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बिड़ला विद्या मंदिर नैनीताल-2
बिड़ला विद्या मंदिर नैनीताल-2
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© Atul Agarwal

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श्री जे.सी. पांडे गुरूजी बिल्कुल सीधे, लम्बे और पतले थे। हिन्दी, गणित, इतिहास व् संस्कृत पढ़ाया करते थे बहुत सरल, शांत और गंभीर कृष्ण भगवान की तरह वीतराग और चेहेरे पर हर वक़्त एक सौम्यता, बंद गले का ग्रे कोट। नीचे ही कहीं मल्लीताल य तल्लीताल में रहते थे। उनके बारे में बहुत सी किंवदंतियां बच्चों के बीच प्रचलित थी. जैसे की उन्होंने कई वर्ष हिमालय में तपस्या की है, उनके पास कई सिद्धियां हैं। एक बार उन्होंने ध्यान की एक क्रिया बताई थी, हलके से अंगूठों से कान बंद कर ले, उनके बगल वाली ऊँगलियों से हलके से ऑंखें भी बंद कर ले, दो उंगिलयां नाक के नीचे, दो होठों पर और दो ठोडी पर, फिर माथे के बीच में ध्यान करें. मैने कभी कभार एक दो मिनट किया, अच्छा लगता था। बाद में पता चला की यह आज्ञा चक्र पर ध्यान होता है और बाद में किसी ने बताया की मन को शुद्ध, निर्मल और शांत करने के लिए ह्रदय पर ध्यान करना चाहिए ।

गुरुजनों के मामले में बिड़ला हीरों की खान थी, कुछ नाम याद आ रहे हैं, जैसे कि : श्री के.एल. वर्मा जी (ड्राइंग), श्री जी.बी. तिवारी जी (गेम्स), श्री जे.एस. कुलश्रेष्ठ जी (संगीत), श्री डी.पी. जोशी जी (हस्तकला), श्री एस.के. गुप्ता जी, श्री राना गुरु जी (दोनों ही गणित) ।

जिनके नाम इस वक़्त याद नहीं हैं, उसके लिए कृपया क्षमा करे. वैसे भी क्षमा वीरों का आभूषण होता है. सभी गुरुजन बेजोड़ और बेमिसाल, सभी को दंडवत नमन।

बिड़ला के आँफिस स्टाफ, बर्सर व् अन्य कर्मचारियों से मिलने का कभी अवसर नहीं मिला। निश्चित ही वो भी बहुत अच्छे रहे होंगे, उनके भी हम ऋणी हैं, उनका रोल कुछ इसी प्रकार का है जैसा की फिल्म बनाने में टेकनिशय्नों का उनको भी नमन।

बच्चीराम, जीतराम, कोराम या कोहराम व् अन्य, हाउस कीपिंग व् खाना खिलाने वाले सभी बहुत मेहनत करते थे. उनको भी प्रणाम। गेम्स फील्ड नंबर एक की देखरेख करनेवाले उम्र में बुजुर्ग लेकिन सबसे चुस्त और १९७१ से १९७३ में नेहरु हाउस के हाउस कीपर के नाम याद नहीं हैं। इसके लिए भी क्षमा करें। कृपया कोई बताएगामैने बिड़ला के प्रिंसिपल जी से ईमेल द्वारा निवेदन किया था की जैसे कि बिड़ला की वेबसाइट पर छात्रों का विवरण डाला है, उसी प्रकार सभी गुरूजनों व् समस्त कर्मचारीगणों का विवरण भी साल दर साल सिलसिलेवार डलवा दें, ताकि सनद रहे व् कोई भी भूली बिसरी यादों को ताज़ा कर सके। यह डाटा आगे जाकर इतिहास बन जबहुत से हीरे गुरुजन बिड़ला छोड़ कर इसलिए नहीं गए, क्योंकि उनकी अंतरात्मा तक २० – २५ साल में वहां से जुड़ चुकी थी। बहुत कम सैलरी में निर्वाह करते रहे. लेकिन जिन्होंने १९७० के आस पास बहुत कम सैलरी में पहली नौकरी पर बिड़ला जौइन किया था, उनमें से कई अच्छी सैलरी का अवसर मिलते ही बिड़ला छोड़ कर चले गए, जैसेकि श्री जे.एस. कुलश्रेष्ठ (संगीत), श्री जी.एल.शाह (गेम्स), श्री एस.सी. गोविल (कामर्स), श्री विवेक वर्धन (बायोलौजी), आदि। उनकी भरपाई असम्भव थी. श्री जी.एल.शाह सही मानों में श्री जी.बी. तिवारी जी के गेम्स में उत्तराधिकारी हो सकते थे। दोनों ही मास्टर आफ औकभी कभी फाउनडर्स डे या अन्य किसी प्रोग्राम के मौके पर ऑडिटोरियम में श्री एन.एन. मिश्रा जी (हैड मास्टर – जूनियर्स) और मोहन दा (श्री एम.सी तिवारी गुरूजी) हार्मोनिअम व् तबले पर संगत करते थे और भजन गाते थे “मन तडपत हरी दर्शन को आज”। जिसने वह देखा हो, वो ही जान सकता है कि कैसे दोनों गुरूजन धीरे धीरे कौन से लोक में चले जाते थे. हमें तो ना संगीत का ज्ञान ना स्वरों का। हम तो बस उनकी भाव भंगिमाओं को देखते रह जाते थे ।

क्रमशः

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कर्मचारी याद वक्त

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