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किस्सा बचपन @ दिल दियां गल्लां
किस्सा बचपन @ दिल दियां गल्लां
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© Harish Sharma

Drama Inspirational

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ये तब की बात है जब चैनल के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था और देखने लायक कार्यक्रम सिर्फ इतवार को आया करते थे।

दोपहर का समय रहा होगा। मार्च का शुरूआती महीना। न ज्यादा गर्मी और न ज्यादा सर्दी।  रिक्शा वाला घर के बाहर आ खड़ा हुआ।  मोनू आज अपनी मासी और मामा के साथ अपने ननिहाल जा रहा है, पढ़ने के लिए।  मोनू खुश है और माँ थोड़ी उदास थी या उसकी आँखों में बेटे के अच्छे माहौल में पलने बढ़ने और ठीक ठाक देखभाल होने की तमन्ना ने उसके हर दर्द को छिपा लिया था, इसका अंदाजा लगाना शायद मुश्किल रहा होगा। मोनू के चाचा, पिता, पड़ोस वाले सोम अंकल और उनका बेटा रवि, जो मोनू के फर्स्ट क्लास में उसके साथ पढ़ता था और साथ खेलता था, सब घर के बाहर खड़े थे। मोनू अब ननिहाल जाकर अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेगा क्योंकि उसका ननिहाल एक बड़ा शहर था, उसके ननिहाल में बहुत अच्छे स्कूल थे।

उसके ननिहाल में गाँव देहात का वातावरण नहीं था, और सबसे बड़ी बात मोनू के मामा और मासी दोनों अभी तक कुंवारे थे और ननिहाल में सयुंक्त परिवार होते हुए भी सयुंक्त परिवार के झमेले नहीं थे।

पिछले एक हफ्ते से मामा और मासी, मोनू के घर मतलब अपनी बहन और जीजा जी के इस देहात के घर में आये हुए थे और इस बात की पूरी तैयारी हो गयी थी कि अब मोनू जो कि एक बड़े परिवार में रहता है, जहाँ उसके दो चाचा, दादा, दादी और एक चाची शोर्टकट में कहूँ तो अनुपम खेर और राज बब्बर वाली संसार फिल्म की तरह रहते थे और वहाँ मोनू की सही से पढ़ाई नहीं हो पायेगी और वो एक लायक बच्चा बनने में दिक्कत महसूस करेगा।  तो उसे क्यों न इस गाँव से दूर उसके ननिहाल जो कि बहुत बड़ा शहर है, वहाँ कि आबो हवा में भेज दिया जाए, ऐसा सबका मानना था। वो स्कूल के शुरूआती मंच पर आने लायक हो चुका था, मतलब छह साल का हो गया था और माँ, पिता और गाँव मॉडल स्कूल की अंग्रेजी वाली मैडम से शुरूआती हिज्जे सीख चुका था, उसे और भी अच्छे स्कूल की जरुरत थी। यहाँ गाँव में परिवार बड़ा हो रहा था और घर सिकुड़ रहा था। गली मोहल्ले में औरतों की पानी के नल पर अक्सर लड़ाई रहती थी, यही नहीं वहीं मोहल्ले में रहने वाले कल्लू और बिट्टू नाम के कथित भाइयों के साथ मोनू के परिवार की दो पीढ़ियों से दो बीघा जमीन को लेकर लडाई थी।  इन सब बातों ने मोनू की माँ के मन में एक अजीब सा भय पैदा कर दिया था और वो मोनू के पिता को इस बात के लिए राजी करने में सफल हो गयी थी कि मोनू के सही मानसिक विकास और सुरक्षित वर्तमान, भविष्य के लिए उसे ननिहाल भेज दिया जाए। जब वो थोङा पढ़ लिख जाये और सयाना हो जाये (सयाना होने का पैमाना क्या है, इस पर मत जाइये) तो उसे वापिस बुला लिया जायेगा और नवोदय स्कूल की परीक्षा पास करवा कर हॉस्टल में भेज दिया जायेगा।

मोनू के पिता एक सरकारी मुलाजिम थे और उस ज़माने में सरकारी नौकरी का हाल आजकल के सरकारी अस्पताल जैसा होता था जहाँ इमारत तो बड़ी होती है पर सहूलियत के नाम पर बाबा जी का ठुल्लू ही होता है।

“ठीक है अगर तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है तो मुझे भी कोई एतराज नहीं, मोनू तुमसे ज्यादा हिला मिला है अगर तुम दोनों माँ-बेटा बिना किसी विरह-वियोग की भावना से परे हो तो यही सही। और कौन वहाँ सब बैगाने बैठे हैं, अपनी मासी के साथ तो खूब पटती है मोनू की, वो तो मन लगा ही लेगा, यहाँ मैं हूँ तुम्हारा मन बहलाने के लिए।”

मोनू के पिता ने अपनी पत्नी को प्यार से कहा।

“मोनू का मन लगा रहे यही काफी है, मेरा मन लगने या न लगने के लिए तो फुरसत चाहिए वो वैसे ही इस घर के कामकाज में नहीं मिलती, सारे घर का खाना, बर्तन साफ सफाई और पचास झंझट। कभी पानी तो कभी रिश्तेदार उन्ही का इंतजाम नहीं निपटता।” मोनू की माँ ने जैसे अपने आप से कहा हो।

मोनू के नाना जी अपनी नौकरी की वजह से चाहे दूर शहर में बस गये थे पर उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बेटी यानी मोनू की माँ को अपने पुश्तैनी गाँव के रीति-रिवाज के मुताबिक मतलब अपने भाई, जीजा की इच्छानुसार एक गाँव में ब्याह दिया। लड़का सरकारी नौकरी में था, बड़ा परिवार था, बस यही काफी था एक दफ्तरी बाबु के लिए।

खैर, जो हो गया सो हो गया तो मोनू पूरी इज्जत, दुलार और भावनाओं के साथ शहर की ओर वाया ट्रेन पूरे १४ घंटे का सफ़र करके मामा-मासी सहित एक बड़े भव्य शहर में पहुँचा। ये उसका ननिहाल था, यहाँ रिक्शा चलने वाले इस रफ़्तार और सफाई से रिक्शा चलाते थे जैसे कोई शार्क समुद्र में अपने शिकार का पीछा करते हुए आगे बढ़ती है, जैसे धूम फिल्म में आमिर खान मोटर साइकिल के कट मारता हुआ हर भीड़ को पूरा कर जाता है।

मोनू, रिक्शे के इन घुमावदार करतबों का आनन्द लेते हुए आस-पास की इमारतों, दीवार पर लगे रंग-बिरंगे फ़िल्मी पोस्टरों और हलवाई की दुकान के बाहर छनते समोसों, उबलते दूध के कड़ाहों, और तमाम लोगों के चेहरों को देखता हुआ अपने सफ़र का आनन्द ले रहा था।

“मासी, वो देखो कितने पतंग।” मोनू ने ऊपर नीले आसमान में कुछ पतंगें उड़ती हुई देखी।

रिक्शा आगे निकल रहा था इसलिए शायद मासी पतंग नहीं देख पायी।

“अरे हाँ, मोनू, यहाँ बहुत पतंगे हैं, वहाँ अपने घर के पास एक दुकान है तो तुम्हें वहाँ से एक नई ले देंगे।” मासी ने मोनू के सर पर हाथ फिराकर कहा।

और मोनू अपनी कल्पना में एक रंगीन पतंग उड़ाते हुए अपने आप को देखने लगा।

नाना का घर और शहर की आबो हवा मोनू को खूब जमी, जैसे ये बात उसके अन्दर उसकी माँ से ही आई हो। मामा-मासी ने भी पहले दो-तीन दिन उसे शहर के मुख्य पार्क, बाजार में घुमाया-फिराया, उसे शहर के चौक की मशहूर चाट, रबड़ी और समोसे खिलाये।  उसके बाद मोनू का नजदीक के एक कान्वेंट स्कूल में दाखिला करवा दिया गया।

पड़ोसियों के दो बच्चे जुगल और सचिन की भी उसी स्कूल में एडमिशन थी। सचिन एक क्लास आगे था। तीनों का बचपन और पतंग का शौक उनके बीच मित्रता में बड़ा कारगर साबित हो गया। सचिन, जुगल मोनू के घर शाम को आ जाते और इकठ्ठे बैठकर लूडो, साँप सीढ़ी खेलते। छुट्टी के दिन तो मासी और मामा भी शामिल होते थे। मोनू के लिए अभी खेल नया था। जरा सा हारने लगता तो पैर पटकता या फिर उदास हो जाता, पर मासी उसे प्यार से सिखाती, और कई बार जानबूझ कर हारती। मोनू जीत पर बड़ा खुश होता था। फिर वो पूरे घर में बताता फिरता-

“पता है नानी, आज मैंने मासी को लूडो में हरा दिया, अब मैं सचिन, जुगल को भी हरा दूंगा ...देखना।”

मासी ने उसे सकूल जाने से पहले थोडा बहुत पढ़ाना शुरू कर दिया था।

रंगीन तस्वीरों वाली किताबें और उन पर लिखी चीजों के नाम वो अंग्रेजी में मासी से पढ़ा करता। रात को कहानियां सुनता। मासी पूरी तरह से उसकी माँ बन चुकी थी।

फिर स्कूल जाने का दिन आ ही गया। न्यू यूनिफार्म, स्कूल बैग और नए जूते पहनकर वो शीशे में अपने आप को देखकर खुश हुआ। मासी ने उसके बाल शम्मी कपूर स्टाइल में कंघी किये और नानी ने उसके कान के पीछे काला टीका लगाकर उसे चूम लिया।

“मेरा राजा बेटा, किसी की नजर न लगे।” कहती हुई नानी मुस्कुरायी। मोनू को माँ याद आई। वो भी तो ऐसे ही काला टीका लगाकर बाहर भेजा करती थी।

मोनू स्कूल का माहौल देखकर बहुत खुश था। सुबह की प्रार्थना, बैंड की रिदम पर होती पी. टी. और अपनी शानदार क्लास जो रंग-बिरंगे पेंट और तस्वीरों से सजी थी, उसे बहुत पसंद आई। अपनी क्लास इंचार्ज पर तो वो लट्टू ही हो गया।

डिम्पल मैडम नाम था उसका। जैसे कोई परी। उसने जुगल की बहन के पास भूरी आँखों वाली जो गुङिया देखी थी, ऐसा लगा जैसे साक्षात उसके सामने आ गयी हो। डिम्पल मैम ने उसके चेहरे को प्यार से सहलाते हुए पुछा था-

“क्या नाम है प्यारे बच्चे ?”

“माय नेम इज मनीष शर्मा।” मासी ने जैसा रटाया था वैसे ही मोनू ने अपना पूरा नाम शर्माते हुए डिंपल मैम को बताया।

“गुड बॉय” कहकर मैम उसके साथ बैठे बच्चे का नाम पूछने लगी।

“नानी मै जब बड़ा हो जाऊंगा न, तो पता है किससे शादी करूँगा।”

मोनू ने स्कूल जाने के एक हफ्ते बाद एक दिन घर आकर कहा।

“अच्छा, तूने ये फैसला भी कर लिया नटखट ....किससे भई, जरा हम भी तो सुने|” नानी और मासी दोनों ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“अपनी क्लास टीचर डिंपल मैम से, वो बहुत सुंदर है, बिलकुल जुगल के घर वाली गुड़िया सी।” मोनू ने बड़ी मासूमियत से शर्माते हुए कहा।

“ अच्छा बाबा कर लेना, पहले क्लास के गुड बॉय तो बन के दिखाओ।” मासी ने कहा।

“गुड बॉय तो मै हूँ ही।” मोनू झट से बोला।

“ ऐसे नहीं बेटा, जब रोज मैम तुम्हें कापी पर एक्सिलेंट और थ्री स्टार देगी तब तुम गुड बॉय बनोगे।”

“आप मेरी कॉपी देखो न, मुझे तो आज भी ये मिला है।” मोनू ने अपनी इंग्लिश की कॉपी में क्लास वर्क के नीचे तीन स्टार दिखाते हुए कहा।

“बहुत अच्छी बात है बेटे, ऐसे ही काम करते रहो। अभी जब तुम्हारा फर्स्ट टर्म का एक्जाम आएगा तब भी ऐसे ही गुड बॉय बनना, पता है ए प्लस ग्रेड मिलता है, गुड बॉय को और फिर मैम ऐसे बच्चों को बहुत प्यार करती है।” मासी ने उसे पुचकार दिया।

बात आई गयी हो गयी। मोनू मन लगाकर पढ़ने लगा। मासी उसे प्यार से सारा होमवर्क करवाती और वो हमेशा अपनी कल्पना में डिंपल मैम का मुस्कुराता चेहरा देखता हुआ सारा काम करता। चाहे उसकी इंग्लिश में इतनी पकड़ अच्छी नहीं थी, पर मैम के प्यार और मासी की मेहनत ने उसे काफी निखार दिया था।

आज छुट्टी थी। मतलब सुबह अपनी प्यारी नींद और सपना अलार्म बजते टूटने का दिन नहीं होता था। सब इत्मीनान से उठते, सिवाय नाना-नानी के।  छुट्टी के दिन का मजा यही होता है कि आपको जल्दी नही उठना पड़ता। और यदि बच्चो को भी उस दिन छुट्टी हो तो उनके लिए जैसे कोई नियामत हो।

आज इतवार नहीं था पर कोई जयंती थी, इसलिए छुट्टी थी। किसकी जयंती थी इससे ज्यादा इंटरेस्ट इस बात में था कि देर रात तक जागकर सिनेमा में कोई अच्छी फिल्म देखी जाय और अगले दिन छुट्टी का फायदा लेते हुए देर तक सोया जाए। अमूमन रोज सुबह पाँच बजे उठना और उसी को लगातार रिपीट करते हुए जिन्दगी ढोना बड़ा उबाऊ सा है। मोनू अपने मामा और मासी के साथ बच्चों की ऐसी ही कोई शानदार फिल्म देखकर सोया था।

वैसे भी रिटायर्मेंट और बूढ़ा होने में काफी समय पड़ा हो तो हम सबको अपने बचपन की तरह जीने की ललक कई बार उठा करती है। बेफिक्र, अभी तो बच्चो के साथ बैडमिंटन खेलना और छत पर पतंग उड़ाने में कोई काम्प्लेक्स महसूस नही होता। अभी तो उनके साथ सुबह-सुबह दौड़ा भी जा सकता है तो इस बात में भी कोई दिक्कत नहीं कि अपने बचपन की बातों को गहरी नींद में सपने देखते हुए जीना।

मोनू के मामा इसी तरह से फुरसत में लुफ्त लेते थे। मल्टी नेशनल कम्पनी में नौकरी करते हुए छुट्टी का सुख क्या होता है ये कोई उनसे पूछे।

उन्होंने कहीं फ्रायड की किताब में पढ़ा था कि सपने हमारे अवचेतन मन में पड़ी यादों से बनते हैं। हम जिन बातों को बहुत गहरे तक महसूस करते हैं वे हमारे अवचेतन मन की किसी अलमारी में सेव हो जाते हैं। उनका भी बचपन उनके दिल में गहरे तक उतरा हुआ था और कभी-कभार जब वे घर में फुरसत के पलों में होते तो मोनू के साथ तकियों से बनावटी युद्ध करते, मरने का नाटक करते, मोनू उनकी छाती पर बैठा विजयी पहलवान की तरह उधम मचाता। मामा को ये सब करते देखते हुए अपने भांजे में अपना ही बचपन का अक्स दिखता।

खैर, अब मोनू के भी सपने बदल रहे थे। उसके सपनों में अपनी माँ के घर के साथ-साथ, जुगल, सचिन और डिम्पल मैम शामिल हो गये थे। उसे सपने में दिखता कि जुगल और सचिन के साथ मैम बातें कर रही थी, फिर जैसे ही मोनू पर उनकी नजर पड़ी वो उन दोनों को छोङकर उसके पास आई और उसे गोद में उठा लिया। अचानक मोनू की नींद खुलती है और वो मन ही मन खुशी से भर जाता है। इस तरह के और कई सपने उसे इन दिनों आया करते।

मोनू के वो दोस्त जिनके टिफिन में पड़ा आमलेट और मैगी वो अपने परांठे के बदले ले लेता उनका नाम विशाल और इरफ़ान था क्योंकि गाँव वाले घर में अंडा, नॉन वेज की सख्त मनाही थी, यहाँ शहर के स्कूल में उसके लिए एक नए स्वाद के अलावा कुछ नहीं थे। मासी को घर में उसने एक बार बता दिया था, पर उन्होंने उसे टोका नहीं, वे खाने-पीने के मामलों में लिबरल थी।

“नानी और नाना से मत कहना, समझे।” मासी ने प्यार से समझाया।

“क्यों, मैंने क्या कोई गलत काम किया है ?” मोनू ने बड़ी मासूमियत से पूछा।

“नहीं बेटा, वो ये सब खाना पसंद नहीं करते, इसलिए।” मासी ने बात टाल दी।

पड़ोस के दोस्त सचिन, जुगल और मोहल्ले के धीरू, कल्लू, अमरजीत, सरवन और विशाल, जिनके साथ पतंग के खूबसूरत अनुभव अब और भी जुड़ने लगे थे, ऐसे ही उसके सपनो में आ जाते। इन सपनों में दुहराव होता जैसे कोई फिल्म रिवाइंड हो रही हो। जिस तरह शोले के डायलाग कभी पुराने नही पड़ते और उसे आप हर साल एक बार देख सकते हैं, जैसे श्री लाल शुक्ल का राग दरबारी हर साल एक बार दुबारा पढ़ा जा सकता है, जैसे हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ पीते-खाते हुए पुराने चुटकलों पर दहाड़ मार कर हँसा जा सकता है वैसे ही अपने बचपन की बातों और किस्सों को बार-बार याद किया जा सकता है। कई बार तो लगता है कि जब आप बचपन की बातों को याद नहीं करते तो वो आपको याद कर लेती हैं और आपकी गहरी नींद में सुबह-सुबह एक स्वाद सा भर जाती हैं, ये स्वाद लगभग वैसा ही होता है जैसे पहली बार अपनी प्रेमिका से मिलने के बाद सड़क पर गुनगुनाते हुए और खोये हुए से लौटना।

आज का सपना भी ऐसा ही था। अपने नाना का घर और उसकी दूसरी मंजिल की छत जिस पर मोनू, आसमान की तरफ अपनी निगाहें टिकाये अपनी तरफ कटी हुई पतंगों को आते बड़ी शिद्दत से देख रहा था। नाना अभी दफ्तर से नहीं लौटे थे, वर्ना उन्हें उसके छत पर जाने से हमेशा दिक्कत रही है और वो भी अकेले। गर्मियों की शाम जब गहरा जाती तो वे दफ्तर से लौट कर, नहा-धोकर, चाय-नाश्ता करने के बाद एक सिगरेट सुलगाते, छत पर टहलते। मोनू पतंग उङाता रहता। फिर वे छत पर पानी छिङकते, छत की सारी गर्मी जैसे भाप बनकर एकाध घंटे में उड़ जाती। शाम ढल जाती अँधेरा हो जाता तो छत पर दरियां बिछ जाती। नीचे खाना-पीना निपटा कर सब ऊपर सोने के लिए आ जाते।

तारों से भरे आसमान के बीच कभी आधा या कभी पूरा चाँद।

“नानी ये चाँद में काला कला क्या है ?” मोनू, नानी के साथ लेटा हुआ चाँद की तरफ देखकर पूछता।

“ अरे, वो तो बुढ़िया है जो चरखा कात रही है।” नानी उसे काल्पनिक जवाब देती।

मोनू टिकटिकी लगाकर चाँद की तरफ देखता और वाकई उसे बुढ़िया चरखा कातती दिखने लगती।

“वो चरखा क्यों कात रही है ?” वो अगला सवाल पूछता।

“बेटा सारा दिन उसे घर के कामकाज से फुरसत नहीं मिलती, इसलिए इस समय थोड़ा बहुत चरखा कात लेती है।” नानी कहती।

“अच्छा चलो आज मैं तुम्हें एक नई कहानी सुनाती हूँ, राजकुमारी वाली।” नानी जानती थी कि इसे नई कहानी सुनाकर ही चैन मिलेगी वर्ना ये सवाल दर सवाल करता रहेगा। राज कुमारी का नाम आते ही मोनू एकदम शांत हो जाता। जब-जब वो राज कुमारी की कहानी सुनता था उसे डिम्पल मैम का सपना आया करता।

पर आजकल उसके सपनों में पतंगे थी और आस-पास की छतों पर सचिन, जुगल और कल्लू की उङती लहराती पतंगे भी। कल्लू, मोनू का पड़ोसी नहीं था, उनके मोहल्ले के पीछे रहते हैदर दूध वाले का लड़का था। पतंग बाजी में बहुत उस्ताद। जुगल, सचिन और मोनू तीनों एक तरफ होते थे और उनके पेंच कल्लू के साथ लड़ते। सचिन और उसका मुकाबला बराबरी पर रहता। जुगल और मोनू की पतंगे तो वो झट से काट देता।

“अरे यार ये कल्लू जाने नुक्कड़ की दुकान से कैसी रील लाता है कि हमारी पतंग पास नहीं फटकने देता।”

“कोई बात नही इस बार मैंने भी पापा से स्पेशल डोर मँगवाई है नक्खास से, कल शाम तक आ जाएगी, इन कल्लू साहब की सारी हेकड़ी निकाल दी जाएगी।”

जुगल और सचिन छत से एक-दूसरे को कह रहे थे।

मोनू सद्दी के आगे नई लाई रील को अपनी चरखी पर लपेट रहा था। सफ़ेद दूधिया सद्दी पर फैलता लाल रील का रंग। आज मोनू, कल्लू की पतंग को काट कर नया कीर्तिमान स्थापित करना चाहता था। मोहल्ले में जितने हिन्दू थे लगभग उतने ही मुसलमानों के घर थे। लगभग सभी सामान्य मध्यमवर्गीय। यहाँ तक कि मोहल्ले वालों का मल उठाने और पखाना साफ़ करने वाली दया चमारिन भी मोहल्ले की नुक्कड़ पर रहती थी। बाजार में दो हलवाई की दुकानें थीं। एक हिन्दू और एक मुसलमान। मुसलमान की दुकान से कभी किसी हिन्दू को मिठाई खरीदते नही देखा था, ऐसा ही दूसरी तरफ भी रहा होगा पर शहर की दूसरी बड़ी दुकानों पर सब एक-दूसरे से सामान खरीदते थे।

इन सबके बीच बच्चों की एक टीम थी जो क्रिकेट और पतंगबाजी के कारण आपस में जुड़ी हुई थी क्योंकि कोई भी खेल अकेले नहीं खेला जा सकता, इसलिए सबको पेंच लड़ाने या मैच खेलने के लिए एक-दूसरे की जरूरत थी। अभी वो राजनितिक तौर पर जागरूक नहीं हुए थे। उनके लिए खरबूजे इस लिए मीठे थे क्योंकि भगवान रात बिरात आकर उनमें शक्कर घोल जाया करता था। उनके लिए जीत का मतलब पतंगबाजी, लूडो, क्रिकेट और कैरम बोर्ड का खेल जीत लेना भर था।

 

खैर, हार-जीत तो चलती रहती है। जुगल के पापा चौक से नई वाली डोर ले आये थे और कल्लू की पतंग कई बार काटी जा चुकी थी। जुगल पूरे उत्साह में था और डोनाल्ड ट्रम्प जैसा महसूस कर रहा था। सचिन की अहमियत जुगल की डोर के कारण थोड़ी कम होती पर उसने लूडो के गेम में मोनू के साथ मिलकर जुगल को कई बार हरवा दिया था और यही काम उसने खुद कैरम बोर्ड में किया। जो जीता वही सिकंदर, तीनों पक्के दोस्तों की तरह ही आपस में व्यवहार करते रहे, कल्लू की पतंग और बाकी सब पतंगों के साथ पहले की तरह उड़ती-कटती रही। इरफ़ान और विशाल के आमलेट और मैगी का स्वाद भी मोनू उर्फ़ मनीष शर्मा लेता रहा। मासी पढ़ाती रही और मोनू, मामा से जिद करके चॉकलेट खाता रहा।

अब इस पूरे प्रसंग में ऐसा नहीं है कि डिम्पल मैडम नदारद हो गयी, बल्कि उन्हें लेकर मोनू का जो बाल सुलभ प्रेम था वह थोडा गंभीर किस्म का हो गया। कारण यह था कि सालाना परीक्षाएँ नजदीक आ रही थी और मोनू को डिंपल मैडम का सबसे स्मार्ट और गुड बॉय बनना था। उन दिनों मासी रोज शाम को उसे और अधिक गंभीरता से पढ़ाने लगी थी। स्कूल में मैडम, सर, दोस्त सब गंभीर हो गये थे। खेलना-कूदना कम हो गया था और आसमान में उड़ती किसी बेशर्म पतंग को पूरी गंभीरता से समय की बर्बादी माना जाने लगा था। पूरे ब्रह्माण्ड में जैसे चारों और गंभीरता फ़ैल गई थी। आपको लगने लगा होगा कि कहानी का यह हिस्सा भी गंभीर सा हो गया है।

“अरे बिटिया, मोनू को कुछ खेलकूद आने दे, अभी दोस्सरी क्लास है, इतना पढ़ाई का बोझ ठीक नहीं।” नानी ने अपनी बेटी यानि मोनू की मासी से कहा।

“माँ तुम नहीं समझोगी, फर्स्ट डिवीज़न और पोजीशन अब हर क्लास में जरूरी हो गयी है, और अपने मोनू के तो अच्छे नम्बर आयेंगे ही। पूरी क्लास में इसका नाम इंटेलीजेंट बच्चों के बीच में गिना जायेगा। और हाँ जीजा भी देख लेंगे कि हमने पढाई में कोई कसर नहीं छोड़ी ....वर्ना तुमको ही सुनना पड़ेगा कि नानी के लाड़ प्यार ने बिगाड़ दिया।” मासी ने मोनू के सर पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया। मोनू मायसेल्फ का निबंध याद कर रहा था।

“आई एम् ए इंटेली जेंट बॉय।” मोनू ने कॉपी में लिखते हुए पढ़ा।

“अरे बेटा आई वोव्ल वर्ड है ...बोलो ....एन इंटेलीजेंट बॉय।” मासी ने उसे बताया।

“ मेरी तो कोई बात ही नहीं सुनता ....कह रही थी कि इसके नाना पार्क तक टहलने जा रहे है ...उनके साथ थोड़ा घूम आता ....डेढ़ घंटे से बैठा है किताब लिए।” नानी बोलकर अपने कमरें में चली गई।

मोनू के सभी पेपर अच्छे हुए थे। बस अंग्रेजी का बाकी था। स्पेल्लिंग मिस्टेक और लिखने में ज्यादा गलतियाँ न हो इसीलिए मासी अंग्रेजी के पेपर की तैयारी थोड़ी अधिक गंभीरता से करवाना चाहती थी। मन बहलाने के लिए उसके पास जेब में एक्लेयर्स की टॉफी थी, डेयरी मिल्क का छोटा चॉकलेट था और पार्ले जी उसकी मेज के कोने में पड़ा था।

शाम की चाय का वक्त अभी-अभी ही बीता था और वो इस बहाने अच्छी खासी ब्रेक ले चुका था इसीलिए मासी उसे नाना के साथ एक और ब्रेक देने के लिए पार्क में नहीं भेजना चाहती थी।

“मासी ये अंग्रेजी के पेपर में एक दो स्पेल्लिंग गलत हो जाय तो ज्यादा नम्बर तो नहीं कटेंगें न।” मोनू ने उत्सुकता से पूछा, वास्तव में वो हाँ सुनना चाहता था।

“एक एक नम्बर कीमती है मोनू, अभी देखो पिछले टर्म में तुम्हारे चार नम्बर इसी वजह से कटे थे और पोजीशन तीसरी आई थी। फर्स्ट पोजीशन वाले बच्चे का कोई स्पेल्लिंग मिस्टेक नहीं था। अगर तुम्हे पोजीशन की कोई फ़िक्र नहीं है तो अलग बात है। जैसी भगवान् की मर्जी।”

मासी, मोनू को किसी तरह से किसी दबाव में नहीं लेना चाहती थी पर वो समय रहते गलती सुधारना चाहती थी। वैसे उन दिनों बच्चे ज्यादा तनाव वगैरह लेते नहीं थे जैसा कि आज है। तब बच्चों की सेहत अच्छी थी और नम्बरों की प्रतिशतता अस्सी से नब्बे के दरमियान बहुत उच्च कोटि की मानी जाती थी।

अगले दिन मोनू उर्फ़ मनीष शर्मा अपना सेकंड क्लास का अंतिम पेपर देने के लिए तैयार थे। उनके पेन्सिल बाक्स में नटराज की दो एच बी पेन्सिल और मुँह में दही-शक्कर का चम्मच था।

“मोनू ये ले बेटा, बढ़िया पेपर लिखना ...सुंदर सुंदर।” नानी ने दही-शक्कर खिलाते हुए उसे कहा।

सचिन, जुगल और मोनू, तीनों स्कूल के ऑटो रिक्शे पर बाय-बाय करते स्कूल की तरफ रवाना हुए।

“जुगल ...आज कैसी तैयारी है ,सब स्पेल्लिंग याद हैं।” मोनू ने अपने क्लासमेट से पूछा।|

“हाँ यार, कल मम्मी ने देर रात तक एक एक स्पेल्लिंग याद तो करवाई थी ...अब देखो।”

जुगल ने उबासी लेते हुए कहाँ।

“बस तुम जागते रहना ...पेपर में सो न जाना कहीं ...हा हा।” सचिन ने उसे छेड़ा।

“और तुम पास हो जाना ...बड़े आये...।” जुगल ने तपाक से सचिन को कहा। सचिन का आज मैथ्स का पेपर था और मैथ्स पेपर को लेकर उसे हमेंशा घर में डाँट पड़ा करती थी।

सचिन ने मुँह बना लिया। स्कूल आ गया था।

मोनू और विशाल एक ही बेंच पर बैठे थे। परीक्षा शुरु हो गई थी।

अरे वाह, कमाल की बात थी आज तो कमरे में ड्यूटी पर भी मैडम डिंपल ही थी।

मोनू में जैसे एक आत्मविश्वास भर गया उसने अपना पेपर बड़े ध्यान से करना शुरू कर दिया उसने नटराज की एच बी काली पेंसिल से एक-एक अक्षर को बड़ी ही सुंदरता से लिखना शुरु कर दिया। वह स्पेलिंग का भी ध्यान रख रहा था इसलिए वह धीरे-धीरे लिख रहा था। समय भी धीरे-धीरे बीत रहा था। विशाल भी अपना पेपर धीरे-धीरे कर रहा था। कभी पेन्सिल मुंह में डाल कर सोचने लगता तो कभी इधर-उधर देखने लगता। शायद उसे कम आता था। वह कुछ देर रुक कर सोचता रहता, कभी-कभी लिखता। मोनू ने एक-दो बार उसे देखा और विशाल ने भी उससे पेपर के दौरान कभी पेंसिल तो कभी शार्पनर मांगा, कभी रबड़। मोनू ने डिस्टर्ब होने से बचने के लिए अपना ज्योमेट्री बॉक्स खोलकर मेज पर रख दिया।

समय बीत रहा था। मोनू सुंदर लिखाई के चक्कर में और कोई स्पेलिंग मिस्टेक न हो इसलिए लिखे हुए को बार-बार पढ़ता। डिम्पल मैडम पूरे कमरे में चक्कर लगा रही थी। वो बच्चों को प्यार से थपथपा देतीं और मुस्कुराकर आगे बढ़ जातीं।

"बच्चों हाफ टाइम ओवर।"

कुछ देर बाद "बच्चों पन्द्रह मिनट बाकी हैं।" वे ऊँची आवाज में कहती।

मोनू को पेपर करते समय कभी दिखता कि रिजल्ट निकल आया है, अंग्रेजी के पेपर में उसके सबसे अच्छे नम्बर हैं और डिम्पल मैडम उसे पूरी क्लास के सामने गुड बॉय कहकर क्लैप्पिंग करवा रही हैं।

"दस मिनट रह गए हैं।" डिम्पल मैडम की आवाज उसकी कल्पना से निकलकर फिर यथार्थ में ले आती हैं।

"ओह, दस मिनट ही बचे हैं, ग्रामर के सारे क्यूशचन पड़े है अभी। कुछ फिल इन द ब्लेंक हैं। मोनू हड़बड़ा जाता है। उसे चिंता होने लगती है। साथ बैठे विशाल ने तो शायद सारा पेपर कर लिया है। वो आराम से बैठा आंसर शीट को उलट-पलट रहा हैं।

"पांच मिनट बच्चों।" मैम की आवाज फिर आती है।

"मैम, मे आई गो टू वाशरूम।" विशाल ने अपनी सीट से उठकर कहा और मैम ने उसे जाने का इशारा किया।

मोनू जल्दी-जल्दी अपना पेपर पूरा करने में लगा है। उसे लग रहा है कि दस नम्बर तो पक्का कट जाएंगे अगर पेपर पूरा न लिखा तो।

फिर जाने उसे क्या सूझता है कि .......|

"टाइम अप, स्टॉप राइटिंग। अपनी शीट्स टेबल पर छोड़कर सभी बच्चे बाहर जाओ"। मैडम कहती हैं। विशाल अभी वाशरूम से कमरे में आया ही था। मोनू और विशाल दोनों ने अपना पेंसिल बॉक्स उठाया और क्लास से बाहर जाने लगे।

"बाय बाय ,मैम।" दोनों ने डिम्पल मैम को कहा। मैम ने भी 'बेस्ट ऑफ लक' कहकर उनका अभिवादन किया।

"मोनू पेपर कैसा हुआ ?" घर आते ही मासी का पहला प्रश्न था।

"बढ़िया"। संक्षिप्त उत्तर सुनकर मासी थोड़ी हैरान हुई।

"थका हारा लौटा हैं ,खा पी ले, फिर अपनी पूछताछ कर लेना।" नानी ने मासी को टोका।

खा पी चुकने वाले सैशन के बाद अब कमरे में मासी और मोनू बैठे थे। दोनों के बीच अंग्रेजी का प्रश्न पत्र ऐसे पड़ा था जैसे कोई प्रस्ताव पास होने के लिए आया हो।

"अच्छा तो पेपर तुम सारा कर आये, ग्रामर वाला पोर्शन देखें जरा, क्या किया है बच्चू।" मासी ने कहते हुए जो पूछताछ की उसका निष्कर्ष ये निकला कि कुल जमा 43 नम्बर 50 में से आयेगें।

"सात नम्बर तो कट ही गए बेटा मोनू,...चलो खैर ..कोई बात नहीं, अब जो हो गया उसका क्या दुख।...तो आज पेपर तो खत्म हो गए...फिर कहाँ घूमने चले।" मासी को मोनू की परेशानी दिखी तो उसने माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

"देख लो, जहां आपको अच्छा लगे। "मोनू ने अलसाई सी आवाज में कहा।

"बेटा, मामा भी आने वाले हैं,...चलो फिर शाम को मार्केट चलते हैं। आज खाना भी बाहर खायेंगे। "मासी उसका मूड ठीक करना चाहती थी।

दस दिन बाद रिजल्ट आया। मामा रिजल्ट कार्ड लेने गए थे। मोनू, मासी के साथ उनकी सहेली की शादी में एक दिन पहले रात में गया था। देर से लौटे थे दोनों। घर में ही सोये रहे।

सारे घर में हैरानी फैली थी।

मोनू के सभी विषयों में बहुत अच्छे नम्बर थे पर अंग्रेजी में कुल नौ नम्बर थे।

मोनू रोने लगा। मासी उसे समझा रही थी।

"बेटे रो मत, तेरा पेपर चैक करने में कोई गलती हुई है या ये नम्बर गलती से किसी और के है जो तेरे रिजल्ट कार्ड पर चढ़ गए हैं। कोई बात नहीं हम कल स्कूल जायेंगे और तेरी आंसर शीट निकलवा कर चेक करेंगें।" मासी पूरी कॉन्फिडेंट थीं।

"बेटा दिल छोटा मत कर, बाकियों में तो अच्छे हैं, अगली क्लास में दाखिला हो जाएगा। अब एक सब्जेक्ट में फेल होने पर सब मे थोड़े ही फेल करेंगे।" नानी ने समझाया।

"शायद मेरी आंसर शीट किसी से बदल गयी है।" मोनू सुबकता हुआ बोला।

"कोई बात नही, कल चेक करेंगे।" मासी बोली।

शाम को जुगल और सचिन के पापा भी घर आये। जुगल के पापा सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। उन्होंने भी कहा, "अजी जुगल अंग्रेजी में इस बार अच्छे नम्बर ले कर पास हुआ है, वरना इसके नम्बर कभी पचास प्रतिशत से बढ़े नहीं थे इसमें। मोनू तो इंटेलीजेन्ट बच्चा है, मैं खुद कल आपके साथ चलूंगा स्कूल। सब ठीक हो जाएगा।"

अगले दिन....

क्योंकि मोनू की क्लास इंचार्ज डिंपल मैडम थी। उन्होंने जब आंसर शीट निकाली तो वे सब देखकर हैरान थे कि रोल नम्बर और नाम सही था। पेपर भी सही चेक हुआ था पर....ये आंसर शीट मोनू की नहीं थी। मासी ने शीट देखकर मोनू की लिखावट पहचान ली थी। इतनी गंदी राइटिंग तो वो नहीं करता।

"क्या ये शीट तुमहारी नहीं है।" मैम ने मोनू से पूछा।

वो चुप था। सहमा सा बैठा था|

मोनू की इंग्लिश की टेस्ट कॉपी मैडम के पास स्कूल में ही थी। मैम ने उससे लिखावट मिलाई। हेंड राइटिंग एक्सपर्ट वालों की तरह सबने पहचान लिया कि कॉपी वाली राइटिंग से आंसर शीट की राइटिंग नहीं मिलती क्योंकि उस दिन मोनू के साथ विशाल बैठा था तो उसकी आंसर शीट निकाली गई।

"ओह,... ये क्या..ये राइटिंग तो मोनू की है।" मैडम ने एकदम कहा।

पूरे चवालीस नम्बर मिले थे इस आंसर कापी को। मतलब विशाल को। मतलब विशाल ने गड़बड़ की थी।

सबने सुख की सांस ली। ज्यादा बखेड़ा खड़ा न हो इसलिए विशाल के मां-बाप को बुलाया गया। उन्हें असलियत बताई गई और मैडम डिंपल पर कोई आँच न आये, प्रिंसिपल तक बात न पहुँचे इसलिए जुगल के पिता ने मास्टरों की तरह विशाल के पिता को समझाया।

"देखिए, बच्चे नादानी में गलती कर बैठते हैं, पर अगर इसके बारे में हम ज्यादा हो हल्ला करेंगे तो विशाल की ज्यादा बदनामी होगी और उसे स्कूल से निकाला जा सकता है। आप को तो पता ही है कि आजकल अच्छे स्कूल में एडमिशन मिलना वैसे ही मुश्किल है।"

विशाल के पिता बात की गंभीरता और बच्चों के बचपने को ध्यान में रखकर अपनी सहमति देकर सकुशल वापस घर लौट गए। बात आई-गई हो गई।

सब खुश थे। जुगल के पापा की खूब प्रशंसा हुई और वे गर्व से भरे सीने और मिठाई से भरे अपने पेट को लिए अपने घर लौट गए।

नाना जी आज मोनू की मनपसंद गुलाब-जामुन लेकर आये थे| मामा ने उसे डेयरी मिल्क का बड़े वाला पैकेट दिया।

मासी संतुष्ट थी।

मोनू चुप था।

शाम को सब घूम-फिर कर लौटे। खाना-पीना भी हो गया। मोनू अब थोड़ा सा सहज था पर ज्यादा बोल नहीं रहा था। मामा के साथ तकियों वाली लड़ाई भी उसने नहीं की। यूँ वो मामा इस के लिए खुद उकसाया करता था।

मासी ने सोचा, बच्चा थोड़ा घबरा गया होगा। पहली बार ऐसी घटना देखी है उसने। हो जाता है|

सब सो गए। मोनू आज मासी के साथ कमरे में ही लेटा था।

लगभग आधी रात को जब मासी ने करवट ली। उसने देखा कि मोनू सीधा पीठ के बल आँखें खोले लेटा है। उसकी आँखे खुली हैं।

"क्या बात है बेटा, नींद नहीं आ रही। "मासी ने उसके सिर पर हाथ रखकर पूछा।

उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े और वो सुबकने लगा।

"अरे, क्या बात है बेटे, मम्मी की याद आ रही है। कोई बात नहीं इस हफ्ते गांव चक्कर लगा आएंगे।" मासी उसके सिरहाने बैठ गयी।

"नही मासी, सॉरी.... मुझे....माफ कर दो... सारी गलती मेरी है।....वो शीट मैंने बदली थी ।" कहकर मोनू फूट-फूटकर रोने लगा जैसे कई दिनों से उसके दिल में इतनी सी बात उफ़न रही थी।

"क्या ? पर क्यों मोनू ! तुम्हें ऐसा करने की जरूरत क्या थी।" मासी खुद परेशान और हैरान हो गयी सुनकर।

"मासी मेरा पेपर छूट गया था...मुझे लगा ज्यादा नम्बर कट जाएंगे। मैंने सुना था स्कूल में कि बच्चे शीट न बदल लें इसलिए अपना रोल नम्बर और नाम सही लिखना होगा। विशाल ने सारा पेपर कर लिया था और वो जब वॉशरूम के लिए गया तो मैंने रबड़ से उसकी शीट पर उसका नाम मिटाकर अपना और अपनी पर उसका लिख दिया। मैं नहीं चाहता था कि नम्बर कम आये और डिम्पल मैम नाराज हो जाए। आप भी नाराज होती। पर सब उल्टा हो गया। विशाल मेरा अच्छा दोस्त है। उसे स्कूल से न निकाल दे। उसका तो कोई कसूर नहीं।" मोनू सुबक-सुबक कर लगातार सब कुछ बता गया।

"देखो बेटे जो किया वो बहुत गलत किया, पर मैं इस बात से खुश हूँ कि तुम्हें अपनी गलती का अहसास है क्योंकि तुम एक सच्चे और अच्छे बच्चे हो। बाकी विशाल कहीं नहीं जाएगा इसकी गारंटी मैं लेती हूँ पर तुम इस बात को याद रखना कि कभी अपने ऊपर से विश्वास मत खोना। तुम जैसे हो जितना कर लेते हो वही तुम्हारी असली पहचान है। कोई भी ऐसा काम न करो जिसके लिए तुम्हें अपने किये पर पछतावा हो। तुमने सच कहा इसके लिए मैं चाहूंगी कि तुम एक सच्चे इंसान बनो, मेहनत करो, अपने दोस्तों से प्यार करो और अपने आप पर विश्वास रखो। तुम्हारे जैसा कोई नहीं।" मासी की सारी बातें मोनू को समझमें आई कि नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता पर आज उसने जैसे किसी बोझ से मुक्ति पा ली।

वो चैन की नींद सो गया।

चैन की नींद में ही वो परियों के सपने देख सकता था। उसकी प्यारी परी के सपने जिसमें उसके दोस्त भी शामिल होते थे।

 

 

 


मार्मिक बचपन संवेदनाएँ शरारत

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