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ठीकरे की माँग
ठीकरे की माँग
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© Kaynat Kazi

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आलिया समझ नहीं पा रही थी कि पैरों पर बोझ ज्यादा लग रहा है या फिर मन पर। थके-मादे कदम उठाऐ वह ख़ुद को लगभग घसीट कर ही ला पाई थी घर तक। अब रह-रह कर उसे अफसोस भी हो रहा था कि आखिर क्या ज़रूरत थी, परवेज़     की दुकान पर जाने की? जिससे, इतने सालों तक मुलाकात नहीं कि उसे देखने की चाह इतनी बलवती हो गई कि बिना कुछ सोचे समझे आलिया उससे मिलने उसकी दुकान तक जा पहुँची। वह क्या था, जो भरी पूरी एक गृहस्थिन को वहाँ खींच ले गया? किसी को पता चल जाऐ  तो क्या हो...? सोचती तो वह हमेशा ही परवेज़ के बारे में थी। कहते हैं पहले प्यार की याद ज़िंदगी भर ताज़ा रहती है। टेक्नीकली आलिया का वह पहला प्यार था भी कि नहीं, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। बात इतनी पुरानी जो थी। हाँ, यह कह सकते हैं कि वो नाज़ुक एहसास शायद पहली बार उसी इंसान के लिऐ जागा था। कोई हमेशा आप का ध्यान रखे... अपने हर ढंग से एहसास दिलाऐ  कि वह आप की बहुत परवाह करता है... यह प्यार नहीं तो और क्या है...? और तो और उसकी अम्मी भी तो आलिया को बहुत चाहती थीं। रिश्ते में थी तो वह आलिया की दूर की मुमानी, पर बचपन से ही उस पर प्यार लुटाती थीं। रिश्ता कुछ यूँ था कि आलिया की नानी और परवेज़     की दादी सगी बहने थीं और उनकी शादी एक ही परिवार में छोटे-बड़े भाई से हुई थी। परवेज़ और आलिया का घर भी एक ही मुहल्ले में था।

 

गर्मियों की छुट्टियों में जब मुमानी अपने मायके लखनऊ जातीं तो आलिया के लिऐ  खिलौने ज़रूर लातीं। आलिया की यादों में वो प्लास्टिक के बने छोटे-छोटे सफेद रंग के कप-प्लेट आज भी छपे हुऐ हैं। आलिया और परवेज़ बचपन के साथी थे। सगे सखा थे। “घर-घर” खेलने में आलिया का पार्टनर हमेशा परवेज़  ही बनता। अगर कोई आलिया से लड़ाई करता तो परवेज़ उसके सामने ढाल बन कर खड़ा हो जाता। आलिया को जब पढ़ना भी नहीं आता था, तब परवेज़     उसे कॉमिक्स पढ़- पढ़ कर सुनाया करता था। बिना आलिया को खिलाऐ कोई चीज़ उसके गले से नीचे न उतरती। यहाँ तक की वह स्कूल के टिफ़िन से भी उसके लिऐ  कुछ ज़रूर  बचा कर लाता। मुमानी बड़े चाव से इस “हंसों के जोड़े” को देखा करतीं और बड़े होकर आलिया को अपनी बहू बनाने के सपने संजोया करतीं। आलिया और परवेज़ इस सबसे अनजान अपनी दोस्ती में खोऐ रहते। उम्र पंख लगाकर उड़ रही थी। छोटे-छोटे खिलौनों की जगह भारी-भरकम बस्तों ने ले ली थी। मुमानी बड़े चाव से पुरानी बात दोहराती और आलिया की अम्मी को “ठीकरे की माँग ” समय-समय पर याद दिलाती रहतीं। पहले मुसलमानों में एक परंपरा काफ़ी  प्रचलित थी। जिसे “ठीकरे की माँग ” कहा जाता था। ठीकरे की माँग  का अर्थ होता था कि लड़की के जन्म के समय ही उसकी चाची, मामी, मौसी या ताई वगैरह में से कोई अपने बेटे के लिऐ उसका रिश्ता माँग  ले। यह उस जमाने की बातें हैं, जब लोग अपनी दी हुई ज़ुबान  पर टिके रहते थे। और बरसों-बरस बीत जाने पर भी अपने दिऐ वचन निभाते थे। या यूं कहें कि तब शायद वचन निभाना आसान होता रहा होगा। खैर, “ठीकरे की माँग ” की अधिक गहराई से पड़ताल की जाऐ कि इस अटपटी रस्म का नाम “ठीकरे की माँग ” कैसे पड़ा? इसके लिऐ    इसके शाब्दिक अर्थ को समझना होगा। ठीकरा मतलब टूटा हुआ मटका। पुराने ज़माने में आमतौर पर बच्चों का जन्म घर में ही होता था और होने वाले बच्चे के करीबी रिश्तेदार जैसे चाची, ताई, मामी, मौसी वगैरह उस समय हाँ मौज़ूद होती थीं। बच्चे का जन्म होने पर यदि होने वाला बच्चा लड़की है, और सुंदर है, तो उन रिश्तेदार महिलाओं में से कोई बिना देर किए झट से उसका हाथ अपने बेटे के लिऐ    माँग  लिया करती थी। इसे ही “ठीकरे की माँग ” कहा जाता था। पर यहाँ तो सवाल ठीकरे से है। इस सब में ठीकरा कहाँ  फिट होता है? आलिया ने भी एक बार अपनी माँ  से यही  सवाल पूछा था। तब माँ ने समझाया था, “बेटी पहले जमाने में जनने-जापे में डस्टबिन (ठीकरा) के रूप में टूटे हुऐ मटके का इस्तेमाल किया जाता था। वहीं से यह शब्द इस परंपरा से जुड़ गया। अब तो घर में किसी की डिलीवरी होती नहीं है, इसलिऐ    अब यह केवल नाम भर रह गया है।”

 

पर आलिया का जन्म तो अस्पताल में हुआ था। तो फिर मुमानी क्यों कहती रहतीं हैं कि आलिया तो मेरे परवेज़  के लिऐ    “ठीकरे की माँग ” है। आलिया को कुछ समझ नहीं आया। शायद ठीकरे की माँग  में ठीकरा सिंबोलिक रूप में ही कहा जाता है। और फिर यह तो दिलों के मेल की बात है, परिवारों के बीच आपसी मुहब्बत की बात है। आलिया को याद नहीं पड़ता की किसने बताया था, पर एक बार जब बड़ी नानी बहुत बीमार थीं और अल्लाह को प्यारी होने वाली थीं, तब उन्होंने भी मुमानी की इस “ठीकरे की माँग ” पर अपनी रज़ामंदी की मुहर लगाई थी। अपनी आखिरी ख़्वाहिश के तौर पर अम्मी से हामी भरवा रही थीं बेचारी बड़ी नानी। पर अम्मी ने बड़ी नानी को कोई वचन नहीं दिया था। पर हम तो बात कर रहे थे, उस मासूम मुहब्बत की जिसे अभी परवान चढ़ना बाक़ी  था। परवेज़ की केयर और मुमानी की मिठास भरी बातें आलिया को बहुत अच्छी लगतीं। आलिया के अपने घर के मिलिटरी माहौल से बिलकुल अलग था यह सब। मुमानी चुपके से आलिया को पैसे देकर झूला झूलने भेजतीं, उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं, उसकी चोटियाँ बनातीं। उसके लिऐ सुंदर-सुंदर झालर वाली फ्राकें सिलतीं। सर्दियों में उसके लिऐ    स्वेटर भी बुनतीं। वो भी क्या दिन थे!!

 

मामू और मुमानी एक परफैक्‍ट कपल थे। उनके पास रुपये पैसे ज्यादा नहीं थे, पर खुशियाँ अपार थीं। कम में भी ख़ुश रहने की कला उन्हें बख़ूबी आती थी। कमाने वाले एक फ़क़त मामू और खाने वाला पूरा कुनबा। ज़बरदस्ती की ज्वांइट फैमिली। मुमानी के सिर पर बैठी उनकी बड़ी बेवा ननद और उनकी आधा दर्जन बेटियाँ। सब उन्हें बड़ी आपा कहते थे। ग़ज़ब की तेज़-तर्रार और ज़बान की कड़वी औरत। बड़ी आपा ने भी पूरी ज़िम्मेदारी से “बड़ी” होने का ज़िंदगी भर फर्ज़ निभाया। मुमानी की सास, बड़ी नानी तो पहले ही अल्लाह को प्यारी हो चुकी थीं। पर उनकी कमी को पूरी करने के लिऐ बड़ी आपा तो ज़िंदा थीं। पर मामू और मुमानी एक दूसरे को बहुत चाहते थे। दुनिया की कातिल निगाहों से बच कर वे रोमांस करते। एक दूसरे का ख्याल रखते। और यह सब देख ननदों की टोली जल-भुन कर ख़ाक हुई जाती। बड़ी आपा ठंडी आहें भरतीं और दबी ज़ुबान  कहतीं, “अये बहना, कैसी बेग़ैरती छाई है।”

 

पर मामू-मुमानी पर इन तानों का कोई फर्क़ न पड़ता। बल्कि मुमानी भी कम मज़ेदार न थीं। वह जलने वालों को और जलाने में विश्वास रखती थीं। मुमानी मामू को प्यार से “ख़ान” कह कर पुकारतीं। वे दोनों आँखों ही आँखों में बातें किया करते। लोगों से भरे इस घर में मुमानी के हिस्से में महज़ एक कोठरी ही आई थी। पर वह कोठरी ही उनका जहान थी। हालाँकि मुमानी बड़े घर की बेटी थीं, पर उन्हें कभी भी शिकायत करते नहीं देखा गया। मामू जब दोपहर को घर में खाना खाने आते तो मुमानी उनके आगे-पीछे घूमा करतीं। उनके नहाने का पानी रखतीं। मामू आँगन में नल के पास ही बैठ कर नहाते और अपना गीला अंडरवियर वहीं छोड़ कर चले जाते। जिसे बाद में मुमानी बड़ी तत्परता से धोतीं और इसे देख कर ननद ब्रिगेड की जान जलती। वे आँखों ही आँखों में एक दूसरे से मुमानी की बुराइयाँ करतीं।

 

बड़ी आपा कहतीं, “अये बहना...  ब्याह तो हमारा भी हुआ था... इनका तो न्यारा हुआ है।” पर मुमानी की सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ता।

 

आलिया को तब यह बातें समझ में नहीं आती थीं, पर अब बख़ूबी आती हैं। पति का ख़याल रखना आलिया ने मुमानी से ही सीखा है। एक फ़रमाबर्दार बीवी और ख़ूब लाड़-प्यार करने वाली माँ का गुण उसे मुमानी से ही विरासत में मिला है। वर्ना आलिया की अम्मी और खालाऐं तो बड़ी ही आधुनिक सोच वाली नारियाँ रही हैं। इस खानदान की औरतों पर नारीवादी सोच हमेशा से हावी रहा है। उन्होंने पुरुषों के साथ बराबरी की माँग  कभी नहीं की, बल्कि ख़ुद को हमेशा उनसे बेहतर ही माना है। इस सोच के चलते उनमें से एक भी अच्छी बीवी साबित नहीं हुई। इनका बस नहीं चला, वर्ना ये तो औलाद भी अकेले पैदा कर लेतीं। मुमानी एक अच्छी बीवी और प्यार करने वाली माँ थीं, जब कि आलिया की अम्मी स्वभाव से हिटलर थीं। बच्चों को ज्यादा लाड़ लड़ाने के सख़्त ख़िलाफ। इसीलिऐ भी मुमानी से मिला लाड़-प्यार आलिया को बहुत सुहाता था। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। मुमानी परवेज़ और आलिया को देसी घी के चीनी के मीठे पराठे पका-पका कर प्यार से खिलातीं। आलिया को लगता कि ज़िंदगी बस ऐसे ही चलती रहे। इस परिवार में सब एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं!! उसे लगता था कि जैसे वह भी इसी परिवार का एक हिस्सा है। वह परवेज़ में अपने मामू की छाया देखती और परवेज़ भी तो अपने अब्बू की प्रति मूर्ति था। उतना ही प्यार करने वाला और सबका ध्यान रखने वाला एक सेंसटिव  इंसान।

 

आलिया ने ख़्वाबों में कितनी ही बार ख़ुद को मुमानी के बावर्ची खाने में, जहाँ बैठ कर मुमानी मामू के लिऐ खाना पकाती थीं, ख़ुद को परवेज़  के लिऐ खाना पकाते देखा था। पर ख़्वाब  हमेशा सच नहीं होते। फिर भले ही क्यों न सुबह के वक़्त ही देखे हों।

 

ख़ुदा का करना ऐसा हुआ कि आलिया की नानी का हज पर जाने का नंबर आ गया। हज पर जाना किसी भी मुसलमान के लिऐ बड़े ही सौभाग्य की बात मानी जाती है। घर में हज पर भेजने की तैयारियाँ ज़ोरों से होने लगी। लोग गुलाब के फूलों का हार लेकर हज्जन नानी से मिलने आने लगे। यह एक रिवाज है कि हज पर जाने वाले से जब लोग मिलने आते हैं, तब वे अपनी हैसियत और नज़दीकी के हिसाब से तोहफे लाते हैं। हाजी जब हज से लौट कर आते हैं तो वह भी लोगों के लिऐ तोहफे लाते हैं। तबर्रुक यानी प्रसाद के रूप में मक्के मदीने से लाई खजूर और आबे-ज़मज़म दिया जाता है।

 

फिर वह दिन भी आ गया जब नानी को दिल्ली के हवाई अड्डे से हज के लिऐ    रवाना होना था। पूरा खानदान एक बस में भर कर दिल्ली की और चल पड़ा। छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के लिऐ हाजी को दिल्ली तक छोड़ने जाने का बड़ा क्रेज होता है। वैसे, इसे कहते तो सवाब कमाना है, पर वास्तव में यह घूमने फिरने का एक बहाना होता है। इसलिऐ हज पर जाने वाला एक होता है, लेकिन उसे विदा करने वाले पचासों। ख़ैर, दिल्ली पहुँच कर हजरत निजामुदद्दीन के दरगाह पर सब लोग आराम कर रहे थे। हालाँकि, इस सफ़र में दो गुट बन गऐ थे। एक गुट जिसमें अम्मी, खालाऐं, बाजियाँ थीं तो दूसरे में मुमानियाँ। मुमानियों वाला गुट अम्मी-खालाओं वाले गुट को फूटी आँख न सुहाता था। आलिया इन सबसे बेख़बर थी। वह तो मुमानी और परवेज़  के साथ घूमने में मस्त थी। दरगाह के आसपास के सजे बाजार में आलिया एक दुकान पर रुकी, और रंग-बिरंगी मालाऐं देखने लगी।

 

मुमानी ने पूछा, “तुम्हें पसंद है?”

 

आलिया ने हाँ में सिर हिलाया, “पर मेरे पासे पैसे नहीं हैं। मैं अम्मी से पैसे लेकर आती हूं।”

 

मुमानी ने आलिया को रोक लिया और बोलीं, “परवेज़     तुम क्यों नहीं आलिया को दिला देते यह माला।”

 

परवेज़ ने झट से अपनी जेब से दस का नोट निकाल कर दुकानदार को दे दिया। परवेज़     की दिलाई माला पहने आलिया ख़ुशी से इतरा रही थी। सब वापस दरगाह के अंदर पहुँच गए। अम्मी की तेवरी चढ़ी हुई थी। मुमानी के साथ देख सख़्ती से पूछा, “कहाँ  थीं तुम आलिया?”

 

“मुमानी के साथ यहीं बाज़ार में घूम रही थी।” अम्मी को यह जवाब कुछ ख़ास पसंद नहीं आया था। अम्मी को आलिया की मुमानी से नज़दीकी सुहाती न थी।

 

अब मुमानी तपाक से बोली, “देखो परवेज़  ने आलिया को कितनी अच्छी माला दिलाई है।”

 

अम्मी को जैसे मिर्च लग गई। आलिया आज तक यह नहीं समझ पाई कि मुमानी ने यह बात सचमुच में ख़ुश हो कर कही थी या फिर अम्मी को नीचा दिखाने के लिऐ   … ?? हो सकता है मुमानी इस घटना के सहारे परवेज़ और आलिया के रिश्ते की ज़मीन तैयार करना चाह रही हों!! पर मुमानी का इतना कहना हुआ कि अम्मी का मुँह गुस्से से लाल हो गया। उस समय तो उन्होंने सब्र से काम लिया और गुस्से में आलिया से कुछ नहीं कहा। पर बाद में, जो सबने मिल कर आलिया का कोर्ट मार्शल किया तो दिल्ली आने का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। घर के सब लोग नाराज़ थे आलिया से। सब उसे ऐसा एहसास करा रहे थे जैसे उससे कोई बड़ा पाप हो गया हो। मलामतों और हिदायतों के ऐसे दौर चले कि परवेज़ से बात करना तो दूर उसकी तरफ़ देखने की हिम्मत भी जाती रही। आलिया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मुमानी उसके लिऐ पहले भी बहुत चीजें लाती रही हैं, तब तो किसी ने कुछ ऐतराज नहीं किया था, पर अब अचानक ऐसा क्या हो गया है? वह हैरान थी और परेशान भी। एक छठी सातवीं की बच्ची को यह सब क्या समझ में आता? अम्मी सोचती थी हममें और उनमें बहुत फर्क़ है, पर आलिया को यह फर्क़ कभी नज़र नहीं आया। उस माला को भी कमबख़्त दुश्मन जमाने ने वापस करवा दिया था। आलिया के मुमानी के घर जाने पर पाबंदी लगा दी गई और उसे घर से दिल्ली हास्टल पढ़ने भेज दिया गया।

 

आलिया अपनी पढ़ाई में खो गई। स्कूल से कॉलेज का सफ़र तय कर लिया। लेकिन परवेज़ की मधुर याद उसके दिल के किसी कोने में छुप कर बैठी रही। सालों में कभी नानी के घर का चक्कर लगता तो परवेज़ की एक झलक पाने की आस सर उठाती। परवेज़ का घर तो नानी के घर से लगा ही हुआ था। पर वह कहीं दिखाई नहीं देता। इस बीच मामू का अचानक इंतेकाल हो गया था, जिसकी वजह से परवेज़ को पढ़ाई छोड़ मामू की दुकान सँभालनी पड़ी। वह रात को देर से घर में घुसता और सुबह जल्दी घर से निकल जाता। आलिया को मुमानी से केवल उसकी ख़बर ही मिलती। अब तक मुमानी भी शायद आलिया को अपनी बहू बनाने के सपने को बिसरा चुकी थी। धन-दौलत की सदियों से चली आ रही इस दीवार ने यहाँ भी दो मासूम दिलों को मिलने से रोक दिया था। इस बीच दिल्ली के एक रईस खानदान में आलिया का ब्याह हो गया।

 

शादी के बाद आलिया जब पाँव फेरने पहली बार मेरठ अपने मायके आई तो फिर उसे नानी के घर जाने का मौका लगा। दिल में एक आस थी कि काश उसकी एक झलक ही मिल जाऐ। भारी-भरकम जेवरों से लधी आलिया दहलीज में दाखिल होने के लिऐ जैसे ही परदा हटाती है तो सामने सफेद कुर्ते में परवेज़ को पाती है।

 

“या ख़ुदा... क्या कबूलियत की घड़ी थी... इस वक़्त अगर कुछ और माँग  लेती तो वह भी मिल जाता।”

 

जल्दबाजी में वह परवेज़ से टकराई और हड़बड़ाहट में कुछ बोल न पाई। घबरा कर इधर-उधर देखा और बुदबुदाई, “हाय अल्लाह!! किसी ने देख तो नहीं लिया।”

 

परवेज़ जा चुका था। आलिया के हाथ लगी तो बस उसके पसीने में घुली इत्र की ख़ुशबू और कुछ न कह पाने का मलाल।

    

वह जो कुछ सेकेंड का एहसास था, जब उसने परवेज़ को एक पुरुष के रूप में इतने नज़दीक महसूस किया था, किसी भी एहसास से बड़ा था। वो तो एक लम्हें को यह भी भूल गई थी की अब उसकी शादी हो गई है।

 

इस घटना के बाद कई साल बीत गऐ। वह जब भी मायके जाती तो मुमानी वालों की ख़ैरियत लेती और ख़ामोशी से अपने बचपन के साथी के बारे में जानने की कोशिश करती। इस बार आलिया मेरठ आई तो पता चला कि पिछली ईद पर परवेज़ की भी शादी हो गई। यह जान कर उसे तसल्ली हुई। पर उसकी बीवी मुमानी को कोई ख़ास सुख नहीं देती है, यह जान कर अफ़सोस हुआ। परवेज़ ने अब कपड़े का एक शो रूम खोल लिया है। थोड़ी और जानकारी जुटाई तो शो रूम का नाम और पता भी मिल गया।

 

पिछले दो दिन से आलिया उसके दुकान पर जाने का प्रोग्राम बना रही है। पर हर बार कोई न कोई पीछे लग जाता है, “उफ्, क्या मुसीबत है!!”

 

वह मार्केट तो जाती है, पर इधर उधर के फालतू सामान लेकर वापस घर आ जा जाती है। सोचती है जब अकेली होगी तब जाऐगी, लेकिन जाकर परवेज़  से कहेगी क्या... और कहने को है ही क्या?

 

कुछ नहीं, बस उसे करीब से देख लेगी और ख़ैर-ख़ैरियत पूछ लेगी। आज अकेले मौका लग गया था बाजार जाने का। पर्स उठाया और पहुँच गई उसके शो रूम पर। रास्ते में सोचती हुई जा रही थी। अगर वह इस वक़्त दुकान पर नहीं हुआ तो!! कहीं काम से गया हो और नहीं मिला तो... कहीं घर खाना खाने तो नहीं चला गया होगा...

 

 जब शो रूम पर पहुँची तो देखा परवेज़  सामने ही काउंटर पर बैठा हुआ था। उसे देखते ही आलिया के चेहरे पर बचपन वाली ख़ुशी तिर आई। और बरसों पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। क्या कहती, “तुमसे मिलने आई हूँ।” नहीं, वह ऐसा कैसे कह सकती है।

 

“वो वो कुछ मर्दाना कुर्ते खरीदने हैं।”

 

परवेज़ ने रस्मी तौर पर पूछा, “कब आईं? और सब ख़ैरियत…”

 

इतना ठंडा रेसपान्स!!! आलिया का दिल बैठने लगा। मानों, यह कोई और बोल रहा है। मैं जिसकी तलाश में आई थी, मेरा बचपन का वह साथी यह तो नहीं है!!!

 

परवेज़  ने अपने सेल्समैन से कहा, “मैडम को अंदर ले जाकर कुर्ते दिखा दो।”

 

और वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। वह ख़ामोशी से सेल्समैन के पीछे-पीछे अंदर चली गई। दिल के किसी कोने में अब भी एक आस बाक़ी थी कि वह अंदर आऐगा... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ...

 

आलिया ने थोड़ी हिम्मत जुटाई और सेल्समैन से झिझकते हुऐ कहा, “वह जो बाहर काउंटर पर बैठे हैं ना, उन्हें अंदर बुला दीजिऐ, हमारे रिश्तेदार हैं वो।” सेल्समैन गया और अकेले ही वापस आ गया।

 

आलिया ने पूछा, “क्या हुआ..? आ रहे हैं वो..?”

 

 सेल्समैन ने कहा, “नहीं, वह फोन पर बात कर रहे हैं।” आलिया काफ़ी  देर तक कपड़े उलट-पुलट कर देखती रही, पर वे नहीं आऐ । हार कर कुछ कपड़े पसंद किऐ और फिर मुड़ कर चोर निगाह से परवेज़  की तरफ़ देखा। लेकिन परवेज़ आलिया से बेपरवाह अब भी फोन पर बिजी था। मानों जैसे आलिया वहाँ हो ही नहीं।

 

“ऐसी बेज़ारी…” “फ़ोन इतना ज़रूरी है.... कि दो घड़ी बात भी नहीं कर सकता इंसान …”

 

हार कर आलिया बिल बनवाने काउंटर पर आ गई। फिर हिम्मत जुटाई और पूछा, “मुमानी कैसी हैं?”

 

उसने मुख्त़सिर सा जवाब दिया, “ठीक हैं…”

 

“और घर पर सब लोग?” आलिया ने पूछा।

 

“सब ठीक हैं…” फिर वही ठंडापन।

 

आलिया ने बिल पे किया और शॉपिंग बैग उठा कर भारी मन से बाहर आ गई। आज आलिया और परवेज़  के बीच प्रेम की जो नाज़ुक डोर थी वह एक झटके से टूट गई थी। काश ! ... वह यहाँ नहीं आती... वह जो एक भरम था, वह हमेशा बना रहता तो अच्छा होता। जिसकी याद आलिया ने सालों दिल में सँजो कर रखी थी, उसे तो आलिया याद भी नहीं थी। जब आलिया दुकान से बाहर आ रही थी, तो उसके कानों में बग़ल की दुकान में बजने वाली गज़ल गूँजने लगी….

 

 

वह जो हममें तुममें करार था

तुम्हें याद हो कि  याद हो...

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