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© HARSH TRIPATHI

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भाग--१ - रूही


कक्षा ५ से लेकर पी.एचडी तक, भौतिक विज्ञान की पुस्तकों में एक चैप्टर होता है--'ऊष्मा' यानि 'हीट'। उस चैप्टर का लुब्ब-ओ-लुआब ये निकलता है कि दुनिया का ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिस से होकर ऊष्मा नहीं बह सकती है, चाहे कुचालक हो या सुचालक , एक सिरे से दूसरे सिरे तक ऊष्मा पहुँचती ज़रूर है चाहे कुछ सेकण्ड्स लगें या कुछ साल भी, कोई भी पदार्थ पूर्णतः ऊष्मारोधी नहीं हो सकता है।

रामचरण के मॉडल टाउन स्थित घर पर आज चहल-पहल ज़्यादा थी, होनी भी थी ही...इकलौती बेटी रूही के लिए लड़का देखने जो जाना था। लड़का खुद रूही ने पसंद किया था, इसलिए रामचरण और उनकी पत्नी को और भी ज़्यादा बेचैनी थी...पता नहीं कैसा लड़का देखा है?..क्या करता है? रूही ने खुद ही बताया है कि सिख लड़का है लेकिन बढ़ी दाढ़ी और पगड़ी नहीं लगाता है...उम्र में दो साल छोटा भी है। अब बताओ, एक तो सिख लड़का पसंद कर लिया है, बिरादरी में लोग क्या बोलेंगे? पूरी दुनिया में यही एक जट्ट मिला था क्या?ब्राह्मण हो कर सिख से शादी ?और उसमे भी बिना पगड़ी, बिना बढ़ी दाढ़ी वाला, वो भी दो साल छोटा? ऐसा अंधेर देखा-सुना है कहीं? लड़की बड़ी और लड़का छोटा? जेठभतारी? अलग-अलग धरम और जात-बिरादर? रामचरण और उनकी पत्नी तो बहुत नाराज़ हुए थे जब रूही ने पहली बार रूपिंदर के बारे में बताया था, सीधे बोला कि किसी हाल में नहीं करेंगे शादी चाहे कुछ हो जाए। रामचरण ने अपनी बीवी से बोला था "...और पढ़ा-लिखा ले अपनी बिटिया को...पढ़-लिख के यही ज्ञान पाया है कि अपने समाज के नियम कानून को गोली मार दो, हिन्दू लड़की हो कर सिख लड़का पसंद करो, जैसे सारे हिन्दू लड़के मर गए हैं, कोई आगरा, मथुरा, भरतपुर का सुरेश ,रमेश, मनोहर, प्रदीप नहीं मिला जी इनको ...पंजाबी रुपिंदर ही पसंद आया इनको", मगर रूही के आगे किसी की कहाँ चल सकती थी. वो लड़की थी लेकिन लड़कों जैसा पाला था उसको रामचरण और उनकी पत्नी जानकी ने, उसकी हर मांग उसके मुँह से निकलने से पहले पूरी की थी हमेशा। उसका छोटा भाई भी था लेकिन घर में जो रुतबा रूही का था वैसा किसी का भी नहीं था, अपने घर की पहली लड़की थी जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला ले सकी वो भी हिन्दू कॉलेज जैसे नामी-गिरामी कॉलेज में. इकोनॉमिक्स में फर्स्ट क्लास बी.ए. पास किया था, फिर फर्स्ट क्लास में एम.ए. भी किया था. फिर बी.एड. पूरा करके सरकारी नौकरी के इम्तेहान की तैयारी शुरू की और दिल्ली सरकार का टीचर का इम्तेहान पास करके पास के ही भोला नगर सर्वोदय विद्यालय में पढ़ाने लगी थी, पढ़ने में तो उसका कोई सानी नहीं था. कॉलेज में अपनी टक्कर का एक ही मिला उसको, सेर को सवा सेर जैसा, रुपिंदर। शुरू-शुरू की टकराहट कब मोहब्बत में बदल गयी दोनों को पता भी नहीं चला. इसी रुपिंदर के लिए रूही ने अपने घर बात की थी और दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड डी.एस.पी. रामचरण की ना सुनकर साफ़ बोल दिया था कि "...इस जनम में शादी करुँगी तो सिर्फ रुपिंदर से, वर्ना किसी से नहीं,.." औलाद के आगे किसी की नहीं चलती, और वो भी जब कमाऊ हो तो और भी नहीं। डी.एस.पी. साहब की भी नहीं चली, आज वो जानकी, अपने बेटे नरेंद्र और एक-दो और रिश्तेदारों के साथ रुपिंदर के घर जाने की तैयारी कर रहे थे।

ऐसा नहीं था कि रामचरण और उनकी बेटी रूही के बीच सब अच्छा ही था, रूही के बचपन से आज तक बाप-बेटी एक दूसरे को बहुत पसंद नहीं किया करते थे. रामचरण मथुरा के मिश्रा ब्राह्मण थे जो दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के तौर पर भर्ती हुए थे, पुलिस की नौकरी में संगत और चाल-चलन दोनों ही बिगड़ गए थे. रामचरण ने शराब पीने का शौक पाल लिया था, लेकिन कुछ वक़्त बाद शराब ही उनको पीने लगी थी. रोज़ रात को शराब पीकर घर आते और जानकी जो दिन भर से उनकी राह तकती रहती थी, उसको जी भर के गालियां देते और पीटते भी, पतिव्रता स्त्री लगभग रोज़ ही ये सब झेलती। कभी कभी वो खुद घर भी नहीं आते थे बल्कि नशे में धुत्त रामचरण को उनके दोस्त अपने कन्धों पर उठा कर घर लाते थे और रात में जब परेशान जानकी दरवाज़ा खोलती तो दरवाज़े से अपने कमरे तक दोस्तों के कन्धों पर जाने में रामचरण दुनिया भर की औरतों के नाम और उनके किस्से बयान किया करते जिन्हे सुनकर उनके दोस्तों के आगे ही जानकी शर्म से पानी-पानी हो जाती थीं. फिर भी कभी जानकी से जब कोई, यहाँ तक कि उनके मायके वाले भी रामचरण के बारे में पूछते तो वो यही बोलतीं "..नहीं जी नहीं,..अब तो ये नहीं पीते हैं. किसी ने कभी बैठा लिया और पिला दिया तो अलग बात है, वो भी महीने-दो-महीने में एक-आध बार ,नहीं तो वो भी नहीं। अब नहीं पीते हैं..". पूछने वाला भी चेहरा देख के समझ जाता था कि अब आगे नहीं पूछना ज़्यादा अच्छा है।

हालत तब और बुरी हो गयी जब रूही पैदा हो गयी. जानकी, राम के हाथों पिटती रहती और सहमी-डरी हुई रूही एक कोने में खड़ी ये सब देखती रहती। बाप की ज़बान से निकली गालियां अब रूही के लिए भी होती थीं, लगभग रोज़ का ही नियम था ये. ५ साल की रूही थी जब नरेंद्र पैदा हुआ लेकिन रामचरण में कोई बदलाव नहीं आया. घर के ज़हर भरे माहौल में रूही को किताबें सुकून दिया करती थीं. पढ़ने-लिखने में वो काफी बेहतर होने लगी थी. जानकी ये ज़रूर ख्याल रखती थीं कि रूही की पढ़ाई में कोई दख़ल न आने पाए. धीरे-धीरे रूही दसवीं में पहुँच गयी, एक दिन हमेशा की तरह, राम जो अब थाना इंचार्ज थे, नशे में धुत्त हो कर घर आये और थोड़ी देर बाद बिना बात के ही जानकी को गालियां देकर पीटना शुरू कर दिया। रोज़-रोज़ के इस तमाशे से रूही तंग आ गयी थी. अब वो ४-५ साल की नहीं थी बल्कि १६ बरस की थी. ५ साल की बच्ची और १६ साल की लड़की के दिमाग, सोचने-समझने में भी फर्क आ जाता है. रूही अपनी कुर्सी-मेज़ से उठी और राम और जानकी के बीच में जा कर खड़ी हो गयी. अपने बाप को डाँटते हुए ज़ोर से बोली "क्या नरक बना रखा है घर को? रोज़-रोज़ यही होता है, आप रोज़ दारू पीकर आते हो और रोज़ माँ को पीटते हो, कैसे घटिया इंसान हो आप? ...बच्चे भी हो गए हैं दो-दो , फिर भी शर्म नहीं आती आपको। बच्चों के सामने ही हमेशा मार-पीट करते हो" राम के अंदर का रावण जाग गया, वो चिल्ला के बोले " अब तू मुझे तमीज़ सिखाएगी? कल की लौंडिया, अब तू बताएगी की अपनी बीवी से मुझे कैसे बात करनी है? मेरे टुकड़ों पर पलने वाले तुम सब..." इतना बोलकर राम के मुँह से रूही के लिए भी भद्दी गालियों की बौछार होने लगी. जानकी ने उसे हटाने की कोशिश की "...जा बेटा, यहाँ ध्यान मत दे.....अपना पढ़ाई कर....बोर्ड के इम्तिहान हैं तेरे,....". लेकिन रूही नहीं हटी "...नहीं माँ, हर रोज़ की इस नौटंकी से अब मेरा दिमाग फटने जैसे हो रहा है. आज तो इनको मैं समझाउंगी ढंग से कि आपकी कद्र करें ये और घर में नरक न बनाए...", "अच्छा,..तो अब तू समझाएगी मुझे " रामचरण ज़ोर से चीखे और जानकी को उंगली दिखा के बोले "....तूने ही सिखाया है न इसको ये सब? मैं करूँ कद्र तेरी? ", फिर वो रूही से बोले "..ले देख कैसे कद्र करता हूँ"...इतना बोलकर उन्होंने जानकी के पेट पर ज़ोर से लात मारी और वो दूर जा कर दीवार के पास गिरी। रूही का सब्र टूट चुका था और अगले ही पल रामचरण के चेहरे पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा. उनका चेहरा पीछे की तरफ घूम गया. थोड़ी देर के लिए राम और जानकी को समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ है. राम का हाथ अपने गाल पर था जिस पर पूरी पांच उँगलियों के लाल निशान थे. जानकी जमीन पर बैठी रोये जा रही थी और राम की हिम्मत नहीं हो रही थी की चेहरा घूमा कर रूही और जानकी को देख सकें। रूही के नथुने फड़क रहे थे और हाथ काँप रहे थे. उस दिन आखिरी बार रामचरण ने जानकी को पीटा था. फिर काफी समय तक रामचरण ने जानकी और रूही से बात ही नहीं की. वो शराब से ही बात करते रहे, जानकी तो बीवी थी, समझौता उसकी प्रवत्ति में था. सिखाया जाता था न पहले,..मायके से डोली,....ससुराल से अर्थी....चाहे पति कुछ भी करे, कैसा भी हो, उस से कुछ वक़्त बाद बातें शुरू हो ही गयीं लेकिन रूही से निगाह मिलाने में अब तक रामचरण डरते थे।

रूही ने सोच लिया था की वो नौकरी ज़रूर करेगी, माँ की तरह पति की लात नहीं सहेगी।


भाग --२ - गुलमोहर


रूही ने बारहवीं अच्छे अंकों से पास कर के दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज में बी.ए. इकोनॉमिक्स में दाखिला ले लिया और पढ़ाई-लिखाई करने लगी। फिर एम.ए. भी हुई और बी.एड. भी., और फिर नौकरी भी. रामचरण की भी उम्र हो रही थी और अब उनको दिल और लिवर की बीमारियों की शिकायत हो रही थी. शराब अब काफी कम कर दी थी उन्होंने। जानकी उनके खान-पान का बड़ा ख्याल रखती थीं और अब रूही भी पुरानी बातें भूलकर अपने पिता के साथ ज़्यादा वक़्त बिताया करती थी, रामचरण को भी रूही का अपने साथ रहना और बातें करना बड़ा अच्छा लगता था. ऐसे ही एक दिन बातों ही बातों में रामचरण और जानकी ने रूही का मन टटोला "...देख बेटा, हमारे गांव देहात और समाज में तो लड़कियां ज़्यादा नहीं पढ़तीं। नौकरी तो बिलकुल नहीं करतीं, चिट्ठी-पत्री लिखना आ गया, बस कर दी शादी। फिर भी तेरी बात मानी हमने और पढ़ने दिया तुझको। बी.ए. के दौरान शादी के लिए मना किया तूने, हम मान गए. फिर तूने कहा की एम.ए. हो जाये, हम वो भी मान गए. फिर तूने बी.एड. की ज़िद की ,हम उस पे भी राज़ी हो गए. अब तू नौकरी भी कर रही है, चल अच्छी बात है, अब तो हमें अपनी जिम्मेदारी शौक से पूरी करने दे...अब तू २७ की हो गयी है, कम उम्र तो नहीं है...फिर बिना तेरी मर्ज़ी के तो करेंगे नहीं, तुझसे पूछना भी तो ज़रूरी है" समय बदल गया था अब. दिल्ली में मेट्रो ट्रेन को भी ८ साल हो गए थे. ये बात राम और जानकी अच्छी तरह जानते थे कि पहले की तरह समय नहीं रहा अब जब माँ-बाप बच्चों से बिना पूछे शादियाँ तय कर दिया करते थे और बच्चे को बाद में पता लगता था कि इस तारीख को शादी है. वो एक सूचना नहीं, आदेश होता था कि चुपचाप शादी में बैठ जाना है बस।

अब वैसा नहीं था, दिल्ली को बदलते राम और जानकी ने खुद देखा था और अच्छी बात ये थी कि इस बदलाव को मान भी लिया था. बगल में बैठी रूही ने बड़ी हिम्मत करके, संकोच करते हुए,शर्माते हुए ज़मीन की तरफ देख कर अपने दुपट्टे के कोने को उँगलियों के बीच मसलते हुए कहा "पापा, एक लड़का था... कॉलेज में..अच्छा लड़का था वो....वो भी अभी तीसहजारी में वकालत करता है...मेरे साथ ही उसने बी.ए , एम.ए. किया था....फिर एल.एल.बी. भी की उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी से...फिर एक बड़े वकील का असिस्टेंट होकर अपना काम शुरू किया है ....और प्राइवेट कोचिंग में दसवीं, बारहवीं के बच्चों को पढ़ाता भी है." इतना बोल के रूही चुप हो गयी, रामचरण ने पूछा "नाम क्या है लड़के का? पूरा नाम?" रूही ने बड़ी मुश्किल से नाम लिया "...जी..... रूप.....रूप.....रुपिंदर ,...रुपिंदर बाज़वा". जानकी ने ये सुनकर रामचरण की ओर देखा और धीरे से बोलीं "क्या लड़का हुआ ये?" रामचरण का पारा अब तक गरम हो चुका था और वो गुस्से में रूही की तरफ देख रहे थे. उनके माथे पर पड़ी सलवटें और माथे के दाएं कोने पर पर उनके दाएं हाथ की दो उँगलियाँ और अंगूठे की हरकत बता रही थी कि मामला गंभीर है. जानकी ने दम साध लिया कि बाप-बेटी में फिर होगा कुछ, रूही अभी नीचे ही देख रही थी. रामचरण ने कड़क आवाज़ में कहा "....हम्म्म,.....तो पंजाबी है वो...",इतना सुनकर जानकी ने अपना सिर पीट लिया "क्या?.....पंजाबी?" जानकी को लगा कि सिर पर आसमान गिर पड़ा है. रामचरण ने फिर कहा "...इस पूरी दिल्ली में एक पंजाबी ही मिला था तुझे?..थोड़ा घर-परिवार ,समाज का ध्यान तो दिया होता तूने कुछ करने से पहले,...". रूही ने सिर ऊपर करके बोला "क्यों?.....ऐसी क्या ख़राबी है लड़के में?...स्वभाव का अच्छा है, चाल-चलन अच्छे हैं...सिगरेट-शराब हीं पीता है, शरीफ काम-धंधा करता है...वकालत भी करता है और किसी कोचिंग सेंटर में पढ़ाता भी है, जिसके अच्छे पैसे भी मिल जाते हैं उसको",और आखिरी लाइन रूही ने धीरे से बोली लेकिन उन दोनों ने साफ सुना "....और अपने घर की औरतों की इज़्ज़त करता है, उनको पीटता नहीं है". थोड़ी देर तक राम और जानकी ,रूही का और फिर एक दूसरे का चेहरा देखते रहे. फिर रूही ने कहा "...वो सिख है, लेकिन पगड़ी और बड़ी दाढ़ी नहीं रखता". राम ने कहा "..कोई सिख बिना पगड़ी, दाढ़ी के नहीं होता। वो तुझे बेवकूफ़ बना रहा है". रूही ने बताया "...चौरासी के दंगों में उसके घर के लोग मारे गए...तो उसकी माँ ने उसको पगड़ी और दाढ़ी रखने से मना कर दिया। तब से वो पगड़ी और दाढ़ी नहीं रखता". रामचरण के चेहरे के भाव तुरंत ही बदल गए और वो अचानक ही जैसे तनाव में आ गए. उन्होंने धीरे से चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और पूछा "क्यों?....घर कहाँ है उसका?". रूही ने बोला "...जी, करोलबाग़ में". "किस बड़े वकील का जूनियर है वो?" रामचरण ने फिर पूछा, "...कोई सिद्धू साहब हैं...उनका मैं ज़्यादा नहीं जानती" रूही ने जवाब दिया। थोड़े दिनों बाद रामचरण और जानकी ने सीधे ना कर दी. रूही भी थी तो ज़िद्दी ही, उसने भी बोल दिया "..शादी होगी तो सिर्फ रुपिंदर से, वरना होगी ही नहीं। मुझे किसी दूसरे लड़के की ना फोटो दिखाना ना मुझसे इस बारे में बात करना". फिर आखिर में रामचरण और जानकी को रूही की बात सुननी ही पड़ी और ४-६ महीने की जद्दोजहद के बाद वो रुपिंदर के घर शादी की बात करने को तैयार हो ही गए।

रुपिंदर २५ साल का, सुन्दर-सजीला, बांका पंजाबी नौजवान था लेकिन बाकी पंजाबियों से काफी अलग. ज़्यादा चिल्लाना, शोर-शराबा उसको बचपन से ही बिलकुल पसंद नहीं था. हो सकता है ऐसा उसकी परवरिश और उस वक़्त के हालात के चलते हुआ हो. वो पचासी के फ़रवरी-मार्च में पैदा हुआ था. वो बड़ा बुरा दौर था, पंजाब में दहशतगर्दी की ख़बरें आ रहीं थीं और फिर मई-जून में ऑपरेशन ब्लू स्टार के नतीजतन अक्टूबर में मिसेज़ गाँधी की हत्या के बाद अचानक दिल्ली और आस-पास के इलाकों में बड़े पैमाने पर सिख-विरोधी दंगे भड़क गए थे जो नवंबर-दिसंबर में ही ख़त्म हुए थे. बदकिस्मती से रुपिंदर का परिवार भी दंगों का शिकार हुआ. उसके पिताजी, ताऊजी, और ताईजी उन दंगों में मारे गए थे. रुपिंदर की माँ सुरजीत और बड़ी बहन शालिनी किसी तरह ज़िंदा बचीं थीं. तब रुपिंदर कोख में ही था, दुनिया में नहीं आया था. पैदा होने के बाद रुपिंदर ने खुद को राजानगर के रिफ्यूजी कैंप में पाया, उसका बचपन वहीँ बीता। माँ और बहन को अच्छी ज़िन्दगी जीने के लिए हर रोज़ संघर्ष करते देखा था रुपिंदर ने राजानगर रिफ्यूजी कैंप में २५ साल पहले रोज़ पीने के पानी, बर्तन, कम्बल के लिए माँ-बहन को लाइन में लगे हुए देखने से लेकर आज करोलबाग़ के मशहूर "बाजवा दी हट्टी" रेस्टोरेंट और अपने सुन्दर से छोटे से घर तक का सफर तय करने के लिए माँ और बहन की दिन-रात की मेहनत को बड़े करीब से देखा था उसने और खुद से जितना भी हो सकता था मदद भी की थी. शायद इसीलिए वो चुपचाप ही रहता था और कोई भी बुराई, नशा-शराब वगैरह उसको छू भी नहीं गया था. कभी भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिस से माँ या बड़ी बहन को किसी तरह की तकलीफ़ भी हो. वकालत उसने अभी कुछ वक़्त पहले शुरू की थी, जबकि कोचिंग वगैरह में पढ़ाते उसको ३ बरस हो गए थे.

लिखाई-पढ़ाई में रुपिंदर बेजोड़ निकला था. बुरे हालात के बावजूद अच्छे नंबर लाता था जिसकी वजह से दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज के इकोनॉमिक्स विषय में उसका दाख़िला हुआ था. तीन चीज़ों की रुपिंदर को जैसे दीवानगी थी--अपनी लिखाई-पढ़ाई, हॉकी,और सूफ़ी तराने। अगर वो अपनी किताबों में नहीं डूबा है और सूफ़ी तराने नहीं सुन रहा है, तो वो पक्का हॉकी ग्राउंड में अपनी स्टिक के साथ होता था. हिन्दू कॉलेज के मेन गेट से उसकी कैंटीन तक जाने वाली सड़क केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के आगे से बायीं तरफ घूम जाती थी और बड़े से स्पोर्ट्स ग्राउंड की बगल में लगे बहुत ही सुन्दर, बड़े से गुलमोहर के पेड़ के पास से गुज़रती हुई कैंटीन पर जा कर ख़त्म होती थी. हिन्दू की कैंटीन बड़ी मशहूर थी, ख़ास तौर पर उसकी फ्राइड इडली की पूरी यूनिवर्सिटी में तारीफ़ हुआ करती थी और लोग बड़े मन से, बड़ी तादात में खाने जाते थे, लेकिन अक्सर वो दोपहर २-३ बजे तक खत्म ही हो जाती थी. इसी कैंटीन में फ्राइड इडली खा कर एक दिन रूही अपनी दोस्तों के साथ वापिस आ रही थी. वो लोग फिर उसी गुलमोहर के नीचे खड़ी हो गयीं। इस भीषण गर्मी में वो गुलमोहर का पेड़ बड़ी राहत देता था. ठीक बगल में ही ग्राउंड का गेट था जहाँ से ५-६ लड़के अपनी-अपनी हॉकी स्टिक्स और बाकि सामान पीठ पर टाँगे ग्राउंड से बाहर आ रहे थे, उसमे कुछ सरदार भी थे. उनको देख कर रूही की एक दोस्त बोली "..ये देख इनको...ये पंजाबी लड़के हॉकी बहुत खेलते हैं". दूसरी ने बोला "....अभी यहाँ हॉकी खेल रहे हैं...रात को रोज़ इनके यहाँ बोतल खुलती है...बिना रात को दारु पिए तो रह ही नहीं सकते ये..."रूही ने कहा "....और रोज़ दारू पीके अपनी घर की औरतों, बेटियों,बहनों को खूब पीटते भी होंगे...",रूही की ये लाइन उन सब ने साफ-साफ सुनी मगर कुछ बोले नहीं, किन्तु उनमें से एक से रहा नहीं गया और वो रुक कर पीछे पलटा और गुलमोहर की तरफ आने लगा. दूसरी दोस्त ने दाँत पीसकर और भौहें तानकर रूही से धीरे से कहा "...ज़ोर से बोलना ज़रूरी था तेरे को? ले अब...जाग गया जट्ट...". रूही भी सहम गयी थी लेकिन फिर भी वो डरी नहीं। अब तक वो लड़का इनके पास आ गया था और बड़े अदब से बोला "...मैडम ,आपको ज़रूर ग़लतफ़हमी हुई है पंजाबी ऐसे बिलकुल नहीं होते। दारू पीते ज़रूर हैं लेकिन घर की औरतों पर ज़ुल्म नहीं करते,..एन्ड फॉर योर काइंड इनफार्मेशन मैडम, मैं ड्रिंक नहीं करता जबकि आई ऍम हंड्रेड पर्सेंट पंजाबी, और मेरी माँ और बहन दुनिया में मेरे लिए सबसे ज़्यादा अहमियत रखती हैं".इतना बोल के वो चुपचाप चला गया. ये रूही और रूपिंदर की पहली मुलाक़ात थी.

अगले दिन रूही को क्लास में पहुँचने में देर हो गयी, प्रोफेसर पढ़ा रहे थे और रूही डरते-डरते पीछे के दरवाज़े से क्लास में दाखिल हुई. सरसरी तौर पर देखा तो पूरी क्लास भरी हुई नज़र आयी, केवल एक सीट एक लाइन में किनारे खाली दिखी थी. बगल में कोई लड़का था तो काली और सफ़ेद चेक शर्ट पहने हुए था,जिसकी शक्ल नहीं दिख रही थी. रूही झटपट वहीँ जाकर बैठ गयी, लड़के ने सिर बायीं ओर घूमा कर एक बार उसको देखा फिर टीचर की तरफ देखने लगा. रूही ने भी उसकी शक्ल देखी और चौंक गयी "...अरे ये तो वही है...जिसने कल गुलमोहर के नीचे झाड़ पिलाई थी...ये मेरी ही क्लास में पढ़ता है ?". थोड़ी देर बाद रूही ने उस लड़के की कॉपी के पेज पर जहाँ प्रोफेसर के लेक्चर नहीं लिखे हुए थे, अपनी पेन से चार शब्द लिखे,..'एस '...'ओ '....'आर'... 'आर'..'वाई'...'सॉरी'. लड़के को कुछ देर समझ ही नहीं आया, उसने जल्दी से प्रोफेसर से डरते हुए 'सॉरी ' के नीचे एक प्रश्नवाचक चिन्ह बनाया... '?' लड़की ने उसके नीचे लिखा "...4 यस्टरडे एट दैट गुलमोहर ट्री " लड़के ने उसके नीचे जल्दी से लिखा "...डज़न्ट मैटर,....लीव इट" और फिर से प्रोफेसर के लेक्चर में दोनों मगन हो गए. क्लास ख़त्म होने के बाद सीट से उठते हुए लड़के ने मुस्कुराते हुए लड़की से कहा "मैडम ,इट्स ओके...इट्स वेरी कॉमन परसेप्शन अबाउट पंजाबीज़ व्हिच इज़ नॉट ट्रू ऑलवेज,....येस,देअर आर सम केसेस व्हिच आर नॉट नॉर्म्स,.आप आराम से रहिये, मुझे ऐसा कुछ बुरा नहीं लगा है". इतना बोलकर वो चला गया. धीरे-धीरे ये बोलचाल बढ़ने लगी.उसकी हॉकी की दीवानगी देखकर रूही को लगता था कि ये दिमाग से तो खाली ही होगा, ये भ्रम भी कुछ समय के बाद दूर ही हो गया जब क्लास टेस्ट वगैरह में, कुछ में रुपिंदर आगे रहता, कुछ में रूही। लंच भी दोनों साथ ही करते, एक की कोई क्लास ख़त्म हो जाती तो वो बाहर निकल के दूसरे का इंतज़ार तब तक करता जब तक दूसरा अपनी क्लास ख़त्म करके वापिस नहीं आता...फिर वो बाहर आ कर हिन्दू के गेट के पास बड़े मज़े से भेलपुरी खाते। हिन्दू के बाहर वाली भेलपुरी भी काफी मशहूर थी कैंपस में. ज़्यादातर खाना वो हिन्दू की कैंटीन में ही खाते। रूही कभी भी रुपिंदर को हॉकी मैच खेलने या पढ़ायी-लिखाई से नहीं रोकती थी और रूही की ये बात रुपिंदर को सबसे ज़्यादा पसंद थी क्योंकि कई बार रुपिंदर कॉलेज की टीम या दिल्ली की टीम की ओर से हरियाणा, हिमाचल,पंजाब के कॉलेजों में भी हॉकी खेलने जाता था. रूही ने एक बार मज़ाक में ही रुपिंदर से कहा "...कैसा अजीब नाम है यार...रुपिंदर,....नाम छोटा, मस्त-सा, सेक्सी-सा होना चाहिए ना?" फिर खुद ही अपने ऊपर गुरुर करते हुए, इतराते हुए बोली "..अब मेरा देखो,..रूही मिश्रा, क्या दिलकश नाम लगता है "रुपिंदर ज़ोर से हँसा और पूछा " तो बताओ मैडम, क्या नाम रखा है तुमने मेरा?" रूही ने कहा " आज से मैं तुमको बुलाऊंगी...रूप देखो, कितना अच्छा सा नाम लगता है...रूप". उस दिन रुपिंदर ने घर जाकर खुद को शीशे में देखा और बड़ी मस्ती से, बड़ी ख़ुशी से, अलग-अलग अदाओं से अपना नाम बुला रहा था "...रूप..रूप...रूप", सुरजीत और शालिनी पीछे बिस्तर पर बैठी हुई ठहाका लगा कर हँसे जा रही थीं . काफी वक़्त बाद दोनों इतना खुल के हँसी रही होंगी। उस दिन से रुपिंदर रूही के लिए 'रूप ' ही हो गया था.

इसी तरह से बढ़ते-बढ़ते दोस्ती कब प्यार में बदली, किसी को एहसास ही नहीं हुआ, या हुआ भी होगा तो किसी ने कहा नहीं होगा,....रूही शायद लड़की होने होने की वजह से शर्माती थी तो रुपिंदर अपनी स्वभावगत विशेषता की वजह से. लेकिन शायद अंदर ही अंदर किसी कोने में वो दोनों ही जानते थे और समझ रहे थे कि उनकी 'दोस्ती ' किधर जा रही थी।


भाग--३ - करोलबाग़



तय वक़्त पर, सुबह के दस बजे, रुपिंदर के घर के आगे रामचरण के परिवार की गाड़ी आ कर रुकी। शालिनी के पति अविनाश और रूपिंदर ने गेट पर जा कर उन लोगों को रिसीव किया। रुपिंदर ने रामचरण और जानकी के पैर छुए और हाथ जोड़कर अंदर आने का निवेदन किया। रूही सबसे अंत में गाड़ी से उतरी। वो गुलाबी रंग की सिल्क साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी, रुपिंदर ने उसे देखा तो एकबारगी तो देखता ही रह गया. वो और रुपिंदर एक दूसरे को देख के थोड़ी देर के लिए मुस्कुराये लेकिन अगले ही पल समझ में आया कि आस-पास बड़े लोग हैं, तो एक-दूसरे से नज़र हटाना ही वाजिब होगा।

अविनाश और रुपिंदर इन लोगों को ड्राइंग रूम में ले आये जहाँ सिद्धू साहब की बीवी थीं, रुपिंदर के कुछ पड़ोसी दंपत्ति थे जिनकी सुरजीत जी से बड़ी अच्छी बनती थी और जिनकी हर घड़ी में सुरजीत साथी होती थी. सुरजीत को वो लोग ऐसा समझते थे की वो खुद परेशानी उठा लेगी लेकिन दूसरों को कभी परेशानी में नहीं पड़ने देगी, यही वजह थी कि पड़ोसी कहीं भी बाहर जाते वक़्त अपने घरों की चाभियाँ सुरजीत या रुपिंदर को दे जाते। पड़ोस के गुरूद्वारे के ग्रंथी साहब भी वहीँ थे, पड़ोस के डॉक्टर सचान की बीवी भी थीं. दोनों पक्षों ने एक दूसरे का अभिवादन स्वीकार किया। सिद्धू साहब की बीवी ने कहा "...आप आराम से बैठिये, शालिनी और भाभी जी बस आ ही रहीं हैं". रुपिंदर अपनी माँ और बहन को लेने अंदर गया, जा कर देखा तो दोनों बड़े खुश लग रहे थे, शालिनी, सुरजीत को बन-ठन के चलने के लिए कह रही थी "...क्या यार मम्मी,...समधी डी.एस.पी. है...हमारी तरफ से भी तो टक्कर दे कोई " जबकि सुरजीत अपनी ख़ुशी के बावजूद भी खुद को बहुत शांत और साधारण ही रखती थी, उसने कपड़े काफी अच्छे पहने थे, लेकिन आभूषण पहनने से मना कर रही थी. अंत में उसने आभूषण नहीं ही पहने और अपने प्यारे से बेटे और ज़िम्मेदार बेटी के साथ अपनी होने वाली बहू और समधी-समधन से मिलने ड्राइंग रूम की तरफ चल पड़ी जहाँ अविनाश और सिद्धू साहब की पत्नी मेहमानों की ख़ातिर में कोई कमी नहीं कर रहे थे. रूप की पसंद की एक बड़ी सुन्दर सी अंगूठी सुरजीत और शालिनी ने रूही के लिए बनवायी हुई थी। रामचरण और जानकी ने सोचा था अगर आज सारी बातें मनमुताबिक़ हुईं तो आज ही 'रोका' भी कर देंगे। जानकी और रूही ने बड़े मन से एक सुन्दर सी अंगूठी रुपिंदर के लिए बनवायी थी.

बैठक में शालिनी और रुपिंदर के साथ सुरजीत दाखिल हुई. लोगों ने उन तीनों के आने के लिए रास्ता खाली किया। दामाद अविनाश ने परिचय कराते हुए कहा "..आइये मम्मी जी, ये हैं रूही के पापा श्री रामचरण मिश्रा जी, और ये रूही की मम्मी जानकी जी", सुरजीत और रामचरण ,दोनों ने अपना-अपना चश्मा ठीक किया और एक-दूसरे को देखने की कोशिश की. शालिनी भी रामचरण को देख रही थी. कुछ ही पलों में रामचरण, शालिनी और सुरजीत के चेहरों के भाव एकदम से बदल गए. उन तीनों के चेहरों से ख़ुशी ग़ायब हो चुकी थी. शालिनी और सुरजीत बिल्कुल सन्न रह गयीं थीं. माँ-बेटी के चेहरे पर अविश्वास, गुस्सा तैर रहा था जिसे कोई भी देख सकता था. रामचरण का चेहरा तो यूँ पीला पड़ गया था कि काटो तो खून नहीं। सुरजीत के देखते ही उनकी आवाज़ जैसे हलक़ में ही अटक कर रह गयी थी. शिष्टाचार भी होता है कुछ, इसका उनको तनिक भी होश नहीं रह गया था. समधन को 'नमस्कार ' केवल जानकी ने बहुत धीरे से वो भी दोहरे मन से किया, उसका एक मन सुरजीत को और रामचरण को देख रहा था और दूसरा इस नतीजे पर पहुंचा था कि रामचरण और उन माँ-बेटी को एक-दूसरे को देख कर कोई ख़ुशी नहीं हुई थी बल्कि संभवतः कुछ ऐसा हुआ है जो नहीं होना चाहिए था. इतने लोगों से भरे कमरे में अजीब सी खामोशी थी. रूही और रूप अपने-अपने माँ-बाप की शक्लें देख कर तनाव में आ गए थे और सोच रहे थे की ऐसा क्या हो गया है. अविनाश ने इस कुछ पलों की खामोशी को तोड़ने की कोशिश की "...मम्मी जी...",लेकिन उनके बोलने से पहले ही सुरजीत ने उनका हाथ पकड़ लिया। अभी भी वो गुस्से से लाल आँखों से एकटक रामचरण की ओर देख रही थी, और रामचरण की हिम्मत नहीं हो रही थी की सुरजीत और शालिनी को देख सकें। अचानक करके सुरजीत बड़ी ज़ोर से "ओ मेरे मालिक..." चीखते हुए बगल में रखे सोफे पर गिर पड़ी. बेटा रूप और बेटी शालिनी और दामाद अविनाश चरण ही उनकी तरफ लपके "...अरे..मम्मी जी..क्या हुआ..." ठीक इसी वक़्त रामचरण को दिल का तेज़ दौरा जैसे पड़ा और वो अपने सीने पर हाथ रख कर तेज़ी से बाहर की ओर भागे, उनके पीछे-पीछे जानकी भागीं। उनके पीछे रूही भागी। रामचरण अपनी गाड़ी के पास जा कर रुके और सीने पर हाथ रखकर भीषण उल्टियां करने लगे. जानकी और रूही उनके पीछे ही आये "...अरे...क्या हुआ आपको?...पापा,...क्या हुआ?..". रामचरण ने मुश्किल से हाँफते हुए कहा "...ओ....मुझे ले चलो यहाँ से...जल्दी करो.." घर पर जो लोग थे, उनमें खलबली मच गयी. रूप और अविनाश ने सुरजीत को बिस्तर पर लिटाया। शालिनी ने रोना शुरू कर दिया। रूप बोला "मैं अंकल जी को देख के आता हूँ...", ये बोलकर वो बाहर भागा, और रामचरण के पास पहुंचा। रूही ने रोते हुए उस से कहा "हार्ट प्रॉब्लम,..". तभी डॉ. सचान की पत्नी ने दरवाज़े के बाहर आकर रुपिंदर और अविनाश को ज़ोर की आवाज़ लगायी "...ओये पुत्तर,...इन दोनों जना को नर्सिंग होम ले चल अभी तुरंत, डॉक्टर साहब वहीँ पर होंगे अभी....रब दा शुकर है ,अस्पताल नज़दीक है...चिंता मत कर.....बस जल्दी ले चल..". रुपिंदर और नरेंद्र ने रामचरण को उनकी गाड़ी में बिठाकर ड्राइवर से बहुत जल्दी सचान साहब के अस्पताल जाने को कहा. रुपिंदर भाग कर अंदर आया, अविनाश बेहोश सुरजीत को गोद में उठाने की कोशिश कर रहे थे, रुपिंदर ने तुरंत हाथ लगाया और जल्दी से सुरजीत को घर से बाहर लाकर दोनों ने अविनाश की गाड़ी में बिठाया, शालिनी उनके साथ बैठी। अविनाश जल्दी से ड्राइविंग सीट पर बैठे, और गाड़ी को सचान साहब के नर्सिंग होम की तरफ दौड़ा दिया। रुपिंदर ने सभी मेहमानों से माफ़ी मांगी, जिस पर मेहमानों ने बड़ी समझदारी से, शांत और संयत प्रतिक्रिया दी. वो भी देख रहे थे की दोनों ही तरफ के लोग अचानक ही बड़ी परेशानी में पड़ गए थे, इसलिए किसी ने भी कुछ नहीं कहा बल्कि सबने रूप से कहा "पुत्तर, तू घर में ताला बंद कर के अस्पताल निकल.....हम वहां अभी आते हैं....सगाई-ब्याह तो हो ही जायेगा". रुपिंदर दरवाज़े पर ताला बंद करके अस्पताल की ओर भागा.

अस्पताल में दोनों गाड़ियों पहुंची। सचान साहब की बीवी ने उनको फोन पर बता दिया था, इसलिए डॉक्टर साहब खुद ही निकल कर बाहर आ गए थे. आनन-फानन में स्ट्रेचर मंगाए गए और सुरजीत और रामचरण को ग्राउण्ड फ्लोर पर ही दो अलग-अलग खाली कमरों में बिस्तर पर लिटा दिया गया और दूसरे डॉक्टर भी जल्द ही दोनों की जांच-पड़ताल के लिए आ पहुंचे।

३-४ घंटे हो गए थे. रामचरण और सुरजीत अपने-अपने कमरों में प्राथमिक उपचार के बाद सो रहे थे. डॉक्टर सचान ने दोनों परिवारों को बता दिया था "..चिंता की कोई बात नहीं है....सही वक़्त पर न लाते तब ज़रूर कुछ बात हो सकती थी...बढ़ती उम्र है...बीमार भी हैं दोनों,.अब उम्र अपना कुछ असर तो दिखाएगी ही...बट सिम्पली,...नॉट टू वरी...इट हैप्पेंस सम टाइम्स" थोड़ी देर बाद सुरजीत और रामचरण दोनों ने अपने कमरों में धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

अक्सर क्या होता है ऐसे मौकों पर? घर वाले भी राहत की साँस लेते हैं और रोगी इंसान ख़ुशी से मुस्कुराता है. लेकिन यहाँ अलग मामला था, दोनों के घर वाले तो उनके आगे हँसते हुए बैठे थे, लेकिन वो दोनों, आँखें खोलने और अपने लोगों से मिलने के बाद भी सामान्य बर्ताव नहीं कर रहे थे, उनके चेहरों से ख़ुशी बिलकुल गायब थी. सुरजीत ने शालिनी की ओर अजीब सी नज़रों से देखा, न उनमें सवाल था, न कोई जवाब, न कोई निर्देश,....केवल एक खालीपन, एक अजीब सा दर्द था, और जिसको शालिनी ही अच्छी तरह समझ रही थी....शायद इसीलिए वो सुरजीत की आँखों में नहीं देख पायी और फफक कर रो पड़ी. सुरजीत ने बड़ी देर से हिम्मत बांध रखी थी लेकिन अब वो टूट गयी और वो भी अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर रोने लगी. अविनाश और रुपिंदर और वहां मौजूद कोई भी शख्स इसे समझ नहीं पा रहा था, कि माँ-बेटी इतनी बुरी तरह से रो क्यों रहीं हैं. डॉक्टर ने भी कहा था कि कोई बड़ी, चिंताजनक बात नहीं है...फिर क्यों ये रुदन?

दो कमरे छोड़ कर रामचरण के कमरे में भी अजब माहौल था. नरेंद्र, रूही, जानकी मुस्कुराते हुए उसके सामने बैठे थे लेकिन रामचरण के चेहरे से मुस्कान ग़ायब थी और उनको देख कर कोई भी बोल सकता था कि वो काफी दबाव और तनाव में हैं. उनकी नज़रें अपने लोगों पर पड़ने की बजाय अस्पताल की दीवारों, खिड़कियों और पंखे, अपने बिस्तर और हाथों पर जा रही थी, जैसे वो कहीं और हैं और उनका मन कहीं और वो अपने परिवार से ज़्यादा बातें नहीं कर रहे थे और ज़्यादातर कि चुपचाप बैठे थे, बिलकुल चुप क्यों?



दोस्ती प्यार जिद्द

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