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साँप और ओजकवि
साँप और ओजकवि
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

Inspirational

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एक साँप ने हम को काट लिया ।

और मुश्किल से दो मिनट जिया ।

तिलमिलाती साँपात्मा हमें बोली ।

गुस्साई अपनी मनोव्यथा खोली ।

कहने लगी अरे!  भाई ज़हरी ।

एक बात पूछूँ थोड़ी गहरी  ।

ये ख़ून भरे कैसे जी पाते हो ।

मेरा विष पचा जाते हो ।

साँपों को बदनाम करवाते हो ।

सच बताना यार क्या खाते हो ?

हम बोले साँपू! कवि हैं हम ।

होश में आजा तोड़ दे भरम ।

हम आदमी हैं पर आम नहीं हैं ।

खुद्दारी रखते हैं,बेईमान नहीं हैं ।

भारत की आबो-हवा में जीते हैं ।

ज़हर खाते हैं और ज़हर पीते हैं ।

समस्याओं के हम नशे में रहते हैं ।

जो कोई न कह पाता हम कहते हैं ।

केवल एक ही मेरे ज़हर का मंत्र है ।

प्यारे!मेरे भारत देश में लोकतंत्र है ।

तुझसे बड़े फनवाले राष्ट्रभाग्य लिखते हैं ।

आधे पंडालों में  आधे संसद में दिखते हैं ।

 

श्रृंगार कवि को काटता तो राहत मिलती ।

हास्य को डसता कुछ मुस्कान खिलती ।

खुद मिटाया तूने साँपों की छबि को ।

अबे !काटा भी तो ओज के कवि को ।

जा, चला जा भगवान के घर ।

पहन के आना अब के खद्दर ।

मिटा देना फिर कश्मीर के दंगे ।

कहीं पे भी ना दिखें  भिखमंगे ।

हर बूढ़े का समाज में सम्मान हो ।

हर सीने में राष्ट्रप्रेम अरमान हो ।

अपनी सब बेटी- बहनों की रक्षा हो ।

सतचरित्र सी राजनीति की कक्षा हो ।

जुर्मों, दंगों, आतंकों का नाश हो ।

लोगों में बस एक अटल विश्वास हो ।

गंगामाँ  की फिर से कंचन लहरें हों ।

फिर द्वारों पे कभी कहीं ना पहरे हों ।

अब शब्दों के बाहर राम का राज बने  ।

सत्य,अहिंसा, प्रेम का हम आगाज़ बने ।

जिस  दिन मेरे  दोस्त ये  सब तू कर जाऐगा ।

ओजकवि  का ज़हर खुद-ब-खुद मर जाऐगा ।

कवि कविता काव्यप्रेमी साँप ओजकवि साँप और ओजकवि विद्रोही

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