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छाता
छाता
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© Subhash Pant

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उसकी आँखों में चौकन्नापन और शिकारी बिल्ली की सी चुस्ती थी, हालांकि वह सहमा हुआ था। उसके हाथ में धातु की डंडी और प्लास्टिक के खूबसूरत हत्थेवाला छाता था। उसके हाथ में ऐसा छाता होना या तो संयोग था, या फिर आश्चर्य क्योंकि उसका कपड़ा कीमती, चिकना और मजबूत था। जबकि उसका हाथ, जिसमें उसने छाता पकड़ रखा था, बदससूरत, बेढंगा और भद्दा था और हत्थे को थामने की कोशिश में लगातार काँप रहा था।

   वह रास्ते भर सोचता आया था कि जब वो छाता लिए घर में घुसे तो पत्नी से उसका आमना-सामना न हो। किंतु यह महज संयोग था कि जैसे ही उसने अपने घर के सुरखी के आँगन में-जिसकी ऊपरी परत पूरी तरह उधड़ चुकी थी और जगह-जगह गड्ढे पड़े हुए थे, कदम रखा, वैसे ही उसने पाया कि उसकी पत्नी की आँखें गहरे अचम्भे के साथ छाते पर टिकी हुई हैं....

   वह यक-ब-यक लड़खड़ा गया और खाँसने लगा।

   पत्नी ने आँखें झुकाईं, जो कातर और नम थीं और चुपचाप रसवाड़े में जा कर चूल्हा फूंकने लगी।

   बारिश फिर शुरू हो गई थी। रिमझिम। हल्की। लगता था सुइयाँ बरसने लगी हैं, जो शरीर को भेदती जा रही हैं। वह ठंड से सिकुड़कर काँपने लगा। लेकिन वह इस कदर अकबका गया था कि एकाएक तय नहीं कर पाया, बारिश से बचने के लिए उसे घर में घुस जाना चाहिए, या अपने सिर पर छाता तान लेना चाहिए। हालांकि सिर पर छाता ताने बारिश में चलते लोगों के प्रति वह अकसर ईर्ष्या की भावना से भर जाता था।

   वह पिछले बारह वर्षो से एक छाता खरीद लेने की जुस्तजू में था, ताकि सम्मानित नागरिक की तरह वह बारिश में छाता तानकर चल सके। यानी, लद्धड़ ओर ग़रीब जिंदगी से गुजरते हुए उसके मन में सम्मानित नागरिक बनने का मोह कहीं अटका हुआ था।

   बावजूद सारी ज़द्दोज़हद और लाख जतनों के वह पिछले बारह वर्षो में छाता नहीं खरीद सका और इस वक्त जो छाता उसके हाथ में था, उसे वह चुराकर लाया था....।

   उस समय बारिश हो रही थी। किसी वेश्या के भद्दे नखरों-सा आसमान बरस रहा था। कभी कम, कभी ज्यादा। वह एक दुकान के बारामदे में खड़ा ठंड से काँप रहा था, और बारिश रुकने का इंतज़ार कर रहा था। जवानी में उसने कभी बारिश-पानी की परवाह नहीं की थी। वह एक अपराजित योद्धा की तरह उसका सीना चीर सकता था। लेकिन जैसे जैसे वह बुढ़ापे की ओर बढ़ रहा था और उसकी धमनियों का खून ठंडा पड़ता जा रहा था, वैसे-वैसे वह बारिश से, खासकर सर्दियों की बारिश से बेहद आतंकित रहने लगा था। सर्दियों की बारिश में भीगकर अकसर उसके हाथ-पाँव सुन्न हो जाते और कई मर्तबा तो उसे ऐसा लगता कि उसकी हृदयगति ही रुक जाएगी। वह मरना नहीं चाहता था। जीवन के प्रति उसमें जबरदस्त आस्था और मोह था। और बारिश थी कि बरस रही थी....।

   तभी उसकी निगाह उस छाते पर पड़ गई, जो दीवार के कोने से सटा हुआ था और शायद कोई उसे भूल से वहां छोड़ गया था। छाता देखते ही उसके आँखों की लालसा सुर्ख हो गई। उसने चोर निगाह से इधर-उधर देखा। उसे कोई नहीं देख रहा था। व्यस्तता दिखाते हुए उसने बारामदे का एक चक्कर मारा, खाँसा और छाते के पास पहुँच गया। उसने एक बार फिर चोर निगाह इधर-उधर घुमाई। उसे अब भी कोई नहीं देख रहा था। वह लापरवाह ढंग से झुका और उसने धड़कते दिल से छाता उठा लिया। उसकी मंशा चोरी करने की कतई नहीं थी, लेकिन उसके भीतर एक जरूरत भरा हाथ था, उसने ही लपक कर छाते को उठाया था।

   वह सिर पर छाता ताने बारामदे की पैडी से उतर गया और लापरवाह ढंग से चलने लगा, लेकन उसे महसूस हुआ जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में बर्फ-सा कुछ पिघल रहा है....

   घर पहुँचने से पहले उसने ऐतिहात में उसे बंद कर लिया था।

   बारिश फिर होने लगी थी और बिना खुला छाता उसके हाथ में था। वह आँगन में खड़ा था और सर्दी से काँप रहा था। उसके रबड़ के टुक्की लगे जूतों में कीचड़ ओर पानी भर गया था और उसके पैर सुन्न होते जा रहे थे।

   तभी जंगले से झांककर उसके बड़े बेटे ने उसे देखा। वह बोर्ड की परीक्षा की तैयार कर रहा था और इस समय ठंड से सुगबुगाते हुए भौतिकशास्त्र की पुस्तक पढ़ रहा था।

   पिता को देखकर वह औचक आश्चर्य और सन्नाटे से भर गया। यह आश्चर्य और सन्नाटा पिता को भीगते देखकर नहीं, उनके हाथ में छाता देखकर हुआ था। यह एक ऐसा वाकया था, जो पिछले बारह वर्षो में पहली बार घट रहा था।

   बारिश में भीगते हुए काम पर जाते देखकर वह अकसर अन्दर तक पिघल जाता था और बराबर सोचता रहता था कि वह, जब भी मौका मिलेगा, उनके लिए छाता खरीदेगा। लेकिन इस समय उनके हाथ में छाता देखकर उसे लगा कि वह गौरवपूर्ण आधार जिस पर परिवार खड़ा था, कहीं से दरक गया है और, वह किसी भी समय भड़भड़ाकर गिर पडेगा....

   बेशुमार तकलीफ़ों और अंधी ग़रीबी में पिता ने उन्हें एक ईमानदार वर्तमान दिया था। वह एक ऐसा सम्बल था जो उन्हें टूटने नहीं देता था। वह हिम्मत से कह सकता था कि वह एक ऐसे बाप का बेटा है, जिसने अपने आदर्र्शों के लिए अपने भविष्य की कुर्बानी दी थी। महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने जिसने जीवन भर सत्य और अहिंसा पर चलने की प्रतिज्ञा की थी और असहयोग आंदोलन में सरकारी नौकरी छोड़ दी थी।

   उस आदमी के हाथ में धातु की डंडी और प्लास्टिक के खूबसूरत हत्थे वाला, चिकना और मजबूत छाता था....तय था कि वह उसे चुराकर लाया होगा, क्योंकि आज़ादी के बीस बरस बाद भी उनकी औकात ऐसी नहीं थी कि वे एक खूबसूरत छाता खरीद सकते....इन दिनों तो हालत ज्यादा ही नाजुक थी। तीन महीने से फ़ीस का जुगाड़ नहीं बैठ सहा था, जबकि उसकी आधी फ़ीस माफ़ थी।

   पिता के इस कृत्य से वह आहत हो गया। अभी वह विद्यार्थी था। सपनों में तैरता। आदर्शों के प्रति मासूम मोह से भरा...।

   उसने भौतिकशास्त्र की पुस्तक बंद कर दी और कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया। टिन की कुर्सी, जिस पर वह बैठा था, जिस पर उसके पिता और कभी दादा भी बैठे होंगे, बेहद ठंडी थी, जिस वजह से वह एक बेचैन किस्म की ठंड महसूस कर रहा था। उसकी इच्छा हुई कि वह माँ को एक गिलास चाय बनाने के लिए आवाज़ दे। पर अगले क्षण वह खुद-ब-खुद सहम गया। माँ का आर्थिक कारणों से लाचार चेहरा बिल्ली के जबड़े में छटपटाते चूहे-सा उसकी आँखों में कौंध गया। वे इतनी सुविधा की जिन्दगी तो नहीं जी रहे थे कि वक्त-बेवक्त चाय की फरमाइश पूरी की जाती रहे....।

   वह इस बात से ज्यादा आतंकित था कि अगर माँ को मालूम हो गया कि पिता छाता चुराकर लाए हैं, तो वह क्या सोचेगी?

 

पत्नी रसवाड़े में जाकर चूल्हा फूंकने लगी। लकड़ियाँ सीली थीं। जल नहीं रही थीं। सिर्फ धुआँ उगल रही थीं। रसोईघर धुएँ से भर गया। केवल रसोईघर ही नहीं, वह खुद भी अन्दर तक धुएँली हो गई थी और एक अजीब-सी छटपटाहट और बेचैनी महसूस कर रही थी।

   यह आदमी जो उसका पति है, जब-जब भीगकर काँपते हुए त्रस्त पंछी-सा घर आया है, तब-तब उसने उसे टोका है--अपने लिए एक छाता तो खरीद लो। हालांकि हर ऐसे वक्त वह जानती होती--छाता खरीदना उनके बित्ते से बाहर है। परिवार की दो वक्त की रोटियाँ ही प्रश्नों के घेरे में खड़ी रहती हैं।

   यह आदमी सख़्तजान था। इसने सारी गरीबी और दुख अपनी आत्मा में पिए हैं, और परिवार के अन्य सदस्यों को जहाँ तक हो सके इस आँच से बचाने की भरसक कोशिश की है। कई-कई दिन तक भूखा रह कर भी किसी के सामने इसका हाथ नहीं फैला। इस आदमी में गज़ब का आत्मविश्वास और साहस था। तीन मासूम बच्चों को, जिन्होंने बिना दवा और इलाज के दम तोड़ा था, इस आदमी ने अपनी बाँहों में उठाकर श्मशान में दफ़्न किया था और इसके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई थी।

   यह आदमी यक-ब-यक इतना कमज़ोर कैसे पड़ गया....।

   एक पत्नी के रूप में क्या उसका यह फर्ज़ नहीं बनता था कि वह ऐसे हालात पैदा न होने दे जिनमें फौलाद का यह आदमी टूट जाए। यह एक आदमी का टूटना नहीं एक युग का टूटना था। इसके लिए वह खुद भी कहीं जिम्मेदार थी....।

   उसने इस आदमी के दुखों और अभावों को केवल ऊपरी और उथली नज़रों से देखा ओर सिर्फ सहानुभूति जतलाई। सहानुभूति ने इसे धीरे-धीरे और पूरी तरह तोड़ डाला...

   वह इसे पूरी उमर कुछ न करने के लिए उलाहना देती रही। बार-बार उसके सामने घर के अभावों को इस तरह पेश करती रही कि यह आदमी उनसे जूझते-जूझते पस्त होता चला गया....।

   चूल्हे में आग भभक गई थी। और बाहर बारिश तेज हो गई थी।

   नदी से फैले इस जीवन के किसी लम्हे में पूरी ईमानदारी के साथ, अभावों की काली चादर को चीरकर, उसे इसके साथ खड़ा होना था, और इसे टूटने से बचा लेना था। पर उसका अपना आचरण लगातार ठंडे आक्रोश और उपेक्षा का होता गया। इस आदमी से कट कर वह सिर्फ परिवार के लिए समर्पित होती चली गई। इसने अपने बारे में कभी सोचा होगा तो उसने कहा होगा कि उसकी धोती फट गई है, या ऐसा ही कुछ....इसने छाता खरीदने का ख़याल किया होगा तो उसने बताया होगा कि बबली के पास फ्राक नहीं है, या लड़के के पास जूता नहीं है या इसी तरह का कोई अभाव...।

   इस दरमियान छाता इसकी शारीरिक जरूरत के साथ मानसिक जरूरत भी बनता चला गया। उसने परिवार के अभावों का डर खड़ा करके हर बार इसकी जरूरतों को बेरहमी से कुचला है....

   अगर वह सिर्फ़ चार दिन भूखी रह लेती तो क्या छाता नहीं खरीदा जा सकता था। आखिर घर की और जरूरतें भी तो किसी न किसी तरह पूरी होती ही रही हैं।

   पानी उबल गया और उसने पत्ती-गुड़ और दूध डाल कर चाय तैयार करली। पर वह पशोपेश में थी, चाय के लिए आवाज़ कैसे दे? चाय ले जाने की हिम्मत भी वह नहीं बटोर सकी। वह आतंकित थी। दोनों एक दूसरे की आँखों का सामना कैसे कर सकेंगे?

   छाता आदमी चुराकर लाया था लेकिन पत्नी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे छाता उसने खुद चुराया है....

 

   बारिश तेज हो गई थी। वह पूरी तरह भीग गया था, जबकि उसके हाथ में छाता था।

   आखिर वह छाता थामे दालान में घुस गया। वह आतंकित और सहमा हुआ था। उसे लग रहा था जैसे वह अपने ही घर में सेंध मारने जा रहा हो और जिसे दालान में पड़े अपने भद्दे जूतों के धब्बों के सहारे पकड़ लिया जाना हो...।

   तेज बारिश की वजह से टिन की छत जगह-जगह टपक रही थी। उसे बाहर ही नहीं, घर में भी छाते की ज़रूरत थी। उसने निराश और थकी दृष्टि से टिन की ओर देखा। वह जर्जर और आहत थी। बारह वर्षों के दौरान वह चार बार तूफान में उड़ी थी और हर बार उसके इन्हीं हाथों ने उसे ठोक-पीटकर कैंचियों पर बैठाया था, जिन हाथों में इस वक्त चुराया हुआ छाता था। वह अन्दर तक दहल गया और उसने तुरंत छाता खूँटी पर टाँग दिया। खूँटी पर टँगे छाते से बंधी धार में पानी निचुड़ रहा था और खुरदुरे फर्श पर साँप की तरह लपलपा रहा था।

   दालान छाते की खुशबू से महक गया। उस वक्त वह घर में सबसे क़ीमती और खूबसूरत चीज थी। टाटा में मखमल के पैबंद-सी।

   अगले ही क्षण उसे लगा कि खूँटी ऐसी क़ीमती चीज के लिए निरापद स्थान नहीं है। आदमी की निगाह सबसे पहले खूँटी पर ही पड़ती है। वह एकदम पकड़ लिया जाएगा। उसने तुरन्त छाता खूँटी से उतार लिया और सोचने लगा, उसे कहां छिपाया जा सकता है? उस पर एक अज्ञात किस्म का डर हावी था और छाते को किसी उपयुक्त स्थान पर छिपा कर वह उस डर से निजात पाना चाहता था। अगला विचार उसके दिमाग़ में आया कि उसे चारपाई के नीचे रखा जा सकता है। लेकिन यह सोचते ही कि वह वहां चूहों से कुतरा जा सकता है, उसने अपना यह विचार तत्काल खारिज कर दिया।

   उसने खोजी निगाह से इधर-उधर देखा। अस्त-व्यस्त टिन-टब्बर फैला था। एक संदूक था जिसका ऊपरी ढक्कन नहीं था। कंडिया थी, जिसमें पुरानी किताबें भरी हुई थी। एक डोल था जिसमें लोगड़ (लिहाफ की उधड़ी रुई) भरा था। आले थे, जो ढिबरी की लौ से काले पड़ चुके थे। जरा सी ठसक से उनकी कालिस झरझर झरती थी। दालान में हवा आने का एक जंगला था, जिसमें जेलखाने के-से सीखचे थे। उन्हें देखकर दम घुटता था। एक दरवाज़ा था, जिसका आधा पल्ला सड़ गया था, जिसकी जगह टिन का पतरा ठुका हुआ था। दीवारे थीं, जिन पर दरारें थी और सीलन फैली हुई थीं। वह झल्ला गया--यह घर है कोई? जहाँ छाता रखने तक की कोई जगह नहीं।

   पर अगले ही पल वह अपने खोल में सिमट गया। खुद तो अपने जीवन में वह एक ईंट भी नहीं जुड़वा पाया था और इस पुश्तैनी मकान की गिरती दीवारें ही उससे थम नहीं रहीं....।

   उसने चुपचाप छाता दीवार के कोने से सटा दिया। ट्रंक के पीछे। फिर उसने विभिन्न कोणों से खड़े होकर मुआयना किया। छाता ट्रंक के पीछे छिप गया था। वह आश्वस्त हो गया। यह अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह थी। बस दीमकों के चाटने से बचाने का थोड़ा ख़याल रखना था।

   आश्वस्त हो कर उसने सिर उठाया तो सन्न रह गया। दीवार पर टंगे एक पुराने कैलेडंर पर उसकी निगाह अटक गई, जिसमें महात्मा गांधी की तसवीर थी और जो हवा में बेचैन किस्म से हिल रहा था।

   लगा जैसे उसे काठ मार गया है। गांधी के प्रति उसमें जबरदस्त आस्था थी। उसने उनके असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी चाही थी। पारिवारिक मजबूरियों के कारण वह वैसा तो नहीं कर पाया था लेकिन उसने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी औेर उम्र भर उनके आदर्शों पर चलने की प्रतिज्ञा की थी।

   वह सारी उम्र निष्ठा के साथ उन आदर्शों पर चलता रहा और जिन्दगी की दौड़ में निरंतर पीछे छूटता चला गया। उसे नहीं मालूम था, आज़ादी के बाद के जिस युग का बापू ने स्वप्न देखा था, उस युग में उनके आदर्श फालतू किस्म की भावुकता बन कर रह जाएंगे। वह युग तो शुरू ही बापू की हत्या के साथ हुआ है। वे लोग ही दिन दूने रात चौगुने फलफूल रहे थे जिन्होंने उनके आदर्शों की हत्या की है....

   वह व्यक्तिगत रूप में उन आदर्शों की हत्या नहीं कर सका। दिल के हाथों मजबूर था, या भावुक था। और इस वजह से उसे जहालत भरा, अपमानित और उपेक्षित जीवन जीना पड़ा। उसकी दो वक्त की रोटी बराबर सवालों में जकड़ी जाती रहीं। यहाँ तक कि वह इतना मजबूर हो गया कि उसे छाता चुरा लेना पड़ा... क्योंकि पिछले बारह वर्षों में अनवरत संघर्ष करते हुए भी वह एक छाता नहीं खरीद सका था।

   कैलेंडर अब भी हवा में बेचैन किस्म से हिल रहा था।

   और उसी तरह वह भी भीतर से....।

   उसने बारीकी से महसूस किया कि वे सारे आदर्श घिस कर अपनी रंगत खो चुके हैं और इतिहास की चीज बन गए हैं। लेकिन उसकी थाती और निजी सम्पत्ति के मूल्य वे ही हैं। उनके सिवा अपना कहने को उसके पास कुछ भी नहीं है। अपनी एकमात्र सम्पत्ति की उसे हिफाजत करनी चाहिए....किसी भी हालत में उसे खोने नहीं देना चाहिए।

   उसने महसूस किया, वह मजबूत हो गया है और एक अलौकिक चेतना उसके भीतर प्रवाहित हो रही है। उसने ट्रंक के पीछे, कोने में छिपाया छाता निकाल लिया। तभी बाहर फिर तेज पानी पड़ने लगा और हवा के ठंडे रेले से उसके भीतर की हड्डियाँ सुगबुगाने लगीं। सिर्फ उसके हाथ का छाता ही उसे बारिश से सुरक्षा दे सकता था।

   उसके भीतर की मजबूरियाँ पिघलने लगी और उसने छाते को मजबूती से थाम लिया...।

 

छाता

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