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मिट्टी की खुश्बू
मिट्टी की खुश्बू
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© Jyoti Gajbhiye

Drama

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महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बस हिचकोले खाते हुये ललिता के गाँव जा रही थी | मई की भयानक गर्मी से वह पसीने से तरबतर हो चुकी थी ,यह तो अच्छा हुआ कि उसे खिड़की के पास वाली सीट मिली थी | यदा-कदा हवा के झोंके आकर पसीने को हरने के लिये उससे गुत्थमगुत्था हो जाते ,पर हवा में भी गर्माहट थी | खिड़की से वह लगातार बाहर के दृश्य देख रही थी, ज्यादातर खेत सूखे नजर आ रहे थे, कोई इक्का-दुक्का खेत होंगे जो कृत्रिम सिंचाई के साधनों से हरे-भरे थे | सूखे खेतों को देख ललिता की आँखें भींग गई, सीमित साधन और बारिश के अभाव में किसान क्या खेती कर पायेगा | भगवान इन बादलों का पानी सुखाकर किसान की आँखों का पानी बढ़ा देता है |

किसान की बेटी थी, मिट्टी की खुश्बू उसके तन-मन में रची बसी थी, वह इन खेतों को छलांगते-फलांगते ही बड़ी हुई थी, उसे याद है तब बाबा तुअर और कपास बोते थे, पुरानी यादें उसे बेतहाशा सताने लगी, बाबा के साथ मनोज और वह खुद जाकर बुवाई ,निराई गुड़ाई ,कटाई करते थे ...कितने अच्छे दिन थे वे, पैसो की कुछ कमी थी पर परिवार में सामंजस्य था | आई –बाबा भले आधा पेट खा कर रह लें पर उन्हें अच्छे से अच्छा भोजन मिले इसी चिंता में लगे रहते थे | उन्होंने दोनों बच्चों को स्कूल में डाला था, गाँव का स्कूल आठवीं तक ही था,आगे पढ़ने के लिये शहर जाना पड़ता था, आई चाहती थी मैं आठवीं के बाद पढ़ाई बंद कर दूँ पर बाबा ने उसकी एक न सुनी और मुझे शहर की हॉस्टल में भर्ती करवाया ताकि मैं आगे की पढ़ाई कर सकूँ  | तब एक साल उनकी खड़ी फसल जंगली जानवरों ने बरबाद कर दी थी, पैसों की तंगी तो थी ही ,खाने के लाले पड़ रहे थे ,तब बाबा ने शक्कर कारखाने में कुछ दिनों तक नौकरी की थी, वे ट्रेक्टर में भर कर गन्ने कारखाने में पहुँचाते  थे, उनके साथ मैं गन्ने के खेतों में गई थी, इन खेतों में अजीब सी खुश्बू मचलती थी , हवा चलती तो इन खेतों में अजीब सी फुसफुसाहट होती मानो एक गन्ना दूसरे से बातें कर रहा हो |

तभी बस वहाँ से गुजरी जहाँ सड़क के दोनों और आम के वृक्ष लगे थे, आम की पत्तियाँ हिल-हिल कर मानो उसे अभिवादन कर रही थी , उसने भी खिड़की से बाहर हाथ हिला दिया | उसे यूँ हाथ हिलाते देख पास बैठी अधेड़ महिला ने पूछा –“कोई पहचान का दिखा क्या ?”

ललिता जोर से हँस पड़ी और जवाब दिया- “मावशी इन अमराइयों से मेरा पुराना रिश्ता है |”

वह अधेड़ महिला अचम्भित सी ललिता का मुख देखती रह गई |

पूरे छःमाह बाद गाँव जा रही है ,शहर में एग्रीकल्चर में एम.एस.सी.कर रही थी, इम्तिहान के बाद घर जा रही थी , नौकरी के लिये भी उसका कैम्पस सेलेक्नश हो गया था |

बस खचाखच भरी हुई थी ,गर्मी की छुट्टियों में बच्चों की परीक्षा के बाद सभी बाहर निकलते हैं , ज्यादातर लोग अपने पैतृक गाँव या फिर शादियों में जाते हैं, बस झटके से किसी स्टॉप पर रुकी कुछ लोग पानी पीने और लघुशंका के लिये उतर गये | ललिता को भूख सी महसूस हुई ,उसने अपने बैग से चिप्स का पैकेट निकाला और खाने लगी, मिलिंद ने उसे बस स्टॉप पर ही हिदायत के साथ बिस्किट और चिप्स का पैकेट पकड़ा दिया था और कहा था –“भूखी मत रहना, रास्ते में खाते हुये जाना |” बड़ी भाग्यशाली थी वह बाबा की तरह ही ख्याल रखने वाला मिलिंद जो मिला था | बाबा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, यही कोई पांचवी-छठी पढ़े होंगे , फिर भी मराठी अच्छी तरह पढ़ लेते थे | उसने अपना पेपर इंग्लिश से मराठी में अनुवाद करके उन्हें दिया था , जिसमें कम पानी में खेती कैसे होती है इसकी जानकारी थी | बाबा ने उसे फोन पर बताया था कि उन्होंने आधुनिक तरीके से खेती शुरू कर दी है | वह देखना चाहती थी इस ढंग से खेती कर उनकी कितनी प्रगति हुई है, वैसे वह बीच-बीच में फोन पर सलाह देती रहती थी |

अचानक बस जोरदार झटके के साथ आवाज करते हुये रुकी, उसने देखा तलोदा उसका गाँव आ गया था|

उसने खिड़की से झाँक कर देखा सफेद कुर्ता-पायजामा , और टोपी पहने बाबा खड़े थे ,उसे खिड़की से झांकते देख उनके चेहरे पर चौड़ी मुस्कान खिल गई वे बस की ओर आने लगे ,वह भी झटपट बैग पकड़कर नीचे उतरी और बाबा से लिपट गई , आँखें गीली हो गई |

बाबा गमछे से मुँह पोंछते हुये भरे गले से बोले – “कसी आहेस पोरी ?”(कैसी हो बिटिया)

“मैं तो मजे में हूँ पर आप क्यों इतने दुबले हो गये ,ढंग से खाते-पीते नहीं हो न ?”

“कहाँ दुबला हुआ हूँ ,बहुत दिनों के बाद देखा तूने इसलिये लग रहा होगा |”

बाबा के साथ मोटरसाइकिल में बैठकर वह घर आई तो गंगा गाय ने जोर से रंभाकर सबको उसके आने की सूचना दे दी | आई और मनोज लगभग दौड़ते हुये बाहर आये ललिता को बाँहों में भर आई की आँखों से गंगा-जमना बरसने लगी | मनोज भागकर पानी ले आया ,वह भी शहर के इंजिनीयरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था ,छुट्टियों में दो दिन पहले ही गाँव पहुंचा था | उसके बाद बाबा ,मनोज और ललिता की बातें शुरू हो गई और आई चौके में उसकी मनपसंद पूरनपोली और आमटी बनाने में जुट गई | उस रात सारे परिवार ने एक साथ खाना खाया , जबसे दोनों बड़े हुये हैं ऐसे अवसर कभी-कभी आते हैं |

सुबह उठी तो मोबाइल में  देखा मिलिंद के तीन-चार मिस्ड कॉल थे | उसने तुरंत मिलिंद को फोन लगाया , वह शायद नींद में था फिर भी फोन उठाया और उसे डांटने लगा की कल से कितने कॉल कर चुका हूँ और तुम हो कि यह भी बताने की तकलीफ नहीं ली कि तुम ठीक से पहुँच गई |

“क्या करती इतने दिनों के बाद आई हूँ , आई-बाबा और मनोज से बातें कर रही थी और मोबाइल मेरे पर्स में पड़ा था |”

शिकवे-शिकायतों के बाद मिलिंद ने कहा –“आई बाबा से हमारी शादी की बात कर लेना |”

“पर इतनी जल्दी , मुझे कुछ समय दो , अभी तो मैंने तुम्हारे बारे में उन्हें बताया भी नहीं |”

फिर बताओ जल्दी ,अब छुपाने में कोई अर्थ नहीं |

हाँ –हाँ बताती हूँ |

फोन पर कह तो दिया ललिता ने पर खुद गहन चिंता में डूब गई , ऐसा नहीं था कि आई-बाबा मना करते , पर बस उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था |

आई ने आवाज दी और वह बाहर खेतों में आ गई ,अब मानो वह स्वप्नलोक में विचरण कर रही थी, बाबा ने एक एकड़ जमीन को स्वर्गलोक बना दिया था | सफेद और हरे वितानों से ग्रीन हाउस का निर्माण किया गया था और बराबरी के अंतर पर पौधे लगे हुये थे ,जिन्हें पाइप द्वारा बूंद-बूंद पानी मिल रहा था |  पौधों में लगी लाल-पीली शिमला मिर्च इतरा-इतरा कर हिल रही थी ,कुछ आगे बढ़ी तो खीरा, टमाटर , मटर के पौधे दिखाई दिये .....बेलों पर लगी लौकियाँ मंदिर के घंटे की तरह दिखाई दे रही थी, सेलरी और लेटुय्स आधुनिक सलाद की पत्तियाँ ,आगे तुलसी और बेसिल के पौधे सब कुछ इतना मनोहारी था कि खुशी के अतिरेक में वह उछल गई |

बाबा उसे देखकर खिलखिला कर हँसे और बोले- “आवडला का लली ?” (अच्छा लगा क्या लली)

“बहुत अच्छा, बाबा मैंने आपको जिस हाईटेक खेती के बारे में बताया था, आपने इतनी जल्दी शुरू भी कर दी  |”

“हाँ बेटा, शुभ काम में देरी क्यों !”

“बाबा पौधों को पानी कहाँ से मिलता है ?”

“मैंने पानी का बड़ा टैंक बनवाया है यदि बारिश होती है तो टैंक में पानी इकठ्ठा हो जाता है ,नहीं हुई तो बोरवेल से मशीन द्वारा चढ़ाते हैं |”

“वाह बाबा ! सब कुछ परफेक्ट किया है आपने |”

“और वह खाद जिसका मैंने जिक्र किया था ,आप बना रहे हो कि नहीं ?”

बाबा ने एक ओर इशारा किया और कहा –“वह देख कृष्णा क्या बना रहा है ?”

वह भाग के कृष्णा के पास गई वह बाजरी का आटा, काले गुड़ और गोमूत्र से जीवामृत खाद बना रहा था, ललिता उसके पास बैठ गई और दोनों हाथों से खाद मिलाने लगी |

“कृष्णा तूने पोधों की जड़ों में  भात का तूस डाला कि नहीं ?”

“डाला  ताई, सब कुछ अच्छे से करता हूँ , आई ने मुझे अच्छे से सिखाया है सारा काम,गंगा गाय का गोठा साफ करके मैं उसका दूध दुहता हूँ फिर खेतों की सफाई करता हूँ, नियम से खाद डालता

हूँ |”

“हाँ ऐसे ही बाबा की मदद किया कर, हम दोनों तो बाहर रहते हैं इसलिये आई-बाबा का ख्याल तुझे ही रखना है |”

फिर वह कृष्णा के साथ पौधों की जड़ों में भुरभुरा कर खाद डालने लगी | खाद डालते हुये उसने देखा की कुछ ग्रामीण स्त्री पुरुष उसी के घर की तरफ आ रहे हैं |

“अरे इतने सारे लोग हमारे घर की और क्यों आ रहे हैं ?”

“आई-बाबा आधुनिक खेती सिखाने के लिये रोज 9-11 वर्ग लेते हैं |”

ललिता ने हाथ का तसला जमीन पर रखा और उस कमरे में लगभग दौड़ती हुई गई जहाँ आई-बाबा क्लास ले रहे थे, बाबा किसानों से बात कर रहे थे ,उनकी समस्यायें सुनना उनका रोज का नियम था | ललिता ठिठक कर दरवाजे पर ही खड़ी हो गई ,बाबा ने उसे भीतर बुलाया, गाँव के किसान और उनकी औरतें उससे कुशलक्षेम पूछने लगे |

“तुम्हारे बाबा की वजह से गाँव का कायापलट हो जायेगा” एक किसान बाबा की प्रशंसा करते हुये बोला |

“बाबा आपको यह क्लास लेने का विचार कैसे आया ?”आश्चर्य से भरी ललिता ने पूछा |

“बेटा गाँव की गरीबी और किसानों की आत्महत्या ने मुझे व्यथित कर दिया था , सोचा जैसे मैं चार पैसे कमा रहा हूँ ,ये भी कमाये |”

ललिता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस गर्व से बाबा को देखती रह गई | तभी बाबा को फोन पर किसी ने बताया कि पास के गाँव में किसी किसान ने आत्महत्या कर ली है, बाबा ने आई को कुछ हिदायतें दी और मोटरसाइकिल लेकर घटनास्थल की ओर रवाना हो गये | आई अनपढ़ थी, पर बाबा की अनुपस्थिति में आधुनिक खेती सिखाने की कक्षा बहुत अच्छे से लेती थी , आज ललिता ने भी आई के साथ क्लास ली और बाद में खेतों में काम किया | यह सब करते हुये दोपहर हो गई ,सूरज सर पर चमकने लगा था, उसे भूख भी जोरों से लगी थी | उसने स्नान किया तब तक आई ने खाना बना कर तैयार रखा था | खाना खाकर उसे सब्जियों की पैकिंग करनी थी ....बाप रे कितने काम ,पता नहीं आई-बाबा अकेले कैसे करते होंगे , मदद के लिये तो सिर्फ कृष्णा है | उसने देखा उसके मोबाइल की घंटी बज रही है मिलिंद था, इस भाग-दौड़ में उसे फोन करने का समय ही नहीं मिला था | मिलिंद ने बताया पन्द्रह दिन में रिजल्ट आ जायेगा फिर वह नौकरी जॉइन कर लेगा, वह कह रहा था कि पन्द्रह दिन बाद वह भी आ जाये ताकि वह भी अपनी नौकरी में हाजिर हो सके | जैसे ही फोन पर बात खत्म हुई आई ने पूछा –“किसका फोन था लली ?”

“बस आई मेरे रिजल्ट के बारे में कॉलेज से .....पन्द्रह दिन में रिजल्ट आ जायेगा |”

आई उसे कुछ संशयित नजरों से देखती रह गई | ललिता ठठाकर हँसकर बोली –“क्या सोच रही है आई?

चल तू खाना खा ले फिर हम सब्जियाँ पैक करेंगे |”

सब्जियाँ पैक करते हुये आई ने ललिता को बताया कि बाबा किस तरह गाँव के विकास में जुटे हैं,कभी-कभी उन्हें खाना खाने का समय भी नहीं मिलता | घर में जिस आधुनिक खेती की शुरुआत की है उस पर तो ध्यान देना ही पड़ता है फिर फसल बेचने शहर जाना ,वहाँ से बीज लाना और यहाँ कई मृत किसानों के बच्चों को ठीक से पढ़ाने-लिखाने के लिये खुद शाला जाना उनको भर्ती कराना ऐसे कई काम अपने जिम्मे लिये हैं | साथ ही वर्ग तो है , फिर वे किसानों का संगठन बनाने का भी सोच रहे हैं | शाम ढले धूल -मिट्टी से भरे बाबा आ गये , धूप से आँखें अंगारे सी लाल हो रही थी | आते ही उन्होंने स्नान किया ,तब तक मनोज भी आ गया था | आई गाय की खली- भूसी तैयार कर रही थी खास मक्के के ज्वारे उगा कर गाय का खाद्य तैयार किया जाता था जिससे वह 8-10 लीटर दूध देती थी |

ललिता ने ही बाबा और मनोज को खाना परोसा, आज उसे बाबा से ढेर सारी बातें करनी थी सो उनके पास ही बैठ गई |

“बाबा क्यों की उस किसान ने आत्महत्या ?” ललिता ने पूछा

“बैंक का कर्जा था उस पर और सामने जवान बेटियों की शादी , पैसों की तंगी से परेशान था बेचारा |

अब हम सब मिलकर वर्गणी निकालकर उसकी बेटियों की शादी करवाने का सोच रहे हैं |”

“ओह ! बाबा आप जो किसानों का संगठन बनाने की सोच रहे हैं ,बिल्कुल सही है इसके द्वारा ही आप गाँव के किसानों की समस्या दूर कर पायेंगे साथ ही सरकार तक भी अपनी बात पहुंचा पायेंगे |”

“हाँ ,कुछ किसान मंत्रालय पर धरना देने की बात कर रहे हैं,जिन्होंने किसी तरह पानी की व्यवस्था कर तुअर की फसल उगाई थी वह  क्विंटलों तुअर  पड़ी है और सरकार ने अपने वायदे के अनुसार सारी नहीं खरीदी , असमय पड़ी बारिश से बाहर रखी तुअर सड़कर बरबाद हो गई |”

“यह तो बहुत बुरा हुआ बाबा |”

“किसानों के साथ ऐसे ही हादसे होते रहते हैं ,कोई गाँव आकर खुद  देखे तो उसे समझ आयेगा |”

“बाबा कितना अच्छा हो की हम गाँव के बच्चों को बचपन से खेती-किसानी सिखाये | मैं गाँव में कृषि विद्यालय खोलना चाहती हूँ |”

“तेरी योजना तो बहुत अच्छी है , पर इस काम के लिये खर्चा भी बहुत है |”

“भाकरी ला दे ताई |” तभी मनोज बोला और ललिता उठकर चौके में गई | वह मन ही मन कुछ सोच रही थी |”

अगले दिन वह तड़के ही गाँव का चक्कर मारने निकल पड़ी ,औरतें उतनी सुबह मर्दों से पहले उठकर बाहर शौच को जा रही थी ,अब तक गाँव में शौचालय भी नहीं बने थे, सबसे पहले तो शौचालय निर्माण के लिये अर्जी देनी होगी | आगे गई तो देखा हरि काका गाय के लिये चारा लिये जा रहे थे ,पशु भी पोषक आहार के अभाव में कमजोर होते जा रहे थे उसने हरि काका को आवाज दी

“कैसे हो काका ?”

“देख तो रही है ,जिसके ट्यूबवेल थे उन्होंने अनाज उगा लिया ,हम गरीब कहाँ से लायेंगे इतने पैसे जो ट्यूबवेल लगवा लें ,सो भूखों मर रहे हैं |”

“काका ऐसा क्यों कहते हो ,आज से ही आई-बाबा के क्लास में आ जाना, मैं खुद आपको सिखाऊँगी की कम पानी में खेती कैसे करते हैं |”

“ठीक है , मुझे दिनकर ने बताया कि तेरे बाबा वर्ग चला रहे , पर उतनी हाय-फाय खेती को पैसा कहाँ से आयेगा|”

“सब बताउंगी काका ,अस्सी प्रतिशत सरकार देती है और बीस प्रतिशत अपना लगाना पड़ता है , तुम क्लास में आओ ,मैं सब कुछ समझा दूंगी |”

लौटते हुये ललिता ने देखा गाँव के बच्चे मैले –कुचैले कपड़ों में खेल रहे थे ,इन्हें सफाई का महत्व बताना भी आवश्यक है | घर वापिस आते हुये वह सोच रही थी कि गाँव के विकास के लिये कुछ करना बहुत आवश्यक है ,बाबा कर तो रहे हैं पर सब कुछ देखते हुये अकेले कितना काम करेंगे | ललिता ने यहाँ आकर बहुत काम संभाल लिया ,मनोज भी अगले हफ्ते जा रहा है , उसकी छुट्टियाँ खत्म होने वाली हैं |

ललिता गहन विचारों में डूब गई |

जब अनमनी सी घर पहुँची तो आई ने पूछा –“का्य झाला लली” (क्या हुआ लली)

“कुछ नहीं , तू अब तक क्लास लेने नहीं गई ?”

“तेरी ही राह देख रही थी ,तू न्याहरी कर ले फिर चलते हैं , तू इतने अच्छे से सिखाती है कि सभी जल्दी से सीख जाते हैं |

गाँव के कामों में दिन इतनी जल्दी गुजर रहे थे कि पता ही नहीं चलता कब सुबह से शाम हो जाती है | पन्द्रह दिन देखते ही देखते गुजर गये , इस बीच मिलिंद के दो-चार फोन भी आये पर ललिता आई-बाबा से कुछ न कह सकी | आई ने जरुर उसकी शादी की बात निकाली थी तब ललिता ने बड़े ठसके से जवाब दिया था आस-पास के सत्रह गाँव में भी मेरे बराबर पढ़ा लड़का नहीं हैं ,फिर मैं शादी किससे   करूँ ?

वहाँ मिलिंद की सांसे अटकी पड़ी थी , पता नहीं उसने ललिता में ऐसा क्या देखा कि किसी और से शादी का विचार उसे अस्वस्थ कर देता | वह तो छुट्टियाँ खत्म होने की राह ही देख रहा था ,पर जब पूरे पन्द्रह दिन के बाद भी वह न आई और न उसका फोन, तो बेचैन हो उसने ललिता को फोन लगाया

“तुम ऐसे कौनसे कामों में व्यस्त रहती हों ,जो दो घड़ी बात भी नहीं कर सकती |”

“तुम कभी गाँव आओ फिर बताती हूँ यहाँ कौनसे काम होते हैं ?”ललिता ने जवाब दिया |

“मुझे मालूम है कि गाँव में खेती-बाड़ी के बहुत काम होते हैं पर इसका मतलब ....”

“इसका मतलब आप नहीं समझेंगे जनाब ,बचपन से शहर में जो रहे हो |” ललिता ने उसकी बात काटते हुये कहा |

“यह सब छोड़ो और बताओ कब निकल रही हो, बेसब्री से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ |”

एक क्षण को चुप रह गई ललिता फिर धीरे से बोली “नहीं आ रही हूँ |”

“हाँ आज नहीं आ रही हो ,एक हफ्ता और घर में रह लो ,अगले हफ्ते आ जाना |”

“नहीं मिलिंद मैं कभी भी नहीं आऊंगी .....कभी भी नहीं |” कुछ दृढ़ आवाज में ललिता ने कहा |

“ पर क्यों ?” मिलिंद हक्का-बक्का था |

“ बस इस गाँव में कई काम ऐसे हैं जो मेरे बगैर हो नहीं सकते |”

“तुम्हारे बगैर भी हो सकते हैं ललिता ,तुम्हारी नौकरी भी तो है .....फिर बीच में छुट्टियों में तुम गाँव आती-जाती रहना |”

“ नहीं यह नहीं हो सकता , मैं नौकरी से ज्यादा खेती करके कमाऊँगी ,मेरी पढ़ाई गाँव के काम नहीं आई तो क्या काम की , मेरे बाबा ने पेट काटकर मुझे पढ़ाया है, मुझे भूल जाओ मिलिंद ....”

“ऐसे कैसे भूल जाऊ ? पूरे पाँच साल का रिश्ता है हमारा ....”

“और इस मिट्टी से मेरा पूरे साढ़े तेईस साल का रिश्ता है |” ललिता ने जवाब दिया और फोन काट दिया | उसकी उँगलियाँ तेजी से मैसेज टाइप कर रही थी -गाँव की मिट्टी की लड़कियां बड़ी कठोर होती हैं तुम जैसे व्यक्ति उसे झेल नहीं पायेंगे और यदि झेल सकते हो तो यहीं गाँव में रहने आ जाओ |  

आधुनिक खेती गाँव विकास

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