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पेंदी और लोटा
पेंदी और लोटा
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© Nikitasha Kaur

Comedy

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लोटा देखा है?  देखा ही होगा. पेंदी लोटे के अस्तित्व का मुख्य हिस्सा होती है. जितनी स्थिर और मज़बूत पेंदी होती है, लोटा उतना ही आदर्श माना जाता है. पेंदी के भी दो साइड होते हैं. बाहर वाला साइड चमकता रहे तो टॉयलेट के बजाय कहीं किचन या स्टोर रूम से रिश्ता आता है. अंदर वाली साइड में फंफूद लगी है या साफ़ है, समधी को इसमें ज्यादा रूचि नहीं होती.
जैसे बहू के घूँघट की लम्बाई के आधार पर उसका चरित्र प्रमाणपत्र तैयार किया जाता है, वैसे ही लोटा समाज में पेंदी से लोटे का स्टेटस तय होता है.
लोटे के और भी भाई-बन्धु-पटीदार हैं. जैसे बटुली, कटोरी, जग, मग, केतली, कराही, भगौना इत्यादि. पर लोटा सबसे निरीह है. किसी के पेंदी पे सवालिया निशान नहीं उठाये जाते. लोटे ही पेंदी उलट-पलट के देखी जाती है. 
सम्पन्न लोटा हो.  माने कि तांबा, पीतल या फूल का हो, तो खानदान के गौरवशाली इतिहास की वजह से जांच वाली एक्स-रे मशीन से बच जाता है. पेंदी हो न हो. वो लोटा बर्तन समाज में खास था और रहेगा.
स्टील वाला सबसे निकृष्ट है.. एक तो पीने, घोलने, युद्ध, छिड़काव, लघुशंका-दीर्घशंका सब में यही यूज़ होता है. और बार-बार इसी के पेंदे की जांच भी होती है. शुभ और अच्छे कामों से दूर रखा जाता है. 
कई बार पेंदी में खोट होने पे कबाडियों, लोहारों और ठठेरों का हाईकमिशन आता है आगे का प्रोग्राम तय करने पर ज़्यादातर वो वेल्डिंग या कोई और सुधार की सलाह देने की जगह लोटे को मिटटी आदि की सस्ती मदद दे के बगीचे में तृतीय दर्जे के गमले के रूप में विस्थापित करा देते हैं. और उस मेहनती लोटे की जगह लेता है कमीशन का सुझाया, मुरादाबाद से आय इम्पोर्टेड लोटा. 
नारी ही नारी की दुश्मन होती है, लोहा ही लोहे को काटता है और लोटा ही लोटे को विस्थापित करता है.
बर्तन प्रेस क्लब के लोग लोटे की चिंता पर दिन रात गले जाते हैं. पिंडलियाँ इतनी कमजोर हो गयी हैं कि बर्तन सरकार ने तत्काल प्रभाव से उन्हें थर्मोकोल के कंटेनर में रहने का आदेश दिया है. कमीशन वाले मुरादाबादी लोटे की समसामयिक ज़रूरत पर सरकार को रिझाने में लगे हैं. तांबे और पीतल के लोटों को Z-श्रेणी की सुरक्षा के तहत ऊपर वाले कपबोर्ड में रखा जाता है. इधर स्टील का लोटा आलमारी के नीचे वाले खाने से ऊपर वाले खाने में पहुंचने का सपना लिए बागीचें में रिटायर हो जाता है.
ऊँट जैसे काम से चबाये हुए जीरे जितनी आमदनी पाने वाले देहात के आदमी को लोटा खरीदते देख लूँ तो लगता है की वो वही लोटा लेता होगा जिसमे खुद का प्रतिबिम्ब पाता होगा. और पूरा बाज़ार छानने के बाद मिलता होगा उसे वही स्टील का लोटा.

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