई और परदे को थोड़ा सा हटा कर बाहर झांका....और लो उसके मन में जैसे एक साथ कई फुलझड़ियां छूट गई हों। कमरा बंगले के पीछे की ओर तीन तल्ले पर था और इस तरफ सजावटी लाईट लगना तो दूर उनकी ऱौशनी की छाया भी नहीं पड़ रही थी। कमरे की दीवारों जितनी खिड़कियों के कांच के पार से ढेर सारे तारों भरा गाढ़ा बैंगनी आसमान बेरोक टोक सीधा कमरे में उतर आने को बेताब था जैसे। वह किसी चमत्कार से अभिभूत ऐसे ठगी सी खड़ी थी कि उसे सात्विक के कमरे में आने का पता ही नहीं चला, चिंहुक कर जागी तो वह तब जब सात्विक ने सारे के सारे परदे समेट एक ओर खिसका दिए और आसमान ज्यों का त्यों कमरे में उतर आया।

मौली के चेहरे पर छलकते उल्लास और अचम्भे के भावों को लाड़ से देख मुस्कुराते हुए कहा उसने, “अब आप कपड़े बदल बेड पर लेट आराम से आसमान देखिए, आज से उससे मिलने आपको किसी छत पर नहीं जाना पड़ेगा, आप जब भी परदा हटाएंगी उसे यहीं पाएंगी अपना इंतजार करते हुए”।

“आपको कैसे मालूम....”, अटकते हुए बोली मौली।

“अरे हम तो आपके बारे में बहुत कुछ जानते हैं, पर सारी जांच पड़ताल यहीं खड़ी खड़ी करेंगी क्या। आराम से बात करते हैं बैठ कर या फिर आप चांद से ही बतियाना पसंद करेंगी”।

कुछ ऐसा था सात्विक के अंदाज में कि उसके साथ साथ मौली भी खिलखिला कर हंस पड़ी।

जब तक वह फ्रेश हो कर आई सात्विक भी चेंज कर चुका था, उसने मौली से कहा---“आपको पता है ना कि शादी के बाद पहली रात को पति अपनी पत्नी को कोई भेंट देता है तो आप हमसे क्या उम्मीद कर रही हैं”।

“मैं.. क्या..”, अचकचा गई मौली।

“अच्छा छोड़िए, आप अपने इस जहीन दिमाग को इन दुनियावी बातों के जाल से दूर ही रखिए, मैं आपको आपकी भेंट ऐसे ही दिखा देता हूं”। इतना कहते हुए वह कमरे के दूसरे सिरे पर बने दरवाजे की ओर बढ़ चला, दरवाजा खोल अंदर जाते हुए उसने मौली को आवाज दी, आइए, आइए, इधर आइए।

वह चौखट पर आ कर ठिठक गई। झांक कर भीतर देखा, घुप अंधेरा था। “भीतर खड़े सात्विक ने आवाज दी। आ जाइए, इतना झिझक क्यों रही हैं, हम आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगें”।

वह आहिस्ता से भीतर खिसक आई, उसकी आंखें अंधेरे की अभ्यस्त हो पाती कि उसके पहले ही भक्क से लाइट जल उठी और मौली को लगा खुशी के अतिरेक से उसकी सांस सीने में ही अटक जाएगी।

कमरे की वो तीनों दीवारें जिधर मौली का मुंह था, लकड़ी की चमकती बुक रैक्स से ढकीं थी, सामने की एक अलमारी में काही, काले और गाढ़े नीले रंग की दफ्ती की मोटी जिल्द बंधी किताबों के कवर पर चमकते सुनहरे अक्षरों से लिखे नाम उसे इशारा कर रहे थे।

मौली की सम्मोहित अवस्था को तोड़ते हुए सात्विक ने कहा, “इन खाली रैक्स को आप अपनी पसंद की किताबों से भरिएगा, जब चाहें, जितनी चाहें बस आप आर्डर करिएगा और किताबें आपके पास होंगीं”।

कमरे के बीच में एक बड़ी सी मेज-कुर्सी, उस पर एक लैपटॉप, एक खूबसूरत पेन-स्टैंड में लगे पेन और कुछ पैड्स---गरज यह कि मौली के सपनों वाला समूचा स्टडी रूम उसके सामने।  मौली को कंधों से आहिस्ता से पकड़ सात्विक ने उसे चौथी दीवार की ओर घुमाया। दीवार पर एक बड़ी सी खिड़की और उसके पास एक रॉकिंग चेयर। सात्विक ने उसे कुर्सी पर बैठा खिड़की का एक पल्ला खोल दिया और बाहर इंतजार करती रात-रानी की महमहाती खुशबू लपक कर आ मौली से लिपट गई। उसने धीरे से आंखे बंद कर ली ज्यूं सुख को भीतर बसा लेने को।

और फिर यूं ही बीतने लगे दिन। अपने और अपने आस-पास रची-बसी दुनिया में डूबते उतराते। सात्विक काफी व्यस्त रहता था। महीने में तकरीबन पन्द्रह दिन तो व्यवसाय के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहता था पर उसे मौली की छोटी-बड़ी हर जरूरत की जानकारी रहती थी और मौली की हर जरूरत, हर इच्छा पूरी भी होती रहती थी, और जैसे कि मौली की आदत थी अपनी पढ़ाई- लिखाई, किताबों, आसमान के संग उसके दिन अच्छे गुजरते थे, और अब तो पेड़ पौधे भी थे। मम्मी जी भी जैसे उसकी सहेली हों। मौली को नहीं याद पड़ता कि उसके अपने मायके में कभी भी उसकी अम्मा, ताई या दादी ने कभी उसकी गतिविधियो में इतनी रुचि दिखाई थी। वह क्या पढ़ती थी या क्या सोचती थी उनके लिए तो सब उनकी अल्हड़ बिटिया का पागलपन था, खाली दिमाग की उपज। हां, छोटी चाची का मन करता था शायद पर तीन तीन रक्षात्मक सत्ताओं का घेरा तोड़ उनके मन के भावों का बाहर आ पाना तो जैसे सम्भव था ही नहीं। पर यहां बात कुछ अलग ही थी। पता नहीं मम्मी जी को खुद आकाश, बाताश और किताबों में कितनी रुचि थी पर हां वे मौली की हर बात बहुत रुचि ले कर सुनती थी, पूछती थी और शहर में होने वाला पुस्तक मेला हो या कवि सम्मेलन, सात्विक खबर देता था और मौली की इच्छा होने पर मम्मी जी उसके साथ जाती थी।

और समय कैसे गुजरता गया मौली को पता ही नहीं चला। उसने एम,ए. कर लिया। और पी.एच. डी. भी पूरी हो गई। आज ही सारे काम खत्म हुए हैं।

मौली को अपना आप आज बहुत हल्का सा लग रहा है। थीसिस लिखने की धुन में वह इतनी मगन थी कि किताबें, किताबें और किताबें ही याद रहती थीं उसे हर समय। यहां तक कि आखिरी बार फुरसत से वह आकाश से कब मुखातिब हुई थी, यह भी उसे याद नहीं पड़ रहा ठीक से।

बेड पर लेट उसने पूरी खिड़की का पर्दा समेट दिया, पर यह आकाश भी आज इतना धूसर सा क्यों हैं।  नहीं, होता है आकाश ऐसा भी कभी कभी। पर आज क्यों, आज जब मौली इतने दिन बाद उससे बतियाने को उत्सुक है तो वह मुंह फेर कर बैठा है, नाराज है शायद।  होगा ही। इतने दिनों से मौली ने उसकी सुध जो नहीं ली। लेकिन आज मौली का चित्त भी थिर नहीं है, शायद इतने दिनों से एक ही धुन में जुटे रहने के बाद एकदम खाली दिमाग मन को भी उचाट किए हुए है। उसने खिड़की का पर्दा फिर पूरा खींच दिया और आंखे मूंद सोने की कोशिश करने लगी, पर उसमें में भी चैन नहीं पड़ा तो उठ कर अपनी स्टडी में आ गई। काफी गड्डमड्ड अव्यस्थित अवस्था में पड़ा था स्टडी-रूम।  एक बार उसने सोचा कि मालती को आवाज दे कि कमरा ठीक करने में उसकी सहायता कर दे पर फिर उसका खुद ही मन नहीं किया किताबों को कैटेगरी के हिसाब से छांटने और अलग करने का।  वह अनमनी सी वापस कमरे में आ गई और बस यूं ही चलती हुई कपड़ों की अलमारी के सामने आ खड़ी हुई।

अलमारी खोलते ही वह जैसे चौंक गई। इतनी सारी तरह तरह की साड़ियां हैं उसके पास पहले कभी उसका ध्यान ही नहीं गया इस तरफ। उसने एक सिरे से जलतरंग की तरह उंगलियां फिराई साड़ियों की कतार पर। एक रेशमी सी अनजानी सिहरन उसके भीतर उतरती चली गई। आहिस्ता से आसमानी जार्जेट की पतले से जरी बार्डर वाली साड़ी बाहर निकाल ली।

ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी मौली को अपना आप ही कुछ अनजाना सा लग रहा था। क्या एक बड़ी सी लाल बिंदी और सिंदूरी मांग से चेहरा ऐसे दिपदिपाने लगता है या फिर उसके भीतर के सुख की लुनाई यूं छलछला रही है चेहरे पर। सच, कितना तो सुख ऊपर वाले ने भर दिया है उसके जीवन में, भीतर–बाहर सब। इस ख्याल के संग ही, बिजली सा एक ख्याल और कौंध गया मौली के मन में....।

मम्मी जी, सात्विक, पापा जी सबने कितना कुछ किया है उसके लिए। कितना कुछ दिया है पर उसने......उसने क्या किया इन लोगों के लिए। वह अपनी ही धुन में, अपने मन का जीवन जीने में इतना व्यस्त थी कि उसका कभी ध्यान ही नहीं गया इस तरफ। एक बेख्याली में जैसे बस वह अपने ही रास्ते पर बढ़ती गई। सब लोग जो कुछ उसके लिए करते रहे, जुटाते रहे उसे बस ऐसे जीती चली गई जैसे बरसों तक मन ही मन सहलाई जाती रही, मुराद का फलित होना भीतर तक उतार रही हो, य़ह सच भी था, पर वह एक नींद में सपने सा जीवन जीती रही और किसी ने उसे झिंझोड़ कर जगाने की भी नहीं सोची।

उसका मन थोड़ी ग्लानि और ढेर सारी कृतज्ञता से लबालब भर गया। एक नए निश्चय के साथ वह सात्विक के घर लौटने का इंतजार करने लगी। पर उसे कहां मालूम था कि उसे किस दिन लौटना है। पिछले कुछ दिन तो थीसिस सबमिट करने की व्यस्तता में वह इस कदर खोई थी कि उसे अपने आसपास का कुछ होश ही नहीं था।

उसका मन किया कि मम्मी जी से जा कर पूछ ले पर फिर झिझक ने उसके पैरों को रोक लिया। अव्वल तो उसने आज तक कभी मम्मी जी से इस तरह की कोई बात की नहीं थी फिर उसे यह तक मालूम न हो कि सात्विक को कब लौटना है, यह अपने आप में कितना अजीब है। सच पूछा जाए तो उसे आज तक यह जरूरत कभी महसूस ही नहीं हुई। शहर में हो या शहर और देश से बाहर सात्विक ही नियम से उसे फोन कर सब सूचित करता रहता था और वह भी जैसे इसी को नार्मल समझने की आदी हो गई थी।

उसका मन किया कि सात्विक को फोन करे पर क्या कहेगी। ऐसा नहीं कि उसने कभी अपनी तरफ से फोन नहीं किया पर हर बार कोई ठोस वजह होती थी----- कभी कोई किताब चाहिए होती थी, कभी किसी प्रोफेसर से मिलने जाने के अरेंजमेंट के सिलसिले में। मन में यह बात आते ही उसे कैसी तो शर्म आई..... कैसे वह अपनी ही दुनिया में खो इतनी स्वार्थी सी हो गई थी। सबकी भरपाई करने की व्याकुलता जैसे उसे अंदर ही अंदर मथने लगी।

शाम की चाय का समय होने वाला था, एक बार उसका मन किया कि ऐसे ही तैयार हुई नीचे उतर जाए, फिर सोचा मम्मी जी पूछेगीं तो क्या कहेगी, कपड़े बदल वह नीचे आ गई।

चाय के बीच में ही मम्मी ने कहा, लौट कर कुछ आराम किया या नहीं, आज तो बहुत दिनों की थकान उतारनी होगी। चाय पीने के बाद भी चाहो तो आराम कर लो। आज तो सात्विक की फ्लाइट थोड़ी देर की है। खाना उसके आने के बाद साथ ही खाएंगें. य़ा फिर तुम जल्दी सोना चाहो तो महाराजिन चाची से कह दो, तुम्हारे लिए कुछ बना कर ऊपर ही पहुंचवा देगीं।

नहीं नहीं, साथ ही खाएंगे......कुछ ऐसी हड़बड़ाहट थी उसके लहजे में कि मम्मी थोड़ा चौंक कर उसका चेहरा देखने लगीं और वह चाय के कप पर थोड़ा और ज्यादा झुक गई।

वापस आ, उसने एक नए उत्साह में भर तैयारी शुरू कर दी। सात्विक वापस आते ही ऊपर आयेंगे फ्रेश होने तभी वह उन्हें सरप्राइज देगी। आसमानी साड़ी का आंचल लहरा खुद को एक बार फिर देखा तो उसे खुद पर ही नाज़ हो आया। बेकली में कमरे में टहलती हुई वह स्टडी की खिड़की तक आ पहुंची। नीचे रात-रानी की लतर के पास आती आवाजों ने उसका ध्यान खींचा। थोड़ी थिरछी हो खिड़की के पल्ले से टिक उसने उधर कान लगाए। ऐसा करते हुए उसने खुद को ही लानतें भेजीं.....ये हो क्या रहा है उसे। कैसी हरकतों पर उतर आई है आज वह। पर आज उससे अपना आप जैसे समेटा नहीं जा रहा था। हवा में तैर उस तक पहुंचती माली काका की अठारह साला नई ब्याही बिटिया और उसे विदा कराने आए दामाद का फुसफुसाहटें उसे एक अंचुहे ज्वार में डुबो गई। तभी उसे कमरे के दरवाजे पर आहट सुनाई पड़ी और वह आहिस्ता से अंधियारे कमरे में खिसक आई।

“मौली, मौली... आप सो गईं क्या। मम्मी तो कह रही .......”, और सात्विक के बाकी के शब्द उसके गले में ही अटक गए। अंधेरे में ही उसे जैसे महसूसती हुई मौली उसके इतने करीब आ खड़ी हुई थी कि वह उसकी सांसें सुन भी पा रहा था और महसूस भी कर रहा था।

एक झटके से अपनी जगह से हट उसने लाइट का स्विच आन कर दिया। मौली अभी भी अपनी जगह पर आंखे बंद किए खड़ी थी। उसके चेहरे पर छलकते भाव सात्विक को बदबहवास सा कर गए।

“मौली..मौली, उसे लगभग झिंझोड़ते हुए बोला वह....क्या हो गया है आपको। आज आप ये कैसी.....”

मौली ने अचकचा कर आंखें खोल दीं..... “मैं..मैं वो........” क्या कहे वह। उसे तो लगा था कि अंधेरे में उसकी देह गंध ही सब कह देगी और सात्विक धीरे से अपने और पास कर लेंगे उसे और फिर....................लेकिन अब..........सात्विक के चेहरे पर नजर पड़ते ही एक ठंडी लहर उसे भीतर तक काटती चली गई...कैसे तो अन्चीन्हे लग रहे थे सात्विक।

थोड़ा संभलते हुए सात्विक ने कहा, “मैं फ्रेश हो लूं। नीचे सब लोग खाने पर इंतजार कर रहे हैं”  और बाथरूम के भीतर चला गया।

मौली कुछ देर बंद दरवाजे को एकटक देखती रही फिर एक उसांस भर कपड़े बदलने लगी। उसने खुद को समझाने का कोशिश की---- अचानक से उसे इस रूप में देख अचकचा गए हैं सात्विक।  वह इतने दिन अपनी ही दुनिया में रची बसी जीती रही और सात्विक भी उसी के अनुरुप जीते रहे और आज अचानक जब उसका मन उमड़ा पड़ रहा है तो वह चाह रही है कि वह भी अचानक उसी रंग में रंग जाए। ऐसा भी भला कभी होता है। आदमी इतने दिन बाद थका हारा घर आए और उसे एकदम से यूं चौंका दिया जाय तो और कैसा रिएक्शन देगा। यूं ही अपने से सवाल जवाब करती वह जीना उतर गई।

डाइनिंग टेबल पर सब इन्हीं लोगों का इंतजार कर रहे थे।

अभी सात्विक फ्रेश नहीं हुआ था क्या। मम्मी जी ने पूछा

“नहीं, बस आ रहे हैं.....”

खाने की मेज पर सात्विक की नजरें बार-बार मौली के चेहरे को टटोलने के लिए उठती रहीं और क्षणांश को उसकी हौले से उठती नजरों से टकरा लौट जाती रहीं। बात-चीत होती रही पर कहीं भीतर ही भीतर एक कसाव सा कंपकंपाता रहा। सब ही अपने-अपने भीतर कहीं गुम थे।

 

“आप ऊपर चलिए, मैं पापा को टूर के विषय में थोड़ा ब्रीफ कर के आता हूं.....” कहते हुए सात्विक बाहर के कमरे की ओर मुड़ गया। मौली कुछ देर तक उसकी दूर जाती पीठ पर नजरें गड़ाए देखती रही, फिर धीरे से सिर झटक, सीढ़ियां चढ़ गई।

सात्विक जब तक कमरे में आया, मौली सो चुकी थी। उसने साइड लैम्प का स्विच आफ किया, किताब सीधी कर रखी और धीरे से खिड़की का पर्दा सरका दिया। बाहर आसमान तारों से भरा था।

“मौली..मौली” उसने धीरे से आवाज दी.......दो तीन आवाजों में ही मौली ने चौंक कर आंख खोल दी, वह थी भी तो इसी आवाज के इंतजार में।

“मौली, हम बात कर सकते हैं न इस समय, तुम जग रही हो न.......”

“कहिए न....”, मौली ने आवाज में ढेर सा मनुहार भर कर, सात्विक के थोड़ा नजदीक खिसकते हुए कहा।

“मौली, जानती हैं हमने आपसे ही शादी क्यों की। बहुत सारे लोग रिश्ते के लिए घेरे रहते थे मम्मी-पापा को, यह अंदाजा तो आपको भी होगा पर.....आप किताबों, ख्यालों की दुनिया में ही गुम रहती थी...आस-पास लोगों की उपस्थिति से आपको जैसे फर्क ही नहीं पड़ता था। हमें लगा था कि हम आपके चारों ओर आपका यह कविता कहानी का संसार रच कर आपको बेइंतहा खुश रखेंगे। हमें लगा था ,यही आप चाहती हैं............”

“सच है इस घर में आ कर मैं अपने सपनों को ही जी रही थी। सपने भी यूं हकीकत में तब्दील होते हैं, यह तो.....” मौली ने लरजती आवाज में कहना शुरू ही किया था कि....

“लेकिन....आज...आज आपकी आंखों में जो हमने पढ़ा.....मौली, हम आपकी वो इच्छाएं, वो जरूरतें पूरी नहीं कर सकते....हम दोस्तों की तरह रह सकते हैं पर.....हम किसी भी लड़की से उस तरह से नहीं जुड़ सकते......”

सात्विक और भी न जाने क्या क्या कहता रहा पर मौली तक उसकी आवाज पहुंचनी बंद हो गई थी.......उसने खिड़की की ओर चेहरा घुमा लिया धीरे से...

बाहर जगमग तारों भरा आसमान बेड के नजदीक तक उतर आया था पर उनकी रौशनी मौली तक जैसे पहुंच नहीं रही थी.............

रूमानी दुनिया में जीने वाली मौली के भीतर की वह अल्हड़ लड़की न जाने किस खोह में जा दुबकी थी।

तमाम उम्र जिन सपनों को जीने की चाह पाली हो, वो पूरे होने पर भी यूं चुभते हैं......!!!!!

 

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