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ये कैसा प्यार भाग-५
ये कैसा प्यार भाग-५
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© Vikram Singh Negi 'Kamal'

Drama Fantasy

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(पिछले भाग से आगे...)

[ अगले दिन, राज कॉलेज में अकेला घूम रहा है, मतलब वो पूरे कॉलेज में अकेला नहीं है अभी उसके दोस्तो में से कोई आया नहीं है इसीलिए अकेला है। ]

"( सोचते हुए) यार, ये दोस्त भी कमाल के हैं ? आये नहीं अभी तक, विजय तो जल्दी आ जाता था वो भी अभी तक गायब है, सब के सब कमाल हैं यार, कहाँ रह गये आज।"

( राज सोचते-सोचते आगे देखते हुए पीछे चल रहा है जैसे ही पीछे मुड़ने को होता है पीछे से आ रही एक लड़की से टकरा जाता है और उस लड़की की किताबें गिर जाती हैं। राज हड़बड़ा जाता है, और उसकी किताबें उठाने के लिए बैठता है जिससे दोनों के सिर टकरा जाते हैं, राज सॉरी कहने के लिए उसकी तरफ देखता है )

"सॉ..." ( अरे इसने तो कहा ही नहीं ये तो उसे देखता ही रह गया, बेचारा राज, लगता है गया काम से, इतने में लड़की उसके हाथ से किताबें ले लेती है और...)

"इडियट !"

( कहते हुए चलने लगती है )

( अब राज को होश आता है )

"स...सॉरी, आई एम वेरी सॉरी, म...मैंने जानबूझकर नहीं किया, स...सुनिए...सुनिए...!"

( पर वह राज के शब्द शायद ही सुनती है और चल देती है राज फिर भी कहता है, वो उसके कहे कुछ शब्द सुनता है )

"ब्लडी फूल ! इडियट...हैविंग मैंटेलिटी !"

( वह चली जाती है और कुछ दूर से आते हुए विजय की नजर राज पर पड़ती है )

"विजय, आ गया ( चिल्लाकर ) इधर आ ! ( विजय राज की तरफ आता है ) आ गया रे तू ! बड़ी जल्दी आया, कहाँ था अब तक !! "

"अरे यार, तुझे तो पता ही है साईकिल से आता हूँ, जरा खराब हो गयी थी, ठीक कराने में देर हो गयी, अरे यार तू अभी उस लड़की की तरफ हाथ हिलाकर क्यों चिल्ला रहा था ? पर उसने शायद सुना नहीं, कौन थी वो ?"

"पता नहीं यार, मैं तेरा इन्तजार कर रहा था और इधर देखता हुआ आ रहा था पीछे से वो आ रही होगी उससे टकराया, उसकी किताबें गिर गयी, मैंने सॉरी बोलना चाहा पर उसने पहले ही कह दिया, इडियट ! "

"तूने कहा नहीं कि मैंने जानबूझकर नहीं किया, सॉरी बोल देता।"

"मैं कहने वाला था पर वो तो बस बोल पड़ी, इडियट, फूल !"

"हा हा हा..."

"मुझे वो गलत न समझे यार, मैंने तो समझाने की कोशिश की पर उसने सुना नहीं।"

"तो कोई नहीं, वो सुने न सुने, तेरी गलती थोड़े थी, होता है यार ऐसा अक्सर !"

"प..पर यार ! "

"ओए पर-पर क्या, यूँ चिड़ियों की तरह न कर, चल आज पहला पीरीयड खाली है, चल कैन्टीन में बैठते हैं, संजय, सोनू जो भी आएगा वहीं आ जायेगा, चल...! "

( राज को पकड़ कर ले जाता है, राज उसी तरफ देखते हुए चलता है जिस तरफ वो गयी थी, फिर विजय के साथ चल देता है )

( उनके जाने के बाद वहाँ अंजलि आती है चारों तरफ देखकर...)

"लगता है सोनू आया नहीं अभी, उफ्फ ग्यारह बज गये, निकिता का फॉर्म भी उसी के पास है, कैंटीन में देखती हूँ शायद वहीं हो...! "

( कैन्टीन की और जाती है, वहाँ राज और विजय को देखकर उन्हीं की तरफ जाती है, विजय अंजलि को आते हुए देख लेता है )

"( धीरे से) रा...राज...वो देख अंजलि आ रही है !"

"अंजलि ? कौन अंजलि ? ( उस तरफ देखकर ) ओ अच्छा अंजलि ! आने दे सोनू को ढूँढ़ रही है शायद।"

"चलो अच्छा है अभी संजू भी यहाँ पर नहीं है, नहीं तो पता नहीं वो क्या-क्या ऊटपटांग बातें करता।"

"चुप ! धीरे वो इधर आ गयी है।"

( अंजलि उनके पास आ गयी है )

(क्रमश:)

कहानी प्यार कॉलेज लड़का लड़की दोस्त

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