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आखिरी कॉकटेल
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© Asha Singh Gaur

Inspirational

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आखरी कॉक्टेल 

अस्सी साल के उल्फत बेग और पिचासी के लगभग कर्नल कमलेश्वर सिंह, दोनों एक दूसरे की दुनिया के पूरक थे। एक दूसरे के बिना उनके अस्तित्व को सोच पाना भी मुश्किल था।

उल्फत बेग साठ के थे जब वो एक प्राइवेट कंपनी से रिटायर हुए थे। रिटायर होने के बाद क्या करेंगे, कैसे करेंगे हर चीज़ की बकायदा लिस्ट बनाई थी उन्होंने। अब तक की ज़िंदगी बेटे का कल संवारने में ही निकली थी पर आगे बेफिक्र होकर जीने का मज़ा लूटना चाहते थे। सुबह सैर पर जाएंगे, वहाँ से आकर नाश्ता करके अपने पोते नवाज़ को स्कूल ले जाएंगें फिर कुछ वक्त शर्मा से गुफ्तगू में बीत जाएगा। अगर उनकी प्यारी बेगम नाज़नीन ने कुछ और साथ दिया होता तो वर्ल्ड टूर भी प्लैन कर लेते।  

उल्फत अपने खर्चे को लेकर निश्चिंत थे। पैंतीस साल एक प्राइवेट कंपनी में काम करने के बाद उनकी पेंशन एक अच्छी खासी राशि में बदल चुकी थी। उन्हें अंदाज़ा भी था कि जिस पौधे को उन्होंने अपने पसीने से सींचकर एक भरापूरा पेड़ बनाया था वही उनसे उनकी बुढ़ापे की लाठी छीन  लेगा। वो तो महीनों से घात लगाए बैठा था। उनके बेटे मुनीर ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर धोके से उनकी पेंशन अपने नाम करके उन्हें घर से निकाल दिया। उल्फत मान ही नहीं पा रहे थे कि उनके बेटे मुनीरे ने उन्हें पैसों के लिए धोखा दे दिया और दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया। सालों परिवार का भरण-पोषण करने वाले उल्फत बेग सदमें में थे। अब वो सारी दुनिया में अकेले थे। बेसुध से उल्फत बेग अपनी बीवी नाज़नीन से अपना गम बाँटने उसकी कब्र पर जा पहुँचे। ऐसे फूट-फूट के रोए जैसे सालों नहीं रोए थे। मिनटों में आँसुओं का सैलाब गया। सुबह से शाम हो गई पर आँसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। चाँद निकल आया, सुबक-सुबक के छाती फटने को आई थी। रात के साथ आई ठंडक ने माहौल कुछ नर्म कर दिया था। उल्फत ज़रा सा सँभले ही थे कि ज़ोर से कुछ भारी चीज़ गिरने की आवाज़ आई।

धप्प…।

अरे रे कर्नल साहब सँभालिए।

कब्रिस्तान के चौकीदार ने कर्नल साहब को सहारा देकर उठाया पर वो बेहोश हो चुके थे। ऊल्फत बेग ने अपनी हालत पर काबू पाते हुए चौकीदार की मदद की। चौकीदार ने बताया, कर्नल साहब हर शाम आते हैं और यूँ ही बेहोश हो जाते हैं।

उल्फत बेग तो पहले ही बेघर हो चुके थे तो सारी रात कर्नल साहब की देखभाल में बिता दी। दूसरे दिन सुबह जब उनकी आँख खुली तो कर्नल गायब थे। सोच ही रहे थे कि बुड्ढ़ा कहां गया कि एक कड़क आवाज़ सुनाई दी।

"गुड मोर्निंन जवान।"

"जवान? उल्फत की हँसी छूट गई।

दिमाग फिर गया है क्या? ये सफेदी नहीं दिखती?"

कर्नल: "बूढ़े को सँभालने वाला तो जवान ही हुआ न।"

दोनों हँस पड़े।

कर्नल को रिटायर हुए दस साल हो चुके थे। कोई बच्चा था नहीं, एक बीवी थी रुहानी जो उनकी जान थी पर वो भी एक आतंकवादी हमले का शिकार हो गई। तभी से जैसे हर चीज़ से दूर हो गए। आर्मी क्लब, पार्टी, सब बंद। रुहानी कश्मीरी थी और वहीं पर आतंकवादियों से मुतभेड़ के दौरान कर्नल को बेहोश पड़ी मिली थी। आतंकवादी उसे उसके घर से जबरदस्ती उठा लाए थे और फौज के आते ही भागमभाग में उसे सड़क के किनारे फेंक कर निकल गए। रुहानी को देखते ही कर्नल उसे दिल दे बैठे।

ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं कब आपके साथ मज़ाक कर जाए। प्रोटोकौल का पालन करते हुए कर्नल रुहानी को इलाज के लिए आर्मी कैम्प ले गए। उस रात रुहानी का चहरा कर्नल के दिलो दिमाग पर छाया रहा। पर एक फौजी के पास तो इतना भी हक नहीं होता कि वो अपने प्यार से ज़िंदगी भर साथ निभाने का वादा कर सके। कर्नल ने अपने फर्ज़ को याद करते हुए खुद को दिलासा दिया और सो गए। दूसरे दिन सुबह तड़के रिपोर्टिंग के बाद रुहानी का हाल पूछने अस्पताल चले गए। अपने हॉस्पिटल बेड पर रुहानी सुन्न सी बैठी थी जैसे उसमें जान ही न हो पर इतनी खूबसूरत मानो संगमर्मर में तराशी कोई मूरत रखी हो।

नमस्ते।

मर्दाना आवाज़ सुन रुहानी सिहर गई। उसने एक बारगी कर्नल को देखा भी नहीं। दहशत की मारी वो खुदमें सिमटती सिकुड़ती जा रही थी। कर्नल ने उसे समझाने कि कोशिश की कि अब उसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं। वो आज़ाद है और अपने घर जा सकती है। घर सुनते ही उसकी आँख भर आई। रुहानी ने पहली बार चहरा ऊपर कर कर्नल को देखा और आँसुओं से डबडबाती आँखों का बाँध टूट गया। कर्नल ने रुहानी को आर्मी जीप में बैठाया और उसके बताए रस्ते पर गाड़ी दौड़ा दी।

घर के दरवाज़े पर पहुँते ही रुहानी खिल उठी थी। उसने दरवाज़ा खटखटाया पर दरवाज़ा नहीं खुला। उसने फिर से दरवाज़ा खटखटाया पर फिर कोई जवाब न आया। अब रुहानी का सब्र छूटता जा रहा था। रुहानी ने पड़ोस के दरवाज़े खटखटाए पर खिड़कियों से झाँकते लोगों ने उसकी सवालों से भरी आँखों पर अपनी रहम और इंसानियत के दरवाज़े भी बंद कर लिए। कर्नल को देरी हो रही थी, उन्हें वापस कौंप में रिपोर्ट करनी थी पर हालात को देखते हुए उन्होंने रुहानी को अकेले छोड़ना ठीक नहीं समझा। तभी दूर एक औरत को आता देख रुहानी दौड़ती हुई उसके पास गई और सवालों की झड़ी लगा दी।

रफ़त आपा, आपा कहाँ हैं सब? पिछले दो घंटे से दरवाज़ा पीटते- पीटते हाथों में नील पड़ गए पर कोई दरवाज़ा नहीं खोल रहा। कोई कुछ नहीं बता रहा, सब खिड़कियाँ दरवाज़े बंद किए बैठे हैं।

रुहानी को देख रफ़त आपा रो पड़ीं।

अरे मेरी नूरी, रुहानी आजतक इन मूओं की उठाई कोई लड़की वापस नहीं आई पर तू आ गई। इसे तेरी किस्मत कहूँ या बदकिस्मती। तेरे अग्वा होने के बाद तेरी अम्मी पगला सी गई और छोटी सी फिरदौस को घर में छिपाने को जगह ढ़ूंडती रही। आधी रात तक भी उसके दिल को चैन न आया। दहशत जम गई थी उसके सीने में, एक बेटी तो खो चुकी थी दूसरी को खोना नहीं चाहती थी। उसी वक्त तुम्हारे अब्बू ने यहाँ से जाने का फैसला कर लिया। कोई नहीं जानता कहाँ गए।

रुहानी की आँखों से धार-धार आँसू बहते रहे।

अब मैं कहाँ जाउँगी आपा? आप ले चलो न मुझे अपने साथ।

मेरी नूरा तुझे ये लोग बचा तो लाए हैं पर तू जानती है वो लोग तुझे ढ़ूंढ़ते हुए फिर आएँगे। अपनी बूढ़ी आपा पर रहम कर मेरी बच्ची और मुझे माफ कर दे।

इतना कहकर आपा रुहानी से अपना हाथ छुड़ाकर रोते हुए चली गई। रुहानी की दुनिया अचानक से रेत के टीलों सी यूँ गुम हो गई मानों कभी थी ही नहीं। कर्नल समझ नहीं पा रहे थे कि उसे इस हाल में छोड़कर कैसे जाएँ। कर्नल ने कहा चलो और रुहानी बिना कुछ बोले साथ चल दी। और चारा ही क्या था उसके पास? कर्नल ने वापस जाकर पूरा वाकया अपने वरिष्ठ अधिकारी को बताया और रुहानी के रेहने खाने के बंदोबस्त की इजाज़त ले ली। पर रुहानी की आँखों में हज़ार सवाल थे। वो ऐसे किसी अंजान के साथ कैसे रह सकती थी? कर्नल ये हिचकिचाहट भांप गए। हालात बदल चुके थे, अब रुहानी उनकी ज़िम्मेदारी थी। कर्नल ने भी आखिरकार हिचकिचाते हुए अपने दिल की बात कह दी।

मुझसे शादी करोगी?

रुहानी खुद को हालात के हाथों में छोड़ चुकी थी। उसने हाँ कर दी। उसकी मंज़ूरी जानते ही कर्नल ने घोड़ी चढ़ने की तैयारी कर ली इस वादे के साथ कि वो दोबारा कभी रुहानी को रोने नहीं देंगे। उस वक्त जो रिश्ता जुड़ा, वो आज तक बर्करार है।

कर्नल बड़े ही हँसमुख थे। बातों का सिलसिला चला तो एक के बाद एक राज़ खुलते गए। जाने कैसे उल्फत की कहानी उनका दिल छू गई। कर्नल भी तो अपने अकेलेपन पर हँसी का मुखौटा पहने जी रहे थे। कर्नल उल्फत को अपने साथ अपने घर ले गए। बिना औरत का घर बिखरा पड़ा था। कई जगहों से चीज़ें जैसे गायब थी। कर्नल साहब ताला लगाने में विश्वास नहीं रखते थे, अक्सर चीज़ें चोरी हो जाया करती थीं। ये मुम्किन नहीं कि उन्हें पता हो पर हाँ, परवाह नहीं थीं। उल्फत समझ चुके थे कि उस सख्त और ज़िंदादिल आवाज़ के पीछे बहुत दर्द छिपा हुआ है। उल्फत ने दरवाज़ा बंद किया और सबसे पहले बिखरा हुआ सामान सही जगह पर रख दिया। कुछ ही देर में कर्नल रसोई से दोनों के लिए चाय बना लाए। उन्होंने कमरे का बदला रूप देखकर उल्फत की ओर देखा, ज़रा सा हँसे और चाय पीने बैठ गए।

धीरे-धीरे दिन बीते, महीने बीते, साल गुज़रे दोनों ने एक दूसरे को सँभाल लिया। इस दौरान कर्नल एक दो बार उल्फत को आर्मी क्लब भी ले गए पर अब पेंशन के जो पैसे बहुत ज़्यादा लगते थे वो कम पड़ने लगे। गुज़ारे का कम, दवाइयों का खर्च बढ़ गया था। अब तो कर्नल की दीवार सी सीधी कमर भी बुढ़ापे की मार से झुक गई थी। पर हौंसले बुलंद थे।

दोनों हर शाम  साथ साथ कब्रिस्तान जाते और घंटों अपनी मेहबूबाओं से बात करते। उल्फत नाज़नीन को कर्नल के किस्से सुनाते और कर्नल रुहानी को उल्फत के। अचानक एक शाम ऐसी ही मुलाकात के दौरान कर्नल ज़ोर ज़ोर से ठहाका मारकर हँसने लगे। उल्फत ने हल्की हँसी के साथ उन्हें देखा और वो नाज़नीन की कब्र की तरफ मुड़ने ही वाले थे कि कर्नल की साँस जैसे अटक गई। वो तड़प रहे थे उल्फत ने चौकीदार को मदद के लिए बुलाया जो अब उनतालीस का हो चुका था और दोनों की हालत से पूरी तरह वाकिफ था। चौकीदार ने उल्फत मिया के साथ कर्नल कमलेश्वर को अस्पताल पहुँचाया और साथ में हज़ार रुपये भी थमा दिए।

"अरे बेटा इसकी ज़रूरत नहीं।"

चौकीदार ने उन्हें ठेस पहुँचाते हुए बोला।

"बाबा आज कोई तो बड़ा ऐक्सिडेंट हुआ रहा दिन मा। शमशान पूरा भर गया रहा। आज ऊपर का बहुत कमाए हैं। रख लीजिए, काम आएगा।"

कई बार मौत ज़िंदगी का सहारा बन जाती है। उल्फत ने बिना कुछ कहे पैसे रख लिए। पिछले बीस सालों में मुर्दों, कब्रिस्तान और कब्रिस्तान वालों ने ही तो सहारा दिया था।

कर्नल ने आँखें खोली तो जैसे बहार गई। होठों पर मुस्कान थी। उन्हें मुस्काता देख उल्फत की जान में जान आई।

"उल्फत मियाँ हम तो चले अपनी मेहबूबा से मिलने। भाभी के लिए कोई लव लैटर भेजना हो तो देदो। बादमें शिकायत मत करना मैंने ऑफर नहीं किया था।"

उल्फत हँस पड़े। ''कहीं नहीं जाओगे तुम कर्नल, यहीं रहोजे मेरे साथ।''

पर आज पहली बार कर्नल की आँखों में आँसू थे। बिलख उठे, "बहुत याद आती है तेरी भाभी, अब उसके बिना रहा नहीं जाता। और इन बिमारियों ने भी थका दिया है। काफी खर्चा हो गया ना मेरी वजह से?''

'' क्या कहते हो कर्नल, सब तुम्हारा ही तो है। और फिर वो चौकीदार एक हज़ार रुपये दे गया था।''

"चौकीदार? वो कैसे?"

उल्फत ने बताया तो कर्नल फिर ठहाका मार के हँस पड़े। उल्फत डर गए कि कहीं फिर से साँस अटक जाए। कर्नल हँसते हँसते बोलने लगे "एक… एक दो और ऐसे हादसे हो जाएँ तो मरने से पहले...एक आखरी कॉक्टेल का इंतजाम हो जाएगा।"

उल्फत इस मज़ाक के लिए बिल्कुल तैयार थे। हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। दोनों इतना हँसे इतना हँसे कि हँसते हँसते पेट में बल पड़ गए। कुछ देर बाद उल्फत मिया की हँसी रुकी तो देखा कर्नल चुप थे। उल्फत बोले, "कर्नल आप भी ना कोई मौका नहीं छोड़ते।" कर्नल ने कोई जवाब नहीं दिया। उल्फत को अजीब लगा, उन्होंने कर्नल को हिलाया पर कर्नल चुप रहे और उनका शरीर ढलक गया।

कर्नल कमलेश्वर सिंह, उल्फत बेग को चकमा देकर आखरी कॉक्टेल का इंतजार किए बिना ही अपनी रुहानी के पास चले गए थे और उल्फत बेग एक बार फिर अकेले हो गए थे। पर इस बार कई खूबसूरत यादों के साथ।

कई बार मौत ज़िंदगी का सहारा बन जाती है।

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