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मेरी कहानी
मेरी कहानी
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© SHIKHAR DWIVEDI

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जब मैंने पलट कर आज उसे देखा, उसकी आँखों की हरकतें ही कुछ और थी, यकायक सब याद आ गया। आसान नहीं रहा था वो वक़्त मेरे लिए काटना। मेरे लिए कोई वजह भी नहीं बची थी उसे याद करने की, पर दर्द से रिश्ता तो अभी तक टूटा भी नहीं था। हर बार खुश होने की कोशिश ना कामयाब होती जा रही थी और जिंदगी के दूसरे पहलुओं में भी कशमकश कम नहीं हो रही थी। मेरे कुछ कर गुज़रने की चाहत पे उसकी चाहत ने कुछ ऐसा असर डाला था जैसे जाम में फंसी गाड़ी धीरे- धीरे आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हो, पर आगे की गाड़ियों के आगे मेरा ज़ोर न चल रहा हो। वैसे देखा जाए तो एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के एकलौते पुत्र से आकांक्षाएं ही बहुत होती है, लड़का इंजीनियर बन जाए, अच्छा कमाए और अच्छे घर में शादी हो जाए। लड़के के ठाठ बाठ से ही तो माँ बाप की समाज में इज़्ज़त और बढ़ जाती है, वजह अब चाहे जो भी हो हर माँ बाप अपनी औलाद से ख़्वाहिश तो रखते ही है। और वाजिब भी है, इतना इंतजार भी जो करना पड़ता है उनको। बचपन से मेरी एक - एक ख़्वाहिश को पूरा किया है मेरी माँ ने और पापा की कमी भी पूरी की। पापा तो हमेशा ही बार्डर पर तैनात रहते और माँ हमारे साथ रोज़मर्रा के काम में संघर्ष करती रहती। आसान नहीं रहा उनके लिए दो बटियों और एक बेटे को पालना वो भी अकेले, पिता का साथ हो के भी नहीं था पर पैसे ज़रूर आ जाते थे हर महीने एक तारीख को।

कोशिश बेटा माँ बाप

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