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त्रिशूल
त्रिशूल
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© Harsh Arora

Drama

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लक्ष्मण: भैया राम ?

राम: बोलो लक्ष्मण।

लक्ष्मण: हमारी वानर सेना लंका पर आक्रमण के लिए तैयार है, आज्ञा दीजिये।

राम: लक्ष्मण, मैं सोच रहा था हमारे सूर्यवंश में यह प्रथा है कि कोई महत्वपूर्ण कार्य करने से पहले हम शिवजी का यज्ञ करते हैं।

लक्ष्मण: हाँ, मैं भी यही सोच रहा था पर समुद्र पार यहाँ लंका में यज्ञ के लिए ब्राह्मण कहाँ से मिलेगा।

राम: ब्राह्मण तो कई होंगे पर केवल एक ही हमारे लिए उचित है।

लक्ष्मण: क्या आप उसी का सोच रहे हैं जिसका मैं सोच रहा हूँ?

राम: हाँ, रावण से श्रेष्ठ और कौन ब्राह्मण हमारी प्रतिष्ठा रख सकता है।

लक्ष्मण: हम रावण से ही युद्ध कर रहे हैं और चाहते हैं की युद्ध की सफलता का यज्ञ भी वह ही करवाए। वाह भैया वाह।

राम: प्रयत्न करने में क्या जाता है, अगर रावण तैयार न हुए तो विभीषण को बुलाएँगे।

लक्ष्मण: तो आपकी क्या आज्ञा है?

राम: मैं चाहता हूँ की हनुमान रावण के पास जायें और उनसे यज्ञ प्रतिष्ठान करने की विनती करें।

लक्ष्मण: मैं अभी हनुमान को बुलाता हूँ। वायु पुत्र। .. जरा यहाँ आइये।

हनुमान: प्रभु क्या आज्ञा है।

राम: वायु पुत्र, हम चाहते हैं कि आप रावण की राज्यसभा में जाएं और उन्हें यज्ञ करने के लिए आमंत्रित करें।

हनुमान: प्रभु, आपकी आज्ञा का पालन मैं अवश्य करूंगा पर मुझे नहीं लगता कि रावण मेरे आग्रह को मानेंगे। आपके विरुद्ध युद्ध की सफलता का यज्ञ भला वो क्यों कराएंगे।

राम: नहीं मानेंगे तो ठीक है पर आपके अनुरोध करने की शक्ति पर हमें आपसे अधिक विश्वास है।

हनुमान: जो आज्ञा प्रभु, मैं अभी चला..

लक्ष्मण: आइये भैया, इतनी देर हम सेना का निरीक्षण करते हैं।

रावण की सभा में...

शूर्पणखा: भैया, राम का दूत हनुमान, आपसे मिलने आया है।

रावण: शूर्पणखा, यह वही हनुमान है जिसने लंका में आग लगाईं थी?

शूर्पणखा: हाँ वही तो है।

रावण: लंका पर चढ़ाई की तैयारी करने वाले राम के किसी दूत से मैं नहीं मिलना चाहता, उसे वापस भेज दो।

शूर्पणखा: हो सकता है राम आपसे संधि करना चाहते हों।

रावण: मैं राम से बिलकुल संधि करने को तैयार नहीं हूँ, मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा, कभी लंका में पैर रखने की हिम्मत नहीं करेगा।

शूर्पणखा: एक दूत न तो शत्रु होता है और न ही मित्र फिर उससे मिलने में आपत्ति क्या है।

रावण: ठीक है, तुम इतना कहती हो तो मिल लेता हूँ।

शूर्पणखा: हनुमान को अंदर भेजा जाए।

हनुमान: महाराज रावण!

रावण: बोलो क्या चाहते हो?

हनुमान: मेरे प्रभु राम युद्ध से पहले एक यज्ञ करना चाहते हैं। उनकी आपसे विनती है की इस यज्ञ की अध्यक्षता आप करैं।

शूर्पणखा: (हँसते हुए) हमारे विरूद्ध युद्ध की सफलता के लिए हमसे यज्ञ करवाना चाहता है। यह क्या मजाक है।

हनुमान: महाराज रावण, आप ब्राह्मण हैं। प्रभु की अपेक्षा है की आप अपने कर्त्तव्य से कभी पीछे नहीं हटेंगे।

शूर्पणखा: कल के छोरे तू लंकाधीश को उनका कर्त्तव्य सिखाने आया है, तेरी ये मजाल।

हनुमान: नहीं महाराज, मैं तो एक योद्धा का दूत एक ब्राह्मण के सामने विनती ले कर आया हूँ। आज्ञा दीजिये मैं क्या सन्देश ले कर जाऊं।

रावण: वापस जाओ और राम से कहदो कि यज्ञ की तैयारी करे, मैं शीघ्र आऊंगा।

हनुमान: जो आज्ञा महाराज।

हनुमान के जाने के बाद।

शूर्पणखा: ये आप क्या कर रहे हैं भईया, राम के यज्ञ की सफलता युद्ध में आपकी हार का कारण हो सकती है।

रावण: भगवान कृष्ण ने गीता में कहा था, अपना कर्त्तव्य करो फल की चिंता न करो। मैं ब्राह्मण पैदा हुआ था, मेरा पहला कर्त्तव्य यज्ञ करवाना है, उसका फल कुछ भी हो।

शूर्पणखा: गीता तो महाभारत में हुई थी आप उसे रामायण में क्यों ला रह हैं।

रावण: गीता, गीता है सूर्पनखा, वह महाभारत में हो या रामायण में।

शूर्पणखा: मैं नहीं चाहती की आपको युद्ध में कुछ हानि हो।

रावण: मैं शिव का भक्त हूँ, और शिव जी हमेशा त्रिशूल लिए रहते हैं। त्रिशूल में तीन शूल यानि कांटे होते हैं, शिव जी ने हर कांटे से एक विश्व पर विजय प्राप्त की थी। पहले कांटे से भौतिक विश्व की, दूसरेसे पूर्वजों के विश्व की, और तीसरे से अपने मन पर विजय प्राप्त की थी। मुझे भी भौतिक यानि युद्ध में विजय के लिए अपने मन को जीतना होगा और मन को जीतने के लिए मुझे पूर्वजों का दिया अपना कर्त्तव्य निभाना होगा।

शूर्पणखा: एक बार फिर सोच लीजिये भैया।

रावण: मैंने बहुत सोच लिया। (त्रिशूल शूर्पणखा को देते हुए) इसे संभल कर रक्खो, मैं अब यज्ञ के कपड़े पहन कर जाता हूँ।

राम के शिविर में सब यज्ञ की तैयारी करते हैं। रावण जोगिया कपड़े पहन कर आता है। राम और लक्ष्मण रावण को प्रणाम करते हैं।

हनुमान: महाराज रावण, हमारे शिविर में आपका स्वागत है।

रावण: यज्ञ की सब तैयारी हो गयी?

हनुमान: आप स्वयं देख लीजिये महाराज।

रावण यज्ञ का मुआयना करता है।

रावण: यज्ञ की तैयारी तो सब ठीक की गयी है, पर यज्ञ में एक घोर कमी है।

राम: क्या कमी है महाराज?

रावण: यज्ञ हमेशा पत्नी के साथ किया जाता है। यहाँ तुम्हारी पत्नी की कमी है।

राम: पर महाराज मेरी पत्नी सीता तो आपके यहाँ बंदी है। हम उन्हें कैसे ला सकते हैं?

रावण: तब तो यज्ञ नहीं हो सकता।

हनुमान: महाराज आपने जब एक बार यज्ञ का उत्तरदायित्व लिया है, तो आपको ही इसका उपाय ढूंढ़ना होगा।

रावण: ठीक है, एक ब्राह्मण होने के नाते मैं कुछ देर के लिए सीता को यहाँ आने की अनुमति दे सकता हूँ। हनुमान, जाओ और सीता को अशोक वाटिका से ले आओ। कोई आपत्ति करे तो कहना मैंने उन्हें बुलाया है।

हनुमान: जो आज्ञा महाराज।

कुछ देर में सीता हनुमान के साथ आती है और राम की ओर हाथ बढ़ा कर आगे बढ़ती हैं।

रावण: रुको सीता, अगर मैंने एक बंदनी को नहीं छुआ तो राम तुम भी सीता को जीतने से पहले छू नहीं सकते।

राम: जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा।

रावण: राम और सीता तुम दोनों यहाँ बैठो। हनुमान और लक्ष्मण तुम दोनों यहाँ बैठो। यज्ञ आरम्भ करने से पहले हम गणेश जी का ध्यान करते हुए उनकी मूर्ति यहाँ रखते हैं।

शूर्पणखा धीरे धीरे पीछे मुँह कर के मंच पर आती है।

रावण: जजमान अपना नाम बोलो।

राम: राम।

रावण: रा का अर्थ प्रकाश और म: का अर्थ मन। राम माने मन का प्रकाश वाह, बहुत अच्छा नाम है। तुम्हारा जन्म स्थान कहाँ है?

राम: अयोध्या महाराज।

रावण: अयोध्या, जहाँ युद्ध न हो। और न ही कोई संघर्ष। और तुम्हारे माता पिता का नाम?

राम: कौशल्या और दशरथ।

रावण: दस रथों का कुशल सवार, तुममे बहुत गुण हैं जजमान तुम्हारा यज्ञ...

तभी शूर्पणखा त्रिशूल लक्ष्मण के गले पर रखती है और कहती है...

शूर्पणखा: लक्ष्मण, तूने एक दिन मेरी नाक काटी थी आज मैं तेरा गला उसी तरह काटूंगी जैसे शिव ने गणेश का गला कटा था।

लक्ष्मण: शूर्पणखा, मैं आपकी भावना समझ सकता हूँ। मेरी यही विनती है कि आपने जो करना है यज्ञ के बाद

रावण: शूर्पणखा, तू मेरा यज्ञ भंग कर रही है, यह तेरे लिए ठीक न होगा।

शूर्पणखा: मैं नहीं चाहती की आपका यज्ञ सफल हो और युद्ध में आपकी हार हो।

रावण: तू जो भी कर, यज्ञ तो आज अवश्य होगा।

शूर्पणखा: वैसे भी, आप गणेश की पूजा से यज्ञ आरम्भ कर रहे हैं। गणेश तो अपनी मां पारवती की रक्षा भी नहीं कर पाए थे। रक्षा करते हुए अपना सिर कटवा बैठे थे।

सीता: (खड़े हो कर ) शूर्पणखा, अरे तुम क्या जानो विश्वास क्या होता है।

शूर्पणखा: सीता तू चुप बैठ, मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है।

सीता: परन्तु मुझे तुमसे शिकायत है। तुम उसी लक्ष्मण को मारना चाहती हो जिस से विवाह करना चाहती थीं। पहली गलती से तुम्हारी नाक कटी थी, इस गलती से जाने क्या होगा।

शूर्पणखा: फल की चिंता किये बिना मैं अपना कर्त्तव्य करती रहूंगी।

सीता: अरे गीता की आड़ में आतंकवाद तुम्हें कहीं का नहीं रक्खेगा शूर्पणखा। यह त्रिशूल जो तुम ले कर आई हो, इसे चौशूल भी कहते हैं, क्योंकि इसका चौथा कांटा तुम्हारी ओर वार करता है। शिवजी दुसरे पर वार करने से पहले अपने अहंकार पर वार करते थे।

शूर्पणखा: मैं चली जाती हूँ पर जाने से पहले कहे देती हूँ तू स्त्री हो कर भी युद्ध का समर्थन कर रही है। तेरा हाल भी वही होगा जो महाभारत मेद्रौपदी का हुआ था। एक दिन तू भी द्रौपदी की तरह आत्महत्या करेगी।

शूर्पणखा कुछ देर चुप रहती है फिर त्रिशूल नीचे फेंक कर मंच से चली जाती है।

रावण: मैं अपनी बहन की तरफ से क्षमा मांगता हूँ आइए अब यज्ञ करें। मेरे साथ बोलो ....ॐ त्र्यं॑बकं यजामहे सु॒गन्धिं॑ पुष्टि॒वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान् मृ॒त्योर् मु॑क्षीय॒ माऽमृता॑त् ।

सीता: महाराज रावण, उठने से पहले क्या मैं आपसे एक प्रश्न कर सकती हूँ?

रावण: अवश्य पूछो ।

सीता: अगर हमारे संघर्षों का समाधान युद्ध के मैदान में होता है तो यज्ञ से क्या हल होता है?

रावण: बहुत उत्तम प्रश्न है सीता। युद्ध के मैदान में हम जीवन देते हैं और जीवन लेते भी हैं । पर यज्ञ में हम अपने अहंकार को समझना चाहते हैं वो अहंकार जिसे हम अपने जीवन का सार मानते हैं।

सीता: राम आपने इस यज्ञ से क्या सीखा?

राम: मैंने तो आज अपने अहंकार को समझा और इस यज्ञ में उसकी आहूति दे दी।

लक्ष्मण: आज के बाद जो मनुश्य अपने अहंकार की आहूति यज्ञ में देगा आगे चल कर वही राम कहलायगा।

सब खड़े हो जाते हैं. और राम और सीता झुककर रावण को प्रणाम करते हैं।

रावण: मैं तुम सबको आशीर्वाद देता हूँ, चलिए सीता. वापस अशोक वाटिका चलें।

रावण और सीता चले जाते हैं।

हनुमान: प्रभु, मेरे मन में एक प्रश्न है, आप कभी भी मुझसे कहते तो मैं सीता मां को आपके पास ले आता। और अभी सीता मां आपके साथ बैठी थी और रावण निहत्ता आया था। आपने उन्हें वापस क्यों जाने दिया? आप सीता मां के साथ युद्ध के बिना आराम से अयोध्या वापस जा सकते थे।

राम: आराम, बहुत उपयुक्त शब्द बोला है तुमने हनुमान - आराम, यानी बिना राम के। आपने जैसा कहा, अगर मैं वैसा करता तो बिना राम के करता। सीता को वापस लेने से अगर समस्या का हल हो जाती तो मैं कब का कर लेता। रावण ने सीता को चुरा कर जो स्त्री का अपमान किया है उसका सबक उसे और बाकी सब को सिखाना आवश्यक है। ब्राह्मण को नहीं, उस ब्राह्मण में जो रावण बसा है उसे मारना चाहते हैं। ये आराम से नहीं, राम के साथ होगा।

लक्ष्मण: और राम ने अपने अहंकार की यज्ञ में आहूति दे दी है, रावण ने नहीं। अब हमारी विजय अवश्य होगी।

राम, लक्ष्मण और हनुमान (साथ में): अब हम रावण पर आक्रमण करने को तैयार हैं।

हनुमान: जय सिया राम।

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