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चकाचौंध
चकाचौंध
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© Rashi Singh

Inspirational

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रेणुका अपनी पेंटिंग में रंग भरने में व्यस्त थी, जब तक रंगों से कोई आकृति न बना ले जीवन बदरंग सा प्रतीत होने लगता है।अभी तक न तो उसने कोई प्रदर्शनी लगाई और न ही अपनी पेंटिंग्स को बेचा बस अपने मन की खुशी के लिए घर के कामों से थोड़ा सा वक्त निकालकर या यूँ कहें कि चुराकर वह अपनी कल्पना की उड़ान को रंगों के द्वारा एक आयाम देने की कोशिश करती है।

​बचपन से ही उसको विभिन्न आकृतियां बनाने और उनको रंगों द्वारा जीवंत करने का शौक जो रहा है।

​जब छोटी थी तब त्यौहारों पर घर पर बनने वाली रंगोली में माँ का साथ देती थी और जब भी पूजा का चौक सजाया जाता था पंडित जी भी उसी को आवाज़ देते थे।

​स्कूल कॉलेज के दिनों में बहुत सारी प्रतियोगिताएं जीती, धीरे धीरे रंग उसकी जिंदगी का एक हिस्सा बनते गए । जब भी वह मायूस या परेशान होती अपनी खोई हुई जीवन शक्ति को दोबारा प्राप्त करने के लिए लग जाती थी रंग भरने में।

​उसके लिए उसकी कला एक साधना थी। चेहरे की मासूमियत शायद इस कलाकारी की वजह से ही अभी तक चेहरे पर चांदनी के मानिंद बिखरी हुई थी।

​"मम्मी सरला आंटी का फोन है, "बेटी मीठी ने मोबाइल लाकर रेणुका को थमा दिया और खुद अपने कत्थक गुरु के द्वारा समझाये गए डांस टिप्स की प्रैक्टिस करने लगी।

​अचानक सात साल बाद सरला का फोन सुनकर रेणुका को आश्चर्य और खुशी दोनों ही हुए।

​"हैलो ...रेणुका l "सरला ने अपने उसी मस्त अंदाज़ में कहा जिसके लिए वह जानी जाती थी।

​"हैलो ...कैसी हो ?"रेणुका ने हँसते हुए कहा।

​"अच्छी हूँ ....बस थोड़ा पेट में दर्द सा रहता है "

​"और बच्चे ?"

​"बच्चे भी ठीक ही हैं, "अचानक सरला की आवाज़ में उदासी सी आ गयी।

​"मतलब ?"

​"बस पूछ मत .....आजकल के बच्चे भी न...यह बता मीठी कैसी है ?"

​"अच्छी है ....ग्रेजुएशन कर रही है साथ ही डांसिंग में भी उसकी बहुत रुचि है ..। "

​"क्यों उसको भी नहीं छोड़ा तुमने ....सिखा दिया लगे रहना ...माँ को पेंटिंग का और बेटी को डांस का ...वाह भाई वाह अच्छा शौक है l"सरला ने ठहाका लगाया तो रेणुका भी हँस दी।

​"हाँ और बता क्या चल रहा है ...?"रेणुका ने प्यार से कहा ।

​"कुछ नहीं यार ....आज डायरी के पन्ने पलट रही थी कि तेरा नम्बर निकल आया। "सरला ने हँसते हुए कहा

​"अच्छा जी ...मोबाइल से मेरा नंबर भी डिलीट कर दिया l "रेणुका ने बनावटी गुस्सा करते हुए

​कहा।

​"नहीं ...वो मेरा मोबाइल खराब हो गया था ..खराब क्या पानी गिर गया था इसलिए सभी नम्बर डिलीट हो गए थे "

​"ठीक है ...और बता "

​"पतिदेव कैसे हैं ?"

​"ठीक नहीं हैं ज्यादा एल्कोहल लेने की वजह से लीवर में परेशानी हो गयी है"

​"और तू ?"

​"मुझे भी ऐसा ही लगता है पेट में हल्का हल्का दर्द रहता है और भूख भी कम ही लगती है"

​"चैकअप करा अपना भी ...और बच्चे ?"रेणुका की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी।

​"बच्चों का तो बुरा हाल है मेरे ....बेटा कुश तो इंटर के बाद पढ़ाई ही छोड़ बैठा और बेटी ...बेटी को इस बार इंटीरियर डिजाइनिंग में एडमीशन दिलाया है ..पहले बीटेक कर रही थी छोड़ दिया "

​"क्यों ?"

​"पढ़ाई में बिलकुल रूचि नहीं है बस दोस्तों के साथ पार्टी करवा लो ...और घर में कुछ कह दो तो दो चार सुन लो, "सरला ने भारी आवाज़ में कहा सुनकर रेणुका को भी बहुत बुरा लगा।

​"अच्छा लगा तुझसे बात करके ...मगर तेरे पास अगर मेरा नंबर था तब तूने क्यों नहीं किया फोन ? "सरला ने आश्चर्य से पूछा, मगर रेणुका क्या कहती जब शुरू शुरू में सरला दूसरे शहर में शिफ्ट हुई थी तब रेणुका को बहुत बुरा लगता था क्योंकि कई साल तक दोनों एक दूसरे के साथ जो रहीं थीं मगर धीरे धीरे सरला का व्यवहार बदलता गया जब वह यहां से दूसरे शहर में चली गयी तब भी रेणुका ने कई बार फोन किया मगर उसकी बात के लहज़े से ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि वह उससे बात करने में रूचि नहीं ले रही हो इसलिए धीरे धीरे उसने भी फोन करना बंद कर दिया।

​"अब मैं फोन रखती हूँ और तुम्हारा नम्बर भी सेव करती हूँ ...ओके बाय, "सरला ने हँसते हुए कहा तो रेणुका ने भी प्रयुत्तर में वही बोल दिया ।

​आज सात साल बाद फिर यादों ने अपनी ओर खींच लिया था रेणुका को और वह खिचती चली गयी।

​दस साल पहले शादी के आठ साल बाद पति दिनेश के साथ इस अजनबी शहर में आई थी रेणुका क्योंकि उनका तबादला जो हो गया था और फिर वहां पर सरला और वह एक ही बिल्डिंग में किराये के मकान में रहते थे धीरे धीरे दोनों की मित्रता गाढ़ी होती गयी, जहां सरला एकदम मुँह फट और आधुनिकता के रंग में ढली हुई थी वहीं रेणुका का स्वभाव थोड़ा संकोची किस्म का था।

​ऐसा नहीं था कि वह आधुनिक नहीं थी ,थी मगर विचारों से, कला की ओर बचपन से ही

​झुकाव था इसलिए ज्यादातर वक्त घर के काम से निपट कर पेंटिंग तथा और भी बहुत से उसके शौक थे जिनको पूरा करने में बचा हुआ समय लगाती थी।

​इससे उसको असीम सुख का एहसास होता था, यही आदत उसने अपनी बेटी की भी डाल दी इससे मन में बुरे विचार नहीं आते और खुश भी रहता है।

​एक दिन सरला ने रेणुका से अपनी सखी शशि के घर उसकी जन्मदिन की पार्टी में आमंत्रित किया, रेणुका खुशी खुशी चली गयी मगर यह क्या वहां पर महिलाओ का रूप देखकर वह परेशान हो गयी। सभी जाम के साथ हंस बोल रही थी, रेणुका को भी पीने के लिए मनाया जा रहा था आधुनिकता की दुहाई देकर लेकिन उसने साफ़ मना कर दिया।

​",अरे यार तू भी कौन सी दुनिया में जी रही है ?"सरला ने कमेंट किया लेकिन रेणुका मुस्करा भर दी।

​"खुद के लिए जीना सीखो क्या हर समय पति बच्चे ...पति बच्चे लगाए रहती हो ...तुम्हारी भी जिंदगी है या नहीं ?,मेरा देख बच्चे खुद एन्जॉय करते है और हम दोनों भी, "सरला ने अपने पति का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

​कुछ दिनों के लिए तो रेणुका भी किटी पार्टीयों में ड्रिंक करने लगी पति से छिपा कर मगर एक दिन उसके पति ने देख लिया और रेणुका को डांटा नहीं अपितु बहुत प्रेम से समझाया।

​"देखो रेणुका तुम हमारे इस परिवार की जान हो तुम्हारी वजह से बच्चे इतना अच्छा जा रहे है पढ़ाई में और मैं तो तुम्हारे बिना कुछ हूँ ही नहीं इसलिए अपनी कीमत कभी भूलना मत मन बहलाने के लिए बहुत से तरीके हैं जिनको अपनाकर तुम सच्ची खुशी प्राप्त कर सकती हो, अपने अंदर की शक्ति को पहचानो यूँ अंधी आधुनिकता के नाम पर हमारे इस प्यारे से परिवार को बर्बादी के अंधकार में न धकेलो।"

​कहते कहते वह भावुक हो गए रेणुका ने उसी दिन अपने बहके क़दमों को वापस मोड़ किया।

​अब उसने सरला को भी समझाना शुरू किया मगर उस पर कोई असर नहीं पड़ा अपितु सरला तो उसको ही बेवकूफ़ कह देती थी।

​इन सबका असर यह हुआ कि सरला के बच्चे भी माँ बाप के नक्शे कदम पर चलने लगे और पढ़ाई में पिछड़ते चले गए।

​"मम्मी ....क्या सोच रही हो ?"बेटी ने रेणुका के काँधे पर हाथ रखकर खिलखिलाते हुए कहा।

​"कुछ नहीं ,बस कुछ याद आ गया था, "रेणुका ने बेटी के गाल पर प्रेम से हाथ फेरते हुए कहा।

​आज वह बहुत खुश जो थी अपनी सखी से बतिया कर मगर उदास भी उसकी हालत जानकार उसने मन ही मन प्रण किया कि वह अपनी सखी से मिलेगी और उसको अंधकार से निकालने का पूरा प्रयत्न भी करेगी।

अंधकार आधुनिकता परिवार

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