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लाल कोट - अध्याय 1 - बरसात
लाल कोट - अध्याय 1 - बरसात
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© Panchatapa Chatterjee

Fantasy

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बारिश लगभग सुबह से ही हो रही थी | ये बेमौसम बरसात थी जो कुछ नापसंद सी लग रही थी, मुझे तो ज़रूर और शायद औरों को भी | छतरी लेकर नहीं निकला था मैं और मेरे दफ्तर में भी कई लोग छतरी नहीं लाये थे | शायद उन्हें भी ये बरसात ईद का चाँद लगा हो पर किसे पता था कि ये दिन कितना भारी पढ़ने वाला था सबपे | सड़के जाम थी | उनमें पानी जो भर गया था | टैक्सी और ऑटो चलना बंद हो गए थे | बस स्टैंड पर लोग खड़े बस का घंटो इंतज़ार कर रहे थे और बसों कि हालत तो आज तौबा तौबा |

दफ्तर कि खिड़की से मैं ये सब नज़ारा देख रहा था | शक था कि आज सलामत घर पहुँचूंगा भी या नहीं | असल में कलकत्ता कि सड़के भी कोई सड़क है, अच्छे शब्दों में इसे गली कह सकते हैं, या गली की बड़ी बहन पर ये बात मैं कभी किसी और कलकत्ता के बंगाली को नहीं बोल सकता, मेरी माँ को भी नहीं | सुबह से करीब हज़ार बार मेरी माँ मुझे फ़ोन कर चुकी है कि कहीं मुझे सर्दी तो नहीं लग गई, या किसी पानी से भरे गड्ढे में मैं गिर तो नहीं गया या किसी कटे और झूलते बिजली की तार में मेरा पैर पड़ कर मैं मर तो नहीं गया | जब तक मैं घर नहीं पहुँचता, आशा करता हूँ वो बार-बार फ़ोन करेगी ये जानने के लिए कि इस बारिश में मैं ज़िंदा तो हूँ |

भला ऐसे बारिश में काम करने का क्या दिल करेगा ? मेरा तो नहीं ! आज मेरे अंदर का शायर जाग गया था और एक कंप्यूटर प्रोग्रामर मर गया था | आज मेरा दिल एक आज़ाद परिंदा था, शायद चकोर जिसे बारिश मिल गयी थी | आज मैं अपनी नींद सोना और अपनी नींद जागना चाहता था |

कुछ ही पल में मैं सामने के एक कॉफ़ी शॉप में चला गया | वो खचा-खच भरा था | मेरे जैसा कोई दूसरा नहीं दिखा वहाँ | ज़यादातर कॉलेज के बच्चे थे जो बस दीवार पर चिपकी रेट-लिस्ट देखते और बाहर हो रही बारिश को पर मोबाइल में सेल्फी रुकने का नाम नहीं ले रही थी | मुझे बैठने कि जगह चाहिए थी वो भी खिड़की वाली जगह जहाँ से सड़क का नज़ारा दिखता पर वहाँ तो सारी सेल्फी वाली जनता बैठी थी | मुझे ऐसे लोगों से चिढ़ है और मैं इन बेवकुफो के मुँह नहीं लगना चाहता | मैंने काउंटर पर करीब सात सौ रुपए का आर्डर दिया और अपनी पसंदीदा सीट मांगी | काउंटर पर खड़े लड़के ने उस सीट कि तरफ देखा फिर केशियर के कान में कुछ फुसफुसाया और उस टेबल कि तरफ गया | अगले ही पल में वहाँ पसर के बैठ गया | यकीन मानो मेरी रूह को जो आज सुकून मिला उसका नशा किसी जॉइंट से कम नहीं था |

वैसे मैंने अपनी ज़िन्दगी में कुछ तीर नहीं मारे हैं | तभी शायद ये छोटी-छोटी वाहियात बातो में मुझे मज़ा आता था | बचपन में पढ़ा बॉयज स्कूल में, तो कोई गर्ल-फ्रेंड नहीं बनी | टयूशन क्लासेज में सोचा कुछ होगा, पर लड़कियों ने घास नहीं डाला | माँ ने बचपन से इतना खिलाया कि मैं गब्लू बन गया और पेट-नाम भी मेरा गब्लू पड़ गया | मोहल्ले कि आइटम लड़कियों ने भाई-दूज में बचपन में ही भाई बना लिया और मेरे ही दोस्तों के साथ मेरी ही निगरानी में मस्त लगाया । बदले में मुझे दिया बूंदी के लड्डु जी ! बचपन से ही मुझे बूंदी के लड्डू पसंद है, पर मैं उन्हें लड्डू के तौर पर नहीं बल्कि उनका कचुम्बर बना बूंदी जैसे खाता हूँ | शायद ये मेरे गुस्से का जवाबी अमल था जो अब तीस साल कि उम्र मैं आदत बन चुका था |

खैर सीधे अल्फाज में मैं एक तीस साल का सूखा इंसान हूँ | पर अब मैं गब्लू नहीं बल्कि गबरू बन गया हूँ | दिल्ली मैं जो चार साल इंजीनियरिंग पढ़ा, ये उसका नतीजा है | अब मैं किसी को घास नहीं डालता बल्कि बहिन बनाता हूँ | मैं ब्रदर-इंडिया हूँ | ये मैंने मुकर्रर किया है कि किसी देसी लड़की से इश्क़ नहीं करूँगा | उन्होंने मुझे भाई बनाया था तो अब मैं उन्हें बहिन बनाऊंगा |

मैं अब थोड़ा भावुक हो चला था | अपनी डायरी निकाल अपनी भावनाये शायरी-इ-मिश्रा के हवाले लिखने लगा कि मेरी नज़र सामने बस स्टैंड पर एक लाल रेन-कोट पर पड़ी | मैं उसे अनदेखा न कर पाया | उस लाल रंग में कुछ तो कशिश थी | मेरी नज़र उसी पर गढ़ गयी | बरसात के वजह से धुंधला दिखाई दे रहा था पर आँखे हट भी तो नहीं रही थी | वहा दूर बस लाल कोट और नीचे का हिस्सा ही दिख रहा था, सर तो छतरी के पीछे छिपा था | उस लड़की या औरत ने पांव में काले बेलीज़ जूते पहने थे शायद | वो बड़े ही खूबसूरत लग रहे थे | शायद उन्हें पहनने वाली भी उतनी ही हसीन हो ! इस ख्याल ने जैसे मेरे नसों में करंट दौड़ा दिया | मेरा दिल अब हौले-हौले तेज़ होने लगा | अंदर से आवाज़ आने लगी कि "वो कौन है ? कैसी दिखती है ?" पेट में मरोड़ और बेचैनी का उफान उठने लगा | मेरा शरीर अब मेरे दिमाग का, जो टेस्टोस्टेरोन छोड़ने लगा था, उसका साथ देने लगा | ये बेसब्री बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी | जितने में मैं बैग समेटके कॉफ़ी शॉप से निकला, वो लाल कोट वहाँ से गायब हो गया | मैंने यहाँ-वहा ढूंढा पर मुझे वो लाल कोट कहीं न दिखा | यकीन मानो, मेरा दिल बड़े ही ज़ोरो से टूटा और बदन की हलचल अचानक ज्वार-भाटे के बाद के सन्नाटे सी खामोश हो गई | इस बरसात के पानी में अब शायद मेरे आंसू भी बहने लगे थे कि तभी मेरा फ़ोन बजने लगा | मैंने फ़ोन उठाया और कहा-

हेलो माँ, मैं जिंदा हूँ और घर आ रहा हूँ............

कहानी जारी रहेगी.....

कल्पनालोक मौजमस्ती बारिश

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