दिल का दर्पण

दिल का दर्पण

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दुल्हन के रूप में सजी संवरी ससुराल पहुँची देविका बार बार खुद को दर्पण में देखती। कभी लजाती और कभी खुद ही विचलित हो जाती। जब भी खुद को निहारती, बीस साल पहले जब वह दुल्हन बनी थी वही अक्स उसकी आँखोँ में घूम जाता। हालाँकि वह कोशिश कर रही थी कि बीते हुए कल की परछाईं उसके आज पर नहीं पड़े फिर भी बीता कल भी तो उसी का था कैसे याद नहीं आता ?

बीस साल पहले जब मात्र उन्नीस बरस की थी उसका विवाह नीलेश के साथ बड़ी धूम -धाम से हुआ था। गुड़िया सी लग रही थी। नीलेश तो जैसे पागल से हो गये थे उसके प्रेम में।

दो खूबसूरत से बच्चे भी हुए मगर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। पिछले वर्ष ही कार एक्सीडेंट में पति व बच्चों की मृत्यु हो गयी। उसकी तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी।

मन लगाने के लिए स्कूल में नौकरी कर ली, वहीं पर श्रीधर से मुलाकात हुई जो उससे उम्र में पाँच साल छोटे थे फिर भी देविका की सादगी और व्यवहार इतना भाया कि शादी का प्रस्ताव रख दिया।

श्रीधर के घरवालों ने आपत्ति उठाई मगर उनकी ज़िद के आगे सभी ने घुटने टेक दिए। एक विधवा से विवाह करना आसान नहीं इस समाज में, मगर यदि सोच में खोट न हो और हौसले बुलंद हों तो कुछ भी असंभव नहीं।

"देविका "अचानक कमरे में श्रीधर की आवाज सुनकर देविका चौंक गयी और बीते हुए कल की यादों से बाहर आई।

"जी"

तुम परेशान मत होना मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ। मेरे मन के दर्पण में देखो खुद को बहुत सुन्दर और प्यारी हो तुम। आज मुझसे वादा करो कि बीते हुए काले कल को याद कर तुम खुद को और परेशान नहीं करोगी। देविका की आँखें भर आई। उसने अपनी हथेली श्रीधर के हाथ में रख दी। श्रीधर ने आँखों में आये आँसू उँगली से पोछ लिए।


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