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प्रभा
प्रभा
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© Birendra Nishad शिवम विद्रोही

Crime Horror Tragedy

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जिला चिकित्सालय के बर्न वार्ड पर आग से झुलसी हुई प्रभा कराह रही थी। उसका शरीर नब्बे प्रतिशत से ज्यादा जल चुका था। कल जब वह खेत से बकरी चराकर वापस आयी तो अपनी मढ़ही पर केरोसिन का तेल ड़ालकर कर खुद को आग के हवाले कर लिया। प्रभा कल तक 24 वर्षीय सुगठित हृष्ट पुष्ट शरीर की धनी महिला थी। बहुत गोरी तो नहीं लेकिन भगवान ने हर एक अंग सुव्यवस्थित ढंग से दिए थे, माँस का लोथड़ा न एक इंच कम और न ही एक इंच ज्यादा।

चलती थी तो कितने ही मनचलों के दिल मचल जाया करते थे। उसकी शादी को 6 वर्ष व्यतीत हो चुके थे पर अभी तक भगवान ने एक भी संतान के दर्शन नहीं कराए थे। उस बदनसीब महिला को शायद यही एक दुःख रहा हो, वरना तो अच्छे खाते पीते व शान-शौकत से रहने वाली महिला थी। उसका पति 'बचनी' पिछले 6 महीनों से परदेश में दो जून की रोटी की जुगत में टिका हुआ है।

गाँव मे यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रभा ने खुद को आग क्यों लगाई ? जितनी मुँह उतनी बातें। कोई तो कह रहा है कि उसके संतान नहीं हो रही थी इसलिए खुद को आग के हवाले कर लिया पर कोई कह रहा है कि परसों ही उसने स्थानीय पुलिस चौकी पर तहरीर दी थी कि गाँव के नम्बरदार राजन ने उसके साथ छेड़छाड़ की थी। पर अभी तक पुलिस का एक कांस्टेबल तक तहक़ीक़ात के लिए नहीं आया था। ऊपर से प्रभा के ससुर ने तहरीर वापस लेने का दबाव बनाया था। कुछ लोगों ने उनके बीच गहमागहमी भी सुनी थी।

ससुर: "बहुरिया जऊं होंए का रहा वा तो होइनगा, अब बात बढ़ावैं से कउनो फायदा नाहीं। ये जनतै हो कि बात गाँव मा फयली हमरै इज़्ज़ती जइ। ऊपर से ऊँ ठहरे बड़का आदमी पुलिसो ओइन के सुनी।"

बहू: तो क्या उस भेड़िया को यूँ ही खुला घूमने दिया जाये। आज मेरे साथ, कल किसी और के साथ। ये तो सिलसिला चलता ही रहेगा। अभी पिछले साल ही तो उसने गोवर्धन के घरवाली से मुँह काला किया था।

ससुर: तो हम का कर सकित थी होइक्या ? फिर ये भी तो सोचो, अगर बात फैलि तो हमरे 'भान्मतिया' (भानमती) का कउनु विहाव करी। का भान्मतिया तोहार कउनु न वाय। एक कै तो ननद है तुम्है, का ओहका सुखी न रहै दयाहो।

प्रभा के लिए ये शब्द असहनीय थे। जो पीड़ा उसने उस समय नहीं भोगा था जब राजन ने उसके शरीर पर हाथ लगाये थे, वह अब भोग रही थी। सच है व्यक्ति को आघात उस समय कम लगता है जब कोई पराया व्यक्ति आपको पहुँचाता है बल्कि उस समय ज्यादा लगता है जब कोई अपना आपके साथ खड़ा न हो सके। ऐसे में प्रभा क्या करती ?

समाज और समाज की संरचना, प्रभा के लिए बियाहबान जंगल के समान प्रतीत होने लगी थी। काश उसका पति बचनी मौके पर मौजूद होता, वह उसके कंधे पर सर रखकर जी हल्का कर लेती। पर यह भी संभव था कि अब बचनी उसे स्वीकार न करे ! ऐसी स्थिति में व्यक्ति के सामने अंधकार छा जाता है और वह, वह कर बैठता है जिसकी उम्मीद किसी प्रभा जैसी समझदार गृहिणी से नहीं कि जाती है।

प्रभा के घर की स्थिति भी तो दयनीय थी ही और बचनी भी बम्बई से इतनी जल्दी नहीं आ सकता। अतः उसे सरकारी अस्पताल के जर्जर जीर्ण भवन में उसके हालात पर छोड़ दिया गया। मैजिस्ट्रेट के समक्ष उसका बयान दर्ज कर लिया गया। वह क्या बयान दिया मजिस्ट्रेट और डॉक्टर के अतिरिक्त किसी को नहीं पता क्योंकि बयान भी बंद कमरे में लिए गए। वह बेचारी क्या बता पाई होगी अपनी पीड़ा। बेचारी मन की पीड़ा बयां करती या तन की। मन में बोझ भानमती के शादी का रहा होगा और तन में पराए पुरुष द्वारा भद्दी भद्दी गालियों के साथ नोचे गए माँस का। वह क्या क्या बयां करती। किस किस राजन की दास्तान सुनाती या कौन कौन सी प्रभा की कहानी सुनाती......

बलात्कार सरकारी अस्पताल आत्म हत्या

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