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फाईल क्लोज़्ड
फाईल क्लोज़्ड
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© Virender Veer Mehta

Inspirational

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"देख 'कलिया' ! तेरी 'मेमसाहब' ने रिपोर्ट की है थाने में, सच सच बता दे 'बड़े साहब' को, क्या चोरी करके भागा है तू शहर से ?" हवलदार तेज आवाज में पूछ रहा था और 'काली' अपने पराये लोगो के बीच माँ के साथ ख़ामोश खड़ा पैर के अँगूठे से कच्चे आँगन की मिट्टी कुरेद रहा था। आस पड़ोस के लोग, गाँव में शहर के दारोगा के आने से हैरान से कभी काली को तो कभी उसकी माँ को देख रहे थे जो सर झुकाये चोरों की तरह खड़े थे।

कच्चे मकान की कच्ची दीवारें, गोबर-मिट्टी से पुता आँगन और एक कोने में बने मिट्टी के चूल्हे के पास बेडौल से अल्मुनियम के बर्तन । कपड़ो के नाम पर माँ बेटे के तन को बमुश्किल ढकते पुराने लिबास । बड़े साहब जो अभी तक इन सारे बदहाल हालात का जायजा ले रहे थे उसे गहरी नज़र से देखते हुये बोले । "डर नही बेटा, सच बता चोरी करके लाया था कुछ ?"

"नहीं साब... कुछ नहीं।" बड़ी कठिनाई से कुछ शब्द उसके मुँह से निकले।

"फिर अपनी मालकिन को बिना बताये वापिस क्यों आऐं ?" उसकी घबराहट देखते हुए बड़े साहब ने अपनी आवाज को और नरम किया।

"साब ! हम तो मेमसाहब से घर आने की छुट्टी और साल भर का मंजूरी माँगत रही पर......"  उसने हिम्मत कर बोलना शुरू किया। ".......पर 'वो' बोलन रही, ना पैसा मिलेगा ना घर जाने दूँगी, यही रहेगा अब तू हमेशा के लिये । .......बहुत मारा साब।" उसकी आँखों में आती नमी का असर उसकी आवाज़ में आने लगा था।  "क्या करते साब ? भाग निकले रात में ही, गाँव की ओर....!

"और यहाँ कोनो काम मिल रहा है तुझे ?" पास खड़े हवलदार ने उसे कुछ ताना मारते हुये कहा ।

"साब !  बँधुआ मजूरी ही करनी है तो गाँव मे ही करेंगे ना, अपनी 'माई' का आँचल तो रहेगा ना, सर पर।" उसकी डरी डरी आँखों में भी एक चमक सी नज़र आने लगी थी।

बड़े साहब देर तक उसकी आँखों में झलकते डर,  झलकती चमक और झलकती सच्चाई को देखते रहे, देखते रहे ।....................

 

चंद घंटो बाद ही बड़े साहब वापिस शहर की ओर लौट रहे थे । रोडवेज बस की यात्रा, दिन भर की थकावट और ठंडी हवा के झोंको से उनकी पलके बोझिल होने लगी थी। गोद में पड़ी केस फ़ाइल पर लिखे शब्द 'फाईल क्लोज़्ड' उन्हें बार बार अपने आप से ही उलझा रहे थे। वो समझ नहीं पा रहे थे कि उनका लिया फैसला सही है या नहीं । गाँव पीछे छूटता जा रहा था और शहर की दूरी कम होती जा रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुये वो एक बार फिर से  अपने फैसले पर सोचने लगे। 

अनायास ही उन्हें मुन्ना की याद आ गयी। सागर किनारे की शांत सुहानी शाम और हाथों में बाल्टी लिये 'चना दाल' बेचता मुन्ना। वो अतीत में खो गये ।...........

"मुन्ना, ये गुब्बारे किसी को देने के लिये खरीदे है क्या ?"  अपनी रोजाना की दिनचर्या की तरह मुन्ना से चना दाल लेकर खाते हुये उसके हाथ में दो तीन गैस के गुब्बारे देखकर उन्होने कहा था ।

"नहीं साहब! ये तो मैंने खुले आसमान में छोड़ने के लिये खरीदे है।" मुन्ना मुस्करा कर बोला था।

"ओह ! 15 अगस्त,  आजादी की ख़ुशी में।" जवाब में वो भी मुस्कराये थे।

"ऐसा ही मान लो साहब पर सच तो ये है कि मेरी अपनी आज़ादी की खुशी में।" वो जवाब देते हुए हँसने लगा था ।

"अपनी आजादी ? मैं कुछ समझा नहीं। उन्होंने अपनी प्रश्नवाचक नज़रें मुन्ना पर डाल दी थी ।

"हाँ साहब। आज के दिन ही मैने अपने जालिम सेठ की गुलामी छोड़ ये 'चना दाल' बेचना शुरू कर अपनी आजादी पायी थी।" कहते हुये उसने गुब्बारे छोड़ दिये थे और देर तक उपर आकाश की और देखता रहा था ।.........

"पों पों......."  अनायास ही बस के हाॅर्न की आवाज उन्हे अतीत से वर्तमान में ले आयी। वो मुस्कराने लगे, अपने किये फैसले पर अब उन्हें कोई दुविधा नहीं थी। उनकी शंका का समाधान हो चुका था ।  

"विरेंदर वीर मेहता"

 

गुलामी आजादी बंधुआ मजूरी

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