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आईना
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© Neha Tiwari

Drama Inspirational Others

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सुबह-सुबह सूर्य की किरणें तीक्ष्णता रहित होती हैं। सब कुछ आँखों को सुकून देने वाला होता है। खासकर चश्मे वालों के लिये। सब कुछ पता है फिर भी तीन साल गुज़र गए हैं बस उठ के बैठने का आलस है एक बार का। 
"
उठ जा रामू! आज तेरा नौकरी का पहला दिन है।"
आखिर माँ की आवाज़ ही गई।

उन्हें कैसे बताऊ की कितनी बेचैन रात से गुज़रा हूँ। ये नौकरी कोई आसान फैसला नहीं। नहीं चाहते हुए भी फिर से सब कुछ शुरू से मेरे अंतर्मन में फ़िल्म की तरह चलने लगा है।
मेरा नाम रामकृष्ण शास्त्री है। उत्तरप्रदेश के बनारस में रहता हूँ। पिताजी प्राइवेट जॉब में थे लेकिन अकेले बेटे के लिये तारे भी तोड़ ला सकते थे, और एक दिन तारों में ही चले गए।
पिताजी थे तो सब मर्ज़ी से किया। बस ग्रेजुएशन का टप्पा लगाने को आर्ट्स ली। मानव अधिकार के एक प्रोफेसर से सेटिंग थी, अपनी छात्रवृत्ति उसको गुरु दक्षिणा में चढ़ाकर पी.एच.डी भी कर ली।
बहुत आवारागर्दी की जितना कर सकता था। पिताजी के शांत होते ही ऐसा लगा जैसे किसी ने उड़ते हुए कालीन से नीचे फेंक दिया हो।
रिश्तेदार सांत्वना देने तक सीमित थे। वो भी धीरे धीरे कम होने लगा। उनको क्या दोष दूँ, मैंने कभी क्या मदद की किसी के बुरे वक़्त में।
ताउजी के ऑपरेशन के वक़्त कहीं मुझे रात में हॉस्पिटल में सोने को ना कह दे कोई, या खून देना हो इस वजह से मिलने तक नहीं गया। 
खैर तीन साल हो गये पिताजी की बचत ख़त्म होने को है, पैसे-पैसे को तरस गए हैं। नौकरी का अता पता ही नहीं। पहला तो मेरे विषय में कोई स्कोप नहीं और ऊपर से मै अनाड़ी भी हूँ।
डॉक्टर रामकृष्ण शास्त्री को मानव अधिकार के कोई नियम कायदे की कोई समझ नहीं। कोई और होता हो कहकहे लगाकर हँसता लेकिन खुद पर हँसना इतना आसान नही होता।
ऐसा नही है की सरकारी नौकरी की वेकेंसी नहीं निकली। लेकिन लाखों लोग भरते हैं और मुझे तो गणित में 9 का पहाड़ा भी नही आता। नरेगा में काम करने का विचार आया। मगर ये स्थाई हल नहीं। वहाँ सारा काम मशीनों से होने लगा है।
बी.पी.एल 
का कार्ड बनवाने में चप्पले घिस चुकी हैं।
अचानक से राज्य सरकार नगर पालिका में खूब भर्ती निकली हैं। भरने वाले भी शायद काम हों।
लेकिन "सफाई कर्मचारी" माँ सुनेगी तो क्या कहेगी। इसी उधेड़बुन में घर पहुँचा।
माँ क्या बनाया खाने में?
माँ ने सब्जी रोटी लाकर रखी। जैसे ही सुखी रोटी का कौर तोड़ के सब्जी खानी  चाही।
"
ओह माँ आपने मेरे लिए अपनी सब्जी छोड़ दी है ना, इसमें रोटी के कुछ टुकड़े पड़े हैं। आप मेरे लिये ऐसा क्यूँ करती हैं।"
ऐसा कहके मैं जैसे ही खाने लगा माँ भागकर आई। खाने की थाली को फेक कर फूट फूट कर रोने लगी।
मै डर गया। क्या हुआ मैंने लगभग चीखते हुए पूछा। "बेटा वो सब्जी पड़ोसन देकर गई थी। मुझे क्या पता था कि वो सब्जी झूठी है।" मेरे मन में कोई शक नहीं बचा था मुझे ये नौकरी किसी भी कीमत पर चाहिए थी। सुना है पूरे 12000 मिलेंगे। रख लूंगा किसी आदमी को 2000 देकर सफाई कर आयेगा मेरी जगह। 
किस्मत से पिताजी के एक मित्र से पेपर की सेटिंग हो गई। पैसा बाद में देना तय रहा।
क्या हालत है मुझे उत्तर भी याद नही हो रहें
चीट शीट बना ली है जो होगा देखा जायेगा।

परीक्षा हो गई थी, परिणाम का इंतजार था। सब कुछ  तय था फिर भी परिस्थिति ने डरपोक बना दीया था। तो आज परिणाम सामने है जा रहा हूँ नौकरी पर।

नगरपालिका के दफ्तर की जो हालत है, बयाँ करना मुश्किल है। लगता है अंतिम सफ़ाई अंग्रेजों के ज़माने में हुई थी। लटके हुए मकड़ी के जाले जिनपर मिट्टी की परते छाई हुई थी वजन से अपनेआप नीचे आने को बेताब थे। पान की पीकों से सीढियां सनी पड़ी थी। दरवाजों पर, दीमकों की सातवी आठवीं पीढ़ी ने, मिट्टी के प्लॉट काट के रजिस्ट्री करवा ली थी।
हम सबको एक लाइन में खड़ा किया गया। बड़े साहब आये और सामने कुर्सी में धंस गए। 
नाम पूछना शुरू किया। 
पप्पू, रामसुख, चौथमल, शिबल्या...सब लोग दलित जाती से थे। कहते है नाम में क्या रखा है। बहुत कुछ है आज पता चला।
जब मैंने धीरे से कहा डॉक्टर रामकृष्ण शास्त्री....ज़रा फिर से बताना...बड़े साहब बोले।
चारों और से खिलखिला के हँसने की आवाज़ रही थी। मै बुत सा बना खड़ा था।
बड़े साहब पहले तो हँसे थे लेकिन अचानक से गम्भीर हो गए।
बहुत बेरोज़गारी है, बड़बड़ाते हुए निकल गए।
हमारी ट्रेनिंग शुरू हुई। पहले शिबल्या की बारी थी। 
"
चल भाई कपडे उतार केवल छोटे कपडे छोड़ दे।
और ये फावडा लेके शुरू हो जा।" सीनियर सफाई कर्मचारी है, स्वभाव में तल्खी से स्पष्ठ था।
कहाँ!
मुझे वहाँ थोड़ी सी काली मिटटी में पॉलीथीन का ढेर दिख रहा था। यार कपडे उतार दिये, कोई ग्लव्स भी नहीं। मुँह पर कोई स्कार्फ़ भी नहीं।
उसने काफी अच्छे से जितना हो सके किया।
ऊपर से कुछ मिट्टी हटने पर नज़र आया ये तो मेनहोल है। ऊपर तक भरा हुआ था, शायद इसलिये नज़र नही आया था मुझे।
मेरी बारी उसमे उतर कर उसे साफ़ करने की आई।
जैसे ही मेरा नाम पुकारा गया।
मेरा दिल ठहर गया। चारों तरफ से खिसिया के हँसने की आवाज़े आने लगी।
"
पंडित जी ने कभी घर के बाहर की भी नाली साफ़ की है क्या...पूछो तो ज़रा।" रामू की आवाज़ थी शायद
किसी और की आवाज़ आई "शास्त्री जी !! जनेऊ उतार लेना ज़रा।
बापू हम दलितों का तो कोई उद्धार नही कर पाए पर उनके चेलों ने भारत का ये हाल किया है कि पढ़े लिखे ब्राह्मण भी हमारे जैसे हो गए हैं।"

एक बड़ी मुश्किल से हँसी रोकता हुआ बोला "अच्छा है बहुत जुल्म किये हैं इन्होने हमारे पुरखों पर। ज़रा इनको पता तो चले मैला कैसे ढोया जाता है। शास्त्री जी तो डाकटर है नया तरीका निकालेंगे सफाई का।
शास्त्री जी कोई मंतर-शन्तर तो बोलो ज़रा। वैसे आप है तो महान आदमी, ये हुई ना बात 
आपकी बिरादरी वाले बहुत करते हैं आरक्षण ख़त्म करो।आज आप आए हैं, हम दलितों का मैला ढोने में 100% आरक्षण ख़त्म करने। आओ सब मिलकर इनके चरण छुए।"

पहले वाला व्यक्ति फिर बोला "चुप करो! इसके पुरखों का बदला आज इससे ले लो फिर हमारे वंशज आज की गई हमारी गलतियों की सजा भुगतेंगे। इसका कोई अंत भी होगा क्या। आँख के बदले आँख लेने से पूरी दुनिया अंधी हो जायेगी। गरीब मजबूर आदमी किसी जाती धर्म का नही है। तुम्हें किसने इस दलदल में पड़े रहने को कहा था। कितनी सुविधाएं है, आरक्षण है, लाभ क्यूँ नहीं उठाते। ढंग की पढाई करवाओ बच्चों की, इस पीएचडी वाले जैसी नहीं। जितनी शारीरिक मेहनत करते होउसकी आधी दिमाग की भी कसरत कर लो।"

मै सर झुकाये खड़ा था। क्या कहता मेरे पूर्वजों द्वारा लोगों से ज़बरदस्ती सम्मान करवाने की सज़ा मुझे आज मिल रही थी। उनकी बातचीत सुनता हुआ मैं धीरे धीरे नयी दुल्हन की सी चाल से मेनहोल की तरफ बढ़ रहा था।
झुक के देखा पानी जितना गन्दा होता है चेहरा उतना साफ़ दिखता है। वो मेनहोल आइना बन चूका था। मुझे कोई टीका, कोई पंडितों वाली चोटी, पीएचडी वाला चोगा नज़र नही आया। एक बदहाल देश का निराश युवा नज़र आया।गलती मेरी थी मैंने कभी ध्यान नही दिया पढाई में लेकिन जो फर्स्ट डिवीज़न पास हुए थे वो भी एक  दफ्तरी से ज़्यादा कुछ नहीं थे। ये कैसा भ्रष्टाचार था जिसने मुझ जैसे 12 वीं पास करने तक की काबिलियत नहीं रखने वाले आदमी को पी.एच.डी बना दिया। 
मैं राम कृष्ण शास्त्री (पीएचडीक्या इसी दिन को तरस रहा था, मेनहोल को साफ़ करने के लिय एक अदद नौकरी के लिए।
वैसे मुझे गन्दगी साफ़ करने से परहेज़ नही था, ही इन क्षुब्ध लोगों के तानो से। अगर मेरे उदाहरण से भी ये अपने बच्चों के भविष्य के लिए सतर्क हो जाये तो इसमें कोई बुराई नहीं।
मेरा दिमाग तो जिस तरीके से सफाई की जाती है उस पर लगा हुआ था।

मानव अधिकार का हनन इसे कहते हैं। मैंने निश्चय किया है यही नौकरी करूँगा, खुद सफाई करूँगा खुद से दस्ताने और ऊपर से नीचे तक चैन से बंद होने वाला प्लास्टिक का सूट लाऊंगा बड़े साहब से बोल के सबको दिलवाऊंगा और जरूरत पड़ी तो मेरी धूल भरी मानव अधिकार वाली पी.एच.डी की किताबें झाड़ के खुद भी पडूंगा और उनको भी पढ़ा दूंगा।

मेनहोल के आईने में अपना भविष्य नज़र रहा है।

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