प्रेम का झरना

प्रेम का झरना

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आज प्रातः काल से ही मन बहुत ही व्यथित है, क्योंकि आज मेरा दस दिन का होली अवकाश समाप्त हो चुका है और मुझे आज ही अपनी नौकरी पर वापस दिल्ली जाना है । मेरा आठ वर्ष का बेटा विदिक कल से ही कह रहा है "पापा दो दिन और रुक जाओ न। आप जल्दी चले जाते हो हमें अच्छा नहीं लगता है।" और मैं उसे बार-बार समझाने की नाकाम कोशिश कर रहा हूँ । उसे क्या पता यह भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे हमें अपनों से दूर रहकर जीना पड़ता है । जीवन यापन एवं आवश्यक आवश्यकता की पूर्ति हेतु हमें अपनों के बिछोह का असहनीय दर्द भी सहना पड़ता है । पर क्या कर सकते हैं यही तो जीवन है । उस बच्चे की भी क्या गलती है, अभी अबोध बालक ही तो है । कल से बहुत खुश भी है क्योंकि कल ही उसका दूसरी कक्षा का परीक्षा परिणाम आया है, जिसमें उसने 85% अंकों के साथ उर्तीण हुआ है और तीसरी कक्षा में प्रवेश हेतु उत्साहित है । मेरी प्यारी बेटी दिशा जो कि इस बार अपनी दसवीं की परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा में उत्साहित है , और अपने भविष्य की आगे की योजनाओं में संलिप्त है, वह भी आज उदासियों के घेरे में है क्योंकि पापा आज दिल्ली चले जायेंगे । बच्चों की इन उदासियों मे मेरा मन इतना विचलित हो रहा है कि अंतर्मन अश्रुधारा की वर्षा में सराबोर हो रहा है । फिर भी बच्चों के सामने कैसे अपनी व्यथा को उजागर करूँ ! एक पिता जो हूँ । जिसे बच्चों के लिए ही तो अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभानी है । बच्चों के इस प्रेम रस में भीगता मेरा मन कितना अभिभूत हो रहा है , जिसमें एक सुखद अनुभूति छुपी हुई है जो बिछोह में भी कितना संबल प्रदान कर रहा है । पत्नी ज्योत्सना जिसे मैं प्यार से बेबी बुलाता हूँ , वह भी सुबह से खामोशी की निगरानी में चहलकदमी कर रही है । जो कि उसके व्यक्तित्व के उलट है , क्योंकि वह जैसी भी है पर बहुत ही खुशमिजाज है और हमेशा मुस्कुराती रहती है । पर आज उसकी खामोशी मेरी आँखों के लिए बड़ी भारी थीं , जिसमें बार-बार पलकें गीली होकर इसका अहसास करा रही थीं । मैं बार-बार उसको रिझाने की झूठी कोशिश में लगा था, पति जो हूँ । फिर वही नैतिक जिम्मेदारियों का अहसास स्वयं को संबल प्रदान कर रहा था ।


मेरे माता-पिता भी हमेशा की तरह इस बार भी मेरे दस दिन के अवकाश पर बहुत ही खुश थे । वृद्धावस्था में भी अपने हर दर्द को भुलाकर ,बेटे के पास होने की ख़ुशी उनकी आँखों मे साफ झलकती थी। जो एक बेटे के रूप में मुझे अपनी कर्तव्य परायणता पर गर्व प्रदान कर रहा था । वही चमकती आँखों मे आज उदासियों का समावेश मुझे चिंतित कर रहा था । वह समय भी आ गया जब मुझे घर से निकलना था, क्योंकि सायं को साढ़े पांच बजे मेरी ट्रैन थी , और मेरे घर से स्टेशन की दूरी लगभग दो घंटे की थी । अतः मैं तैयार होकर घर से बाहर निकला । हमारे ग्रामीण परिवेश में जब कोई बाहर शहर जाता है तो घर वाले उसे कुछ दूर गाँव के बाहर तक छोड़ने आते हैं, एतएव मेरे भी घर वाले मुझे भी बाहर तक छोड़ने आये । यह समय सबसे अधिक पीड़ा देने वाला होता है, क्योंकि सभी की आँखों मे अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थीं , और मैं निरंतर उसमें भीग रहा था । बेटे विदिक की तरफ मैने देखा तो उसकी आँखें अब भी कह रही थीं, पापा दो दिन और रुक जाओ न । वहीं मेरी बेटी दिशा की पलकों का भारीपन एक पिता पर बहुत भारी पड़ रहा था और पत्नी ज्योत्सना की गीली पलकों में एक याचना झलक रही थी कि अगली बार थोड़ा जल्दी आना । माताजी और पिताजी की आंखों से बहते आँसू इस बात की पुष्टि कर रहे थे , जा बेटा सदा खुश रहे , तुझे संसार की सारी खुशियाँ मिल जाएं । इस बिछोह पीड़ा में मैं जिस अश्रुधारा के प्रेम रूपी झरने के नीचे भीग रहा था , उस सुखद अतुलनीय प्रेम की परिभाषा परिभाषित करना पूर्ण रूप से असम्भव है । जिसमें सिर्फ और सिर्फ प्रेम रस की मिठास समाहित थी, जो एक सुखद अनुभूति के रूप में प्रेम झरना बनकर मुझे जीवन भर भिगोता रहेगा।              


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