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केवल महिलाएं
केवल महिलाएं
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© Pradeep Soni प्रदीप सोनी

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दिल्ली की भागती दौड़ती जिन्दगी में वो भी एक घिसा पीटा सामान्य दिन ही था. अखिल भारतीय स्तर से आई सवारियों से लदी पड़ी मेट्रो में एक तस्सली बक्श कौना ढूँढना भी भाग्य की बात हो चली है, और हम किस्मत के पिटे सम्राट अपने लैपटॉप बैग को पेट से झाकती मटकी को छिपाते हुए पिछली सवारियों के धक्के खाते मेट्रो के कपाट को भेदते हुए अन्दर आ घुसे।

अगली सवारी को मैं धक्का मार रहा, मुझे मेरे पीछे वाला और उसे उसके पीछे वाला और हम सब ये ही मंत्र का उच्चार कर “ यार धक्का मत मारो भाई ”।

एक स्टेशन आते आते खड़े होने की जगह का जुगाड़ भी हो ही जाता है, वैसे तो आरक्षण प्रथा का मैं चिर विरोधी रहा हूँ मगर मेट्रो में महिलाओं को मिलने वाले स्पेशल डब्बे और हर कोच में मिलने वाली सीटों का तो कट्टर से भी कट्टर विरोधी हूँ ।

सवारियों से ठुसे ट्रेन को देख कर बड़ा नार्मल सा लग रहा था सब अपनी अपनी जिन्दगी में व्यस्त थे. कोई कैंडी क्रश खेल रहा तो कोई क्रश की जुल्फों से, सफ़र बड़ा आरामदायक चल रहा था। सामने वाली सीट पर बैठे ताऊ की तबियत थोड़ी डाउन ही लग रही थी खांसी जुकाम से पीड़ित लग रहे थे. आस पास की सवारी भी अपने फ़ोन में व्यस्त थी कसम से जब से ये फेसबुक चलाना बंद किया है टाइम पास करना भारी हो गया है बस ट्रेन में ।

अगले स्टेशन पर झटके से ट्रेन रुकी और कपाट खुलते ही एक सुंदर सी कन्या मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी कसम से मान के चलो 250 ग्राम मेकअप और परफ्यूम थोप के आई थी लड़की, चलो हमे क्या हम कौन होते है किसी के बारे में कुछ बोलने वाले।

लेकिन वो कन्या जब से आई कुछ असहज सी लगी जैसे की किसी चीज़ के लिए व्याकुल हो, अपन ने कन्या से फासले को बढ़ाते हुए फिर से ताऊ की तबियत पर फोकस किया और सोचने लगा यार ये ताऊ के घर वाले अकेले क्यों आने देते है इन्हे इतनी भीड़ मे।

तभी वो विचलित कन्या बोल उठी “अंकल खड़े हो जाइये ये लेडीज सीट है ....!!!”

उस समय मैं बस 3 चीज़े ही देख पा रहा था

ताऊ की ख़राब तबियत

उस लड़की की बेशर्मी

“केवल महिलाएं" लिखा वो बोर्ड

तब गुस्सा तो बोहोत आ रहा था उस जवान बुढ़िया पर की सुना दूँ कुछ मगर ना जाने क्या चीज़ थी जो बांधे हुए थी। वो ताऊ अपनी छड़ी उठा मेरे बगल में आ खड़े हुए थे और बगल में बैठे नवयुवक ने भी अपनी आँखें बंद कर ली थी की कही सीट देनी ना पड़ जाये।

और मैं देख रहा था उस डंडा पकड़े खड़े ताऊ को, अपने हक़ के लिए लड़ती उस कन्या को और आँखें बंद करने वाले उस नवयुवक को भी

आरक्षण डब्बा सीट

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