Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
किस्सा चाचा तरकीबूराम का
किस्सा चाचा तरकीबूराम का
★★★★★

© Divik Ramesh

Children

7 Minutes   14.2K    18


Content Ranking

चाचा तरकीबूराम और किसी के प्यारे हों न हों, पर बच्चों के बहुत प्यारे हैं। गाँव भर में कोई ऐसा बच्चा नहीं है, जो उनकी बैठक में न जाता हो। चाचा तरकीबूराम भी हर वक्त बच्चों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। बस कोई बच्चा पहुँच जाए अपनी समस्या लेकर, वे सबकुछ छोड़-छाड़कर उसे सुलझाने में लग जाएँगे। वे अक्सर गाँव में ही रहते हैं। बहुत ही जरूरी हो तभी शहर या दूसरी जगह जाते हैं-वह भी एक दिन भर के लिए। असल में न तो उनका दिल बच्चों के बिना लगता है और न बच्चों का उनके बिना। अब तो चाचा तरकीबूराम के किस्से दूसरे गाँव के बच्चों तक भी पहुँच गए हैं। किस्से भी दस-पाँच हों तो! अब यही किस्सा ले लो!

 

गाँव में तालाब के किनारे एक छोटा-सा प्राइमरी स्कूल है। वीनू इसी स्कूल में चौथी कक्षा का विद्यार्थी है। करीब एक महीने पहले उस बेचारे पर मुसीबत टूटी थी।

 

एक दिन जब उसने आधी छुट्टी में अपना खाने का डिब्बा खोला तो दंग रह गया। खाना गायब था। उसकी माँ उसे रोज बढ़िया-बढ़िया चीजें खाने के लिए रखती थी। उसने सोचा शायद माँ आज खाना रखना ही भूल गई। उसने भूखे पेट ही किसी तरह बिताया। पेट में कूद रहे चूहों ने उसे परेशान तो बहुत किया, पर बेचारा करता भी क्या।

 

शाम को घर पहुँचते ही उसने माँ से शिकायत की, "माँ, आज तुमने खाना क्यों नहीं रखा?" माँ ने वह शिकायत सुनी तो हक्की-बक्की रह गई। उसने तो अपने हाथ से अच्छा-अच्छा खाना डिब्बे में रखा था।

 

अगले दिन माँ ने वीनू के सामने ही डिब्बे में खाना रखा। आधी छुट्टी में जब वीनू ने डिब्बा खोला तो रुआँसा हो गया। खाना फिर गायब था। उसने अध्यापक से शिकायत की तो अध्यापक ने सब बच्चों को डाँटते हुए पूछा, "वीनू का खाना किसने चुराया है? सच-सच बता दो वरना सब को मुर्गा बनाऊँगा। लेकिन किसी ने चूँ तक नहीं की।

 

वीनू के एक अच्छे दोस्त मटरू ने खाने में से थोड़ा वीनू को दिया। वीनू ने उतने खाने से ही किसी तरह गुजारा किया। घर जाकर उसने  माँ को सारा किस्सा सुनाया। उसने यह भी कहा, "माँ अगर कल भी किसी ने मेरा खाना चुराया तो मैं भी किसी का खाना चुरा लिया करूँगा।" माँ ने वीनू की बात सुनी तो प्यार से बोली, "तुम्हारा गुस्सा बहुत ठीक है बेटे! लेकिन कोई गन्दा काम करे तो खुद गन्दा काम करने से समस्या नहीं सुलझती! और फिर सजा गन्दा काम करने वाले को ही मिलनी चाहिए! तुम चोर को पकड़ने की कोशिश करो! कल तुम और मटरू चोर पर पूरी नजर रखना।"

 

अगले दिन फिर वही हुआ! वीनू और उसके दोस्त मटरू ने ध्यान तो खूब रखा था पर न जाने चोर खाने पर कब हाथ साफ कर गया। बेचारे दोनों बहुत उदास हो गए। वीनू को तो लगा था कि अब वह कभी दोपहर का खाना नहीं खा सकेगा। उसे रोज ही भूखे पेट पढ़ना पड़ेगा।

 

मटरू ने बहुत दिमाग लद़्आया कि चोर को पकड़ने की कोई तरकीब सूझ जाए ताकि उसके दोस्त को भूखा न रहना पड़े, लेकिन सब बेकार। आखिर उसे अचानक तरकीबूराम का ध्यान आया। उसका चेहरा एकदम खिल गया। वह चहककर बोला, “वीनू, तुम्हारा चोर मिल गया! तुम्हारा चोर मिल गया!" वीनू ने इधर-उधर देखा, वहाँ कोई नहीं था। तभी मटरू ने बताया, "अरे, हमें तरकीबू चाचा का अभी तक ख्याल नहीं आया था। चलो उनके पास। वे जरूर चोर को पकड़ लेंगे।

 

"अरे, हाँ, तरकीबू चाचा का तो ध्यान ही नहीं रहा था। आज स्कूल से लौटते वक्त उनके पास चलेंगे।" उस दिन उनका बाकी का समय बहुत ही आराम से कटा।

 

शाम को घर लौटते वक्त वे दोनों पहुँच गए तरकीबू चाचा की बैठक में। तरकीबू चाचा बड़े मजे से बैठे हुए थे। बच्चों को देखा तो खुश होकर बोले, "अरे, आओ-आओ, वीनू-मटरू! आज कई दिनों बाद आए हो। क्या कोई नाराजगी है भई अपने तरकीबू चाचा से?"

 

"नहीं, चाचा, नहीं! यह बात नहीं है। असल में पिछले कई दिनों से हम बहुत परेशान हैं। स्कूल में  बेचारे वीनू का कोई खाना चुरा लेता है। इसे भूखे पेट ही रहना पड़ता है। मास्टर जी ने सब बच्चों को खूब डाँटा भी, लेकिन किसी ने भी तो नहीं बताया कि चोर कौन है।" मटरू ने बताया।

 

"अच्छा तो बात यह है!" चाचा तरकीबूराम ने गम्भीर होकर कहा। जब वे गम्भीर होकर सोचते हैं, तो अपनी मूँछों को दोनों ओर से मरोड़ने लगते हैं। मूँछों को मरोड़ते हुए उन्होंने पूछा, "कितने दिन से यह किस्सा चल रहा है?"

 

"छह दिनों से, तरकीबू चाचा!" वीनू ने उत्सुकता के साथ बताया।

 "हूं, तो मास्टरजी की डाँट खाकर भी किसी ने नहीं बताया कि चोर कौन है?"

 "नहीं चाचा!" मटरू ने एकदम बताया।

 

थोड़ी देर के लिए सब चुप हो गए। चाचा तरकीबूराम ने अपनी आँखे बन्द कर लीं। दोनों बच्चे उनकी आँखें खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी देर में चाचा तरकीबूराम के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ती नज़र आने लगी और उन्होंने झट से आँखें खोल दीं। फिर उन्होंने धीरे-धीरे कहा, "तुम्हारा चोर पकड़ा गया समझो, वीनू! अब जैसा मैं कहूँ, तुम दोनों वैसा ही करो।"

 

"हमें क्या करना होगा, चाचा-" दोनों ने पूछा।

"सुनो!" चाचा ने दोनों के कान में कुछ कहा। सुनकर दोनों उछल पड़े।

 

अगले दिन स्कूल से छुट्टी होते ही वीनू और मटरू सिवाले वाले पेड़ के पास पहुँच गए। चाचा तरकीबूराम पहले से ही वहाँ मौजूद थे।

 

तीनों पेड़ के मोटे तने के पीछे छिप गए। थोड़ी ही देर में किसी के आने की आहट नजदीक आ गई। किसी की आवाज आई, "हे पेड़वाले भूत! लो यह एक पूरी और सब्जी! आज वीनू पूरी और सब्जी लाया था। मैं यहाँ पेड़ की जड़ में रख रहा हूँ। तुम खा लेना। अब तो तुम रात को मुझे डराने नहीं आओगे न?"

 

"अरे, यह तो शैतान लखमी की आवाज है। अच्छा तो यह है चोर!" वीनू ने बहुत ही धीमे-धीमे कहा।

 

तभी चाचा ने मोटी-सी, भद्दी-सी आवाज निकालते हुए कहा, "शाबास, लखमी! मैं खुश हुआ। अब मैं तुम्हें रात में डराने नहीं आऊंगा!"

 

आवाज सुनकर लखमी बहुत खुश हुआ। वह बोला, “अच्छा तो भूत जी, मैं जा रहा हूँ।" यह कहकर वह चलने को हुआ ही था कि वीनू-मटरू के साथ चाचा तरकीबूराम ने सामने आकर उसे पकड़ लिया। वह भौचक्का-सा रह गया। वह रंगे हाथों जो पकड़ा गया था। उसने चाचा तरकीबूराम से बहुत माफी माँगी, लेकिन चाचा तरकीबूराम उसे पकड़कर सीधा मास्टरजी के पास ले गए। लखमी असल में पहले भी कई बर अपनी शरारतों को लेकर चाचा तरकीबूराम से माफी माँग चुका था। चाचा भी माफ करते रहे थे।

 

मास्टरजी ने सारा किस्सा सुना तो उन्होंने लखमी को बहुत डाँटा और अगले दिन उसके माँ-बाप को बुलाकर उसकी शिकायत भी की। इतना ही नहीं, स्कूल के सारे बच्चों के सामने उसके गले में ‘चोर’ की पट्टी लटकाकर, उसे घुमाया गया। लखमी ने जब नाक रगड़-रगड़कर यह कहा कि वह कभी चोरी नहीं करेगा, तभी उसे माफ किया गया।

 

अब तुम यह तो जरूर जानना चाहोगे कि आखिर तरकीबूराम चाचा की तरकीब क्या थी, जिसे सुनकर वीनू-मटरू उछल पड़े थे और जिसके कारण लखमी की चोरी पकड़ी गई थी।

 

भई, हुआ यह कि चाचा ने उनके कान में कहा था कि वीनू अगले दिन खाने के डिब्बे में एक पर्ची भी रख दे, जिसे पर भद्दी सी लिखावट में लिखा हो, "मैं सब जानता हूँ। तुम रोज वीनू का खाना चुराकर अकेले-अकेले खा जाते हो। अगर आज तुमने थोड़ा-सा खाना मेरे लिए नहीं रखा तो मैं रात को तुम्हें बुरी तरह डराऊँगा। मैं सिवालेवाले पेड़ का भूत हूँ। स्कूल से छुट्टी होने के ठीक आधा घण्टे बाद तुम आज के चुराए हुए खाने में से थोड़ा खाना लेकर पेड़ के पास पहुँच जाना और उसकी जड़ में रखकर मुझे आवाज देकर बता देना। इधर-उधर बिलकुल मत देखना।"

 

बस तरकीबूराम चाचा की तरकीब कामयाब हो गई। लखमी ने उस पर्ची को भूत कि लिखी पर्ची समझकर वैसा ही किया, जैसा पर्ची में लिखा था। उसे तब तक यह तो पता ही नहीं था कि भूत-वूत कुछ नहीं होता, सो आ गया चाचा के शिकंजे में। अब तो समझ गए न?

 

लो, मुझे एक और किस्सा याद हो आया। तुम भी क्या कहोगे कि चाचा तरकीबूराम के ही किस्से सुनाने पर लग गए। अच्छा चलो, यह किस्सा फिर कभी। अब तुम अपने कोर्स की किताब पढ़ लो। शायद तुम्हें यह नहीं मालूम कि चाचा तरकीबूराम यह कभी नहीं चाहते कि उनके किस्से सुनने-पढ़ने वाले बच्चे अपनी स्कूल की पढ़ाई में फिसड्डी रहें। उन्होंने खासतौर पर कहा था कि उनके किस्से उन्हीं बच्चों को बताए जाएँ, जो खूब मन लगाकर पढ़ते हों।

 

 

बाल कथा

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..