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चिल मार
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© Jaya Jadwani

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 ‘हाय डैड......’ अन्दर घुसते ही समीर बहुत उत्साह से उनकी ओर देख कर चिल्लाया और पास आकर उन्हें ‘हग’ कर लिया ...

    ‘हाउ आर यू ....?’ वह उनके ठीक सामने खड़ा है ...उनके कद से ऊँचा ..बलिष्ट ..उनका अपना खून ...उनके बरसों की मेहनत का ख्वाब ..अपने साकार रूप में ..अपने खून की महक ..अपने दिये संस्कारों और आदतों की महक ,उस परफ्यूम की ...जिसके बीते दिनों वे आदी थे जब वह उनके साथ रहता था ...उसके नज़दीक आते ही पूरा का पूरा अतीत आकर उनसे लिपट गया ....कसकर अपने से चिपका लेने की ख्वाहिश के बावजूद एक गहरी साँस  लेते हुये उन्होंने उसे अपने हल्के घेरे में ले लिया .

 ‘आय एम गुड बेटा ..हाउ अबाउट यू ?’ वे सोफ़े पर बैठे उसी का इंतेज़ार कर रहे थे शिद्दत से .जाब का मजबूरियाँ  जानते हुये भी उनके भीतर का बाप वह प्रतीक्षा सहन नहीं कर पा रहा था .

 ‘एक्सीलेंट डैड ...अच्छा हुआ आप आ गये .अब लगेगा कि यह घर है वरना तो यह सराय लगता है ....ट्रेन लेट तो नहीं थी ?’ वे उसे देर तक गले लगाये रखना चाहते थे पर वह खुद ही अलग हो गया .उन्होंने उसे आँख भर कर देखा.....ऑफिस के फार्मल कपड़ों में जेंटलमैन लग रहा है ...

   ‘ज्यादा नहीं .एक घंटे पहले पहुँचे .’

  ‘सॉरी डैड ...मैंने बहुत कोशिष की पर वह मीटिंग इतनी इम्पोर्टेंट थी कि चाह कर भी निकल नहीं सका .आखिर मुझे आपको मैसेज करना पड़ा .’

 ‘नो प्रोब्लम बेटे ..आय अंडरस्टैंड यू बट योअर ममा वाज एक्सपेक्टिंग यू .’

 ‘ओ ...सो सॉरी ममा ...’तक तक समीर उनके पास से हटकर सोफ़े पर बैठी अपनी माँ के पास पहुँच चुका था .माँ ने मुस्कराते हुये उसका माथा चूमा तो  सारी शिकायतें दूर हो गयीं . उनका बेटा जो हजारों कि.मी. घर से दूर जॉब कर रहा है ...अब जिसे देखने के लिये तरसना ही उनकी दिनचर्या का हिस्सा होता जा रहा है ...मजबूरियाँ  होंगी .कोई बात नहीं  ..नहीं आ सका तो ?

   ‘अरे शिद्दू ...माम डैड आये हैं .तूने चाय वाय पिलाई या नहीं ?’ समीर किचन की तरफ़ मुँह करके चिल्लाया .

 ‘अरे बेटा ...इसे हमारी वाली चाय बनानी नहीं आती.मैंने ख़ुद बना ली.’ मि. डागा ने सहज स्वर में मुस्कराते हुये कहा .

 ‘अरे डैड ..इसका कान पकड़कर इसे सिखाइये .आलसी है एक नं का इसे बनाना सब आता है पर मन लगाकर बनाता नहीं . अरे शिद्दू ...चल ज़रा गरमागरम पकोड़े बना दे और डिनर में क्या बनेगा डैड से पूछ ले .’ कहता हुआ समीर बाथरूम में घुस गया .

  ‘ए शिद्दू ...सुन ,प्रिया मैम किस समय आती हैं ?’ मि.डागा किचन में पहुँच गये और शिद्दू की मदद करने लगे .यूँ वे जानते थे दोनों के ऑफिस आने –जाने का टाइम अलग –अलग है .समीर दुपहर एक बजे ऑफिस जाता है ,रात ग्यारह बजे लौटता है .प्रिया सुबह नौ बजे जाकर छः –सात बजे लौट आती है. सात बजने वाले हैं ,प्रिया आती ही होगी .समीर भी आज उन्हीं के ख्याल से जल्दी आया है .

   मि.डागा ख़ुद को उस किचन में ,उस परिवेश में अजनबी पा रहे हैं .किचन इतना अस्त –व्यस्त है कि वे ठिठके से खड़े हैं .सिर्फ़ शिद्दू ही जानता है कि किसमें क्या है और उसे क्या करना है ? न जाने कितने किस्म के ‘रेडी टू ईट’ के पैकेट अधखुले पड़े हैं . कुछ पैकेट्स देखकर लगता है इन्हें फेंकना ही पड़ेगा .डस्टबिन पिज़ा हट के खाली पैकेट्स से भरी पड़ी है ..न जाने कितने किस्म की सासेस इधर –उधर बिखरी पड़ी ....अपने घर में मि.डागा इतने व्यवस्थित हैं कि कोई औरत भी शरमा जाये .जबसे मिसेज डागा ने बिस्तर पकड़ा है ,उन्होंने पूरे घर की जिम्मेदारी ले ली है और पूरी जिम्मेदारी लेने का मतलब है दूसरे को स्वतंत्र कर देना .अब भी मिसेज डागा आराम से सोफ़े पर बैठ टी.वी.देखने में मग्न हैं ,टी.वी.उनके अकेलेपन का बेहतरीन साथी है .इतने कैरेक्टर्स आते –जाते हैं कि ताल –मेल बिठाते –बिठाते ताल भले बिगड़ जाये ,मेल बैठ ही जाता है .अपने बढ़ते वज़न और कई बीमारियों से ग्रसित अब वे चल- फिर भी बड़ी मुश्किल से पातीं हैं .दो साल पहले ही बेटे की शादी हुई है .दोनों बैंगलुरु में हैं आई.टी. कंपनी में .मि.डागा बच्चों के कैरियर के प्रति शुरू से ही सजग रहे .बेटी तो एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में यू .एस. में है .अपने पति के साथ हर तरह से सुखी .टाइम के अलावा उनके पास हर चीज़ है ..वे –वे चीज़ें जिनका कभी तसव्वुर तक न किया था .वक्त ख्वाबों से बहुत आगे निकल गया है .ख्वाब तो ज़िन्दगी से बस चार कदम आगे चलते हैं .बेटा –बहू यहाँ हैं ,ख़ुद पति –पत्नी वहाँ  इलाहबाद में .सारी जिम्मेदारियाँ  निभा –चुका कर ,बड़ी सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट लेते के बाद.सालों का सफ़र .एक मामूली सी नौकरी से शुरुआत करके महकमे के सबसे बड़े अफसर बनकर रिटायर हुये मि.डागा .क्या रुतबा ?क्या शान ? बाज मर्तबा उन्हें ख़ुद यक़ीन नहीं आता कहाँ से चलकर कहाँ पहुँच गये ? रिटायर होते ही आधे से ज्यादा लोग कम हो गये उनकी ज़िन्दगी में .तो क्या लोग अपनी ज़रूरतों के वक़्त  ही उन्हें याद करते थे ?जिन हक़ीकतों को हम पहले से ही जानते हैं ,तमाम कोशिषों के बावज़ूद उन्हें अपने गले से नहीं उतार पाते. यह बात बहुत चुभने वाली है न कि अब तुम किसी के लिये भी उतने इम्पार्टेंट नहीं रहे .

   वे बड़े प्यार और चाव से बेटे का 2 बी.एच.के. फ्लैट देख रहे हैं ...ठीक –ठाक से सोफ़े ...छोटी सी चार कुर्सियों वाली काँच की डाइनिंग टेबल ..जिस पर सासेस की कुछ छोटी –छोटी बाटल रखी हुई हैं ....इधर –उधर टँगी कुछ तस्वीरें ..जो उन दोनों की ही हैं .एकाध तस्वीर उन दोनों की नहीं लग सकती थी यहाँ ? ख्याल आते ही उन्होंने ख़ुद को झिड़क दिया .घर को देख कर ही लगता है शिद्दू के सिवा कोई उसे हाथ नहीं लगाता .यह फ्लैट भी बेटे ने दो साल पहले ही खरीदा है ...जिस दिन शादी की डेट फिक्स हुई .इसके पहले तो वह अपने दोस्तों के साथ रहता था .शुद्ध शाकाहारी से कैसे मांसाहारी बन गया ...इंडियन फ़ूड से फ़ास्ट फ़ूड तक पहुँच गया ,यह कोई नहीं जान सका . न किसी ने जानने की ज़रूरत समझी ...पुराने फ्लैट में चार दोस्त एक साथ रहते थे ...कभी कोई आ रहा है ..जा रहा है ...किचन कबाडखाना ...कमरे अस्त –व्यस्त ..बाथरूम माशाअल्ला ..खाने के खाली पैकेट से डस्टबिन भरा हुआ .मैले कपड़ों का ढेर किन्हीं हाथों की बाट जोहता ...किसी दिन पानी का अकाल ,किसी दिन बाढ़ का प्रकोप. अकेले रहने की हज़ार मुसीबतें .बेवक्त खाना ,सोना ,उठना फिर भी वे सब खुश रहते थे ,शिकायत नहीं करते कभी .एक दिन गये थे मिलने तो मारे टेंशन के उस फ्लैट में रुके नहीं ,होटल चले गये थे ....

 ‘ओ डैड ..चिल करो ..दोस्तों में ऐसा ही चलता है .’समीर हँ स कर कहता था. पर चिल करना इतना आसान है क्या ?

  अब तक शिद्दू गरमागरम पकोड़े हरी चटनी के साथ टेबल पर रख कर चला गया .वे बहू के लिये दुबारा पूछने ही वाले थे कि कालबेल बजी और प्रिया अन्दर आ गयी ....

  ‘हाय डैड ...हाय माम ....’ वह हँसती हुई उनके पास आकर जरा सा झुकी तो उन्होंने उसे पैर नहीं छूने दिये ,सिर पर हाथ रख दिया .भले बेटे ने अपनी मर्जी से शादी की है पर उन्हें कोई शिकायत नहीं है .लड़की भली है ..प्यारी भी.

‘हाउ वाज़ योर जर्नी ?’

‘इट वाज़ फ़ाईन बेटे ...हाउ आर यू ?’

‘क्वाइट गुड डैडी ....बस जॉब और हम ...आप लोग शुरू कीजिये ,मैं आती हूँ.’ कहकर वह अपना हैण्डबैग उठाकर अन्दर जाने लगी ...

‘अब कल नहा लेना ..बैठ जाओ....’समीर उस जाती हुई को देखकर चिल्लाया...

‘शट’अप ...’एक मीठी झिडकी दे वह अपने रूम में चली गयी .

‘सुबह बिना नहाये चली जाती है ...शाम को आकर नहाती है ...’समीर ने हँसते हुये कहा और पानी के लिये शिद्दू को आवाज़ लगाई .

    रात का एक बज रहा है...मि.डागा को नींद नहीं आ रही .मिसेज डागा  नींद की गोलियाँ खाकर नींद का इंतेज़ार कर रहीं हैं .बारह –एक बजे तक वे केवल टी.वी.ही देखती हैं .मि.डागा को टी. वी.सख्त नापसंद है .वे शाम को रोजाना क्लब जाते हैं बैडमिंटन खेलने .सुबह जल्दी उठकर मॉर्निंग वाक के लिये निकल जाते हैं .आते –आते कभी तो रेडीमेड ब्रेकफास्ट ले आते हैं जिस दिन कुछ नया खाने का मन हो .नहीं तो घर आकर पत्नी को जगाते हैं ,उन्हें चाय पिलाते हैं ,अपने कुछ ज़रूरी काम निपटाते हैं फिर सैंडविच बना लेते हैं. नहीं ..कोई शिकायत नहीं है ज़िंदगी से फिर भी न जाने क्यों ख़ुद को रीतता और बीतता हुआ महसूस करते हैं .क्या यहीं पहुँचने के लिये चले थे ? हाँ ,एक अच्छी नौकरी से रिटायरमेंट ,अच्छी पेंशन ,मजबूत फंड ,अपने पैरों पर खड़े बच्चे ..और क्या ? वे खुद से कहते हैं और चुप पलंग पर बैठे रहते हैं .ये जो कोई चुप उनके साथ उठता –बैठता –सोता –जागता है न ..मि.डागा को इससे डर लगता है ..भरी हुई बन्दूक है यह और निशाने पर मि.डागा स्वयं .

    ड्राइंगरूम से समीर और प्रिया की आवाजें आ जाती हैं कभी –कभी .वे अपने –अपने लैपटॉप के सामने बैठे हैं ..उसी में डूबे ...बीच –बीच में कोल्डड्रिंक और वेफर्स जैसी चीजें खा रहे हैं .आखिर उनसे रहा नहीं गया ,बाहर निकल आये ....’अरे ...तुम लोग सो नहीं रहे .सारा दिन कम्प्युटर के सामने बैठ कर नहीं थकते जो रात को भी इसे लिये बैठे हो ?’ वे दोनों रात के छोटे –छोटे कपड़ों में दो सोफों पर धँसे बैठे हैं...

    प्रिया उन्हें देखते ही दूसरे कोने में सरक गयी ...इअरफोन के साथ लगे माइक में उसकी बातें बदस्तूर जारी हैं ...कौन है इस वक़्त ?वे ठिठके खड़े रहे ...जी किया पूछ लें ....पर नहीं ..ये सीमाओं का अतिक्रमण होगा. उन्हें तो बहू की हाफ पैंट भी उन्हें खटक रही है .टॉप इतना छोटा और टाईट है मानो संसार में कपड़े का अकाल हो .ये बड़े ब्राण्ड जितने बड़े पैसे लेते हैं .... कपड़े उतने छोटे देते हैं. उनकी आँखों की तुर्शी प्रिया तक नहीं पहुंची .उसकी आँखें स्क्रीन पर और उँगलियाँ की बोर्ड पर थीं .

  ‘ओ डैड...चिल मारिये ..अभी उठते हैं .यही तो वक्त होता है दोस्तों से चेटिंग करने का.....’समीर ने बिना सिर उठाये हँस  कर कहा .वह भी स्काईपी पर है..

  ‘जिनसे कभी मिले नहीं हो ..मिलोगे भी या नहीं ..उनसे इतनी बातें ?तुम तो कभी अपने पड़ोस में भी नहीं गये ....’ उन्होंने कहा ज़रूर पर किसी ने सुना नहीं .वे वहीँ सोफ़े पर बैठ गये फिर ऊबकर पत्रिकाऐं ढूँढने लगे .एक भी पत्रिका पूरे घर में नहीं दिखी ....

   ‘डैड ...क्या ढूँढ रहे हैं ?’बेचैन चहलकदमी से समीर बेचैन हुआ .

   ‘कुछ पढने को नहीं है ?’

   ‘ये है न ?’उसने मोबाईल की तरफ़ इशारा किया .....’जो मन करे पढ़िये .घर में कूड़ा रखने की क्या ज़रूरत है ?’

 ‘इसमें नहीं पढ़ा जाता मुझसे .अच्छा आज का न्यूज़पेपर ही दे दे .’

‘न्यूज़पेपर भी यहीं मिलेगा डैड .सिर्फ़ आज का नहीं हर मिनट का .आपका मोबाईल कहाँ हैं ...रूम में ?’

‘यहाँ न्यूज़पेपर नहीं आता ?’

समीर ने ‘न’ में सिर हिला दिया ..अविश्वास से वे उसे देखते रह गये .वहाँ तो वे पाँच न्यूज़पेपर मँगवाते हैं .घंटा भर तो उसी को उलटते –पुलटते बीत जाता है जो सुबह नहीं पढ़ पाते रात को देख लेते हैं .

‘पर मेरा तो काम नहीं चलेगा बिना न्यूज़पेपर पढ़े .’उनके मुँह से निकला .

‘तो शिद्दू से मँगवा लीजियेगा ..नीचे ही तो मिलता है.’ समीर ने झट कहा.जैसे कह रहा हो अभी तो पीछा छोड़ो .

    दोनों बदस्तूर अपने –अपने लैपटाप में मग्न हैं . वे उनसे कुछ देर बात करना चाहते थे ...कुछ भी ...मौसम का मिज़ाज़ ...दुनियावी दुःख सुख ...सेंसेक्स ...बाजार ...अमेरिका ...पाकिस्तान ...आतंक ....चुनाव ..मोदी ....कुछ भी ...पर किसी के पास फुरसत नहीं है .. एक क्षण के लिये उन्हें लगा ...वे कितनी भी कोशिष कर लें ...इन तीनों में से किसी के पास नहीं पहुँच पायेंगे .....आखिर वे उठे और अन्दर चले गये. पत्नी अभी तक जाग रही है...

  ‘क्या हुआ ?’ उन्होंने यूँ ही पूछा .

  ‘इनकी दुनिया हमारी दुनिया से कितनी अलग है ?’

  ‘तो ?तुम्हारी दुनिया नहीं थी अलग तुम्हारे बाप से ?’ उन्हें पता है पत्नी उनके माँ –बाप को पसंद नहीं करती थी पर उसने निभा लिया.पर प्रिया ?

 ‘ थी ..पर इतनी नहीं ...यहाँ किसी दूसरे की जगह नहीं है ...ये मल्टीनेशनल कम्पनियाँ उन्हें सबसे दूर ले जा रही हैं ...अपने घर से ..संबंधों से ...संस्कारों से ..अपनी महक से...अपने माँ –बाप तक से ....ये कहाँ जाकर रुकेंगे पता नहीं ...क्या इस सब का कोई अंत है ?’

 ‘हमीं तो कहते थे उन्हें ..पढो ..आगे बढ़ो .अब आगे बढ़ गये तो क्या कहें ..लौट आओ .उनको अपनी ज़िंदगी जीने दो ...तुम अपनी जिओ ...’ पत्नी ज्यादा प्रेक्टिकल है उनसे.. अपनी ? उनके पास अपना क्या बचा है ? उन्हें लगा वे अपनी बात किसी को नहीं समझा पायेंगे. वे लेट गये और सोने का अभिनय करने लगे.

   अभिनय तो मिसेज डागा भी कर रहीं हैं यह दिखाने का कि सब ठीक है ..कहीं कुछ गड़बड़ नहीं है पर हकीक़त वे भी जानती हैं .उन्होंने इस एक दिन में ही भांप लिया कि बच्चे उनसे कितनी दूर चले गये हैं पर कहकर वे ख़ुद को छोटा करना नहीं चाहतीं .जीवन क्या ऐसा ही है हर बंदा थोड़ी देर आकर तुम्हारे पास बैठता है और चला जाता है पर ये तो अपने बच्चे हैं ?नहीं ..सब ठीक है ..उन्होंने ख़ुद से कहा ...वे ख्वाहमख्वाह पजेसिव हो रहीं हैं .  

   सुबह जब वे सो कर उठे ..सारा घर गहरी नींद में था .ड्राइंगरूम में खाली कोल्डड्रिंक की बाटल्स..गिलास और खाली पैकेट पड़े थे .शिद्दू न मालूम कितने बजे आयेगा ?वे तैयार होकर बाहर निकल गये ...नयी –नयी जगह ..अजनबी इमारतें ,अजनबी सड़कें ..सुबह का आवाजाही .वे पूरी दिलचस्पी से जायजा लेने की कोशिष करते रहे .एक जगह खड़े होकर कुछ न्यूज़पेपर्स खरीदे ..हिंदी के ,इंग्लिश के ...दूध ...ब्रेड –बिस्किट के पैकेट और घर पहुँचे तो दरवाज़े पर ही प्रिया मिल गयी ....

 ‘बाय डैडी ...गोइंग तो ऑफिस ...सी यू ....’

‘अरे ...कुछ खाया तुमने ...?’ उन्होंने कुछ अचकचा कर पूछा .

‘गेटिंग लेट डैडी ...रास्ते में या ऑफिस में कुछ खा लूंगी ...’

   वे समझ गये ...सिर्फ़ मुँह धोया और चेंज किया होगा .बाकी सब ऑफिस से आने के बाद .बिना नहाये कैसे काम में मन लगता होगा ,वे सोचते रह गये .

   समीर अभी तक सो रहा है .उन्होंने सबसे पहले पत्नी को जगाया और किचन में जाकर चाय बनाने लगे .चाय गैस पर रख उन्होंने ड्राइंगरूम में पड़ा सारा कचरा हटाया और बंद खिड़कियाँ खोल दीं .ठंडी हवा का झोंका उनके चेहरे से टकराया .तब तक चाय बन चुकी थी .चाय पीकर पत्नी दुबारा अपने बिस्तर में घुस गयी और वे घर के छोटे –मोटे काम करते हुये शिद्दू की प्रतीक्षा करते रहे .शिद्दू लगभग ग्यारह बजे आया ..तब तक वे नहा –धोकर नाश्ता कर चुके थे ..पत्नी को खिला चुके थे .आते ही शिद्दू ने पूछा ..

  ‘व्हाट डू यू वांट फॉर लंच ?’ ओह ...ये भी इंग्लिश बोलता है .

  ‘समीर ईट्स ऐट होम ?’

  ‘ नो ...ही टेक्स अ कप ऑफ़ काफ़ी ओनली .’

  ‘प्रिपेयर दाल एंड एनी वेजीटेबल ...ओ.के.? ’

  ‘गुड मॉर्निंग डैड ...’जाने को तैयार दिखता समीर अपने बैडरूम से बाहर निकला .

  ‘जा रहे हो ...बिना कुछ खाये ?’

  ‘जी ..शाम को डिनर के लिये बाहर चलेंगे ,मैं जल्दी आने की कोशिश  करूँगा ..बाय ....’ और वह निकल गया .

 अब ? क्या करें वे ?कुछ देर हतप्रभ वैसे ही बैठे रहे फिर मोबाईल से नं. ढूढ़ –ढूढ़ कर मिलाने लगे .घंटा भर दोस्तों से बात करने में लगा दिया .न्यूज़पेपर इतनी देर तक पढ़ते रहे कि लंच टाइम हो गया .

 शिद्दू ने उन दोनों को लंच परोसा और अन्दर चला गया .

जूठी प्लेट रखने जब वे किचन में गये तो इतना सारा खाना देखकर हैरान रह गये ...’अरे इतना खाना क्यों बनाया है ?’

‘मुझे नहीं मालूम था आप कितना खाते हैं ?’ उसने लापरवाही से जवाब दिया.उसकी जेब में मोबाईल है ...इअरफोन कान से लगा है ...म्यूजिक बज रहा होगा .उन्हें गुस्सा तो बहुत आया कि साले राक्षस समझा है क्या ....? थोड़ा दिमाग तो लगाता या पूछ लेता .....पर कुछ कहते नहीं बना...यह उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है ....

  उन्होंने अपने और पत्नी के मैले कपड़े लांड्री बैग में डाल दिये और अन्दर ही चहलकदमी करते रहे .एक फालतूपन का अहसास उन्हें शिद्दत से घेर रहा है .क्या करें ?कहाँ जायें ?ये दुनिया उनके लिये कितनी अजनबी है और तालमेल उन्हें ही बिठाना है ...ताल तो हर हाल में ......

  फाइव स्टार होटेल से वे शानदार डिनर करके लौटे हैं ...सब –कुछ शानदार था ..भव्य बिल्डिंग ,भव्य रेस्टारेंट ,भव्य इंटीरियर,भव्य आते –जाते लोग ,भव्य वेटर ,भव्य बिल .इतने रुपयों में तो वे कभी पूरे महीने का घर खर्च हँसते –हँसते चला लेते थे .समीर और प्रिया को बाहर खाने का बहुत शौक है .डिनर अक्सर वे बाहर करते हैं या होम डिलेवरी के तहत कुछ मँगवा लेते हैं .घर पर खाना न के बराबर बनता है ....

  ‘तुम्हारे महीने भर बाहर खाने का बिल कितना आता होगा ?’ वापसी में मि.डागा ने यूँ ही पूछा .

 ‘पचीस से तीस हज़ार ....’ समीर ने मुस्कराते हुये कहा .

 ‘तुम लोग शिद्दू से क्यों नहीं बनवाते ?’

 ‘उसके टाइम से हमारा टाइम मैच नहीं करता .फिर उसका टिपिकल इंडियन टाईप फ़ूड ...वी डोंट लाईक ....’प्रिया ने मुँह बनाते हुये कहा .वे चुप रह गये थे यह भी नहीं कह सके कि फिर तुम मिलकर क्यों नहीं बनाते ?

 अपने बेटे –बहू की जिंदगी देखना परदे पर कोई फ़िल्म देखने जैसा ही है .ये प्राइवेट कंपनीज़ जितना पैसा देतीं हैं ,बच्चे उसी के हिसाब से अपना जीवन बदल लेते हैं .

 ‘तुम लोग कोई फ्यूचर प्लान क्यों नहीं करते ?’उन्होंने चिंतित स्वर में कहा. 

 ‘चिल मारो डैड ...यही हमारा प्रजेन्ट है यही फ्यूचर .’ समीर ने हँसते हुये कहा .खाना खाते समय भी उसकी नज़रें मोबाईल पर थीं .हर मिनट वे फेस बुक ,व्हाट्स अप या ट्वीटर देख रहे हैं .न जाने क्या –क्या तो है इनकी मोबाईल पर ..एक पूरी की पूरी अनडिस्कवर्ड दुनिया ..जिनके रहस्य हर लम्हा इनके सामने खुलते हैं .अब ये किसी बात पर हैरान नहीं होते .

  वे सब ड्राइंगरूम में टी.वी.देख रहे हैं .बारिश ने कश्मीर का हाल बहुत बुरा कर दिया है .लोग इतनी बुरी तरह फँसे हैं कि उन्हें निकलना मुश्किल है. उन्होंने बेटे की तरफ़ देखा ....

  ‘देख रहा है कश्मीर के हाल .पिछले साठ सालों का रिकार्ड टूट गया .200 लोगों के मरने की खबर है इसका मतलब ज्यादा मरे होंगे .लाखों लोग फँसे हैं.’ उन्होंने चिंतित स्वर में कहा .

 ‘चिल मारो डैड .वी हैव आलरेडी डोनेट सम मनी .’

 ‘व्हेन ?’ वे अचकचाये .

 ‘लास्ट नाईट ....’

   कमाल है ..कंसर्न दिखाई भी नहीं देता और काम हो भी जाता है .वे जिस बात को सोचते रह जाते हैं ..बच्चे कर भी देते हैं .क्या इन्हें सचमुच कुछ व्यापता है ?ये हमेशा इतने कूल कैसे रहते हैं ?अपने आभासी संसार में गुम .उन्हें वे आपस में बात करते भी कम ही देखते हैं ..जैसे दो सामानांतर दुनियायें आस पास हों .रस्मी आवाजाही के बाद वे अपनी दुनियाओं में खो जाते हैं .कितना स्पेस देते हैं वे एक –दूसरे को ? क्या बेटे में उन्हीं से गयी है ये बात?वे भी तो पत्नी के अंदरूनी जीवन में बिल्कुल दखलंदाजी नहीं करते थे न उन्हें अपनी दुनिया में शामिल करते थे .अपने अहं को सुरक्षित रखने का बढ़िया उपाय लगता था उन्हें .अब तो जवानी गयी ,सब गया वाली बात है .अब तो इतना एकांत है कि उसे महफूज़ रखने की नहीं ,उसे भरने की चिंता बनी रहती है.

 वे बहुत देर तक बच्चों के बारे में सोचते रहे ...ठीक है ,उन्हें क्यों अजीब लग रहा है ,वे ख़ुद इतनी ग़ैरजिम्मेदाराना ज़िंदगी नहीं जी सके ,इसलिये ?आखिर ज़िंदगी कोई जिम्मेदारी उठाने की यातना या विवशता का नाम तो है नहीं हालाँकि अधिकतर लोग ऐसा ही जानते और मानते हैं न ही यह किसी ऐसे गुह रहस्य को अनावृत करना है जिसकी बाबत तमाम प्राचीन ग्रन्थ भरे पड़े हैं. अगर वे इसी तरह जीना चाहते हैं तो यही सही .अब वे किसी का मार्गदर्शन नहीं करना चाहते .न उन्हें ज़रूरत या चाह है .अपना मार्ग तो वे आज तक ढूँढ नहीं सके.

  दूसरे दिन बच्चों के ऑफिस जाने के बाद वे फ्लैट से नीचे उतरे और अकेले घूमने निकल पड़े .पत्नी से व्यर्थ इसरार किया ज़रूर .

  बहुत दूर तक पैदल चलने के बाद उन्होंने कुछ ज़रूरी चीज़ें ,पत्नी की दवाइयाँ ,सब्जियाँ  और फ्रूट खरीदा और एक टैक्सी रोककर उसमें बैठ गये ...

  ‘पूरा शहर घुमा दे ...’

    वे बाहर कम अपने अन्दर ज्यादा घूम रहे हैं ...क्या इकठा किया है उन्होंने आज तक ...जमाने भर का कचरा ? और इस कचरे से भी कितना प्यार है उन्हें ..इन बाहरी सुखों –दुखों –तकलीफ़ों से ..हमें इनकी लत लग जाती है .हम इनके बिना हताश हो जाते हैं. ये न हों तो हम जूझें किससे ?

  पर तकलीफ़ सिर्फ़ इतनी है कि कुछ और भी है ?और अगर वह न होती तो क्या यह निरर्थकता इतनी ही व्यापती ?

       उन्हें याद है ,पिछले बीस तीस सालों से वे अपनी मर्जी से कहीं नहीं गये ...अपनी मर्जी से कुछ नहीं किया .वे जिंदा क्यों हैं ? उन्हें समझ में नहीं आया.....जिनके लिये वे दावा करते थे ,क्या उन्हें पता है ? वे जानते या मानते हैं या वही एकतरफ़ा ढोल पीट –पीट कर खुद को बरगलाये जा रहे हैं .

         पूरा शहर घूम लिया ....लौटे खाली हाथ .      

    सुबह वे देर तक सोते रहे ..किसी ने नहीं जगाया .पत्नी भी सो रही हैं. जागने पर भी वे ख़ुद को बड़ा विवश और निरर्थक महसूस कर रहे हैं. उम्र की मोहताजियाँ और उम्र काटने की ,पत्नी को ठीक रखने..अपने और बच्चों के बीच संपर्क बनाये रखने की मुसलसल व्यर्थ महसूस होती कोशिश .

 उन्होंने चाय बनाकर पत्नी को जगाया और उनके हाथ में चाय का कप दे दिया .फिर वे ब्रेकफास्ट बनाने की तैयारी करने लगे .कल खूब सारी चीजें लाये थे . सैंडविच के लिये ग्रीन वेजी काटने लगे फिर ग्रीन चटनी बनाकर चार सैंडविच तैयार किये कि प्रिया अपने बैडरूम से निकल आई .....जाने को तैयार ...’गुडमॉर्निंग डैडी .’

 ‘गुडमॉर्निंग बेटा .हैव ब्रेकफास्ट ?’

‘नो डैडी ...आय एम गेटिंग लेट ...बाय ’ और कार की चाबी ले बाहर निकल गयी. कमाल है ,ये लड़की साढ़े आठ बजे उठकर नौ बजे निकल जाती है.अगर सात बजे उठे तो आराम से ब्रेकफास्ट के साथ दूसरे कई काम निपटा सकती है. आखिर संतुलन भी तो कोई चीज़ है .अब शावर भी शाम को ही लेगी .पर ये बच्चों की ज़िंदगी है उन्हें क्या ?उन्हें क्यों अब हर चीज़ की चिंता होनी चाहिये ? हर बार ख़ुद को ऐसा कहना ज़रूरी होता जा रहा है .

   पिछले कई दिनों से वे श्रीनगर में अचानक आई बाढ़ से चिंतित हैं ...बेहद कम टी.वी. देखने वाले वे दिन भर वहीँ के समाचार देखते हैं ...लोगों के दुखों का कोई अंत नहीं है .कश्मीर तो अक्सर ही तमाम किस्म की राजनीतिक समस्याओं से घिरा रहा उस पर ये क़ुदरत का कहर ....वे लगातार उदास होते जा रहे हैं ..क्यों ?क्या इस बात की कोई भीतरी वजह है ?  उन्हें याद नहीं पिछली बार वे कब खुल कर हँसे थे ?ऐसी कौन सी चीज़ है जो आहिस्ता –आहिस्ता जिंदगी से लुप्त होती जा रही है ?होने को क्या नहीं है ?अच्छा –खासा ज़रूरत से बहुत ज्यादा बैंक बैलेंस ..नौकर चाकर ..तमाम किस्म की सुविधायें ...फिर भी वे महीनों से एक अद्रश्य बेचैनी और उदासी की गिरफ़्त में हैं जिससे भाग कर वे यहाँ आये थे .यहाँ आने के बाद जिसमें इज़ाफा ही हुआ है .

  अगले दिन संडे ...दोनों बच्चे देर तक सोते रहे .मार्निंगवाक से आने के बाद उन्होंने खुद अपना और पत्नी का ब्रेकफास्ट बनाया .ब्रेकफास्ट ख़त्म हुआ तो न्यूज़ पेपर का बण्डल खोल कर बैठ गये .एक अक्षर न पढ़ा गया तो टी.वी.खोल ली ...श्रीनगर में बारिश के बाद की समस्यायें ...ओह !इस कोमल दिखते आदमी की त्वचा कितनी कठोर है कि न जाने कितने वक्तों और मौसमों की मार भी इसके ज़िंदा रहने की उम्मीद और जतन करते रहने की जिजीविषा को ख़त्म नहीं कर सकती .वे हैलीकाप्टर से खाने के पैकेट गिरते देखते रहे .कई बार आँखें नम हुई और वे पानी पीने के बहाने उठकर टहलते रहे .

  शिद्दू के हाथ का बना लंच खाने के बाद तय हुआ कि मूवी देखने चलेंगे ,शॉपिंग करेंगे और डिनर भी बाहर किसी शानदार रेस्टारेंट में .

    और हुआ भी वही जैसा सोचा गया था .उन्होंने बच्चों को डेढ़ लाख की तगड़ी शापिंग करवाई .सोफों के साथ पूरे घर के परदे और न जाने क्या –क्या बदल दिया .बच्चे ख़ुशी –ख़ुशी वापस आये ...’ओ डैड ....वी लव यू .’

  उन्हें पहली बार यह वाक्य अच्छा नहीं लगा ...सस्ता बना दिया है यूथ ने. शब्दों का भूसा रह गया है. इसका एक ही अर्थ है ..जब तक तुम मेरे अनुकूल हो ..ठीक है, नहीं तो गो टू हेल .

    सोने चले गये .पर उन्हें चैन नहीं. जब तक भीड़ में रहते हैं भूले रहते हैं .अकेले पड़ते ही कोई चीज़ सालने लगती है ...आखिर मि.डागा तुमने पैसे कमाने के सिवा किया क्या ? बस अपना और बच्चों का पोषण करते रहे ,उसी में जीवन गर्क कर दिया और अब इनकी चौकीदारी करने का जिम्मा क्यों ले रहे हो ? कितनी ज़रूरत है यहाँ तुम्हारी .....क्या दिख नहीं रहा ?आखिर तुम्हारी वास्तविक जगह कौन सी है ?

  ‘ओ चिल मारो मि.डागा. हर बात का टेंशन मत लो .’ उन्होंने ख़ुद से कहा पर अपना कहा सुनने की हालत में तो वे न जाने कब से नहीं थे .

  लगभग सारी रात वे न जाने क्या –क्या सुनते –गुनते –बुनते रहे ...

       अगली शाम प्रिया देर से घर वापस आई ....उसे देख कर वे हैरान रह गये ..उसने अपने बाल ‘पी.के.’ की अनुष्का शर्मा की तरह कटवा लिये थे ....यहाँ तक कि उसके कपड़े तक बदल गये ....यानि शापिंग पर भी गयी थी ...अभी कल ही तो वे सब ‘पी.के.’ देख कर आये थे .हीरानी और आमिर कुछ भी बनाते रहें ....जिन्हें जो समझना होगा वही समझेंगे....

  ‘कैसी लग रही हूँ ?’ उसने समीर से इठला कर पूछा .समीर ने उसे देखकर कंधे उचका दिये ......’गुड....’

  ‘आप बताइये डैडी ...?’ उसने उनकी तरफ़ देखा ....

  ‘किसी की नक़ल क्यों करनी बेटा ?तुम पहले ज्यादा अच्छी लगती थी ...कितने लम्बे और प्यारे बाल थे ?’ न चाहते हुये भी उनकी आवाज़ में तल्खी उतर ही आई थी .

 ‘ओ कम आन डैडी ...माय एव्हरी फ्रेंड गेव मी कमेन्ट दैट यू आर लुकिंग एक्सीलेंट.’ प्रिया ने नाराज स्वर में कहा .

 ‘ डैड आपको बताऊँ ...ये पहले शाहरुख़ खान की फैन थी ...उसके लिये करवा चौथ का व्रत रखती थी ...फिर आमिर खान की ..अब वरुण धवन की ...इसकी पसंद जल्दी –जल्दी बदलती है ...’समीर ने उसे चिढ़ाते हुये कहा .

   ‘ओ शट’प ...यू डेविल ....आइल बीट यू ...’वह उसे धमकाती हुई गुस्से से अपने बैडरूम में चली गयी .वे हतप्रभ वहीँ खड़े रह गये मानो इस द्रश्य में जबरन चले आये हों और अब दर्शकों से माफ़ी माँग कर चले जायें .

  रात फिर उन्हें नींद नहीं आ रही है .समीर से लम्बी बात करने के ख्याल से ड्राइंगरूम में आये तो समीर तो नहीं प्रिया बैठी थी अपने रात वाले कपड़ों में किसी से हँस  –हँस  कर बातें करती ...वे वापस जाने को मुड़ गये फिर न जाने किस अन्तःप्रेरणा से दरवाज़े की ओट में खड़े हो गये .....

   ‘नॉट पास्सिबल ...आय हैव टू रिपोर्ट माय होम सून .’

  ‘................................................’

  ‘फिल एंड मिल इज़ हिअर...मिल तो एकदम सड़े मूड में रहती है .ईटिंग , स्लीपिंग एंड वाचिंग टी.वी...देट्स आल.... फिल इज़ नेवर सैटीसफाईड...आय गेट वेरी पिस्डआफ़ ....’

  ‘..........................................’

  ‘सन्डे ?’

  ‘.......................................’

  ‘व्हाट द हेल ..हर बार यू टर्न मी डाउन .आय डोंट नो तुम कैसे मैनेज करोगे ? आय विल वेट .’

  ‘...............................................’

 ‘डोंट कम्पेयर टू शिट टूगेदर .

‘........................................’

‘शापिंग इज़ नॉट द कंपनसेशन .....’

‘..........................................’

‘फक’प ..................’ उसने गुस्से में फोन काट दिया .

  मि. डागा बहुत देर सकते में खड़े रह गये .उन्हें एक बार फिर यकीन नहीं आ रहा था कि बच्चे और वे ख़ुद दो अलग –अलग दुनियाओं के बाशिंदे हैं ..जो कहीं नहीं मिलते .अभी तो एक –दूसरे की आवाज़ सुनाई देती है ,भविष्य में हो सकता है ,वह भी सुनाई देनी बंद हो जाये . वे दीवार के सहारे धीरे –धीरे अन्दर चले गये ....अपने बैडरूम में ....देखा मिसेज डागा जाग रहीं हैं .वे उनकी बगल में बैठ गये ......

  ‘यहाँ से जाने का वक़्त आ गया ....’उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा.

  ‘मुझे भी यही लग रहा है ....’ मिसेज डागा ने उनकी तरफ़ नहीं देखा. मि.डागा को लगा उन्होंने मिसेज डागा के रोने की आवाज़ सुन ली है .उनकी  कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं पड़ी . टी.वी.म्यूट पर है .कुछ सुनाई नहीं दे रहा .सिर्फ़ तस्वीरें बदल रहीं हैं .कभी हम कितनी शिद्दत से चाहते हैं कुछ सुनाई न दे. सारी रात वे एक –दूसरे की बगल में लाशों की तरह पड़े रहे .     

     उठे एक निर्णय के साथ ....ज़िंदगी जितनी भी बची है ,उसे कैसे भी व्यतीत करने का अधिकार वे ख़ुद को नहीं दे सकते .

    अगली सुबह जब बेटे से सामना हुआ ,उन्होंने पास बुलाकर कहा ...

‘सुनो समीर ...ज़रा नेट पर हमारे जाने की टिकट देख लेना.’

‘व्हाय डैड ? आप तो कम से कम एक महीना रहना चाहते थे ?’

‘बस बेटा ...तुम लोगों को देख लिया .वहाँ भी घर खाली पड़ा है .’

‘बट डैड .......’ वह असमंजस में पड़ गया .

‘ओ ..चिल मार यार ...आते –जाते रहेंगे .’ मि.डागा मुस्करा रहे हैं .

‘ओ.के. एज़ यू विश ...कब की करवाऊँ ?’

‘जितनी जल्दी मिल जाये .न मिले तो फ्लाइट की देख लेना .’

‘ठीक है डैड ...मिलते हैं शाम को ...आज कहीं चलें ?’

‘नहीं यार ...सब देख लिया ..अब क्या देखना बाकी है .’

समीर सिर हिलाता हुआ बाहर निकल गया .वे जाते हुये समीर की पीठ देखते रहे .क्या पता पीठ पर ही वह लिखा हो जिसे वे आज तक चेहरे में ढूँढते रहे .........?

                                    

 

 

   

 

   

#चिल मार

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