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© Amit Rathore

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ज़माना खराब है लड़कियों को सँभल कर रहना चाहिऐ। यह बात टीना बचपन से सुनती आई थी। परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ बारहवीं के बाद छोटे से कस्बे से B.com. करने शहर आ गई थी। पिता की किराने की दुकान थी और उससे छोटे से परिवार का लालन-पालन वह अच्छे से कर लिया करते थे। वे चाहते थे कि जल्दी से कोई अच्छा सा लड़का देखकर उसकी शादी कर दें पर टीना ने किसी तरह माँ को शहर जाने के लिऐ राज़ी कर लिया था। माँ के बहुत समझाने पर पिता ने भी अनमने ढंग से ही सही पर हाँ भर दी।

 

इस सबमें टीना का छोटा भाई ही सबसे ज़्यादा ख़ुश था। शहर में दीदी से मिलने के बहाने आना जाना लगा रहेगा। सचिन के लिऐ यह सब सपने जैसा था। शहर जाना, वहाँ रहना, बड़े कॉलेज में पढ़ना, दोस्तों के साथ माल्स मे घूमना, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखना, बारहवीं पास करते ही वह भी अपनी बड़ी बहन की तरह शहर पढ़ने जाना चाहता था हालाँकि यह बात उसने पिता से कभी कहीं नहीं थी क्योंकि वह हमेशा उसे घर के धंधे यानि किराने की दुकान सँभालने की हिदायत दिया करते थे। कभी-कभी किसी काम से कुछ देर के लिऐ बाहर जाने पर वह सचिन को दुकान सौंप भी जाया करते थे पर सचिन का ध्यान दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने में ज़्यादा लगा रहता था। पिता के लौटते ही वो दुकान से ऐसे भागता था मानो दिवाली का राकेट छूटा हो।

 

टीना की पैदाइश के समय ही उनके पारिवारिक ज्योतिषी ने कहा था, यह लड़की ज़रूर परिवार का नाम रोशन करेगी। टीना बचपन से ही पढ़ाई में तेज़ थी। क्लास में हमेशा अव्वल आया करती थी। नाते रिश्तेदार भी ख़ूब तारीफ़ किया करते थे पर जाने क्यों पिता बस जल्द से जल्द उसकी शादी कर देना चाहते थे। फिर अगर पति की इच्छा हो तो वो चाहे आगे P.hd. करे। उन्हें इस बात से कोई परहेज़ नहीं था। शायद ज़माने की तेज़ रफ्तार, अख़बार और टी.वी. पर लड़कियों पर बढ़ते अपराध की ख़बरों ने उनके मन में कहीं घर बना लिया था और यह डर ही उन्हें बार-बार टीना की शादी के लिऐ उकसाता था।

 

शारदा वैसे तो घरेलू महिला थी, बच्चों की देखरेख और घर का काम काज करते हुए ही ज़िंदगी का अधिकांश समय बिताया था, पर विचारों में वो गोपाल से कहीं ज्यादा निर्भीक और स्वतंत्र थी। अगर वो हिम्मत न करती तो गोपाल टीना को कभी भी शहर पढ़ने न भेजते लेकिन शारदा को यक़ीन था टीना एक दिन ज़रूर किसी बड़ी जगह पर पहुँचेगी। शहर में B.com.  के तीन वर्ष कैसे गुज़रे, टीना को पता ही नहीं चला। सहेलियों के साथ घूमना फिरना, मौज मस्ती करना देर रात तक पढ़ना और भविष्य के सपने देखते-देखते वो दिन भी आ गया जब टीना ने न केवल B.com. प्रथम श्रेणी में पास कर लिया बल्कि विश्वविद्यालय में एमबीए में प्रवेश हासिल कर लिया पर आगे की पढ़ाई जारी रखना यह इतना आसान नहीं था। वो जानती थी पिताजी इस बात के लिऐ हरगिज़ राज़ी नहीं होंगे।

 

जहाँ एक ओर शारदा टीना को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनते देखकर ख़ुश हो रही थी वहीं गोपाल की चिंता की लकीरें और गहरी होती जा रही थी। इधर कुछ समय से किराने की दुकान भी अब पहले जैसी नहीं चल रही थी। नित नई दुकानों के आ जाने से गोपाल की आमदनी भी अब पहले जैसी नहीं रह गई थी। टीना हर हाल में MBA करना चाहती थी इसलिऐ उसने घर जाकर माँ को समझाया। "माँ आप कॉलेज की फीस की बिलकुल भी चिंता मत करो, मुझे बैंक से आसानी से लोन मिल जाऐगा। बस आप इसके लिऐ किसी भी तरह पापा को राज़ी कर लो। नौकरी लगते ही मैं सारा लोन चुका दूँगी।” शारदा को भी लगा कि अगर वाकई अच्छी नौकरी मिल गई तो टीना घर ख़र्च में भी दो साल बाद ही सही हाथ बँटा दिया करेगी। उसी दिन रात में खाना खाते समय शारदा ने गोपाल से कहा "छोरी को पढ़ने दीजिऐ एक बार नौकरी मिल गई तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाऐगी।” "तू तो पगला गई है सारी उम्र घर पर बैठा कर रखेगी क्या ? ज़्यादा पढ़ लिख गई तो कौन ब्याह करेगा इससे"? गोपाल ने सवाल किया। "अब ज़माना बदल गया है आजकल सभी पढ़ी लिखी लड़की देखते हैं फिर आपकी दुकान भी तो ठीक नहीं चल रही है ........" "तो क्या लड़की की कमाई से खाऐगी, गोपाल ने भड़कते हुऐ कहा।" "ऐसी बात नहीं है ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिऐ  वो पैसा तो उसी की शादी में काम आऐगा। हमें कौन सा बाँध कर ऊपर ले जाना है।” गोपाल भी मन ही मन जानता था कि दुकान की कमाई से टीना की शादी नहीं हो पाऐगी। अभी तो ठीक से घर चल जाऐ वही बहुत है इसलिऐ उसने भी शारदा के समझाने पर टीना को MBA करने की इजाज़त दे दी।

 

टीना शहर जाकर दुगने उत्साह से  MBA की पढ़ाई में जुट गई। पढ़ाई के दौरान ही उसकी मुलाक़ात क्लास में पढ़ने वाले मंजीत से हुई। वह एक महानगर से MBA करने आया था और अकेला रहता था। वह काफ़ी खुले विचारों का था। टीना धीरे-धीरे मंजीत की ओर आकर्षित होने लगी। दोनों कालेज में और उसके बाद भी काफ़ी समय साथ में बिताते। कॉफी हाऊस में कॉफी पीना, फिल्म देखना, साथ पढ़ाई करना और साथ में भविष्य के सपने देखना। सचिन और शारदा कई बार इस बीच शहर आऐ पर टीना ने मंजीत के बारे में कभी कुछ नहीं बताया। वो पहले मंजीत का मन टटोलना चाहती थी। एक दिन फाइनल सेमिस्टर के दौरान कॉफी हाऊस में कॉफी पीते हुऐ मंजीत ने कहा "टीना तुम मेरे साथ ही क्यों नहीं रहती हो। मेरा फ्लैट भी खाली है।” यूँ तो टीना कई बार मंजीत के फ्लैट पर अकेले भी गई थी पर इस तरह साथ रहना उसे कुछ अटपटा सा लगा। "मेरे कई फ्रेंड्स लिव इन रिलेशनशिप में रह रहें है और वो सभी बहुत ख़ुश हैं।” "लेकिन मंजीत ........." "ओह कम आन टीना डोंट ब्रेक माय हार्ट" थोडे सोच विचार के बात टीना ने मंजीत के साथ रहने के लिऐ हाँ कह दी और मन ही मन तय किया कि नौकरी मिलते ही वह मंजीत से शादी कर लेगी। उसके अनुसार मंजीत एक ज़िम्मेदार लड़का था। दिखने में भी स्मार्ट था इसलिऐ गोपाल और शारदा को भी शादी से कोई ऐतराज़ नहीं होगा और अगर हुआ भी तो वो उन्हें प्यार से मना लेगी।

 

MBA पूरा होते होते टीना और मंजीत दोनों को अलग-अलग प्रायवेट कम्पनी में नौकरी मिल गई। नौकरी लगने के एक महीने बाद टीना अपने घर गई। पहली कमाई से सभी के लिऐ कुछ न कुछ लेकर। सचिन के लिऐ क्रिकेट का किट, माँ के लिऐ नई डिज़ाइनर साड़ी और पिता के लिऐ डिजिटल रिस्ट वाच पूरा घर उल्लास से भर गया। टीना लौटने से पहले हर महिने घर पर कुछ पैसे भेजते रहने के लिऐ आश्वस्त करके आयी थी। इस दौरान गोपाल की सेहत भी धीरे-धीरे गिरने लगी थी और सचिन अब पहले से ज्यादा समय दुकान पर बैठने लगा था। शहर लौटते ही टीना धीरे-धीरे फिर से काम मे व्यस्त हो गई। सुबह से जारी भाग दौड़ देर रात तक चलती रहती। कभी-कभी तो मंजीत और टीना को एक ही घर में रहते हुऐ  भी एक दूसरे से ढंग से बात किए हुऐ एक-एक सप्ताह गुज़र जाता। टीना ने मंजीत से उसके बारे में कभी बहुत ज़्यादा पूछा नहीं था जितना मंजीत ने बता दिया बस उतना ही जानती थी। वो इकलौता लड़का था। पिता सरकारी नौकरी में बड़े पद पर थे। गाड़ी, बंगला, बैंक बैलेंस सब कुछ था। देखते ही देखते छः महीने बीत गए। टीना शहर में रहने के ख़र्च और बैंक लोन के अलावा जो भी पैसा बचता वो हर महीने घर भिजवा देती जिससे घर के आर्थिक हालात भी अब सुधरने लगे थे।

 

साल भर होते ही टीना की तनख़्वाह में और वृद्धि हो गई। मंजीत तो पहले ही अच्छे पैकेज पर लगा था। दोनों ने अपने फ्लैट में टी.वी., फ्रिज, वाशिंग मशीन जैसी सुख सुविधा का सामान भी इकट्ठा कर लिया था। उस दिन रविवार था और संयोग से दोनों ही घर पर थे। टीना सुबह से ही कुछ अनमनी सी लग रही थी। मंजीत ने टीना को देखकर भाँपते हुऐ कहा "कुछ दिन आफिस से छुट्टी ले लो दोनों कहीं घूमने चलते हैं लाइफ बोरिंग सी हो गई है।” टीना ने ख़ुशी से उछलते हुऐ  कहा, "एड्जेक्ट्ली मैं भी यही सोच रही थी।” "तो बताओ कहाँ चलना है" मंजीत ने लेपटाप से नज़रें हटाकर टीना की ओर देखते हुऐ  कहा। टीना ख़ामोश थी। चेहरा लाल हो गया मंजीत से नज़रें चुरा कर बोली "ऐसे नहीं पहले शादी करेंगे फिर चलेंगे।” "शादी! आर यू इनसेन टीना, अभी तो हमारे घूमने फिरने के और मौज़  मस्ती करने के दिन हैं।” "होंगे, लेकिन मैं शादी करना चाहती हूँ। कब मिलवाओगे मुझे अपनी मम्मी-डैडी से" टीना ने उत्साह से पूछा। "देखो टीना अभी हमने हमारा करियर स्टार्ट किया है अभी तो मुझे बहुत कुछ करना है। एम.एन.सी. में हायर पोस्ट, ख़ुद की गाड़ी, फॉरेन टूर, तुम तो जानती हो यह मेरा सपना है।” मंजीत ने थोड़ा झुंझलाते हुऐ कहा। "हाँ लेकिन ............." टीना को बीच में ही टोकते हुऐ  मंजीत ने कहा "लेकिन क्या टीना आई लव माय फ्रीडम। मैं अभी किसी भी बंधन में बँधने के लिऐ तैयार नहीं हूँ और तुम भी अभी लाइफ इंजाय करो। यह सब बाद में भी होता रहेगा बहुत वक़्त है हमारे पास।” टीना ने रुँधे गले से कहा "तुम समझ नहीं रहे हो मंजीत।” "देखो टीना जब हमने साथ में रहने का फ़ैसला लिया था तभी हमने तय किया था कि कोई भी किसी पर कुछ भी थोपेगा नहीं और अब तुम ......." टीना ने हिम्मत जुटा कर कहा "मंजीत आय एम प्रेग्नेंट।”

 

मंजीत टीना की ओर अवाक सा देखता रहता है फिर टेबल पर रखा सिगरेट का पैकेट उठाता है और सिगरेट जलाकर खिड़की पर जाकर खड़ा हो जाता है। रविवार का दिन होने से सड़क पर इक्का दुक्का वाहन ही गुज़र रहे थे। मंजीत यादों के झरोंखे से झाँकता है। टीना ऑफिस से लौटी थी मंजीत उस दिन शाम से ही घर पर था। तेज़ बारिश हो रही थी। टीना भीग गई थी, घर पर आते ही नहाने चली जाती है। मंजीत घर की सारी लाईट बंद कर देता है। जैसे ही टीना नहा कर आती है मंजीत उसे बाँहों में भर लेता है। "टीना यू आर लुकिंग सो प्रीटी।” "मंजीत आर यू ड्रंक तुमने पी रखी है"? टीना ने मंजीत को हल्के से धकेलते हुऐ कहा। "सो वाट डार्लिंग"? कहकर मंजीत उसे पहले से भी ज्यादा ज़ोर से अपनी बाँहों में जकड़ लेता है। टीना धीरे-धीरे जलती हुई मोमबत्ती की तरह पिघलने लगती है। अँधेरे में दोनों की साँसों की आवाज़ संगीत की लय की तरह गूँजने लगती है। तब तक जलती हुई सिगरेट होंठो तक आ जाती है मंजीत स्मृति के झरोखों से चौंककर लौटते हुऐ  कहता है "डोंट वरी टीना सब ठीक हो जाऐगा।” टीना दौड़कर मंजीत से लिपट जाती है "ओह मंजीत आई लव यू।” मंजीत टीना से छिटक कर दूसरी सिगरेट जलाता है। "टीना आई थिंक हमें अभी करियर पर फोकस करना चाहिऐ। मेरे पहचान के एक डाक्टर हैं, मैं तुम्हे उनके पास ले चलूँगा सब कुछ पहले जैसा हो जाऐगा।” टीना स्तब्ध सी मंजीत को देखती रह जाती है। अगले दिन सुबह टीना ऑफिस जाने के लिऐ तैयार हो रहे मंजीत से कहती है, “मैंने फैसला कर लिया है, मंजीत मैं बच्चे को जन्म दूँगी। तुम मेरा साथ दो या न दो।“ कुछ दिनों तक दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं होती है। सबकुछ सामान्य दिनों की तरह चलता रहता है।

 

एक दिन टीना अपनी ऑफिस की सहेली को सारी बातें बता देती है। जो कुछ भी हुआ वह सुनकर टीना की सहेली उसे समझाती है "देख टीना मेरे हिसाब से तो तुझे मंजीत के ख़िलाफ पुलिस स्टेशन मे कम्पलेन्ट करना चाहिऐ ।” यह सुनकर टीना चौंक जाती है। "और नहीं तो क्या ऐसे लड़कों को तो जेल में होना चाहिऐ । यह सरासर धोखाधड़ी है। पहले तो भोली भाली लड़कियों को प्रेम के जाल में फँसाते हैं और फिर उनका इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ देते हैं। तू फ़िक्र मत कर मैं तेरे साथ हूँ। ऐसा मज़ा चखाऐंगे धोखेबाज़ को कि ज़िंदगी भर याद रखेगा।” टीना चुपचाप सहेली की बातें सुनती रहती है। आखिरकार कुछ दिन बाद टीना मंजीत से सीधे सवाल करती है मंजीत तुमने क्या फैसला लिया? मेरा फैसला तुम जानती हो आगे तुम्हारी मर्ज़ी। टीना को यक़ीन था कि मंजीत उसके साथ शादी के लिऐ तैयार हो जाऐगा। उसे लगता है कि हो सकता है अचानक प्रेग्नेंसी की ख़बर सुनकर वो घबरा गया होगा और इसलिऐ अबार्शन की बात करने लगा था पर मंजीत का इतने दिनों के बाद भी वही जवाब सुनकर टीना टूट जाती है। निढाल होकर गिर पड़ती है आँखों से आँसू की धारा बहने लगती है लेकिन मंजीत पर इसका कोई असर नहीं होता है। वह टीना को उसी हाल में छोड़कर ऑफिस चला जाता है।

 

टीना भी मंजीत से बिना कुछ कहे घर चली जाती है। उसके अचानक आने से सभी बहुत ख़ुश होते हैं लेकिन मन की उदासी ज़्यादा देर तक छिपी नहीं रह पाती है। एक दिन शारदा टीना से पूछ लेती है क्या बात है, "बेटा शहर में सब ठीक है न?” उस समय तो टीना किसी तरह माँ को बहला फुसला कर टाल देती है पर मन ही मन जानती है कि ज्यादा दिन तक बात को छुपा कर नहीं रख पाऐगी। इस तरह पंद्रह बीस दिन बीत जाते हैं। छुट्टियाँ भी ख़त्म हो चुकी थी इसलिऐ| ऑफिस से बार-बार फोन आ रहे थे। आस-पड़ोस के लोग और नाते-रिश्तेदार भी टीना की लम्बी छुट्टी का राज़ जानने की कोशिश में तरह-तरह के सवाल करने लग गऐ थे। गोपाल और शारदा भी किसी अनजाने भय से अंदर ही अंदर काँप रहे थे पर टीना के कहने का इंतेज़ार कर रहे थे। घर में अजीब सी मायूसी छा जाती है तब एक दिन टीना माँ को सबकुछ सच-सच बता देती है। मध्यमवर्गीय परिवारों के घर काँच के बने होते है इनके भीतर कोई भी बात ज़्यादा देर तक छिपी नहीं रहती हैं। टीना के बारे में जानकर गोपाल और शारदा पर मानो पहाड़ टूट जाता है। दोनों लोक लाज के डर से सहम जाते हैं। आग लगी है तो धुँआ भी उठेगा। यह सोचकर दोनों तय करते हैं कि चुपचाप शहर जाकर बच्चे को गिरा देंगे। फिर तुरंत कोई लड़का देखकर टीना की शादी कर देंगे। बला जितनी जल्दी टल जाऐ उतना अच्छा। शारदा गोपाल को सँभालते हुऐ कहती है। "मैं तो शुरू से ही कलमुँही के शहर जाने के ख़िलाफ था पर तूने तो ज़िद पकड़ ली थी। अब भुगतो अपनी लाड़ली की करतूत" गोपाल झल्लाता है। "शांत हो जाइऐ आपकी तबियत ख़राब हो जाऐगी।” टीना एक कोने में सिसकियाँ ले रही थी सचिन भी घर में अनायास आऐ इस भूचाल से घबराया हुआ था लेकिन टीना के मन मे जो चल रहा था उससे सब अनजान थे वह मन ही मन तय करती है कि चाहे जो हो जाऐ  वो यह पाप नहीं होने देगी बल्कि बच्चे को जन्म देकर ख़ुद उसे पालेगी। अगले दिन किसी तरह हिम्मत जुटा कर वह अपना निर्णय माँ को बताती है। "पागल हो गई है तू छोरी अगर तेरे पापा को पता चला न तो बेचारे जीते जी मर जाऐंगे। अरे कुछ तो शर्म कर। क्या हम लोगों को ज़िंदा मार डालेगी तू?” टीना अपनी माँ को समझाने की बहुत कोशिश करती है। "नहीं इस बार मैं तेरा साथ नहीं दूँगी। तूने मेरा विश्वास तोड़ा है। तुझे वही करना होगा जो हम कहेंगे और कान खोलकर सुन ले अगर इतनी बड़ी मेमसाहब बन गई है तो हम तीनों के लिऐ थोड़ा सा ज़हर ला दे फिर जो तेरा मन करे वो करना।” शारदा सख़्त लहज़े में अपना निर्णय सुना देती है।

 

चारों ओर से निराश टीना घर के समीप तालाब पर पहुँच जाती है। अतीत में तालाब किनारे बिताऐ ख़ुशनुमा पल याद आते हैं। कई तरह के विचार दिमाग में कौंधने लगते हैं। घोर निराशा के पल में एक बार तो वो अपनी जीवन लीला समाप्त करने का मन बना लेती है। तालाब की गहराई की तरफ एक कदम बढ़ाती भी है कि तभी ख़याल आता है कि यह मैं क्या करने जा रही हूँ ? एक निर्दोष की हत्या करने का मुझे कोई हक़  नहीं। यह सोचकर वह उस विचार को त्याग देती है और दृढ़ निश्चय कर तालाब से लौटती है। अगले दिन सचिन दौड़ा हुआ आता है और माँ को टीना की लिखी चिट्ठी दिखाता है।"

 

"माँ मैं वापस जा रही हूँ। मैंने फिर से नौकरी ज्वाइन कर ली है। मेरी वजह से आप लोगों को बहुत परेशानी होगी जानती हूँ पर मैं अपने बच्चे के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी। आशा है आप लोग मुझे माफ़ कर देंगे।"

-आपकी टीना। 

 

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