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समय-समय की बात
समय-समय की बात
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© Tulsi Tiwari

Drama

18 Minutes   14.7K    25


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पत्र खोलते हुए उसके हाथ कांपने लगे, दिल की धड़कने बेतहाशा बढ़ गईं, कोई सरकारी पत्र नहीं था क्योंकि कहीं कोई सील मोहर नहीं था, अवश्य कोई व्यक्तिगत पत्र था, हल्के नीले रंग का लिफाफा था उसके हाथों में। आजकल भला कौन बैठता है चिट्ठी लिखने ? घर में झाडू पोछा करने वाली से लेकर सड़क पर फटेहाल रिक्शा चलाने वाले तक कान में मोबाइल लगाये वक्त-बेवक्त दूर-दराज के लोगांे से गपियाते नजर आते हैं, ऐसे में यह बन्द लिफाफा मन में कई तरह के प्रश्न उठाने वाला साबित हो रहा था।

‘‘चश्मा कहाँ रख दिया मैंने ? ’’लिफाफे से एक सुन्दर लिखावटों वाला पत्र निकालकर वह अपना चश्मा ढूढ़ने लगा था - भूलने की आदत ने हैरान किया है शुरु से ही, आॅफिस से आकर मोबाइल, चश्मा, पर्स, यहाँ-वहाँ रखकर भूल जाता था, बस फिर घंटे दो घंटे खोजते रहो, उसने कई आइडियाज़ निकाले, जैसे-इन वस्तुओं को एक से अधिक खरीद कर रखा, गले में लटका कर रखने की व्यवस्था की फिर भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। ‘‘अरे ! ये चश्माा तो बहुत परेशान करता है ! एक दिन तो ऐसा गुमा की खोजते-खोजते हलाकान ही कर दिया, पचीसों जगह फोन करके पूछा, जहाँ-जहाँ गया था, जाकर खोजा, जब नहीं मिला तक फिर डाॅक्टर से जाँच करवाकर नया बनवाया, पन्द्रह दिन बाद एक दिन अचानक बाइक में जहाँ सामान रखने की जगह है, वहाँ आराम से पड़ा मिला, लगता है आज भी वैसे ही सतायेगा।’’

‘‘देखूं कहीं खिड़की, किचन, लिखने पढ़ने की टेबल या किसी खूंटी पर न लटक रहा हो।’’ उसने सब जगह खोजा, पता नहीं क्या लिखा है चिट्ठी में, उसने व्याकुलता से पहलू बदला।

बहुत पहले उसे एक पत्र मिला था, तब वह नया-नया इंजीनियरिंग करके निकला था, बस्तर के घनघोर जंगल में सड़क बनाने का ठेका मिल गया था उसे, शायद इसलिए कि उस तरफ काम करने की परिस्थितियाँ बड़ी जटिल थीं।

आज भी वहाँ कई स्थान ऐसे हैं जहाँ दिन में भी सूर्य दर्शन नहीं होते। झाड़ झंखाड़ पशु-पक्षी, साँप-बिच्छू से ज्यादा भय तो नक्सलवादी गतिविधियों के कारण था, हजार मुश्किले पार कर कुछ काम हो भी जाय तो, बजट का 50 प्रतिशत उन्हें दो नहीं तो हुआ काम मटियामेट कर देने में उन्हें कितनी देर लगती है ? उसे पता चला सरकारी गैर सरकारी सभी प्रकार के निर्माण कार्यों में उनकी हिस्सेदारी पक्की जैसी है, अब न उसे ठेका वापस करते बना न ही वह इस पहले ही काम में घाटा उठाने की हिम्मत कर सका,पुरानी लीक पर चलना उसकी विवशता बन गई थी।

घर से गये लगभग एक वर्ष हो चुके थे उस समय मोबाइल का इतना चलन नहीं था, फोन वहाँ लगता नहीं था, पत्र आने से ही घर परिवार का समाचार मिलता था, घर में बूढ़ी दादी को वह नौकरानी के भरोसे छोड़ गया था, उम्र का तकाज़ा था कि उन्हें अकेली न छोड़ा जाय।

‘‘अपनी योग्यता सिद्ध कर दुनियाँ के सामने ! मैं तेरी प्रतीक्षा करूँगी।’’ उन्होंने ही उसे उत्साहित किया था। उसने जी जान से मेहनत करके काम पूरा किया, आने वाली हर मुसीबत का सामना कर उसने वांछित सड़क बनाई, शेष बचे 50ः में ही, परन्तु निर्माण पूरा होने के दूसरे दिन ही वह सड़क बारूद से उड़ा दी गई अपनी जान बचाने की चिन्ता में वह व्याकुल था, निकल भागने का मार्ग खोज रहा था कि डाकिये ने उसे लिफाफा लाकर दिया।

उसे झटका सा लगा-‘‘दादी’’ ! उसके दिल से आवाज निकली, पत्र खोलकर पढ़ा, उसमें उनकी बीमारी का समाचार था, उसने सब कुछ जैसे का तैसा छोड़ा था, जैसे था वैसे ही गाँव के लिये निकल गया था। जब वह गांव पहुंचा तब तक दादी को संसार से विदा हुए पन्द्रह दिन हो चुके थे, परायों के हाथ का आग-पानी ही मिल सका था उन्हें । उस अनाथ को दादी ने ही पाला-पोसा, पढ़ाया, लिखाया था और वह उन्हें एक बून्द पानी भी नहीं पिला सका अंत समय में।’’ टूट गया था वह तन-मन से, साल भर लगा था उस सदमें से उबरने में।

‘‘अब यदि चश्मा नहीं मिल रहा है तो वह कैसे पढ़े उस पत्र को ?’’ बेटियाँ अपनी ससुराल में हंै, बेटा अपनी नौकरी पर, उसके मन में शंका के नाग ने सिर उठाया।

‘‘नहीं ! बच्चे ठीक हैं। सुबह फोन आता है कल्याणी का..... कैसे हैं पापा ? दवाई ली या नहीं,खाना ठीक से खाइयेगा, आज ठंड बहुत है, घर में ही मार्निंग वाॅक कर लीजिएगा।’’

शाम को कैलाश का ‘‘पापा आप अच्छे तो हैं न ?’’ नौकरानी आयी या नहीं, सभी दवाइयाँ ली न आपने समय से, पापा चिन्ता तो नहीं करते ? मैं कोशिश कर रहा हूँ पापा, लखनऊ ट्रांसफर कराने की और मैं तो कहता हूं यहीं आ जायें, शाम सबेरे हम देखते तो रहेंगे, कविता भी आपको बहुत मिस करती है, नौकरी न होती तो ऽ...ऽ..!’’ वे ठीक हैं बाकी चाहे जैसा भी समाचार हो, उसे धैर्य से पत्र पढ़ना होगा, अन्य किसी समाचार से उसे कोई विशेष फर्क पड़ने वाला नहीं, एक बहन है शुभांगी, वह भी अक्सर फोन करती रहती है। उसने शुरू से ही करूणा की जिम्मेदारी ले ली थी। वह उन्हें ही माता-पिता समझती है, ठीक है बच्ची अच्छे घर गई है, पापा नहीं मामा कहती है। वह तो पापा ही सुनता है।

कितने गाढ़े समय में दीदी ने साथ दिया था, लगता था, उसका समूल सर्वनाश हो जायेगा, दाता की मर्जी के आगे किसकी चलती है ? सालों तक तो जीवन सूना-सूना सा रहा, वह हर माह कामिनी की ओर देखता, शायद बताये कि वह उम्मीद से है, उसके एक-एक लक्षण देखता, शायद वह समझ न पा रही हो अपने शरीर में होने वाले परिवर्तन, दीदी जब भी आती खुशखबरी पूछती, बताने लायक कुछ भी न होता उसके पास, अपनी नौकरी मंे व्यस्त रहते दोनों अपनी कमियों के साथ।

और जब भगवान् ने दिया तो एक साथ इतना दिया जिसके भार से उसकी झोली फट गई, बड़ी मुश्किल से कटे थे वे दिन, कामिनी का बढ़ता पेट रोज रोज की नई-नई परेशानियाँ, ऊपर से सोनोग्राफी की वह रिपोर्ट तो गजब ढाने के लिए पर्याप्त थी, जिसमें बताया गया था कि गर्भ में तीन बच्चे पल रहे हैं। उसने डाॅक्टरों से सलाह की थी, पता चला यदि एक बच्चे के लिए कुछ किया जायेगा तो तीनों की जान को खतरा होगा। कामिनी ने अपने आपको ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया। ‘‘जिसने दिया है वही सम्हालेगा, कामेश्वर तुम चिन्ता मत करो, जो होगा अच्छा ही होगा।‘‘ वह हमेशा हौसला बढ़ाया करती।

‘‘तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है कामिनी, तुम्हारे बिना मैं बच्चे लेकर क्या करूँगा ? हम पहले ही ठीक थे मुझे नहीं चाहिए बच्चा- वच्चा।’’ वह देख रहा था कामिनी की पीली पड़ती काया, एक हाथ का सहारा बनाकर वह अपने पेट को सम्हाले रहती थी। दीदी अक्सर आ जाया करतीं थीं, घर के कामों में मदद करतीं, हौसला बढ़ातीं और उसे कुछ खिलाने पिलाने का उद्यम करती-‘‘चार जीवों के पोषण लायक खाओ कामिनी, यह लो मेवे वाला शुद्ध घी से बना हलुवा, तुम्हें तो बहुत पसन्द है न ? ’’

‘‘दीदी! पेट का भार इतना है कि मुझे खाने में डर लगता है!’’

‘‘डरो नहीं, सब ठीक होगा, लो पालक का जूस पीओ, चुकन्दर और गाजर का मैंने शाम के लिए बना रखा है।’’ उन्हें तो भगवान् ने औलाद नहीं दी, पूरी जिन्दगी सन्तान के लिए तड़पते बीत रही थी।

‘‘तुम्हें मुझ पर भरोसा हो तो दे देना एक बच्चा मैं पाल लूँगी, बाकी दो तुम दोनों पाल लेना, सब हो जायेगा, दरअसल भगवान् ने मेरे लिए ही तेरी कोख में एक अतिरिक्त डाल दिया है।’’ वे हँसी मजाक कर कामिनी को बहलाये रखतीं, घर छोड़ कर बार-बार मायके आने के कारण जीजाजी नाराज रहने लगे थे।

‘‘तुम्हें मायका इतना प्यारा। है तो वहीं रहो, मुझे क्यों फंसा के रखी हो ? मेरे घर को भी तो औरत की आवश्यकता है। जीजाजी खीझते। दीदी जातीं दो चार दिन उन्हें मना कर फिर आ जातीं।

पेट का वजन खतरनाक ढंग से बढ़ रहा था। सातवें माह में ही आॅपरेशन कर उन्हें निकाल लेना पड़ा, किन्तु कामिनी उन्हें छोड़कर संसार से चली गई।

दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा था उसके ऊपर, छोटे-छोटे तीन बच्चे, दो बेटी एक बेटा ! वजन एक-एक़ किलो, रबर के गुड्डे जैसे, उन्हंे गर्भकाल पूरा होने तक अस्पताल में ही रखना पड़ा, कामिनी का जाना, उसे पूरी तरह तोड़ गया। साथ ही अटूट बंधन में बांध गया। जिनके लिए उसने अपनी जान दे दी, उन्हें बचाने की जिम्मेदारी अब उसकी थी। लखनऊ नगर निगम में वह नौकरी करता था। जिम्मेदारी ऐसी थी कि वह घर में कम ही रह पाता था। विवश होकर उसने एक वर्ष का अवैतनिक अवकाश ले लिया था। कामिनी निहायत घर जोड़ू औरत थी, उसकी जोड़ी गृहस्थी अब आठ-आठ आँसू रो रही थी, उसे तो रोने बैठने की भी फुरसत नहीं थी, भाई-बहन अस्पताल के बरामदे में बैठे काँच के बाहर से अपने बच्चों की रात-दिन रखवाली करते, जब भी वे पक्षी जैसे अपना नन्हा सा मुँह खोलते दीदी नर्स के पास दौड़ी जातीं,’’ बच्चे रो रहे हैं, दूध पिला दीजिए। ’’ या शायद गीला किया है, प्लीज देख लीजिए।’’

‘‘कैसे पालूँगा कामिनी तुम्हारी अमानत ?’’ एकान्त पाकर वह जी भरकर रोता, अब तक की जिन्दगी उत्सव की तरह बीत गई थी, वह इस तरह चली जायेगी, ऐसा सोचा भी नहीं था उसने, उसका चिकित्सा विज्ञान से विश्वास उठ गया, कहते हैं आॅपरेशन के दौरान अधिक रक्तस्त्राव के कारण मृत्यु हो गई। वे कहते तो वह अपना एक-एक बून्द खून उसे दे देता, सब कहने की बातें हैं यह ईश्वरीय अन्याय है उसके प्रति।’’

‘‘ऐसा मत सोचो भाई, भगवान् तुम्हारी परीक्षा ले रहे हैं, देखना ये तीनों एक दिन बड़े हो जायेंगे, हमारी बच्चियाँ अपनी माँ जैसी होंगी, बेटा तुम्हारी तरह, उस दिन के इंतजार में हम सारी कठिनाईयों पर विजय पायेंगे।’’ दीदी उसे समझाया करती।

जीजाजी ने कानपुर के घर को किराये पर देकर लखनऊ में ही रहने का फैसला किया, उन्होंने बच्चों के लिए ही अपना व्यापार नये सिरे से प्रारंभ किया।

‘‘कामेश्वर ! ये तीन हम तीन है, हम अवश्य जीतेंगे।’’ जीजाजी ने हिम्मत दी थी, रूई के फाहे से उन्हें गाय का दूध पिलाया जाता, जब रोते तो तीनों एक साथ, सोते तो एक साथ, जागते तो तीनों एक साथ, कभी-कभी तो रात जागते ही बीत जाती।

‘‘ये अवश्य बड़े हो जायेंगे भाई घबड़ा मत!’’ जब वह नींद से व्याकुल होकर निराश हो जाता और बच्चे को गोद में काँय...काँय करते देख चिड़चिड़ा जाता तब दीदी समझातीं।

ले...देकर साल बीता, बच्चे प्रति दिन रूप बदल रहे थे। उनका वजन बढ़ गया था, तकिये के सहारे बैठने लगे थे, डाॅक्टर्स का कहना था कि इनके चलने में कुछ विलंब हो सकता है, मालिश जारी रखें।

‘‘देख, कामेश्वर जिन्दगी बड़ी कठिन डगर से होकर गुजर रही है, इसमें एक ही आशा की किरण है,’’ दीदी कुछ कहने की भूमिका बांध रहीं थीं।

‘‘कौन सी किरण दीदी ?’’

‘‘देख ! दूध गिर गया तो क्या हुआ, दोहनी तो है।’’

‘‘मैं समझा नहीं क्या कहना चाहती हो!’’

‘‘मैं सोचती हूँ तुझे दूसरी शादी कर लेनी चाहिए।’’

‘‘ये क्या कह दी दीदी ? कामिनी के बाद अब कोई कामना शेष नहीं है मेरी, अब तो जैसे-तैसे इन्हें बड़ा करना है, जीवन में सुख ही बदा होता तो वह क्यों साथ छोड़ देती।’’ उसका स्वर पीड़ा के सागर से निकलकर आ रहा था।

‘‘अपनी कामना के लिए मैं कहाँ कह रही हूँ ? मेरी भी उम्र हो रही है, बच्चों को सम्हालने में थक जाती हूँ नौकरानी के भरोसे तो छोड़ा नहीं जा सकता, अब ये चलेंगे, तीनों एक साथ भागेंगे, रोयेंगे, गायेंगे, हम कैसे सम्हालेंगे भाई ? हो सकता है भगवान् इन्हें माँ दे दे ये पूरी जिन्दगी माँ कहे बिना कैसे जियेंगे भाई ?’’ फिर तू भी कब तक काम छोड़कर घर बैठा रहेगा कहते कहते वे रोने लगीं।

‘‘दीदी ! और मुसीबत को न्यौता मत दो, देखती नहीं सौतेली माँ के किस्से, जिन्हें जीवन का लक्ष्य बना रखा है, उन्हें उपेक्षित अपमानित होते कैसे देखेंगे।’’ वह ग़मगीन हो गया था।

‘‘सभी एक तरह की नहीं होतीं,कई तो माँ से ज्यादा अच्छे से बच्चे पालतीं हैं, अभी ये इतने छोटे हैं कि अपना-पराया नहीं समझ पायेंगे, जिससे प्यार और अपनापन मिलेगा, उसी के हो जायेंगे।’’ दीदी ने समझाया।

‘‘ठीक है दीदी जैसा आप उचित समझो, बस मेरी शर्त इतनी ही है कि बच्चों को अपनाने वाली मिले।’’ उसने हथियार डाल दिये थे।

‘‘मुझे तो नहीं लगता कि तीन-तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाने कोई औरत आयेगी।’’ उसने लापरवाही से कह दिया था।

‘‘तीन कहाँ करूणा तो मेरी ही है, दो कहो, चार बच्चे सम्हालने वाली भी मिल जाती है, एक औरत के सिवा क्या कमी है हमारे घर में ?’’ वे आशान्वित थीं, शाायद अपने ऊपर उन्हें कुछ ज्यादा ही भरोसा था।

चिट्ठियों का आना-जाना उस समय भी कुछ हुआ था - ‘‘अरे मर गया चश्मा मेरा। मिलेगा तो पटक ही दूँगा।’’

‘‘कूहू...ऽ....ऽ... कुहू ......कुहू ..ऽ...ऽ...!’’

‘‘कौन आ गया ? नौकरानी होगी और कौन होगा ?’’ वह दरवाजे की ओर बढ़ा।

हाँ वही थी, सदा की भांति गंभीरता की चादर ओढ़े सिर पर पल्लू डाले।

‘‘चम्पाबाई!’’

उसने निगाहें उठाईं उसकी ओर प्रश्न पूछती ।‘‘मेरा चश्मा नहीं मिल रहा है..... कब से परेशान हूँ।’’

‘‘मैं देखती हूँ जरा ठहरिये आप।’’ इधर-उधर देखती वह अन्दर प्रविष्ट हुई।

उसे बहुत दिन हो गया इस घर में, वह विश्वास करता है उसका, परन्तु वह हमेशा सतर्क रहती है एक अकेले आदमी से, आदमी की भावना कभी भी बदल सकती है क्या ठिकाना ?

‘‘ये लीजिए!’’ वह किचन से चश्मा लेकर आ रही थी।

‘‘ये कहाँ था..... बताना जरा।’’ उसका गुस्सा चश्में के ऊपर था

‘‘वाशबेसिन के पास’’.. वह निर्लिप्त थी, उनका चश्मा गुमना कोई नई बात थोड़े ही थी।

‘‘वहाँ कैसे पहुँचा नामुराद ?’’

‘‘खाना खाकर आप जब हाथ मुँह धोने गये थे तब उतार कर रख दिये होंगे।’’ वह अन्दर जाकर अपने काम में लग गई।

उसनेे चश्मा नाक पर चढ़ाया और पत्र लेकर पढ़ने लगा। वह एक लंबा पत्र था.... लिखा था ......

आदरणीय,कामेश्वर जी,

नमस्कार

एक अरसे के बाद आपको पत्र लिख रही हूँ,आप तो शायद मुझे भूल ही गये होंगे, आखिर क्यों न भूले ? मैंने आपका प्रस्ताव जो ठुकरा दिया था।

‘‘हैं ..ऽ...ऽ... किसका पत्र है ? नीचे देखा तो लिखा था आपकी पवित्रा, ‘‘ये पवित्रा कौन है ?’’ आगे पढ़ने पर ही पता चलेगा।’’

उसने आगे पत्र पढ़ा .......

लीजिए मैं याद दिलाये देती हूँ, आप अपनी शादी का प्रस्ताव लेकर हमारे घर आये थे, अपनी दीदी की ससुराल इस गाँव में होने का वास्ता दिया था, तब मेरा नया नया तलाक हुआ था, पुरूष के प्रति कटुता की अधिकता थी मेरे मन में। मुझे लगा आपको जीवन साथी की नहीं एक आजन्म कैदी आया की आवश्यकता है, जो आपके तीनों बच्चों को पाल सके, आपकी शर्त सुनकर मेरा मन उचट गया था, भूल गये ? अरे वही ‘‘मेरे बच्चों की उपेक्षा करने वाली, उसी पल से मेरी शत्रु हो जायेगी, जिस पल मुझे इसका आभास भी हो जायेगा।’’ आपकी दौलत आपका अनिंद्य चरित्र, आपकी शालीनता सब पर आपकी शर्त भारी थी इसीलिए मैंने साफ मना कर दिया था।

शादी तो मुझे दुबारा करनी ही थी, मैंने अपने ही समान बिना बच्चे वाले से शादी की। वैसे तो वह अच्छा कमाता था, परन्तु पीने की लत के कारण उसने मेरी जिन्दगी नरक कर दी, तीन लड़कियाँ छोड़कर ऊपर चला गया, अब मेरी जिन्दगी बड़े दुःख से गुजर रही है, मुझे पता है आप अब भी अकेले हैं, यदि आप चाहें तो मैं आपसे शादी करने को तैयार हूँ, मेरी बच्चियों को आपके जैसे पिता की आवश्यकता है जो उन्हें अपने बच्चे के समान प्यार कर सके, यही शर्त थी न आपकी ? मुझे आपका फोन नंबर मालूम नहीं था फिर इतनी बातें फोन पर अच्छी नहीं लगती, इसीलिए पत्र भेज रही हूँ। मुझे विश्वास है आप मुझे निराश नहीं करेंगे।’’

आपकी

पवित्रा हमीरपुर (उ.प्र.)

मो.नं. 93xxxxxxxx

उसका माथा झनझना उठा पत्र पढ़कर।

अब आ रही है शादी करने, उस समय तो इतरा रही थी, जब मेरी गरज थी, बच्चों को माँ की गोद की आवश्यकता थी, अब जब अपनी बेटियों की बात आई तो पत्र लिख रही है। अब क्या होगा शादी करके ?’’

‘‘क्यों ! आज भी तो एक साथी की आवश्यकता है बच्चे बड़े होकर अपने अपने ठिकाने लग गये, जब तक छोटे थे उन्हीं के सहारे दिन कट गये, अब तो बात करने के लिए मुँह गंधाता रहता है, किससे कहे अपने दुःख-सुख ?’’ मान लेना चाहिए उसका प्रस्ताव ।

’’पागल हो कामेश्वर ! फिर से अपने गले में फंदा डाल रहे हो, उसकी तीन-तीन बेटियों की जिम्मेदारी लोगे अपने सिर पर ?’’

‘‘क्यों नहीं, जब अपनी गरज थी तब तो बहुत उम्मीद लगाया करते थे, कितनी गालियाँ दी थी तुमने इस पवित्रा को, अब समझे परायी सन्तान को पालना सहज नही है।

पवित्रा ही क्यों ? सैकड़ों घर के दरवाजे खटखटाये थे उसने, बस एक ही बात थी बीच में ? मेरे बच्चों को अपनाना होगा।’’ किसी ने हिम्मत नहीं दिखलाई, एक जगह तो दीदी को इतनी लानत-मलानत झेलनी पड़ी की पूछो मत, किसी विधवा अथवा तलाकशुदा बड़ी उम्र की स्त्री की खोज में वे एक घर गईं थीं, उनका मानना था कि बात-बात में बात बन जाती है, उन्होंने अपनी समस्या बता दी, संयोग से घर में बीस वर्ष से कम की दो लड़कियाँ थीं, गृहिणी ने सोचा, यह मेरी लड़कियों के लिए बात कर रही है।’’

बस फिर क्या था, जो चण्डी का अवतार हुआ तो दीदी को सफाई देते न बना था-

‘‘तुझे शर्म नहीं आती बुढ़िया, तेरे बूढ़े भाई और तीन-तीन बच्चों को सम्हालने के लिए मेरी ही मासूम बेटी मिली है ? तेरा तो लगता है दिमाग खराब हो गया है, भाग यहाँ से नहीं तो दो लाठी दूँगी, बाँझ है इसीलिए परायी बच्ची का दर्द नहीं समझती।’’ वह दहाड़ रही थी।

‘‘विश्वास करो बहन जी, मैंने आपकी बेटियों के लिए सोचा भी नहीं, मात्र पूछा है कि आपकी जानकारी में कोई है क्या ?’’

‘‘भाग यहाँ से, झूठ बोलकर अब बात बना रही है।’’ दीदी रोती हुई घर आईं थीं।

‘‘हमारी हीरे जैसे कामिनी होती तो ऐसी गति क्यों होती कामेश्वर ?’’

‘‘अपनी मुसीबत हम स्वयं ही झेलेंगे, किसी ने ठीक ही कहा है, अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता। हम अपने बच्चों को बड़ा करेंगे’’। उसने दीदी को सम्हाला था।

‘‘अब जब उम्र हो गई काम छोड़ कर घर बैठ गया, बहू बेटे वाला हो गया तब आ रहा है विवाह का प्रस्ताव, इनकी बात मान लूं ताकि, औलाद से भी हाथ धो लूं, हर एक काम का समय होता है।’’ वह स्वयं से बात कर रहा था।

‘‘साहब चाय बना दूँ ?’’ चम्पा ने पूछा था।

चार बज चुके थे, यह उसके चाय का वक्त था, किन्तु जाड़े का बादल वाला दिन देर हो जाने का आभास करा रहा था, उसे लगा था आज बाई चाय देना भूल गई है।

‘‘तो गोया आज चाय की छुट्टी करना चाहती हो ?’’

‘‘नहीं साहब बन गई है।’’ वह लजा सी गई।

वह सोच रहा था पत्र के बारे में किसी से सलाह मशविरा करना चाहिए, ‘‘पर किससे ? वह तो अकेला रहता है, करूणा की नौकरी के कारण दीदी, जीजाजी उसी के पास रहने लगे हैं उसके बच्चे की देखभाल भी तो होनी चाहिए। कल्याणी भरे पूरे परिवार में गई है, उसकी नौकरी और बच्चा सब ठीक चल रहा है। देखो यदि कैलाश यहाँ ट्रान्सफर करा कर आ जाय तो ठीक हो जाय ।’’... वह मन ही मन सोचा करता रहा था।

और कुछ हो न हो वह एक बार पवित्रा से बात करना चाहता था, संभव हो तो मिलना भी चाहता था, देखूं तो अब कैसी दिखती है, जब वह उससे उसका हाथ मांगने गया था, उसके रूप रंग से बहुत प्रभावित था, उसे लगता था इतनी कोमल त्वचा वाली स्त्री का दिल भी कोमल होगा वह उसके बच्चों को हृदय से लगाकर रखेगी, किन्तु उसने स्पष्ट तौर पर पत्र लिखकर बता दिया - ‘‘मुझे आपसे कोई प्राबलम नहीं है किन्तु मैं किसी दूसरी औरत के बच्चे नहीं पाल सकती, मुझे क्षमा करेंगे।’’

‘‘आज समय ने मजबूरी में फंसाया है तब समझी। जब औरत होकर वह बिन माँ के बच्चों को न अपना सकी तो वह उसकी बच्चियों का बाप कैसे बन सकता ?

‘‘हाँ यह माँग औरत से ही की जा सकती है मर्द से नहीं।’’ वह इसी उधेड़बुन में लगा था, उसे लगा कि दीदी को अवश्य बताना चाहिए कि देर से ही सही उसके भाई का घर बसने की संभावना जागी है। हृदय के किसी कोने में गुदगदी सी होने लगी, वाह! उसने तो स्वयं को एकदम बूढ़ा समझ लिया था, यहाँ तो विवाह के प्रस्ताव आ रहे हैं।

नौकरानी उसके पास की टेबल पर चाय रख गई थी, चाय पीते पीते वह दीदी का नम्बर खोजने लगा था, अच्छा लगेगा उसे यह जानकर कि जिसने ठुकराया था अब वह शरणागत् है।

कई बार ट्राई करने पर भी दीदी से सम्पर्क न हो पाया, एक बार मन हुआ कि पत्र में दिये नंबर पर सम्पर्क करके बात करनी चाहिए, उसने नंबर डायल किया और उधर से घंटी बजते ही फोन उठा लिया गया। जैसे कोई इंतजार में ही बैठा हो।

‘‘हैलो’’

‘‘जी मैं लखनऊ से कामेश्वर राय बोल रहा हूँ मुझे पवित्रा जी से बात करनी है।’’ उसने अपना परिचय दिया था।

‘‘हाँ.....हाँ नमस्ते राय साहब, मेरा पत्र आपको मिल गया ऽ....ऽ..... न ?’’

‘‘जी हाँ, वहीं से तो आपका नंबर मिला, कहिए कैसी हैं आप ?’’

‘‘क्या कहूँ राय साहब मेरी हालत एकदम खराब है, तीन-तीन बच्चियों को लेकर कहाँ जाऊँ, उनके पापा ने कुछ भी नहीं छोड़ा, अब इस उम्र में काम काज कहाँ मिलेगा ? आपने इन परिस्थितियों को भोगा है, मुझे उम्मीद है आप मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लेंगे। हम मिलकर सभी बच्चों का जीवन बनायेंगे’’। वह लगभग गिड़गिड़ा रही थी।

’’लगता है आप उसी दिन पर रुकी हुई हैं जिस दिन मैं आप के यहाँ इसी प्रकार की प्रार्थना लेकर गया था, वर्षों बीत गये मैडम्! मेरे तीनो बच्चे बाल-बच्चेदार हो गये हैं, भगवान् ने मेरा तप पूर्ण किया। ’’

’’तब तो कोई परेशानी ही नहीं है, तीनो बच्चियों के साथ हमारा जीवन फिर से महक उठेगा, अकेलेपन से घबराते तो अवश्य होंगे ?’’ वह हमदर्द की तरह बातें कर रही थी।

’’मैडम् ! मैंने इतने झंझावात सहे हैं जीवन में कि अब बस शांति की ही कामना शेष रह गई है। फिर जरा सोचिये ! आप युवती हो कर इसी प्रकार के दायित्व न उठा सकीं तो मैं उम्र के अंतिम प़ाव पर कैसे हिम्मत कर सकता हूँ ? अच्छा हो आप हिम्मत पैदा करें अपने आप में, बच्चियों को परवान चढ़ाकर सीना तान कर खड़ी हों दुनियाँ के सामने, अपनी जीत का उत्सव मनाते हुए।’’ उसने मोबाइल बंद कर दिया। उसका दिल धक्...धक् कर रहा था, कैसे कह पाया एक विवश औरत से वह सब कुछ ?

’’अरे हट्ट ऽ....ऽ ! अब किसी की कुछ नहीं सुनना !’’

’’आईं हैं बहारें मिटे जुल्मों सितम ,

प्यार का जमाना आया दूर हुए ग़म।

राम की लीला रंग लाई,

श्याम ने बंशी बजाई ई....ई....ई।’’

वह गुनगुनाते हुए अपना कोट पहन रहा था। यह उसके ईवनिंगवाॅक का समय था, उसके कानों में मीठे-मीठे स्वर गूंज रहे थे।

’’पापा मेरे ऽ....ऽ ! ’’ अरे कल्याणी !’’

’’पापा मेरे ऽ....ऽ !’’ अरे कैलाश !’’

’’मामा मेरे ऽ....ऽ!’’ अरे करुणा !’’

’’दादा ! नाना ! दादा ! नाना ! पापा ! पापा।’’

’’हाँ पल गये मेरे बच्चे और ईश्वर ने मान मर्यादा की रक्षा भी की, अब फिर से झमेले में फंसने का न्यौता दे रहा है, भाग कामेश्वर भाग !’’ वह दरवाजे पर ताला डाल कर भागा बगीचे की ओर।

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