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अतीतजीवी
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© Manish Kumar Singh

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दूसरे कमरे से विभा ने यशपाल को मोबाइल लाकर दिया। मुरली का कॉल था। 'यह सब ठीक नहीं हुआ।'

'क्‍या ठीक नहीं हुआ?' पूर्वानुमान लगा लेने के बाद भी उसने प्रश्‍न किया। इसका कोई उत्‍तर दिए बिना मुरली बोला 'देखिए लाइफ में बहुत कुछ झेलना पड़ता है। यह भूल जाइए कि हार किसे कहते हैं और जीत क्‍या है। फ्लेक्‍सेब्लिटी के बिना कुछ नहीं होगा।' कॉल भंग करने से पहले उसने यह भी बताया कि वह आज या कल में उससे मिलेगा। बात खत्‍म होने के बाद विभा ने कहा। 'हर समझदार आदमी यही बोलेगा। आपका मिजाज़ ज़माने से अलग है।'  

'अरे ऐसा क्‍यों बोलती हो।' उसने प्रतिवाद किया। 

'सभी कहेगें। एक मैं ही नही हूँ।' वह चलने से पूर्व पलट कर तीक्ष्‍ण शैली में बोली। 

पिछले हफ्ते बॉस ने कमरे में आकर सबके सामने चिल्‍लाकर कहा कि वह फाइल उसे बिना दिखाए सुपर बॉस के पास क्‍यों चले गई। यशपाल अवाक था। ऊपर वाले बॉस ने स्‍वयं उसे बुलाकर फाइल माँगी थी। मना कैसे कर सकता था। 'सर ऐसे में मैं क्‍या करता।'  

'व्हाट डू यू मीन क्‍या करता। अरे एट लिस्‍ट यू हैव टू इनफॉर्म मी।' इसके बाद बॉस सबके सामने पाँच-सात मिनट तक मूसलाधार बरसता रहा। जब वह बाहर गया तो यशपाल भीगा हुआ था। एक तो गलत बोलता है और दूसरा सबके सामने यह सब। आमतौर पर गरजना-बरसना वह अपने केबिन के एकांत में करता था लेकिन आज खुद आकर। अब दोनो बड़े अफसरों के बीच क्‍या झमेला है यह वह क्‍या जाने। संभव हो कि सुपर बॉस ने उसे डाटा हो। जो भी हो वह क्रॉस फायरिंग का शिकार हुआ था। घटना के बाद वह कुर्सी पर ऐसे खामोश बैठा था मानो कोई जीवित व्‍यक्ति न होकर किसी प्राचीन गुफा की दीवार पर उकेरा हुआ भित्ति चित्र हो।

थोड़ी देर बाद उसके पास आकर एक अधीनस्‍थ ने आत्‍मीयता से कहा। 'जाने दीजिए जब इनका मूड ठीक नहीं होता है तो इसी तरह गुस्‍सा होते हैं।' वह इस सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव से और आहत हो गया। ऐसे समय उसे सहानुभूति की नहीं परदे की ज़रुरत थी। अगर यही काम बॉस अपने केबिन में करता तो चल जाता। कमबख्त़ ऑफिस के काम में गलती करो तो मान लेता कि हमारा दोष है। लेकिन आपस के झंझट में मुझे क्‍यों खामखाह घसीट रहा है। उसने मन ही मन कुछ गालियाँ बॉस को अर्पित की। खुलेआम तो दे नहीं सकता है। ऑफिस के आहार श्रृंखला की कड़ी में उसका स्‍थान काफी नीचे था। ज़ाहिर था कि वह मूलत: बड़ी बिल्लियों का भोजन था। ये दूसरे लोग इन सब चीज़ों से कैसे तालमेल बना लेते हैं। यशपाल काम निपटाने के बाद फुसरत में सोचने लगा। इधर हाड़तोड़ काम करने पर भी दफ्तर के इन देवताओं को संतुष्टि नहीं होती। उधर हरिनारायण वगैहर कामकाज के नाम पर सिफर हैं लेकिन अफसरों को ऐसे मुठ्ठी में रखते हैं कि बस पूछो मत। सामने यस सर नो सर और सॉरी सर के सिवा और कोई वाक्‍य ज़ुबान पर नहीं आता है। थोड़ा सोचने के बाद वह इस निष्‍कर्ष पर पहुँचा कि एकाध हफ्ते पूर्व एक प्रोजेक्‍ट मंजूर करने के संबंध में उसने फाइल पर कुछ विपरीत टिप्‍पणियाँ की थीं। प्रोजेक्‍ट शायद बॉस के किसी अपने का था। इसी बात को लेकर खफा होगा।

घर में मुँह लटका कर आया तो बारह साल पहले उससे शादी के बंधन में बंधी अनुभवी स्‍त्री ने पहचान लिया। 'क्‍या बात है? आप परेशान दिख रहे हैं। ऑफिस में कुछ हुआ क्‍या?' वह नज़र न मिलाते हुए बोला 'कुछ भी नहीं।'

'ऐसा हो ही नहीं सकता है।' विभा के स्‍वर में सहधर्मिणी की चिन्‍ता घुली थी। लेकिन ऐसे मौकों पर यह कुरेदना यशपाल को भारी लग रहा था। 'अरे कहा ना कुछ भी नहीं है।' पर तल्‍खी से हृदय के भाव कहाँ छुपते हैं। न बताने पर भी वह समझ गयी कि ऑफिस की पार्टी-पालिटिक्‍स का चक्‍कर होगा। पति से उसे हमदर्दी थी। वह जानती थी कि सीधा बंदा है। लेकिन इस बात का अफसोस भी कम नहीं था कि जीवन की व्‍यवहारिक परिस्थितियों को समझने व निपटाने में कमतर है। सास ननद-देवरों से सुना था कि ये तो किताबी कीड़ा है। पहले अच्‍छा लगा था लेकिन कालांतर में रिश्‍तेदारों के उन्‍नति की ओर बढ़ते कदम और अपने घर की अपेक्षाकृत औसत दर्जे के रहन-सहन से उत्‍पन्‍न क्षोभ ने इस भावना को खत्‍म कर दिया। दूसरे भाई लोग पता नहीं क्‍या-क्‍या कर गए। एक ये हैं। बचपन के संस्‍कारों या किताबी ज्ञान पर आधारित अव्‍यवहारिकता को नमन नहीं किया जा सकता। एक ठीक-ठाक नौकरी और महानगर का परिवेश भी इसे अब तक खत्‍म नहीं कर पाया था। पता नहीं यह महाशय महानगरीय दक्षता को कब प्राप्‍त करेगें जिसमें उनके समस्‍त समकालीन प्रवीण हो चुके हैं। अभी भी पुराने कागज़चिठ्ठियों मैगज़ीनों को सँभाल कर रखते हैं। जिन बातों से अच्‍छा रहन-सहन हासिल न हो पाए उन्‍हें कलेजे से लगाकर रखने का क्‍या मतलब! देख लेना बाल-बच्‍चों को भी सही लाइन नहीं पकड़ा पाएगें।

'आपके इस महीने लगने वाले इंक्रीमेंट का क्‍या हुआ?' उसने एक सामयिक प्रश्‍न किया। 'देखो शायद अगले महीने लगे।' वह शर्ट का ऊपरी बटन खोलता हुआ बोला। नितांत घरेलू स्‍त्री भी ऑफिस के मामलों को शीघ्र भाप जाती है। 'बने रहिए बाबाजी। फिसड्डी रहने की आदत जो पड़ी है।' दफ्तर से क्‍लांत होकर आया यशपाल इस कथन पर प्रतिक्रिया देकर युद्ध नहीं करना चाहता था। इतना पवित्र आत्‍मा नहीं था वह। ऑफिस के बाहर पार्किंग में खड़ी कारों को देखकर रश करता है। उनके अन्‍दर झॉककर इंटीरिअर का अवलोकन भी करता है। फिर खाली वक्‍त में इंटरनेट पर देखता है कि कौन सी कार के कैसे फीचर्स हैं। ऐसा नहीं कि वह सांसारिक नहीं है परंतु भौतिक उप‍लब्धियों को प्राप्‍त करने के लिए जो चाहिए उसकी कमी है। विभा अपने बारह साल के दांपत्‍त्‍य जीवन में  लगभग रोज़ाना उसे इसका अहसास दिलाती थी। 

पिछले दिनों घर पर बहन-बहनोई पधारे थे। विभा ने जाते वक्‍त उन्‍हें ड्राई फ्रूट का एक पैकेट दिया। लेकिन वह यशपाल को यह सुनाने से नहीं हिचकी कि बाज़ार में किशमिश का क्‍या भाव है। यही चीज़ें खरीदनी इतनी भारी न पड़ती यदि अन्‍य लोगों की भाँति वह भी थोड़ा चतुर होता। ऑफिस में कईयो को न मालूम कैसे-कैसे गिफ्ट मिलते रहते थे। मरने दो हमें क्‍या हैं। मुझे ये सब नहीं चाहिए। इन उपहारों के न मिलने पर उसकी आंतरिक प्रतिक्रिया यह थी। विभा का आक्रोश इस बात पर था कि उसके लाड़ले पति ने इन्‍हें प्राप्‍त करने का कोई सराहनीय प्रयास नहीं किया। यशपाल को इस पर गर्व था कि वह उनके लिए लालायित नहीं है। लेकिन एक चिंताजनक खबर यह उड़ी थी कि शायद उसे किसी देर-दराज के फील्‍ड ऑफिस में फेंका जा सकता है जहाँ हर तरह की सुविधा का अभाव होगा। यह बात सर्वप्रथम उसे मुरली ने बतायी। उसने गंभीरता से नहीं लिया पर जब एकाध और लोगों से ऐसा सुनने में आया तो उसका अपने मन-मस्तिष्‍क के शिराओं के यातायात को नियंत्रित करना कठिन हो गया। सीधे अफसरों से पूछने का साहस न था। मुरली ऐसा व्‍यक्ति था जो अपने निम्‍न पद के बावजूद सर्पाधिक लाभान्वित व्‍यक्ति था। न जाने किस बांसुरी की तान से अफसर रूपी गोपियों को पाश में बाँध लेता। उनके व्‍यक्तिगत काम को करके उनसे मतलब का कार्य पूर्ण करवाता और फिर थर्ड पार्टी से पारिश्रमिक वसूलता। ऊपर से नीचे तक लोग उसके धंधे से परिचित थे परंतु मुँह खोलने का साहस किसी में न था।  

वह मुरली से मिला। यह जानते हुए भी कि वह चाय के बदले मदिरा पीना ज़्यादा पसंद करता है उसने चाय-समोसे मँगवाए। अपना दुखड़ा सुनाते हुए वह बोला 'भई कोई राह निकालो।' मुरली मज़े से समोसे को सॉस में लपेट कर खाता रहा। सब चट कर जाने के बाद उसने चाय सुड़कना शुरु किया। वह अब तक चाय की पहली चुस्‍की भी नहीं ले पाया था। इधर बात शुरु होने से पूर्व ही मुरली ने मैदान साफ कर दिया। यशपाल ने इसे खेल भावना से झेला। 'यार आपकी प्रॉब्‍लम यह है कि सिच्‍युऐशन नहीं समझ पाते।' इस वक्‍तव्‍य पर वह चुपचाप उसका मुँह देखता रह गया। 'बुरा मत मानना' मुरली रुमाल से हाथ पोछता हुआ भूमिका तैयार करने लगा' अफसर ओर औरतों का मूड भांपना बहुत ज़रूरी होता है। आप वो बोलते हैं जो आपको पसंद हैं। जबकि होना यह चाहिए कि आप केवल वह कहो जो उन्‍हें पसंद है।' थोड़े शब्‍दों में तत्‍वज्ञान प्रस्‍तुत करते हुए उसने एक तरह से यशपाल के जीवन-दर्शन का बड़े सलीके से उपहास किया था। 

'मुरली भाई मैंने तो कभी किसी को कुछ नहीं कहा।' उसकी मुद्रा दयनीय सी हो गई थी। इस तत्‍वज्ञान को सुनने के बाद वह मानो शर्मिंदा होकर आत्‍मनिरीक्षण करने लगा था। लेकिन बहुत प्रयास करने पर भी स्‍मरण नहीं आया कि उसने कभी किसी से नोंक-झोंक की हो। दो-एक लोग ऐसे थे जो कि अतीत में कभी ट्रेड यूनियन वाली शैली में बॉस से उलझ पड़े थे। परंतु उनकी स्थिति भी इतनी ऐसी-वैसी नहीं थी। वह संभ्रम में पड़ गया। 'माई डियर सर मक्‍खन लगाने में पूरी टिक्‍की खर्च करनी पड़ती है। बस नमस्‍ते गुडमार्निंग से काम नहीं चलता। आप यह देखिए कि उसके किस काम आ सकते हैं। ऑफिस का काम तो कमबख्त़ बूढ़ा दफ्तरी भी कर लेता है। पर्सनल वर्क कीजिए।' मुरली ने भी तो यह सब सीखा ही होगा। कुछ यही आकर कुछ दुनिया-जहान से। लेकिन बहुत कुछ उसका निजी उर्पाजन होगा। वह अपने को निरंतर समकालीन ओर अद्यतन रखता था। उसने पुन: कुछ और भी बताया। 'सच पूछो तो आप कौन से किसी से कम है।' यशपाल समझ गया कि वह हरिनारायण के विषय में कह रहा है। पौन घंटे बाद विसर्जन से पूर्व उसने जैसे निर्गुण को सगुण में रुपांतरित करके यशपाल सदृश्य अपेक्षाकृत अल्‍प ज्ञानी प्राणियों के लिए भी सुलभ कर दिया था। सूर्यास्‍त के पश्‍चात् वह मदिरा के सिवा किसी और तरल पदार्थ को स्‍पर्श तक नहीं करता था। लेकिन यशपाल के लिए यह सब गवारा किया। उपकार यह बोझ कम करने के लिए उसने कहा 'सर एक सौ का पत्‍ता होगा? एक शादी में जाना है।' उसे यह तुरंत मिल गया। 

बॉस अगर उसे किसी फील्‍ड ऑफिस में पटकेगा तो सारे समीकरण धूल-धूसरित हो जाएगें। बच्‍चों की पढ़ाई दूर-दराज के इलाके में अनजान लोगों के मध्‍य रहना बने-बनाए परिचयों को छोड़कर जाना जैसी बातें उसे भूत की भांति भयभीत करने लगीं। उसने निश्‍चय कर लिया था कि वह मुरली को अपना पथ-प्रदर्शक बनाएगा और सफलता के लिए जो भी आवश्‍यक होगा वह करेगा। उसे बीच में लाकर बॉस से मिल लेगा। मुरली ने आश्‍वासन दिया था कि जल्‍दी ही वह मुलाकात करवाएगा। 'अभी हाल फिलहाल बात नहीं हो सकती है क्‍या?' वह गरजमंद की भांति आतुर था। 'क्‍या वे बहुत व्‍यस्‍त है?' 

'व्‍यस्‍त नहीं बहुत भ्रष्‍ट है।' मुरली हँसा। वह अपलक देखता रहा। 'सब का हाल मुझे पता है। कौन किस पार्टी से किस होटल में मिलता है। कितने में डील फाइनल हुई। इस चक्‍कर से वह ज़रा निकल जाए फिर बात करेगें।' 

यशपाल को हल्‍का–हल्‍का मालूम हो गया था कि बॉस ने अपनी पत्‍नी और बेटों के नाम से एक कम्‍पनी शुरु की है। मोटा लोन पास करवाया और अब मज़े कर रहा है। कम्‍पनी में सारे घरवाले जैसे बेटा-बेटी, चाचा-ताऊ वगैरह डायरेक्‍टर हैं। बिज़नस प्रमोशन के नाम पर फाइवस्‍टार में लंच करते हैं और क़र्ज़ चुकाने के लिए पैसा नहीं है। मुरली ने भी लोन दिलवाने हेतु खूब भाग-दौड़ की है। दफ्तर के काम में इतनी इज्ज़त कहाँ मिलती है जितनी इन सब उपक्रमों में। एक दिन वह सार्वजनिक रुप से यह घोषणा कर रहा था। लोगों को यह समझने में तकलीफ नहीं हुई कि यहाँ इज्ज़त शब्‍द का अर्थ धन व ऊँचे लोगों की कृपा से हैं।

उसने घर का एक विहंगम अवलोकन किया। सब कुछ ठीक दिखा। एक कमरे में रंगीन टी.वी. विद्यमान था। माना कि कई बरस पुराना था। उतना ही जितना समय उसकी शादी को हुए थे। लेकिन चल रहा था। विभा कई बार नया लेने को कह चुकी थी। छोटा सा लेकिन ठीक हालत में फ्रिज भी था। पिछले साल बिजली के उतार-चढ़ाव से इसका कम्‍प्रेशर खराब हो गया था परंतु रिपेअर कराने से ठीक काम कर रहा था। बच्‍चे अच्‍छी जगह पढ़ रहे थे। फिर समस्‍या क्‍या थी? आसपास रिश्‍ते नाते और दफ्तर में देखे तो हर कोई ज़्यादा नोट कमा रहा था। किसी के पास गाड़ी थी तो किसी और के पास बड़ी गाड़ी। उनके बच्‍चे ज़्यादा महंगे स्‍कूल में थे। घरवालियों के पास ज़्यादा गहने-कपड़े थे। विभा का कहना गलत नहीं था। इंसान को ज़माने के हिसाब से बदलना चाहिए। मुझे क्‍या पड़ी है कि फालतू में सिद्धांतवादी बनूँ। अगर ऊपर वाला कहेगा कि ऊँट को बिल्‍ली उठाकर ले गयी तो हाँ मे हाँ मिलाऊँगा। मुरली जीवन दर्शन इस मामले में बिलकुल सही है। चुपचाप सब चीज़ के मज़े लो। दिल से लगाने का कोई फायदा नहीं। सब कुछ एक दिन यहीं रह जाएगा। ऐसी नश्‍वरता का बोध जिसे हो जाए वह भी एक तरह से सन्यासी ही है।  

पिताजी की बात और थी। उनका भी एक दर्शन था। कुछ हजार रुपए में संयुक्‍त परिवार का पालन। समस्‍त नियम-धर्म मर्यादाओं का पालन करना और सभी को इनका अनुसरण करने को कहना। यशपाल ने उन्‍हें कभी भी डगमगाते नहीं देखा था। मझली बहन की शादी और लगभग उसी समय बड़े भाई का इंजीनियरिंग में एडमिशन के वक्‍त परिवार की व्‍यवस्‍था चरमरायी थी। लेकिन उनके ऊपर शिकन तक नहीं पड़ी थी। घर के सदस्‍यों पर ज़रा भी आँच नहीं आने दी। नौकरी के साथ-साथ गाँव की खेती की व्‍यवस्‍था भी देखते रहे। बुआ का लड़का भी घर में रहकर पढ़ता था। सभी को बिना किसी तकलीफ के साथ रखा। तब की बात और थी। अब विभा कहती है कि आज के ज़माने में न तो किसी का हमारे यहाँ आना धर्म है और न ही हमारा किसी के घर जाना धर्म है। इतनी मँहगाई है।

एक दिन यशपाल को विभा ने बताया कि पता है आपका बेटा क्‍या कह रहा था? कहता है कि मम्‍मी मेरे लिए एक कार ले आओ। पैसे की बात पर बोला कि मेरे गुल्‍लक में फॉरटी रुपीज़ है। उन्‍हें ले लो। वह हँसा। पूछा 'दोनों पढ़ाई कर रहे हैं या नहीं?' वह जानता था कि वे अपना होम वर्क कर लेते हैं पर आगे बढ़ने के लिए इतना काफी थोड़े न है। मालूम नहीं क्‍या करेगें। हमने तो फिर भी एक मुकाम हासिल कर लिया। कभी सोचता कि किसी बढि़या से पब्लिक स्‍कूल में दाखिला करवा दूँ। जो भी खर्च होगा देखा जाएगा। फिर बिना किसी के समझाए यथार्थ के धरातल पर आ जाता कि जब अभी ऐसी हालत है तो तब आगे कैसे चलेगा। पहले की बात कुछ और थी। बागवानी के शौकीन मोहल्‍ले-पड़ोस के बच्‍चों को भी दुलराने वाले पिताजी हमेशा ईमानदारी के रास्‍ते पर चलें और अपने परिवार को भी यही सिखातें। बुढ़ापे में जहाँ दूसरे लोग आराम करते या पूर्व स्‍मृतियों के आधार पर समय व्‍यतीत करते हैं वे अभी भी सामाजिक सरोकारों को लेकर अड़ोस-पड़ोस वालों का लामबंद करते थे। विभा चिढ़कर कहती कि आपके भाई लोग उनके बताए रास्‍तें पर क्‍यों नहीं चलते? एक आप ही बचे हैं? पहले की बात और थी। तब ड्योढ़ी पर पूरा कुनबा इकठ्ठा होकर जश्‍न मनाता था। अपना समय मिलजुल कर बिताता था। आज हर कोई अलग-अलग है। बड़े शहर में टू प्‍लस वन फ्लैट मध्‍यमवर्ग का सपना है। बीमारी में हल्‍दी-गुड़ और सोठ से ठीक नहीं हुआ जाता। ढ़ाई कोस दूर स्थित मिडिल स्‍कूल में बच्‍चे पढ़ाई के लिए नहीं भेजे जातें। खेती रही नहीं। वक्‍त—ज़रूरत पर हाथ लगाने को रिश्‍तेदार-पड़ोसी नहीं हैं। सब कुछ स्‍वयं करना है। ऐसे में अपने हाथ में रुपया-पैसा होना ब्रह्मा-विष्‍णु-महेश है।

पिताजी का क्‍या था। पढ़ाई करके लौटता तो कहते कि गाय के सामने पानी रख दो। बालकपशु असमर्थ लोगों को संरक्षण योग्‍य मानते थें। सीमित आय का एक भाग इनके ऊपर व्‍यय के लिए बचाकर रखते। मस्‍त रहते। तब और अब में क्‍या अन्‍तर नहीं है? परिवर्तन इसे कहते हैं। वह अपने को बदलेगा। मुरली की सलाह गलत नहीं है। वह बॉस के घर जाएगा। मुरली भी साथ में होगा। वहीं माफी-सुलह होगी। उसका चार सदस्‍यीय परिवार है। आखिर उसे भी अपने दो बच्‍चों और पत्‍नी का निर्वाह करना है। उसी के पद पर कार्यरत ज़्यादातर लोग पैसे-रुतबे में उससे कोसों आगे हैं। आखिर बंटवारे के समय भाईयों ने पिताजी को एक असफल आदमी घोषित कर दिया था। ऐसा इंसान जो अपने संतान के लिए औसत दर्जे का माल-असबाब भी नहीं जोड़ पाया था उसके लिए दूसरे शहरों में बसने गए पुत्र आदि उनकी स्‍मृति में प्रतिवर्ष पेड़ नहीं लगाएगें। प्रॉपर्टी जुटाएगें तो अगली पीढ़ी भी लाभान्वित होगी। वरना हवा में बातें करने से कोई लाभ नहीं है। सहसा यशपाल को लगा कि पिताजी का स्‍वरुप उसकी नज़रों से भी ओझल व तिरोहित हो गया है।

दो दिन बाद उसके टेबल पर आकर मुरली मंदिम स्‍वर में बोला 'गुरुजी आज शाम को बॉस का होटल में डिनर है। सुबह ही फ्लाइट से आए हैं। एक पार्टी से कोई डीलिंग है। वहीं मिलेगें। ऑफिस में यह सब ठीक नहीं रहेगा।' उसने कृतज्ञतापूर्वक सहर्ष अपनी स्‍वीकृति दी।

ऑफिस के बाहर कार खड़ी थी। मुरली ने इंतजाम किया था। 'ड्राइवर साहब होटल कॉटिनेंटल चलना है।' मुरली बड़े आराम से पिछली सीट पर लुढ़कता हुआ बोला। वह सिमटा हुआ था। 'सर जी आप बस हमारे साथ रहो। दुनिया का सारा हाल बता दूँगा। आप टेलेन्‍टेड आदमी हो। ज़रा सी देर में सब सीख जाएगें।'

होटल की भव्‍यता और शान-शौकत का अहसास उसे सजे-धजे दरबान के सलाम अदब से दरवाजा खोलना छत और दीवार देखकर हो गया। मुरली आगे-आगे अभ्‍यस्‍त कदमों से बढ़ रहा था। वह अज्ञात भय से ग्रस्‍त उसका अनुगामी बना हुआ था। लिफ्ट के सामने दोनों रुके। आधुनिक परिधान धारण की हुई एक गतयौवना आयी। मुरली ने अतिशय विनम्रता से उसे मार्ग दिया। 'प्‍लीज़ मैम।' उसने देखा कि नितात अपरिचित स्‍त्री के मुख पर भी मुस्‍कान उभरी। सही मंज़िल पर पहुँच कर मुरली आत्‍मीयता से उसका हाथ थामकर बाहर आया। 

जिस कमरे में बॉस ठहरा हुआ था उसमें घुसने से पूर्व मुरली बड़ी अदा से बोला 'मे आई कम इन हीज हाइनेस?' बॉस अन्‍दर एक सूटेड-बूटेड व्‍यक्ति के साथ बैठा ड्रिंक कर रहा था। यशपाल को लगा कि इस बनावटी अदा को वह पहचान कर नाराज़ होगा। लेकिन वह उलटे खुश होकर हँसा। 'आओ यार खड़े क्‍यों हो।' खी-खी करता मुरली उसके घुटनों को हाथ लगा कर बोला 'महापुरुषों की बैठक चल रही है। हमें भी सत्‍संग का लाभ उठाने दीजिए।' इस पर बॉस और भी हँसा। साथ बैठा आदमी भी मुस्‍करा रहा था। मुरली ने उसके घुटनों का भी स्‍पर्श किया। 'सर आपका आर्शीवाद चाहिए।'                             

'ले जाओ जितना चाहिए।' उस व्‍यक्ति ने मेज पर पड़ी बोतल उठाकर उसकी ओर बढ़ायी। मुरली फिर दंतपंक्तियाँ झलकाने लगा। अभी तक यशपाल की ओर किसी का ध्‍यान नहीं गया था। परम कृपालु बॉस का परहित करने वाले मुरली ने उसकी तरफ ध्‍यान आकृष्‍ट किया। नाटकीय तरीके से यशपाल का हाथ पकड़ते हुए उसने कहा 'हजूर ये हमारे भाई हैं। कोई गिला-शिकवा हो तो माफ करें। सर बड़े सीधे इंसान हैं। बड़ा लिहाज़ करते हैं आपका। ज़रा ध्‍यान रखिए।' 

बॉस सहसा गंभीर हो गया। मदिरा के साथ सिगरेट भी पी रहा था। राख को एशट्रे में झाड़ते हुए कहा 'यार मेरे काम का अलग स्‍टाइल है। मिस्‍टर यशपाल अच्‍छा काम करते हैं लेकिन हमें अपने यहाँ कोई अलग मिजाज़ का चाहिए। यू नो। वर्क शैल बी दी सेम बट इट हैज टू बी डन डिफिरेंटली।' अपना मंतव्‍य आंग्‍ल भाषा में व्‍यक्‍त करने के पश्‍चात् उसने आसव का एक घूँट लिया। 'सर एक मौका तो दीजिए। आप जैसा औघड़ दानी ऐरे गैरों को छप्‍पर फाड़कर देता है। ये तो अपने हैं। काम आएगें सरकार।' मुरली साष्‍टांग दण्‍डवत की मुद्रा में आ गया। अपने लिए किसी को ऐसे करते देखकर यशपाल के हृदय में कृतज्ञता शर्मिंदगी और यहाँ तक की ज़मीन में समा जाने वाले परस्‍पर विरोधी भाव धूप-छाँव की तरह आ जा रहे थें। वह अभी तक खड़ा था। किसी ने बैठने को नहीं कहा था।

साथ वाला मनुष्‍य कौतुहलपूर्वक समस्‍त घटनाक्रम को निहार रहा था। बीच में सिगरेट-शराब का बदस्‍तूर सेवन जारी था। कुछ क्षणों तक विचारमग्‍न रहने के बाद बॉस मुरली की ओर मुखातिब हुआ। 'ओके! इफ यू थींक सो...मैं मिस्‍टर यशपाल को चांस देता हूँ।' सुनते ही उसने चपलता से आगे बढ़कर उसके घुटनों का स्‍पर्श किया। 'इसकी गारंटी मेरी है सर जी।'

मामले को निपटाने के बाद मुरली अब दूसरे विषय पर मुड़ा। 'सरकार की सेहत का क्‍या राज़ है। लगता है कि सुप्रीम कोर्ट से स्‍टे ले लिया है कि उम्र बढ़ेगी ही नहीं। नारियल पानी पीते हैं?' उसने साथ वाले मनुष्‍य को संबोधित किया। वह इस टिप्‍पणी पर मुस्‍कराने लगा। मुरली भी हँस रहा था। 'सर मैंने आपको गोआ के बीच पर मैडम के साथ देखा था। बिलकुल राधा-कृष्‍ण की जोड़ी लग रही थी।' इस पर वह हो-हो करके हँसने लगा। 'बड़ा बदमाश है यह!' बॉस भी इस विनोद पर मुस्‍करा रहा था। अंत में मुरली मतलब पर आया। 'हजूर कल एक क्रिया में जाना है। कुछ हेल्‍प चाहिए।'

'कौन गुज़र गया?' उस व्‍यक्ति ने लापरवाही से पूछा।

'गाँव के चाचा थे।' उसने भी वैसी ही सपाट भाव से कहा। 'अब कुछ खर्चा-वर्चा अपनी तरफ से करना पड़ेगा। रिश्‍ते की बात है।'

'चल बोल कितना चाहिए?' व्‍यक्ति नवाबी शान एवं फक्‍कड़ों वाली उदारता से युक्‍त वाणी से बोला। 

'सर इधर जेब सूखी पड़ी है। मानसून दगा दे गया। यही कोई दसेक हजार।'

उसने ब्रीफकेस खोलकर एक गड्डी मुरली की तरफ उछाल दी। खींसे निपोरते हुए गड्डी को लपककर उसने अपने कपड़े में कहीं गुम कर ली। 'सर माँग कर खाता हूँ। हमारे लिए गॉड भगवान खुदा सब आप हो।'

वापस आते समय मुरली बेहद सहज था। कोई फिल्‍मी गाना गुनगुना रहा था। यशपाल को विपत्ति टलने की राहत थी लेकिन साथ ही साये की तरह चिपकी इज्ज़त जाने का गम भी था। गाड़ी में बैठकर मुरली उसे इन खुदाओं एवं भगवानों के विषय में अधिक जानकारी देने लगा। 'साले का एक्‍साइज में काम फँसा था। इधर का उधर करने के चक्‍कर में फँसा था। मेरी तो हर जगह गोट फिट रहती है। इसका उद्धार करवाया। घर में मैं व्हिस्‍की पीकर आराम फरमा रहा था कि इसका फोन आया। भाई प्रॉब्‍लम में हूँ। मदद करो। मैंने कहा बेटे ज़रूरत करेगें बस ज़रा अपनी जेब ढ़ीली करो। काम के बदले एक पेटी ली। अपने साहब से इसे इंट्रोड्यूज़ करवाया। दोनों के मज़े हैं।' बोलते समय उसकी क्षुद्रतम भाव-भंगिमा को सम्‍मोहित यशपाल ऐसे निहार रहा था मानो उसमें ब्रह्माण्‍ड का गहनतम रहस्‍य निहित है। यात्रा के दरम्‍यान उसने शब्‍दों भावों व हाथों को नचा-दिखाकर यह समझाया कि सत्‍ता-संपत्ति की आकांक्षा एक महासागर है जिसमें चमचागिरी भ्रष्टाचार चक्र-कुचक्र जैसी अनेक नदियाँ लीन हो जाती हैं। जो बात उसने यशपाल के मस्तिष्‍क के हार्ड डिस्‍क में बिठा दी थी वह थी कि खामखाह सर पर कफन बाँधने का कोई फायदा नहीं है। तन नंगा हो तो पहले उसे ढ़कना चाहिए। घर आकर एक चाय पीने के प्रस्‍ताव को उसने यह कहकर अस्‍वीकार किया कि एक दोस्‍त के पास जाना है। बोलने के बाद मुरली के मुख पर उभरी हँसी के भाव ने यह संभावना उजागर की कि दोस्‍त शब्‍द उभयलिंगी है। दफ्तर में लोगों से यह सुना था कि वह अपनी आय के अन्‍य स्रोतों से प्राप्‍त राशि को मुख्‍यता सुरा-सुन्‍दरी में व्‍यय करता है। 

घर पर यह सब बताते हुए वह उत्‍साहित था। सामने बैठी पत्‍नी को राहत व प्रसन्‍नता थी कि उसका पति अक्‍ल की कुछ चीज़ें तो सीख पाया। किसी रोज़ उन्‍हें घर पर बुलाओ। उसने सुझाया। उन्‍हें अर्थात् मुरली। वह मन ही मन हँसा। उसे चाय इतनी पसंद नहीं है। न ही ऐसे लोगों को घर बुलाना ठीक रहेगा। उसे मौन देखकर पत्‍नी ने अपना पसंदीदा कर्तव्‍य पूरा करने के उद्देश्‍य से एक नीति वाक्‍य सुनाया 'गुस्‍सा सब कुछ गँवाने का ज़रिया है जबकि धीरज सब पाने का।' 

दो दिन बीत गए। सब सामान्‍य चल रहा था। हरिनारायण ने उसके निकट जाकर अपनी कत्‍थई बत्‍तीसी दिखाते हुए कहा 'अब तो खुश हो ना!'

'क्‍यों?' उसने अचकचा कर पूछा। 'भई क्‍या कहने। बॉस के गुड बुक में शामिल हो गए हो।' यशपाल समझ गया कि ऐसी बातें छुपती नहीं। सच बात है सिंसियरिटी में अपनी समस्‍त ऊर्जा होम करना उचित नहीं है। कुछ दूसरी चीज़ें भी होनी चाहिए। संकोच के साथ ही सही पर दो बार उसने सप्‍लायरस् को अपने घर गाड़ी से छोड़ देने को कहा। आदत शनै: शनै: ही बनेगी। वह तो भला हो मुरली का जिसकी सूक्ष्‍म अन्‍वेषण शक्ति ने अनुमान लगा लिया कि उसमें तात्‍कालिक क्षमता भले ही न हो परंतु प्रशिक्षण प्रत्‍यक्ष अनुभव इत्‍यादि द्वारा यह विकसित की जा सकती है।        

बॉस ने जब यशपाल को केबिन में बुलाया तो उसके अन्‍दर उत्‍कंठा भय संशय आदि मिश्रित भावों ने उभरना शुरु कर दिया। यहाँ वह जब भी आया है उसके मन में उबलते-खौलते विचार व भाव अन्‍दर ही अन्‍दर सत्‍ता की ऊँची पहुँच के सामने स्‍खलित हो गए। यहाँ आते ही स्‍वर की उष्‍णता ए.सी. की ठंडक में बुझ जाती थी। 'देखिए....मिस्‍टर यशपाल‍' उसके नमस्‍ते का एक ठीक-ठाक जवाब देकर फाइल में नज़र गड़ाए हुए वह बोला 'एक इर्म्‍पोटेंट प्रोजेक्‍ट के पेपरस् हैं। ज़रा रीचेक कीजिएगा। फिर मुरली से मिल लीजिए। आज शायद ऑफिस में न हो।' उसके बारे में बॉस यहाँ तक खबर रखता था। 'पॉसिबल हो तो उसके घर पर मिल लीजिए। फिर इस पर कल डिस्‍कस करते हैं।'

'यस सर।' वह हकला कर बोला। इनर सर्किल में प्रवेश पाने की खुशी के साथ ज़िम्‍मेवारी का अहसास भी अनायास घुस गया। रोज़ छुट्टी के बाद बस पकड़ कर घर पहुँचने की जल्‍दी का स्‍थान अब दूसरी बातों ने ले लिया था। सप्‍लायरस् अब उसे मुस्‍कराकर नमस्‍ते करते। कुछेक रोज़ में पैकेट भी पकड़ाने लगेगें। उसने स्‍वयं का व्‍यवहार भी परिवर्तित अनुभव किया। सूखे में धरती कितनी सख्‍त होती है पर बारिश के बाद ज़मीन गीली होकर कीचड़ बनकर पैरों में चिपकने लगती है। पहले उसके लिए जो कल्‍पनातीत था अब उसे वह सहजता से कर रहा था। बात-बात पर हँसना आते-जाते काम के लोगों को पकड़ कर बात शुरु कर देना वगैरह। समय बचाने के मतलब से तथा साथ ही मानसिकता में आए नए-नए परिवर्तन के कारण भी वह बस के बदले ऑटो पकड़ कर मुरली के यहाँ पहुँचा। एक सोसाइटी फ्लैट के दरवाज़ें पर घंटी बजाने से नौकरानी नुमा महिला ने द्धार खोला। वह ड्राइंगरुम में बैठ कर हाँल की शोभा निहारने लगा। अच्‍छा ठाट था। लगता नहीं था कि अपनी तनखाह से यह जुटाया होगा। उसने यह सुन रखा था कि मुरली के घर का एक कमरा बस गिफ्ट से अटा पड़ा है। आखिर वह हर महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति के साथ हमेशा छिपकली की भांति चिपका रहा था। इनाम तो मिलेगा ही। यशपाल की सहज बुद्धि कहती थी कि ऐसे आदमी से दीर्घकालीन वचन बद्धता की आशा व्‍यर्थ है। परंतु यह कैसे संभव है कि तमाम उपादानों के मध्‍य रहते हुए मनुष्‍य विचलित न हो। जैसे किसी शल्‍य-चिकित्‍सक के सम्‍मुख नारी देह-मात्र शल्‍य-क्रिया के लिए हो। आखिर मुरली ने भी तो बड़े लोगों की कृपा की धूप में प्रकाश-संश्‍लेषण के द्वारा अपने लिए चाँदी काटी है।

थोड़ी देर में उसी महिला ने पानी का गिलास ट्रे में लाकर उसके सामने रख दिया। मुरली के बारे में पूछने पर बताया कि साहब की तबियत ज़रा ढ़ीली है। अभी बुलाती हूँ। तभी एक मोटा सा लड़का अन्‍दर से निकला। मुरली का बेटा होगा। उसकी ओर उचटती दृष्टि से देखता हुआ वह मोबाईल पर अंग्रेजी में बातें करने लगा। उसकी आवाज़ तेज व आत्‍मविश्‍वास से भरी थी। जींस पर मोटी बेल्‍ट कसे हुए पोशाक कुछ अजीब लग रही थी। कान में बाली लटक रही थी। शायद फैशनवश पहना होगा। बाल किसी पॉप या रॉक स्‍टार की तर्ज पर थे। आजकल यही चल रहा है। इसमें नया क्‍या है। थोड़ी देर तक कमरे में चक्‍कर काटते हुए बातें करने के बाद वह चला गया। दस मिनट बाद मुरली आया। 

'कैसे हो भाई? तबियत तो ठीक है ना।' उसने पूछा।

'हाँ बॉस। ठीक हूँ।' आँख मलते हुए जवाब दिया। वह थका सा था। सोफे पर पसरने के बाद उसने अनुरोध किया। 'आप पानी-वानी पीओ।....कल कुछ लोगों के साथ महफिल जमी। जोश में दो-चार पेग ज़्यादा हो गया। उलटी-वुलटी हुई। अब पहले वाले दिन तो रहे नहीं कि पेट में ईंट-पत्‍थर जो भी डालो सब भस्‍म। उम्र हुई। दूसरे साले अफसरों के हजार काम करने पड़ते हैं। गंदगी वे फैलाए और साफ-सफाई करें हम। घर में भी झंझट लगे रहते हैं।'

'लगता है कि आज कुछ परेशान हैं।' यशपाल ने आत्‍मीयता से कहा। 'सर जी ऐसा है कि राम और कृष्‍ण के जीवन में भी मुसीबतें आईं थीं। फिर हम लोग कैसे बच सकते हैं। वाइफ की तबीयत ज़रा वैसी रहती है। कुछ मेंटल प्रॉब्‍लम है। शक्‍की मिजाज़ की है। ऊपर से व्रत-उपवास इतने ज़्यादा कि पूछो मत। दस डॉक्‍टरों से दिखला चुका हूँ। दवाईयों की दुकान घर में लग गई लेकिन मज़ाल है कि किसी की बात सुन ले। मैं कहता हूँ कि जब मरीज़ खुद होशियारी नहीं बरतेगा तो मर्ज़ क्‍या खाक दूर होगा। बुरा न मानना सरकार...' वह अपनी आदत के मुताबिक संबोधन को प्रयुक्‍त करके बोला 'मैं यह मानता हूँ कि इंसान जब तक जीए सुख-चैन से जिए।'

'बात सही है।' उसने समर्थन किया। कुछ न कुछ बोलना था। मुरली की आँखें अभी तक लाल थीं। 'आप से क्‍या छिपाना। बीवी बच्‍चों के लिए ही हम सब कमाते हैं। वरना बात-बात पर झूठ, औरों की चमचागिरी, और पचास तरह के तिकड़म कोई क्‍यों करेगा? सर जी हर इंसान का सेल्‍फ रिस्‍पेक्‍ट होता है। आपके बारे में मेरी बड़ी अच्‍छी राय है। यू आर एन अपराइट एण्‍ड ऑनेस्‍ट पर्सन।' वह बोलता गया। 'सभी कहते हैं एक मैं ही नहीं। हमने दो पैसे एक्‍सट्रा कमाए लेकिन लड़का वैसे ही है। काफी खर्च किया पर पढ़ाई में ध्‍यान नहीं रहता। सोचता है कि अच्‍छा अक्‍ल का अंधा बाप मिला है। दुहते जाओ। बाइक-कार सभी चाहिए। पैसे खूब चाहिए। ये नहीं सोचते कि जिनके बूते पर मौज कर रहे हैं उनका लिहाज़ करें। फिर लड़की-वड़की का चक्‍कर! मैं कहता हूँ यार इतनी जल्‍दी क्‍या है। पढ़ाई तो पूरी करो। ऐसा नहीं कि हमारे समय में ये सब नहीं होता था लेकिन ज़्यादातर मामलों में एक से रिश्‍ता बनता था। यहाँ तो घर पर झुण्‍ड बुलाने को तैयार हैं। कहते हैं कि मेरे फ्रेंडस् हैं। यार व्‍हाट इज दी डिफिनिशन ऑफ फ्रेंड?'

वह मौन उसकी बातों को तन्‍मयता से सुन रहा था। यह समझ नहीं पा रहा था कि क्‍या प्रतिक्रिया प्रकट करे। तब तक मुरली पुन: शुरु हुआ। 'बॉस मैंने सोच लिया है कि इनके लिए मर-मर कर जोडूँ, इससे अच्‍छा है कि सभी को अपने हाल पर छोड़ दूँ।' पता नहीं उसके कथन में कितनी द्दढ़ता थी, परंतु इससे उसका क्षोभ व हताशा अवश्‍य झलक रही थी।

'सब ठीक हो जाएगा।' इस अवसर पर मित्रता का तकाज़ा था कि वह सहानुभूति के दो शब्‍द बोले। उसने तो आगे बढ़कर उसका कंधा भी थपथपाया। 'लड़कपन में गलतियाँ होती हैं। उम्र होने पर सब सँभल जाते हैं।' मुरली कुछ नहीं बोला, पर उसके भाव से स्‍पष्‍ट था कि वह इन शब्‍दों से आश्‍वस्‍त नहीं हुआ था। जिस काम के लिए आया था उसकी चर्चा अंत में की। पेपर लेकर वह वापस चला। लौटते वक्‍त मुरली ने यह भी बताया कि वाइफ का एक ऑपरेशन निकट है।

ऑफिस में दिन भर रहने के बाद घर पहुँचकर भी वह मुरली से सुबह हुई मुलाकात को भूल नहीं पा रहा था। अपने अपेक्षाकृत छोटे घर में काफी संतोष मिल रहा था। सामने बांस की खपच्चियों वाले रैक पर किताबें मैगज़ीने और पुराने कागज़ वैसे ही पड़े थे। एक कमरे के कोने पर विभा ने देवी-देवताओं की तस्‍वीरें व मूर्तियाँ स्‍थापित करके पूजा-घर जैसा कुछ बनाया था। उसे बैठा देख कर वह चाय लेकर आयी। आज वह शांत थी। कोई शिकायत नहीं कर रही थी। अन्‍यथा जब वह शुरु होती है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि पहली बारिश में ढालूदार छत से कई दिनों की जमी बीट टपक रही हो। तभी दोनों बच्‍चे शोर मचाते उसके पास आ गए। 'पापा आज टीचर जी ने मुझे गुड दिया है।' बड़ा बेटा उत्‍साहित था।

'अच्‍छा!' उसने खुशी ज़ाहिर की।

'और पापा मेरे लिए कल सर ने क्‍लास में क्‍लैपिंग कराई थी।' छोटे बेटे ने कहा।

'वैरी गुड।' सरकारी स्‍कूल में पढ़ने वाले बच्‍चे बड़ी आत्‍मीयता से उससे चिपक कर बैठे थे। उनके चेहरे पर खुशी व मासूमियत झलक रही थी। तब तक विभा उनके लिए नाश्‍ते में घर की बनी मठरी और लड्डू लेकर आयी। बच्‍चों की आँखों में विशुद्ध तत्‍काल की उपलब्धि की खुशी भरी हुई थी। वह उनमें सुनहले भविष्‍य को देख रहा था।

सबके इधर-उधर हो जाने के बाद कुर्सी पर बैठे हुए ही उसकी आँख लग गयी। एक झपकी ही ली थी कि लगा कि माँ पिताजी से कह रही हैं कि इस साल यशपाल के पास तीज नहीं भेजी। बहू जाने क्‍या सोचेगी। वे मज़ाक में कहने लगे कि क्‍या ज़रूरत है अगली बार भेजेंगे। उसको ऐसा प्रतीत होने लगा कि दरवाज़े पर पिताजी खड़े होकर किसी से बात कर रहे हैं। बस घंटी बजाने ही वाले हैं। वह हड़बड़ाकर जाग जाता है। कुछ भी हो, वह किसी के हाथों रुपान्‍तरित नहीं होगा। अपने लालच की खातिर भी नहीं। सच है कि इंसान मात्र वह नहीं होता जो वह आज है। न जाने कितनी चीज़ें ग्रहण करने और त्यागने के पश्‍चात् उसे यह स्‍वरुप प्राप्‍त हुआ है।

 

यथार्थ के सागर के बीच अभी भी कहीं-कहीं आदर्श के द्वीप पाए जाते हैं।

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