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कबाड़
कबाड़
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© Ritu Verma

Tragedy

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आज रजनी के पेट में बहुत दर्द उठ रहा था।

डरते -डरते उसने बहू-बेटे के कमरे का दरवाजा खटखटाया।

बेटे ने झल्ला कर पूछा- क्या है ?

रजनी ने डर कर कहा- बेटा पेट में बहुत दर्द है।

बहू वंदना की आवाज आई- जब सारा दिन बस खाने के अलावा कोई काम नहीं है, तो ऐसा ही होगा।

रजनी को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करें, अपने चाहने से तो मौत भी नहीं आती।

बेटे ने उनींदी आँखों से माँ का चेहरा देखा और बोला- आपको तो दफ्तर नहीं जाना होता, पर हमें तो दस काम है। कोई घरेलू इलाज कर लो, सुबह वंदना ले जाएगी।

इससे पहले रजनी कुछ बोलती, उसके मुँह पर दरवाजा बंद हो गया था।

उसके सामने घर की नौकरानी राधा खड़ी थी। रजनी को अपनी स्थिति राधा से भी बदतर लगी। राधा का बीमार होना घरवालों के लिए मुसीबत है, पर रजनी एक ऐसा कबाड़ है जिसे उसके घर वाले ना बाहर निकाल सकते हैं, ना घर पर रखना चाहते हैं।

पूरी रात उसने आँखों में काट दी। सुबह से वो इंतज़ार कर रही थी कि अब उसे कोई डाक्टर के ले कर जाएगा पर बेटा तो बिना हालचाल पूछे दफ्तर के लिए निकल गया। बहू से उसे कोई उम्मीद नहीं थी।

राधा ने फ़ोन लगाया पर वहाँ से क्या जवाब आया, इसका अंदाज़ा रजनी ने उसका चेहरा देखकर लगा लिया था। रजनी ने राधा से कहा- बेटा तुम मुझे अस्पताल ले चलो।

राधा ने ऑटो बुलाया।

रजनी काँपती आवाज में बोली- राधा मेरे पास बस हज़ार रुपये हैं।

राधा बोली- माँजी आप चिंता ना करो, मेरे पास भी कुछ रुपये हैं, सब हो जाएगा।

घर में तीन-तीन गाड़ियाँ हैं, पर उनके लिए एक भी नहीं।

रजनी कराहती हुई अस्पताल पहुँची।

डॉक्टर ने राधा को डाँटा और बोला- अगर और थोड़ी देर हो जाती तो इनके लिये बहुत खतरनाक हो सकता था।

राधा क्या बोलती।

डॉक्टर ने कहा- इनको तुरंत भर्ती कर दो।

राधा बोली- लेकिन मैं तो इनके घर काम करती हूँ।

डॉक्टर बोला- फ़ौरन इनके घर वालों को बुलाओ।

राधा फ़ोन पर फ़ोन करती रही।

आखिर में वंदना ने फ़ोन उठाया और झल्ला कर बोला- क्या है राधा मैं पार्लर में हूँ।

राधा ने डरते हुए कहा- भाभी, माँजी अस्पताल में बहुत बुरी हालत में है।

आधे घंटे बाद बहू-बेटा आये पर रजनी को अस्पताल में भर्ती करवाने के बजाय बाहर की तरफ ले जाने लगे। राधा बोली- भैया, ये आप कहाँ ले जा रहे हो।

बहू बोली- सरकारी अस्पताल में। हमारी औकात नहीं है यहाँ इलाज करवाने की।

राधा के ये बात समझ नहीं आई। पाँच हज़ार पार्लर के लिए हैं पर बूढ़ी माँ के लिए एक पैसा भी नहीं है। सरकारी अस्पताल में लंबी लाइन लगी हुई थी।

बेटा रजनी जी से बोला- माँ, बच्चों की तरह मत करो, थोड़ा दर्द सहना भी सीखो।

राधा के हाथ में पाँच सौ का नोट पकड़ा कर दोनों चलते बने और रजनी अस्पताल के बरामदे में दर्द से करहाती रही।

वो रजनी जो कभी अपने घर की शान थी, अपने पति की जान थी, आज एक फ़ालतू कबाड़ की तरह पड़ी हुई है, जिसकी किसी को जरूरत ना थी।

माँ कबाड़ बुढ़ापा

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