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शक्ति का स्रोत
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© Jyotiramai Pant

Inspirational Tragedy

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आज पारुल के मनोचिकित्सा केंद्र 'सौम्या' का उद्घाटन समारोह था। शहर के जाने-माने व्यक्ति उपस्थित थे। अभी तक पारुल यह काम घर से या विभिन्न अस्पतालों-स्कूलों में जाकर करती थी। कितनी ही दुःखी, परेशान बेटियों का जीवन उसने सँवारा था।

समाज में फैली बलात्कार की महामारी से बचाने और पीड़ितों के मन से पाप और ग्लानि के भावों को मिटाने का बीड़ा उठाया था उसने। केंद्र के उद्घाटन के बाद बच्चों को यौन शिक्षा देने का व्याख्यान दिया तो तालियों से स्वागत हुआ. बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श की बात समझाई। तभी एक पाँच-छह साल की लड़की ने जब अपने घर के किसी व्यक्ति द्वारा गलत स्पर्श की बात कही तो सब सन्न रह गए। उसके मम्मी पापा भी उसे चुप रहने को कहने लगे। पारुल ने उन्हें ही चुप कर दिया। सलाह दी और बताया इस तरह दुष्ट -कुकर्मी लोगों की गलती छुपा कर वे और बड़ी गलती कर रहे हैं। दोषी को सजा देने की जगह बेटी को जन्म भर के लिए मानसिक संताप दे रहे हैं। उसकी बात का सभी ने समर्थन किया और आगे सचेत रहने का वादा भी किया।

पारुल अचानक उदास सी हो गयी। शायद आज के कार्यक्रम की थकान हो। उसका मन अतीत की गलियों में खो गया।

घर में खुशियाँ छाई हुई थी। सरोज जी के बेटे अतुल का विवाह हुआ था। बहू पारुल का स्वागत खूब धूमधाम से हुआ। अचानक ही रात को बहू बेहोश हो गयी तो अतुल ने घबरा कर माँ और भाभी को बुला लिया। तुरंत डॉक्टर भी आ गए। उन्होंने कई दिनों के चलते रस्मों-रिवाजों के कारण हुई थकान बताई। पारुल के होश में आते ही सब निश्चिन्त तो हो गए पर उसके चेहरे में फैला भय और घबराहट अभी दूर नहीं हुआ था। सास और जेठानी कुछ देर उसके पास बैठ कर जब जाने लगीं तो उसने फिर रोना शुरू कर दिया और जेठानी के हाथ कसकर पकड़ लिए। वे मुस्कुरा कर उसे समझाने लगीं,

"अरे ! पारुल ! घबराने की कोई बात नहीं। आज तो तुम्हारी जिंदगी नयी राह पर चलने वाली है, तुम तो पढ़ी-लिखी आधुनिक लड़की हो सब जानती ही होगी।’’

"हाँ दीदी ! पर"

कहती हुई वह फफक कर रोने लगी। सास उठ कर चली गयी। हो सकता हो बहू अपनी बात उसके सामने न कर पाए। जेठानी सौम्या उसकी बहन और सहेली बन कर संभाल लेगी।

बहुत समझाने पर पारुल बोली, "दीदी ! कैसे बताऊँ ? मुझे तो खुद भी नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ?"

"अतुल ने ज्यों ही प्यार जताना चाहा और नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की न जाने क्या हुआ, मुझे लगा ऐसा कुछ करने की कोशिश हुई है मेरे साथ। कौन था पता नहीं। बचपन में हुआ है पहले, जब मैं पाँच साल की थी। तब मैं बीमार भी हो गयी थी पर माँ आदि सभी घर के लोगों ने इस बात को भुलाने की कोशिश की थी। मेरा बहुत ध्यान रखा। यह बात मैं भूल भी चुकी थी पर शायद मेरे अवचेतन मन में यह बात अंकित हो और आज अचानक ...अब क्या होगा ?" कहकर वह फिर सुबकने लगी।

सौम्या सुनते ही बात की गंभीरता समझ गयी। अगर बात अभी न संभाली तो मुश्किल हो सकती है। कैसे समझाए ?

पहले उसने उसको प्यार से बैठाकर सारी बात सुनी। फिर कहा, "इस सब को जैसे तुम ने पहले भुलाकर रखा था वैसे ही अब भी कोशिश करो। तुम जानती हो कि तुम निर्दोष हो। इसमें तुम्हारा क्या कसूर है ।हाँ. ये बात ज़रूर है कि ऐसे लोगों को सजा देने के बजाय हमारे ही लोग उन्हें बचा लेते हैं और लड़कियों को ही सारा दर्द- अपमान और उपहास सहना पड़ता है।"

"अब इस समय इस बात से तुम्हारा नया जीवन ध्वस्त हो सकता है, अतः तुम हौसला रखो। अतुल पता नहीं कैसे प्रतिक्रिया करे ? हालांकि तुम दोनों का प्रेम विवाह हुआ है पर अचानक इस बात से क्या करेगा ? उसे समय देना पड़ेगा थोड़ा।

आगे न जाने क्या हो ? हो सके तो इस तरह की लड़कियों को भी सहारा और हौसला देकर उनके जीवन को सँवार सकती हो। काम कठिन है पर तुम्हें यह करना ही होगा। मैं तुम्हारे साथ सदा रहूँगी।"

अगले दिन उसे हॉस्पिटल मनोचिकित्सक के पास ले जाकर कुछ दिनों परामर्श और इलाज करवाया। सौम्या की मदद से सब कुछ ठीक हो गया। अगर उस दिन सौम्या न होती और अतुल समेत सभी इस बात को जान लेते तो क्या होता ?

अतुल को बाद में उसने हिम्मत कर बता भी दिया था। उसे बताना भी ज़रूरी था सौम्या ने उसे सलाह दी थी कुछ समय प्रतीक्षा करे। उसकी परेशानी और निर्दोष होने के कारण सभी ने मदद की। तभी तो आज वह इस मुकाम पर पहुँच सकी है। इसी लिए उसने अपने केंद्र ‘सौम्या’ का उद्घाटन भी सौम्या के हाथों करवाया। उसकी शक्ति का स्रोत तो सौम्या ही थी न ?

बालयौन शोषण डर मुकाबला

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