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बचपन, अलाव और शराबी
बचपन, अलाव और शराबी
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© Harish Sharma

Inspirational

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जनवरी का दूसरा हफ्ता है,और आज इतवार है। धूप का कोई टुकड़ा जहां भी आँचल पसारे बैठा है उनमें से एक को मैंं चुनता हूँ। कुर्सी पर बैठे सूरज की तरफ चेहरा किये मैंं आखे मूँद लेता हूँ। मुझे पिता की गोद याद आई जिसमें कभी बचपन में मैंं अक्सर सर्दियों में बैठ जाता और धूनी तापा करता। आग की तपिश जैसे सर्दी से ठन्डे हुए गालो को प्यार से सहलाती। मैंं अपने पैरों को भी सेकने के लिए फैलाता तो पिता टोकते।
'पैर मत सेको, एड़ियां फट जायेगी, हाथ सेको बेटा।'
मैंं बात मान लेता पर जब पिता जी इधर-उधर उठ के चले जाते मैंं पैर सेंकने लगता। आस पड़ोस के बच्चे भी यही करते थे।

एक बार ऐसे ही घर में एक तसले में कुछ जलते कोयले डालकर हम सब ताप रहे थे। तसला गोबर मिटटी से लिपे फर्श पर दो ईंटें रखकर टिकाया हुआ था।

मुझे पिता जी ने एक नई छोटी लाल रंग कि कुर्सी लाकर दी थी। बुआ जी अपने बच्चो के साथ घर आई हुई थी और हम सब बच्चे तसले के इर्द गिर्द कुर्सी, मूढे और बड़ो के गोद में दुबके बैठे थे। बड़े अपनी बातों में मस्त थे। माँ और बुआ एक दूसरे के घर बार की दुःख तकलीफों को शेयर कर रही थी।

देखने को दूरदर्शन चैनल था और महाभारत का वो एपिसोड चल रहा था जब दुर्योधन और उसके मित्रों ने भीम को नशीली खीर खिला कर और चटाई में लपेट के तालाब में फेंक दिया था। खैर मेरा बुआ के बच्चो से  बहुत ज़्यादा प्यार था और वे सब मुझसे छोटे थे। मैंं अपनी लाल कुर्सी पर बैठा कुर्सी को आगे पीछे करता तो कभी पैर सेंकने लगता। मुझे याद है कि माँ ने मुझे कई बार टोका होगा,

'अज्जू शरारत मत कर बेटा तसले में पैर जल जायेंगें।'

पिता जी फूफा जी के साथ महाभारत के इस नाटक में दुर्योधन और उसके भाइयों को लेकर बच्चों की मानसिकता को लेकर बाल मानसिकता पर खेद जता रहे थे।

'देख रहे हैं, बच्चे भी किस हद तक सोच सकते हैं, सब संस्कार और सीख की देन हैं, धृतराष्ट्र के मन में अगर अपने भाई पांडू के प्रति कोई खुन्नस न रही होती और अपने भाई के प्रति मन साफ़ होता तो उसके बच्चों में भी अच्छे संस्कार होते।'

'फिर भी देखिये, जीत तो अच्छाई की ही होती है इसलिए अच्छाई का साथ नहींं छोड़ना चाहिए।'

दोनों लगभग नैतिकता और धार्मिकता में रंग चुके थे।

उधर भीम तो डूबकर भी सत्तर हाथियों का बल लेकर लौटा पर मैं अपनी कुर्सी पर  न संभल सका और मुझे मेरे ही चंचल मन ने नंगे पैरो समेत तसले के जलते कोयलों की पूरी शिद्दत से चुम्मी दे डाली।

'ओह, हाय' करता मैं तसले से बाहर कूदा।

मिनटों में हाय तौबा मची। मैंंने हाय हाय की, बुआ ने दौड़ के मुझे संभाला और माँ ने पैर की तरफ देखने से पहले अच्छी तरह दो तीन झापड़ मुझे रसीद किये।

बुआ ने प्रहलाद की तरह मेरी रक्षा की पर वहां कोई हिरन्यकश्यप नहीं था बल्कि माँ थी जो पीटकर खुद रोने लगी और मेरे थोड़े बहुत जले तलवो पर कोलगेट  टूथपेस्ट लगाते हुए कभी मेरे चेहरे के हांव भाव देखती और कभी अपने मुंह से ठंडी फूक मारकर मेरे तलवो पर गुदगुदी सी कर देती।

'ये लड़का खुद भी परेशान होता है और मुझे भी तड़पाता है, हे भगवान् मेरे बेटे की तकलीफ कम कर।'

पिता जी इस मामले में दिलेर थे,

'कोई घबराने वाली बात नहीं,अरे अपना अज्जू क्या किसी भीम से कम है क्या,अभी देखना हसने खेलने लगेगा।'

वो तो शुक्र था कि मेरे पैर ही तसले में टिके वर्ना कही कुर्सी से सीधे तशरीफ़ तसले में लैंड हो जाती तो असली नानी याद आ जाती।

सर्दियों में अलाव पर मूंगफली और बाते ऐसे मिलती थी जैसे नोटबंदी  के बाद बैंकों के बाहर लाइन।

रात में खाना खाने से पहले या बाद में गाँव के लोग अपने मुहल्ले में ऐसे ही धूनी या अलाव जला लेते थे जहां बच्चों, नौजवानों से लेकर बूढ़ो तक की महफ़िल सजती। घर की औरतों बेटियों को आज तक ऐसी आज़ादी या समानता नहींं मिली है कि वे भी ऐसी अलावमयी महफिलों में शामिल हो सकें। घर का काम काज और चूल्हा चौका ही उन्हें इतना व्यस्त रखता कि उन्हें सर्दी गर्मी का शायद पता ही नहींं चलता था।

सीमन द बोवुआर की ‘सेकंड सेक्स’ और राजेन्द्र यादव का ‘स्त्री उपेक्षिता’ वाला शोर अभी इन गली मोहल्लों में नहींं था पर फिर भी जिन्दगी जैसे तैसे चल रही थी।

अलाव पर इस मरदाना टोले में गाँव के किसी न किसी घर के झगड़े से लेकर सरकार की हर नीति राजनीति तक का हो हल्ला वहा मचता। कई बार खूब जनाना अंगों को बेधती गालियाँ तक बक दी जाती। मुहल्ले का सिंदर शराबी अक्सर लास्ट मोमेंट में वहां आकर बैठ जाता। कैलकुलेशन के हिसाब से देखे तो ९९ प्रतिशत मौके ऐसे थे कि वो जब जब मुहल्ले के लोगों के बीच ऐसे किसी अवसर पर बैठता तो पिट जाता, विशेषकर शाम के बाद का समय ज्योतिष और उसकी ग्रह चाल के बिलकुल विपरीत था।
वो अक्सर गालिया बकता हुआ ज़्यादा बाते करता। एक दिन बिमला ताई  के 12 साल के लड़के को छेड़ने लगा,
क्यों बे लब्बू, अभी यही बैठा है, जा दौड़ जा घर,तेरी माँ को तेरा बाप पकड़े बैठा होगा।'
लब्बू चाहे 12 साल के अंतिम चरण में था और टीनेजर बनने वाला था पर सबकि माँ बहन करने के लिए उसकी जुबान बहुत तेज थी उसने तपाक से गैंग्स ऑफ़ वासेपुर वाली टोन में गाली दी।
'तू भी चला जा, वहाँ तेरी घर वाली को पता नहीं कौन पकड़े बैठा होगा।'
इतनी बात पर शराबी ने गाली देते हुए नाई के बेटे को पकड़ लिया और वही धूनी में फेंकने की धमकी देते हुए बोला,
'अबे,यही जला के फूंक दूँगा,कुत्ते की औलाद।'
लोगो ने बीच बचाव किया। लड़का अपने घर की ओर वैसे ही चला गया जैसे कोई पास बैठी पलटन को हमले की सूचना देने भागता है। 
कुछ ही देर बाद लब्बू का बाप और उसके भाई पूरे परिवार समेत लाठियां लेकर आ गए और सिंदर शराबी को खूब पीटा। सिंदर का सरकारी मुलाज़िम भाई अपने शराबी भाई को बचाने के लिए आया तो उसे भी धुन दिया। बात पुलिस चौकी तक पहुँच गयी और मामला ले दे के निपट गया।
लोग बाग़ चाहे झगडे को रोक देना चाहते थे पर अंदर ही अंदर सिंदर शराबी की आद्तों  से इतना तंग थे कि उन्होने उसकी पिटाई पर एक तरह की ख़ुशी महसूस की। 
सिंदर शराबी की यह कोई पहली पिटाई नहीं थी, वो अक्सर अपनी बीवी, अपने सालों, अपने भाइयों और लगभग हर पड़ोसी से अपनी धुनाई करवा चूका था। वास्तव में वो बोरिंग का काम करता था। जहाँ कही नया ट्यूबवेल लगवाना होता वो सिंदर और उसके साथियों को बुलवाते। दो तीन दिन का काम होता। सुबह से शाम तक वे बड़ी बड़ी लोहे की पाइपों से खुदाई करते जैसे ओखली में कोई मसाला कूटने के लिए बार-बार भारी मूंसल से चोट करता है उसी तरह लोहे के बड़े पाइप मूसल की तरह धरती को खोदते हुए ज़मीन के अंदर ही अंदर घुसते जाते। शाम होते ही वे थोड़ा बहुत दिहाड़ी का एडवांस पैसा लेकर दारु के ठेके से बिन्नी ब्रांड की बोतल ले लेते और तब तक पीते जब तक एक दूसरे को गालिया देकर विदा न लेते।

ये उनका एक स्टाइल था, वे शराबी फ़िल्म के अमिताभ बच्चन की तरह सिविलाइज़्ड शराबी नहीं थे बल्कि प्राण जैसे माइकल थे जो दारु पीकर दंगा करता था। 
अपने मोहल्ले में पहुंचकर वे खूब हो हल्ला करते, सिंदर गाहे बिगाहे उस पड़ोसी को बिना नाम लिए ऊंची आवाज़ में गालिया देता जिससे कुछ दिन पहले पिटा होता। पर इस बार तब तक चुप न होता जब तक किसी और पड़ोसी को फ्री फण्ड में अपने घर या बाहर के गुस्से को निकालने के लिए मौका न दे देता।

मार कुटाई के अगले ही दिन ख़ास कर तब जब उसका ज़मीन में बोरिंग का काम बंद हो जाता और वो बेरोजगारों की तरह इधर उधर भटकने वाला होता तो सुबह से ही उसकी चाल ढाल बदल जाती मतलब वो हद दर्जे का अमोल पालेकर बन जाता और पूरी शराफत से मोहल्ले के सभी बड़ो छोटो से माफ़ी मांग लेता। किसी न किसी तरह दारु पीने के लिए शाम को कुछ

उधार जूटा लेता। उसे जुआ खेलने की  भी लत थी।

गाँव के बस अड्डे पर सर्दियों के दिनों में सब जुआरी इकट्ठे होकर धूप और अलाव की गर्मी सेंकते और जीतते हारते एक दुसरे पर गर्मी दिखाते। ये जुआ कोई ग्रेट गैम्बलर वाला या कैसिनो रायल वाला जुआ नहींं था। वहीं एक कोने में ईंट या बोरी बिछाकर ताश की बाजी पर लगता दांव था या रेजगारी के साथ ज़मीन में एक छोटा सा दिए जितना गड्ढा खोद उसकी तरफ एक खास दूरी से उछाल  कर फेंके गये चंद सिक्के वाला खेल था।

सुबह से शाम तक दस से लेकर  सौ दो सौ की बाजी चलती। उधार के मामले में यहाँ कोई रियायत नहींं थी, आप बड़ी नफासत से यहाँ अपने घर का बर्तन, बीवी की चांदी की पायल और घड़ी जो लगभग २० से ५० तक शहर के बस स्टैंड पर मिल जाती थी, को दांव पर लगा सकते थे। अलाव देर शाम तक जलता और उसकी तपिश को बनाये रखने के लिए आस पास से कंडे, झाड़ियाँ, पुराने टायर, लिफाफे आदि जलने को डाले जाते।

वहा गाँव में बस स्टैंड के पीछे ही अनाज की मंडी थी जो केवल फसल बिकने के दिनों काम आती और बाकी दिनों में वहा गोबर के उपले आस पास के घरों की औरते  सुखाने के लिए लीप जाती। यही से चोरी छुपे सूख चुके कंडे जुआरी चुरा लेते और औरते अपने लीपे हुए उपलों का हिसाब किताब बिगड़ा देख बाप भाई की गालियाँ खुसुर फुसुर ढंग से दे डालती।

लोहड़ी का त्यौहार नज़दीक था। पंजाब में अगर आप किसी गाँव में है तो लोहड़ी का त्यौहार दीवाली और पूरब की बिहार उत्तर प्रदेश की होली से कम नहीं होता।

लोहड़ी शाम दिन छिपने के बाद जलाई जाती है हर मोहल्ले का आपस में एक तरह का ये कम्पटीशन होता कि किस मोहल्ले में बड़ी लोहड़ी जलाई जाएगी। इसी बात को लेकर सब बच्चे अधिक से अधिक उपले,लकड़ी आदि इकठ्ठा करने की मुहिम छेड़ देते।
इस दिन सुबह होते ही गाँव के बच्चे घर घर लोहड़ी के लिए मूंगफली, रेवड़ी, उपले आदि इकठ्ठे करने के लिए टोलियाँ बना कर घूमा करते।

 हमारे अपने मोहल्ले के दीपू, राजू, लब्बू, जिंदर, सोनी और मैं भी लोहड़ी मांगने के लिए निकलते। सबसे ज़्यादा टारगेट उन घरो को बनाया जाता जहा नयी शादी या लड़का पैदा होने की खबर मिलती। इसके लिए किसी नेटवर्क या कल तक न्यूज चैनल की ज़रूरत नहींं पड़ती थी। हर घर के बाहर टंगा हुआ नीम और लटकते खिलौनों से पता चल जाता कि ये घर विशेष ख़ुशी वाला घर हैं। नयी पुताई वाला घर भी इस में शामिल होता।

घर के नजदीक ही सब बच्चे गाना  शुरू कर देते।

लोहड़ी भई लोहड़ी

तेरा बेटा चढ़ेगा घोड़ी

घोड़ी चढ़ कर तीर चलाये

तीर लगेगा तीतर के

तीतर कहता च्याउ माऊ

चार कु दाने खीलों के

उपला लेकर हिल्लेगें।

यदि घर के लोग कटोरी भर के रेवड़ी मूंगफली दे देते और साथ में कुछ चवन्निया और उपले भी तो सब खूब खुश हो जाते। उपलों को अलग और रेवड़ी मूंगफली को अलग अलग बोरी में  बच्चे भर लेते और गाते  

कंघा भई कंघा

ये घर है चंगा।

कई घर वाले कुछ देकर भी न देने वाला काम करते मसलन एक उपला दे दिया या या लेना है तो ले या फुट ले वाले स्टाइल में हड़का देते तो बच्चे भी अपना गुस्सा ये कहकर निकालते और भाग जाते कि

कंघा भई कंघा

ये घर है नंगा।

उन दिनों कोई बच्चो का ज़्यादा बुरा न मनाता। गाँव के लोग हस कर टाल  देते कि त्यौहार का दिन है,जाने दो...और ये सब बच्चे हैं।

खैर शाम तक सब खूब उपले, लकड़ी लाकर मोहल्ले के बीचो बीच खूब ऊंचा अलाव बना लेते और अँधेरा होते ही सब औरत मर्द अपने घरों में लोहड़ी का माथा टेकने से पहले मुहल्ले की इस लोहड़ी में तिल गुड़ चढ़ाकर माथा टेकते। नयी नवेली दुल्हन और नए जन्मे बच्चे को टिकवाते। बड़े बुजुर्गो के पैर छूकर आशीर्वाद लेते। कोई कोई बुजुर्ग औरत गाना या बोली सुना देती और सब खूब हँसते। रात गहराती तो सब धीरे धीरे अपने अपने घरों में जाने लगते। इसी बीच सिंदर शराबी भी पहुँचता और शराफत से सबको देखा करता। बड़े बुजुरुग उसे भी मुठ्ठी भरकर रेवड़ी मूंगफली देते। अलाव देर रात तक जलता रहता, सिंदर को कोई शादी वाला घर बोतल दे जाता,वो खूब पीता और दबी आवाज़ में गाली देन शुरू करता तो उसकी बीवी उसे पकड़ कर अंदर घर ले जाती।

बचपन की कुछ यादों में कहानीपन का तड़का और किस्सागोई की कोशिश

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