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आखिरी स्वेटर
आखिरी स्वेटर
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© Saumya Jyotsna

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सालों के इंतज़ार के सामने, ट्रेन में दो दिनों का सफ़र बहुत छोटा लग रहा था| पूरे 19 साल बाद मैं अपने गांव वापस आई थी| मेरा गांव, मेरी नानी माँ का घर| मन शांत था और कई तरह की जिज्ञासाओं से घिरा था| गांव अब कैसा होगा? सभी सवालों, उत्सुकताओं की गठरी बांधे, मैं आगे बढ़ रही थी| गांव अब काफी बदल गया था, पर फिर भी अपनापन वही था| खेतों में ईश्वर का आशीर्वाद और किसान काकाओं की मेहनत लहलहा रही थी| झूमती, गाती अल्हड़|

गांव को निहारते, आँखों में भरते मैं आगे बढ़ रही थी| चलते-चलते मेरे कदम मेरी और नानी-माँ के घर के सामने आकर ठिठक गए| आँखों के सामने पुरानी यादें, खट्टे-मीठी यादें सभी चलचित्र की भांति  तैर गई| मानों यह कल की हीं बात हो, नानी-माँ तुरंत आएँगी और मुझे अपनी गोद में भरकर घर के अंदर ले जाएँगी| जैसे वो पहले किया करती थीं पर....अब नानी-माँ नहीं आएँगी| मेरी आँखे अपलक घर को निहार रही थी| न जाने कब उन आँखों में आंसू आ गये जो अबतक आँखों में कैद थे|

काफी सालों से बंद पड़े घर पर, वक़्त ने अपने काफी निशान छोड़े थे| जंगली लताओं और बेलों ने घर को जकड़ लिया था| आसपास जहां कभी हरियाली हुआ करती थी, वहां आज लम्बी इमारतों का बसेरा हो चला था| ख़ैर ताले और चाभी की गुफ्तगू के बाद दरवाजा खुला, और मैं अंदर गई| जर्जर खिड़कियाँ,दीवारों से गिरती पपड़ी और मकड़ी के जालों ने पूरे घर को जकड़कर रखा था|घर की ऐसी हालत देखकर मन भर आया| मैं चौखाट को लांघकर अंदर गई| ये वही चौखट था जिससे टकराकर मैं गिर जाया करती थी, और फिर नानी-माँ मुझे उठाते हुए चौखट को डांट लगाकर मेरा रोना बंद करवाती थी|

घर अपनी बेबसी बयाँ कर था|अब उसे भी मरम्मत की जरुरत थी| जी हर किसी को एक वक़्त के बाद किसी अपने की जरुरत होती है| आज हम दोनों को एक दूसरे की जरुरत थी|

मैंने साफ-सफाई करने वालों को बुलाया और घर का पुन:-निर्माण करने का मन बना लिया|कुछ देर बाद ही साफ-सफाई का काम शुरू हो गया| मैं पूरे घर में,ठीक वैसे हीं घूम रही थी, जैसे पहले घुमा करती थी|फर्क सिर्फ इतना था कि आज नानी-माँ मेरे साथ नहीं थीं...पर उनकी यादें,उनका आशीर्वाद परछाई के साथ मेरे साथ चल रहा था|मेरे 10 वें जन्मदिन पर मैंने और नानी-माँ ने जो आंगन में आंवले और नीम का पेड़ लगाया था वह आज भी खड़ा था| मेरे वहां जाने पर अपनी कुछ पंखुडियां गिराकर उसने अपना प्यार जताया|

मैं| 5 साल की थी, जब माँ और पापा काम के लिए गांव छोड़कर शहर चले गये थे,मुझे नानी-माँ के पास छोड़कर|उनके जाने के बाद नानी-माँ मेरी दुनिया बन गयीं|वे मुझे स्कूल पहुंचाती| लंच में मेरे पसंदीदा पराठे-अचार दिया करतीं| छुट्टी के वक़्त हमदोनों बात करते घर पहुँचते| ठंड के मौसम में वे छत पर अचार और पापड़ सुखाया करतीं| वे मेरे लिए हर साल एक स्वेटर बुना करतीं थीं|मेरा नाप लेते हुए कहतीं,’थोड़ा बड़ा बुन देती हूँ ताकि अगले साल भी पहना जा सके’| ऊन और काँटों से उनकी खास दोस्ती थी|उसके साथ हीं वे कपड़ों पर तरह-तरह के डिजाईन बनाया करतीं थी| स्वेटर तो न जाने कितने तरह के! गांव की औरतें उनसे सीखने आया करती थी, बढ़ाना-घटाना, नए फुल काढना, स्वेटर के नए डिजाईन सबकुछ| शायद वह वही वक़्त था जब मुझे भी सिलाई-बुनाई आदि चीजों से दोस्ती हो गई थी| मैं भी उनके साथ कुछ-कुछ सीख लेती थी| इन्हें सब चीजों के बाद न जाने कबसे मैं उन्हें नानी-माँ कहने लग गई थी|हमारे दिन ऐसे हीं एक-दूसरे के साथ बीत रहे थे|

नानी-माँ के चहरे पर कांति बढ़ रही थी तो वक़्त के निशान भी| एक रोज नानी-माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई| आनन-फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया|वे अंदर मशीनों से जकड़ी हुई थीं|माँ-पापा भी आ वापस गए थे|हमारी कई रातें अस्पताल में हीं गुजरी|मैं बार-बार नानी-माँ के पास जाती और उनके सिर को सहलाते हुए उनके जल्द ठीक होने की कामना करती|

नानी-माँ की तबीयत जब थोड़ी ठीक हुई तो उन्होंने घर वापस ले जाने को कहा|हमने डॉक्टर से सलाह ली और उन्हें वापस घर ले आए पर, अब वे बेहद कमज़ोर हो गयीं थी|उनकी यादाश्त कमज़ोर होने लगी थी|उन्हें सिर्फ मैं याद थी|मैं उनके पास हीं बैठी रहती|वे अपनी कांपती आवाज़ से मुझे कहानी सुनाती|उस वक़्त भी वे मेरे लिए स्वेटर बुन रही थीं|वह हरे रंग वाला स्वेटर|उनके धुंधली यादों में मेरा लिए स्वेटर बुनना शेष था| उस शाम भी वे मेरे लिए स्वेटर बुन रही थीं|जिसका अधिकांश हिस्सा पूरा हो चूका था| पर अचानक उनके हाथ रुक गए और वे खामोश हो गयीं|आँखें ठहर गयीं और वे मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गयीं|उनके पास रखा वह अधुरा स्वेटर, अधुरा हीं रह गया|उसकी एक बांह अधुरी हीं रह गई|नानी-माँ मुझे छोड़कर चली गई? मैं वह स्वेटर लिए घर में दौड़ती और नानी-माँ को ढूंढती,और कहती नानी-माँ ‘आप कहाँ हो?ये स्वेटर अधुरा है इसे पूरा करो|मुझे स्कूल जाना है लंच दो, मेरे साथ स्कूल चलो’|कुछ देर बाद मैं खुद हीं रोने लगती|

मेरी इस हालत को देखकर माँ-पापा मुझे अपने साथ शहर ले आए| वहां भी मैं अपने उस स्वेटर को लिए रहती|माँ मेरे लिए सबकुछ करतीं ताकि मैं ठीक हो जाऊं| पर वक़्त के इस घांव को भरने में न जाने कितने साल लग गये|

धीरे-धीरे मेरी हालत सुधरी पर नानी-माँ की याद मेरे साथ हीं रही| आज भी उनकी आखिरी निशानी वह स्वेटर मेरे पास हीं हैं| मेरे हाथों में,जो मेरे साथ आज फिर गांव आया है| इसकी धागों में नानी-माँ का आशीर्वाद है,उनका साथ है,उनका प्यार है| आज मैं एक क्लॉथ डिजाईनर हूँ,वह भी नानी-माँ का हीं आशीर्वाद है|उन्होंने मुझे जो कुछ भी सिखाया,वह मेरे कपड़ों में झलकता है| अब यह स्वेटर कई जिंदगियाँ बुनेगा| मैं इस घर को नानी-माँ की याद में सिलाई-बुनाई सेंटर बनाउंगी|

वह आखिरी स्वेटर अब कई स्वेटर बुनने वाला था.....  


    

लाडला चौखट माँ

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