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रिक्शावाले बाबा
रिक्शावाले बाबा
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© Prapanna Kaushlendra

Drama

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उनका कोई नाम नहीं था। जैसे तमाम रिक्शे वालों के नाम नहीं होते। जैसे उन लोगों का नाम ही रिक्शा हो। चिल्लाते या आवाज भी तो इन्हीं नामों से लगाते हैं। अब किस किस का नाम याद रखा जाए। यह भी तो एक मसला है। वैसे भी जब से बैट्रीरिक्शे आ गए हैं तब से हाथ रिक्शेवाले मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं। एक तरफ दन्न दन्न चलते बैट्रीरिक्शे वहीं दूसरी ओर तीन पहियों की मंथर गति से चलने वाला हाथ रिक्शा !!!

स्ुबह से उनका माथा और देह बुखार में तप रहा था। न शरीर साथ दे रहा था और न मन ही। लेकिन रिक्शा का लेकर बाज़ार में जाना ही था। नहीं जाते तो शाम और दोपहर में क्या खाते ? रिक्शा नहीं चलाएंगे तो पेट खाली रह जाएगा। अनमने ढंग से रिक्शा लेने मालिक के पास चले गए। जब रिक्शा लेकर गेट से बाहर आ ही रहे थे कि मालिक का हाथ उनके हाथ से छू सा गया।

‘‘अरे बेचुआ ! तेरा तो पूरा देह जल रहा है। रिक्शा कैसे चलाएगा ?’’

‘‘जा जा के आराम क्यों नहीं कर लेता ?’’

‘‘बाबुजी आराम करूंगा तो घर कैसे चलाउंगा ?’’

‘‘मलकिनी तो रही नहीं लेकिन छोड़ गईल है दो दो रेंगन को’’

‘‘उनको काम क्यों नहीं सीखाता ?’’

‘‘तेरा काम आसान हो जाएगा’’

बातें हो ही रही थीं कि उनको लगा चक्कर सा आ रहा है। सो वहीं रिक्शे की सीट पर लेटने सा लगा। कुछ देर लेटने के बाद आराम मिला और फिर

‘‘अच्छा बाबुजी अब ठीक लगा रहा है। देखता हूं दोपहर तक सवारी ढोता हूं फिर आ जाउंगा’’

‘‘देख के जाना कहीं भेड तक देना रिक्शा।’’

उम्र तो ज़्यादा नहीं थी। लेकिन चेहरे मोहरे से और उस पर सूखे गाल और लंबी दाढ़ी उनकी उम्र को पच्चास से ज़्यादा कर रही थीं। लाइन में लगे वो सोच रहे थे कोई लंबी दूरी की सवारी मिले तो एक बार में ही पचास रुपए आ जाएं। दो मिल जाएं तो मालिक को देकर साठ रुपए मिल जाएंगे। दवाई भी ले लूंगा और दोपहर में खाना भी हो जाएगा।

एक एक कर अपनी अपनी पारी आती रही और रिक्शेवाले सवारी लेकर जाते रहे। उनकी बारी जब आई तो एक जवान लड़की ने कहा-

‘‘ मेट्रो स्टेशन चलोगे ?’’

‘‘ज़रा जल्दी चलो देर हो रही है’’

रिक्शे की सीट पर बैठने से पहले दो तीन बार लंबी खांसी आई। खांसते खांसते रिक्शा खींचना शुरू किया।

‘‘भईया थोड़ तेज चलाओ’’

और लड़की अपने फोन में लग गई।

‘‘हां हां आ रही हूं।’’

‘‘टिकट ले लो बस मेट्रो स्टेशन पहुंचने वाली हूं।’’

‘‘हां हो आई लव यूं’’’

‘‘आई लव सूं टू’’

‘‘उमांह !!!’’

‘‘भईया इससे से अच्छा थो मैं पैदल ही चली जाती। जल्दी पहुंच जाती। ग़लत रिक्शे पर बैठ गई।’’

उमस भरी इस दुपहरी में लगातार वो अंगोछे से पसीने पोछे जा रहे थे। शायद आंखों में अपनी उम्र को लेकर आंसू भी टर टर पसीने से मिल रहे थे। तबीयत ठीक होती तो ईलईकिया को कहने का मौका नहीं देते। लेकिन का करें ? बुखार से देह टूटा जा रहा है। किसी तरह मेट्रो स्टेशन पहुंचे।

लड़की ने पैसे दिए और भुनभुनाते हुए बाल को छटका और

‘‘हां हां एक बुढे रिक्शे पर बैठ गई थी यार वरना....’’

‘‘देह में जान नहीं और रिक्शा क्यों चलाने आ जाते हैं।’’

मेट्रो स्टेशन के नीचे जूस वाला भी था। उससे बोला ‘‘एक गिलास छोटा वाला जूस बनावा’’

देह को किसी तरह समेटते हुए वो जूस की रेडी के पास खड़े हो गए।

Rikshaw Poverty Hardwork

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