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सर्प्राइज़
सर्प्राइज़
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© Prasun Upadhyay

Inspirational Romance

12 Minutes   13.5K    15


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इसे घर तक कैसे छोड़ेंगे ? इस सवाल ने सबके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ा रखीं थी, सब दौड़ भाग कर स्टेशन पहुँचे थे, जहाँ पहले से ही मैं उसके साथ खड़ा था। वक़्त था जिसकी रफ़्तार आज कछुऐ से भी धीरे हो गयी थी। अनाउंसमेंट सुन कर और भी डर लगा जा रहा था, क्योंकि उसके शहर जाने वाली सबसे पहली ट्रेन तीन घंटे बाद थी। मामा जी कभी ट्रेवल एजेंसी तो कभी बस स्टैंड फ़ोन कर पता कर रहे थे, ताकि उसे जल्दी से जल्दी घर पहुँचाया जा सके। हमारा शहर उसके लिए अनजान था, वहाँ के यातायात और चीज़ों से वो अपरिचित थी। फ़ोन पर लगातार कॉल्स आ रहे थे कहाँ हो ? घर कब तक आ रही हो ? हम गाड़ी भेज दें ? 

             और वो सबको बड़े धैर्य के साथ समझा रही थी की जल्दी पहुँच रही हूँ। हालाँकि उसके चेहरे का भी रंग गुज़रते वक़्त के साथ उतरता जा रहा था, और मैं सोच रहा था की इतनी बड़ी गलती मैं कैसे कर सकता हूँ जो ट्रेन सुबह 5.30 बजे थी, उसको मैं शाम का समझ बैठा था। अब इस नासमझी की कितनी बड़ी सजा मेरे साथ-साथ सबको मिलने वाली है ये बस वक़्त को ही पता है। हम सब बात कर ही रहे थे की वो कॉल काट कर मेरे पास आई और थोड़े रुँआसे गले से कहा बड़ा महँगा पड़ गया न आप सबको  मेरा "सर्प्राइज़"

                                            सर्प्राइज़' है मामूली कैसे होता। और लोगों को तो २४ घंटे पहले या उसी दिन सर्प्राइज़ मिलता है मुझे तो अपने जन्मदिन के एक महीने पहले बर्थडे सर्प्राइज़ मिला हैतो कुछ तो अलग होना ही है, इतना कहते ही हम दोनों आज सुबह की खुशियों में खो गये थे। 

                                     हर दिन सा आज भी अलार्म ने जगाया था, ऑफिस गया और शिफ्ट में काम कर घर लौटा था। यही कोई सुबह के साढ़े दस या पौने ग्यारह हो रहे होंगे। Professor's House के दूसरे तल्ले पर पहुँचा ही था की सीढ़ियाँ चढ़ते मैंने जो देखा वो हतप्रभ कर देने वाला था। मुस्कुराते हुए मैं  बोल पड़ा था, जो लड़के घर पे जैसे-तैसे रहते हैं, कोई भी सामान अपने जगह पर नहीं मिलता वो आज सुबह सुबह इतने तैयार होकर क्या कर रहे हैं, कहीं जाना है क्या ? इतना कहते कहते मेरी आँखों ने बस उमाकांत को देखा था रेड चेक की शर्ट में, तभी दरवाज़े के बाहर सफ़ेद रंग की सैंडल नज़र आई मुझे, मैनें सोचा ये तो उसकी सैंडल है पर यहाँ कैसे ? हालाँकि सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसके फे़वरेट परफ्यूम नें मुझे रोकने की कोशिश ज़रूर की थी, पर लगा ये कैसे संभव हो सकता है। मैं अपने कमरे में पहुँचा ही था की उसका पर्स नज़र आया अब तो ये निश्चित  हो गया कि वो मेरे शहर में मेरे घर पर है नज़रे उसे ढूँढने लगी और मैं किचेन तक जा पहुँचा, जिसके दरवाज़े के पीछे आख़िरकार वो नज़र आ ही गई और लुका- छुपी का ये खेल खत्म हुआ और मेरी ज़िन्दगी  का पहला सर्प्राइज़ मुझे मिल चुका था। कहाँ तक, मुझे तारीफ़ करनी चाहिए थी, थैंक्स कहना चाहिए था फ्रेंड्स को गले लगाना चाहिए था, खुशी से पागल होना चाहिए था, उसे गले लगा लेना चाहिए था, पर मेरे मुँह से निकला "मकान मालिक घर से निकाल देगा"। और उसने 'खिलखिलाते हुए कहा' फिर तो मैं जा रही हूँ। सुनकर सब हँस पड़े थे मैंने पूछा, ये प्लान किया किसने कब कैसे, तुम आयीं कब, किस तरह और उसने कहा शांत बालक :) सब पता चल जायेगा। अपने दिमाग और धड़कनों को सँभालते हुए मैं साथ में बैठ गया था और सारे दोस्त उस अतिथि की ख़ातिरदारी में लग गए थे। शैल, चिंटू, उमा, मामा जी और पंडित इन सबने सारी तैयारी पहले से ही कर रखी थी. मिठाइयाँ, लंच, कोल्ड ड्रिंक सबकुछ।  

                                            मैंने पूछा तुमने कैसे ये सब..... ये असंभव था। और उसने मुस्कुराते  हुए कहा इसकी तैयारी पिछले एक महीने से की जा रही थी, पता चला मैडम ने स्टेशन आने से भी सबको मना कर रखा था। ख़ुद ही घर तक आयीं, बस पंडित नीचे तक रिसीव करने गया था। प्री बर्थडे सर्प्राइज़ की इतनी शानदार तैयारी शायद ही किसी ने किसी के लिए की होगी  जज़्बात और इश्क़ क्या क्या नहीं कराते। आज वक़्त थोड़ी जल्दी गुज़र रहा था, पंडित  आज की प्लानिंग का मास्टर माइंड जो खास आदेश पर आज मेरे साथ कुछ ज़्यादा ही मज़ाकिया हो रहा है और बाक़ी सब उसका अनुकरण कर रहे हैं। इंजीनियरिंग के  स्टूडेंट्स शराफ़त भी दिखाना चाहें तो शैतानियाँ ही निकलती हैं ये भी आज अपने तरीके से मेरा बर्थडे मनाना चाह रहे थे। आख़िरकार पहले सरप्राइज़ का केक काटा गया और उस केक का आधा क्रीम मेरे चेहरे पर था सबने खाया कम लगाया ज़्यादा। फ़िर लंच का दौर चला तो लगा वक़्त ने तो जैसे आज पंख लगा लिऐ हैं, शनिवार 19 अक्टूबर को आज इंडिया ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच है मोहाली में। सब मैच देखने की तैयारी में लग गए, स्नैक्स, चॉको स्टिकस, कोल्ड ड्रिंक्स के साथ और तब मुझे वक़्त मिला थोड़ा प्यार जताने का, पिछले एक महीने से चल रही प्लानिंग को जानने का, जिसका परिणाम इतना ख़ूबसूरत था। कुछ पल मिले थैंक्स कहने के लिए और इस 'सर्प्राइज़' को और भी यादगार बनाने को। बातों ही बातों में कब शाम हुई पता ही नहीं चला और इस दरम्यान ही रिटर्निंग की टिकट बुक की थी मैंने क्यूँकि अगले दिन संडे था तो मैं भी उन्हें ड्राप करने जा रहा था। 5 बज गए और खुशियों के सुबह की शाम हो गई , स्टेशन पहुँचे और प्लेटफार्म पर जाने के बाद पता चला की बहुत बड़ी गलती कर दी है मैंने टिकट बुक करते वक़्त, सुबह की ट्रेन को शाम का समझ बैठा था । पंडित को कॉल किया और कहा जहाँ भी हो जैसे भी हो स्टेशन पहुँचो, और मामा जी को भी साथ में ले लेना। सब अपनी तरफ से प्रयास में लगे हुऐ थे पर सिवाए ट्रेन के इंतेज़ार के कोई दूसरा रास्ता नहीं निकला। मैंने अनुमान लगा लिया था की कुछ भी कर लें रात के दस तो बजेंगे ही। थोड़ी देर बाद पंडित और मामा जी दोनों मेरे सामने खड़े थे हम आने वाले हालात के बारे में सोच रहे थे।

                तभी उसने कहा सुनिऐ! ट्रेन आ रही है और मैं जैसे सोते से जागा था। तब तक शाम के आठ बज चुके थे, हमारी स्थिति ऐसी थी कि टिकट्स थे नहीं और हम चार लोग थे जो उस ट्रेन से जाने वाले थे। बात हुई की टीटी से टिकट्स बनवा लेंगे। ट्रेन में चढ़े तो पता चला शायद कोई त्यौहार है, भीड़ बहुत थी और खड़े होने की जगह भी बहुत मुश्किल से मिली थी, अगर बैठने की जगह एक को भी मिल जाये तो किस्मत हमारी। जिस बोगी में हम थे उसके पहले कम्पार्टमेंट में लड़कियों का एक ग्रुप था, जिन्होंने उसे बैठने की जगह दे दी और हम तीनों बगल में खड़े हो गए थे। दिमाग में यही चल रहा था की बस थोड़ी सी भी जगह मिल जाये और मैं उसके पास बैठूँ, शायद डर लग रहा हो उसे, मन परेशान हो, क्या सोच रही होगी। ख़ुद की परेशानी भूल कर उसने दिमाग चलाया और मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया। तभी सामने बैठी लड़कियों ने आपस में कुछ बात की, मुझे बस उनकी हँसी से यही लगा की हम दोनों साथ में अच्छे लग रहे थे, ऐसा ही कुछ कहा है उन्होंने। थोड़ा सुक़ून था की हम जल्दी पहुँचने वाले थे पर हमारा ये सुक़ून ज्यादा देर तक नहीं रहने वाला था ये भी हम जानते थे। क्यों कि ये ट्रेन  हमें आधे रस्ते में छोड़नी पड़ेगी और  उसके आगे की यात्रा फिर से वक़्त और किस्मत के भरोसे थी।  

                                                     हम सब ऊपरवाले से यही माँग रहे थे कि बस अगली ट्रेन जल्द मिल जाए। उसके साथ बैठे हाथों में हाथ लिए चिंता की लकीरें भूलते हुऐ डेढ़ घंटे बड़ी मुश्किल से गुज़रे हैं, और आख़िरकार वो स्टेशन भी आ ही गया जहाँ हमें उतरना था और जो अपने सबसे लंबे प्लॅटफॉर्म के लिए जाना जाता था। रात के दस बज चुके हैं, उतरने के साथ ही भागकर पंडित ट्रेन पता करने गया, हमसब बैठने के लिए जगह देख ही रहे थे की दौड़ता भागता हुआ वापस आया पंडित, हाँफ़ते हुए उसने कहा यही सवारी गाड़ी जाएगी। उसकी बात पूरी होती तबतक सवारी गाड़ी प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी थी। थोड़ा दौड़ने के बाद हम ट्रेन मे थें, रात की वजह से खाली पड़ा जनरल डब्बा डर का आभास करा रहा है, डूबते को तिनके का सहारा तो मिला  है पर वक़्त और ज़्यादा लगने वाला  है और शायद डर भी। जो दूरी आमतौर पर डेढ़ घंटे मे तय की जाती है, उसमें आज कितना वक़्त लगेगा ये शायद पैसेंजर ट्रेन  के ड्राइवर को ही पता हो।

               उस लड़की को जिसे दुनिया में उस वक्त सबसे ज्यादा भरोसा मुझ पर है उसे बात का चैन  है की मैं उसके साथ हूँ। उस लगभग डराती हुई सी रात मे और रुके हुए से वक़्त में अगर कुछ सुनाई पड़ रहा  है, तो बस सवारी गाड़ी के पहियों की आवाज़ जो अपनी ताक़त से कहीं ज़्यादा तेज़ भाग रहे हैं मगर हमारा मन हमारी सोच और हमारी बातें सब रुक सी गयी हैं। मेरी नज़रे उसके सोते हुऐ चेहरे पर पड़ी जो मेरे दाहिने कंधे पर है फिर मैने घड़ी देखी रात काफ़ी गहरी हो चुकी है और डेढ़ बज रहे हैं। तभी ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी शायद ही कोई उस वक़्त ट्रेन मे चढ़ा हो, तबतक उसकी नींद भी खुल चुकी थी और उसने कहा 2 स्टेशन बाद वाले स्टेशन पे हमलोग उतर जाएँगे और टेक्सी ले लेंगे, शायद थोड़ा पहले पहुँच जायें। मैने सहमति मे सर हिलाया और सोते से मामाजी और पंडित को जगाया और ये बात कही, उन्होने भी अपनी सहमति दे दी। पर फ़िक्र ये भी थी की हम उतनी रात को क्या करेंगे कहाँ जाऐंगे, कहाँ रूकेंगे। मैने पंडित से पूछा टिकेट्स तो ले लिए हैं ना, उसने कहा टिकेट्स लेता तो ये ट्रेन निकल जाती। यानी हमलोग एक ही दिन मे दूसरी बार बिना टिकट यात्रा कर रहे  हैं और रेलवे का क़ानून तोड़ा है। डर इस बात का भी था कि किसी ने सवाल जवाब किया तो स्थिति संभालने मे और वक़्त लगता, शुक्र है किसी और ने हमारी परेशानी नहीं बढ़ाई। ट्रेन रुकने के साथ ही हमसब स्टेशन पर उतरे और तेज़ कदमों से टैक्सी स्टैंड की तरफ चल पड़े थे। टैक्सी वाले ने दुगुने पैसे माँगे  उसे भी लगा बस यही मौका है हमारे पास भी पैसे देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वक़्त और स्थिति के हाथों मजबूर थे हम।

                                          टैक्सी स्टैंड से निकलते ही मैने "महादेव शंकर" को याद किया। रात के दो बजे लाइट्स की रौशनी से जगमगाती हुई खाली सड़क पर  सन्नाटे को चुनौती देती पूरे रफ्तार से भागती हुई टैक्सी मानों किसी रेस मे भाग ले रही है। सब एकदम चुप से थे और शांत इतने थे की सुई गिरे तो भी पता चल जाये ना तो कोई जोक सूझ रहा था ना ही किसी बात पर स्माइल आ रही थी। कुछ बात करने को जैसे शब्द ही ना हो हमारे पास। सड़कें पीछे भागती जा रही थी, और हमारी मंज़िल करीब आती जा रही थी। थोड़ा सुक़ून अब मैं उसके चेहरे पर देख पा रहा था किसी को कॉल किया उसने कहा गेट खोलना दस मिनट मे मैं घर पे रहूँगी। जैसे ही हमारी टैक्सी उस ऐतिहासिक सेतु पर आयी जो केवल दो खंभों पर टिका है,  सेतु का आधा रस्ता ही हमने पार किया था कि ड्राइवर ने अचानक ज़ोर से ब्रेक मारा, चीचीचीचीची करती हुई हमारी गाड़ी रुक गयी, हम सब चौंक पड़े, चोट लगते लगते बची थी मैनें पीछे मुड़कर देखा तो एक नयी सी कार बिल्कुल हमारी टैक्सी के  पिछले हिस्से को छूती हुई निकल रही थी, उसके ड्राइवर ने भी ब्रेक मारते हुए अपनी कार मोड़ी थी। हमारे ड्राइवर ने कहा आयल गिरा हुआ था सर ब्रेक नहीं मारा होता तो एक्सीडेंट पक्का था। उसकी इन बातों ने डर और बढ़ा दिया मैंने सोचा आज की रात में और क्या क्या होना बाक़ी है। शायद कल के अख़बार की सुर्खियां बनते बनते रह गये हम, बच के निकले थे और अब गाड़ी उसकी गली मे जा रही थी। उसने कहा आपलोग नीचे मत उतरियेगा, गाड़ी रुकी और स्थिति की गंभीरता देखिये बिना अलविदा कहे ही वो टैक्सी से उतर गयी। हमने पीछे मुड़कर देखा वो घर के अंदर जा चुकी थी और हम सबने चैन और सुक़ून की साँस ली थी। अगले मोड़ पर टैक्सी वाले को हमने दुगुने माँगे हुऐ पैसे दिए धन्यवाद भी कहा और और उतर गये। रात के ढाई बजे अब हम क्या करें किधर जायें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, वापसी की ट्रेन चार घंटे बाद की थी।

                          पंडित और मामाजी ने अपने कुछ दोस्तों को फ़ोन  किया तो पता चला की उनका ठिकाना इतना दूर था की आते जाते ही वक़्त निकल जाता। सोचा स्टेशन जाकर आराम करेंगे और वापसी की ट्रेन पकड़ेंगे पर इस सोच पर फिर से एक टैक्सी वाले के माँगे हुये दुगुने भाड़े ने पानी फेर दिया। उसने पैसे इतने माँगे जीतने हम तीनों के पास नहीं थे, फ़ैसला हुआ की वापस उसी रास्ते ग्यारह नंबर की बस से (पैदल) स्टेशन जायेंगे, मॉर्निंग वॉक भी हो जाएगा। कुछ देर पैदल चलने के बाद फिर हम उसी ऐतिहासिक सेतू पर थे जिस पर दुर्घटना होते होते बची थी और अभी हम उसी पुल पर फोटोज़ क्लिक कर रहे थे। 'ज़िंदगी भी क्या चीज़ है, मन ही मन मैं ये सोचते हुए मुस्कुरा रहा था'। थकान अब चेहरे पर नज़र आने लगी थी, सब खुश तो थे पर आँखें नींद से बोझिल हो चुकी थी। स्टेशन लौट ही रहे थे की फोन रिंग हुआ देखा तो उसका कॉल है, एक बार के लिए धड़कन बढ़ गयी लगा क्या बात हो गयी, उसने कहा घर पहुँच के कॉल कीजिएगा, मुझे पता है मैने ज़्यादा परेशान  कर दिया आप सबको फिर भी उम्मीद है मेरा सर्प्राइज़ आपको अच्छा लगा हो, मैंने कहा फिर भी "ILOVEYOU". 

       उस हस्की सी आवाज़ को सुन कर सब भूलना चाहा मैनें, मुस्कुराते हुए प्लेटफॅार्म की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, पर थकान ने कहा ऐसे नहीं, इतनी जल्दी भी क्या है। कुछ लोग शायद ट्रेन मे बैठने के पहले इंतेज़ार कर गये थे, उनके द्वारा बिछाया गया अख़बार प्लेटफॅार्म के फर्श पर ही था, मैंने देखा और बिना कुछ कहे-सोचे लेट गया, मामाजी ने भी मेरा साथ दिया, और पंडित बेंच पे बैठा। मुझे कब नींद आई याद नहीं, पर जब आँखें खुल रही थीं उसके पहले कानों मे शोरगुल, रेलवे की उद्घोषणा और पंडित की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उसने कहा भाई दस मिनिट बाद ट्रेन है उठिए, मैने चेहरे पर  पानी के छींटे मारे फिर मैं मामाजी और पंडित तीनों ट्रेन पकड़ने के लिए प्लॅटफॉर्म नो. 16 की तरफ चल पड़े थे, वक़्त कम था इसलिए सुबह की मॉर्निंग वॉक भी हो गयी तेज़ कदमों के साथ। आख़िरकार हम स्टील सिटी वापस आने के लिए ट्रेन में थे। सुबह के 6 बज रहे थे, तभी मैने पंडित से पूछा आज भी कहीं रेलवे का कानून तो नहीं तोड़ रहें हम टिकेट लिया ? ज़ोर से हँसा वो कहा ले लिया है।

                                           सीट पर बैठते ही मैने हँसते हुए कहा पिछले 24 घंटे मे हमने क्या-क्या नहीं किया। पहले 12 घंटे उसके साथ खुशियों वाले गुज़ारे और बाद के 12 घंटे उसके साथ यात्रा करते हुऐ, पंडित ने कहा ये क्यूँ भूल रहे आप दो ट्रेनों में बिना टिकेट ट्रेवल किया, सुबह के तीन बजे इतनी दूर पैदल चले, पहली बार किसी लड़की को घर छोड़ने आए बिना कुछ खाए रात गुज़र गयी और पहली बार प्लॅटफॉर्म पर सोये। मैने गहरी साँस लेते हुए कहा ये इश्क़ जो ना कराऐ प्यारे पर  तेरी भाभी है बहुत प्यारी। मामाजी से भी चुप ना रहा गया सोते  हुए बोले केक भी मज़ेदार था प्रसून  और "सरर्प्राइज़" यादगार। 

कहाँ हो ? घर कब तक आ रही हो ? हम गाड़ी भेज दें ?

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