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टुकड़ों-टुकड़ों में सफर
टुकड़ों-टुकड़ों में सफर
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© Raj Kumar

Drama

10 Minutes   1.4K    13


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“यहाँ से अगली ट्रैन कब की है, जरा देख के बता।”, अपनी शर्ट से चश्मा साफ करते हुए रितेश पूछा।

“पहले से ही देख रखा है।”, रूम से निकलते हुए मैंनें उत्तर दिया। बाहर जाकर मैंने होटल के मालिक को एक बोतल पानी रूम में भिजवाने को कहा और चेक आउट करने की सूचना देकर वापिस आ गया। रितेश और सम्राट दोनों अपने-अपने सामान पैक कर रहे थे। मैंने अपना समान पहले ही बैग में रख लिया था।

“आपने पहले इवेंट में इतनी अच्छी तरह से कविता बोली, वह काबिल-ए-तारीफ़ थी।“, अपनी बैग से शर्ट रितेश को देते हुए सम्राट ने बोला।

“इसकी पोइट्री सब दिन से काबिल -ए-तारीफ़ ही रही है।“, मैंने सम्राट से बोला। तभी अचानक से दरवाजे पर दस्तक की आवाज़ सुनाई दी। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा, होटल का मालिक और उसके साथ में पानी का लिए हुए एक आदमी खड़ा था। दोनों अंदर आये। वह आदमी पानी मेज पर रख कर चला गया।

“कैसा रहा कल का कवि सम्मेलन”, कुर्सी पर बैठते हुए होटल का मालिक बोला।

“बढ़िया रहा”, रितेश ने जवाब देते हुए कहा, “आप चाहे तो योर क्योट का यु टयूब चैनल पर देख सकते हैं।“

“स्मार्टफ़ोन चलाना नहीं आता, पर अगली बार जब भी धनबाद आना हो, तो यही आइयेगा। मैंने आप लोगों को 600 रुपये में ही दो रूम दे दिया, ताकि आप तीनों को सोने में दिक्कत न हो”, उन्होंने मेरी तरफ अपना विजिटिंग कार्ड बढ़ाते हुए बोला।

“आपकी दरिया-दिली ने हमें मोह लिया और आपका होटल वाकई में अच्छा है, बस रूम की छत और दीवार को थोड़ी सी मरम्मत की जरूरत है। पूरी रात बारिश का अनचाहा आनंद उठाना पड़ा।“, मैंने बोला।

“हाँ, आप सही कह रहे हैं। बस यही दोनों रूम में पानी गिरता है। वैसे भी धनबाद में पानी भी तो बहुत होता है।“

“और मौसम भी अच्छा रहता होगा यहाँ।“

“बिल्कुल सही कहा।”

“हम्म, लेकिन आप जल्दी से रूम ठीक करवा लें, रात में रितेश फिसल कर गिर गया था। एक पल के लिए लगा कि हो गया इसका पोइट्री अब।“

“बस, दो दिन बाद ही काम शुरू हो जाएगा। वैसे आप लोगों के लिए ओला बुला दूँ।”

“नहीं, स्टेशन पास में ही है; हम लोग पैदल चले जायेंगे।“, रितेश बीच में बोल पड़ा। हम लोग अपनी-अपनी बैग लेकर निकल पड़े।

“धनबाद टू हजारीबाग रोड”, टिकट पढ़ते हुए सम्राट ने बोला, “ हम लोग पटना जा रहे है या यहाँ।“

“यह पटना के रास्ते में ही पड़ता है। हमारे पास पैसे कम है, इसलिए रास्ते को टुकड़ा करके टिकट लिया है। अगर पकड़े गए, तो बोलेंगे कि हम लोग सो गए थे, कब आगे आ गए पता ही नहीं चला।“, मैंने बोला। प्लेटफॉर्म पर ज्यादा भीड़ नहीं थी। हम तीनों अपने-अपने फ़ोन में लग गए। थोड़ी देर बाद हमारी ट्रेन भी आ गयी। सीट लेने के लिए हम लोग ट्रैन के रुकने से पहले ही चढ़ गए। बैठते ही मैंने अपना मोबाइल फ़ोन निकाला और अपनी फाइल्स में फ़िल्म खोजने लगा। मुझे एक फ़िल्म मिली- ‘करनजीत कौर’। मैंने देखना शुरू किया। यह फ़िल्म सनी लियॉन के जीवनी के बारे में थी। थोड़ी देर देखी, मेरी आँखों पर नींद सवार हो गयी। अपनी गोद में बैग रखकर मैं उस पर टेक लगाकर सो गया। फिर नींद खुली, थोड़ी देर इधर-उधर देखता रहा और फिर से फ़िल्म देखने लगा। फ़िल्म सनी की लाइफ को टुकड़ा- टुकड़ा में बाँटकर नॉन-लीनियर सीक्वेंस में बनाया गया था।

थोड़ी देर देखने के बाद नींद आने लगती थी। इसी तरह रात भर सोना जागना लगा रहा। मैंने टुकड़ों-टुकड़ों वाली फ़िल्म टुकड़ा-टुकड़ा में देखा। सुबह तक पटना पहुँच गए लेकिन फ़िल्म खत्म नहीं हुई।

“अब हमारे पास दो ऑप्शन है, या तो थोड़ी देर बाद जो ट्रैन है उससे चले या फिर 1 बजे वाली ट्रेन से चले”, मैंने फ़ोन देखते हुए बोला।

“ अगर रुक के आराम करेंगे, तो फिर से सफर करने का मन नहीं करेगा।“, सम्राट ने तुरंत ही जवाब दे दिया।

“ नहीं, रुक जाते हैं। हमें आराम की जरूरत भी है।“, रितेश बैग से बोतल निकालते हुए बोला।

“ सम्राट सही बोल रहा है”, मैंने बोला, “आराम एक बार ही घर पर कर लेंगे।“

रितेश भी राजी हो गया। हम लोग पटना स्टेशन से राजेन्द्र नगर तक ऑटो से आये। वहाँ पर हम तीनों सोच रहे थे कि टिकट ले या नहीं, तब तक ट्रेन आ गयी। मैं दौड़कर टिकट काउंटर के पास गया। वहाँ कोई नहीं था। मैंने जल्दी से अपना फ़ोन निकालकर काउंटर की वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली और ट्रेन में उन दोनों के पास पहुँचा जो कि पहले से सीट लेने के लिए घुस गया था।

“ इस बार कहाँ तक का टिकट लिया”, सम्राट ने हँसकर बोला। मैंने उन दोनों को वीडियो दिखा दिया।

“ये क्या है?”, रितेश ने पूछा।

“यही है हमारा टिकट। अगर पकड़े गए, तो बोल देंगे कि टिकट काउंटर पर कोई रहता, तब तो टिकट लेते।“, मैंने उत्तर दिया। ट्रैन के खुलने के थोड़ी ही देर बाद हम तीनों सीट के ऊपर सामान रखने वाले जगह पर जाकर लेट गए। मैंने अपने फ़ोन को पावर बैंक से चार्ज में लगाया और अधूरी फ़िल्म पूरी करने में लग गया। रास्ते में किसी मुखिया के अनुयायियों ने उनकी हत्या होने के कारण प्रदर्शन करने हेतु ट्रैन को रोक दिया। मैं जस का तस लेता रहा। करीब दो घंटे बाद ट्रेन खुली। इतनी देर में मैंने दो-तीन झपकी ले ली थी। फ़िल्म अभी भी पूरी नहीं हुई थी। ट्रैन भी हर छोटे-बड़े स्टेशन पर पंद्रह-बीस मिनट रुक जाती थी। जब हम लोग सिमरिया पहुँचे, तो मेरे कान में औरतों की आवाज़ फ़िल्म की आवाज़ को अतिव्याप्त कर रही थी। नीचे मुड़ा तो देखा कि औरतों की शैलाब गंगा नदी से नहा कर ट्रैन में भड़ गयी है। मैंने फ़ोन के वॉल्यूम हाई कर दिया, तब थोड़ी-थोड़ी बाहर की आवाज़ कम हुई। जैसे ही दो स्टेशन आगे बरौनी पहुँचे, तो मेरे हाथ को किसी ने नीचे से खींचा। गर्दन घुमा के देखा, तो रितेश के होठ हिल रहे थे। मैंने ईरफ़ोन निकाल कर पूछा,”क्या हुआ ?”

“ नीचे उतरो, हमें उतरना पड़ेगा यहाँ, यह ट्रेन कहीं और जा रही है।“, रितेश ने उत्तर दिया।

“कहीं और कैसे जा सकती है, यार ?”

“एक भैया बोल रहे थे कि इस ट्रेन की आधा हिस्सा सहरसा और आधा हिस्सा जय नगर जाती है।“

“भक... वो तम्हारी सीट लेने के लिए बकवास कर रहे हैं।“

“ नहीं रे, सच बोल रहे हैं।“

“रुक।”

मैंने मामा को कॉल करके पूछा, तो उन्होंने बोला,”बरौनी में उतरकर इंजन की तरफ वाले हिस्से में बैठ जाना, आगे वाला हिस्सा ही सहरसा आती है।“ मेरे कॉल कट करने से पहले ही रितेश इमरजेंसी एग्जिट वाले खिड़की से बाहर निकल गया और बोला जल्दी आओ ट्रैन खुलने वाली है। मैं भी जल्दी-जल्दी नीचे उतरा। नीचे सही से खड़े होने की भी जगह नहीं थी। मैं सीट के नीचे रखी हुई चप्पल निकालने के लिए झुका। वहाँ ढेर सारी सामान रखी हुई थीं। मैंने एक-एक करके सारा सामान इधर-उधर करके देख लिया, मेरी एक ही चप्पल मुझे मिली। नीचे बैठी हुई औरतों से मैंने उठने को बोला, तो किसी ने नहीं सुना। एक चप्पल ही पहनकर जब मैं निकलने लगा, तो तेज की आवाज़ सुनाई दी।

“देखे नय छो हो, टांग के दाईब देलके; लगे छे आँख में रोशनी छैबे नै कइले।“, एक औरत चिल्ला कर बोल रही थी।

मैं भी तब रितेश का रास्ता ही अपनाकर खिड़की से निकल गया। सम्राट भी चप्पल खोजने की नाकाम कोशिशों के बाद बाहर आ गया। ट्रैन खुल गयी। मैंने उस एक बची हुई चप्पल को भी ट्रेन को अर्पण कर दिया।

“अब लग रहा है तुम गंगा स्नान करके आ रहा है, शुद्ध भक्त।“, रितेश ने चिढ़ाते हुए बोला। मैं चुप रहा और खाली पैर स्टेशन से बाहर की ओर चलता रहा। हम लोग कीचड़ भड़ी रास्ता से चप्पल की दुकान पर पहुँचे। चप्पल खरीदने और घर तक पहुँचने के लिए हमारे पास अपर्याप्त रुपये थे। दुकानदार से कम दाम वाली चप्पल दिखाने को बोला। उन्होंनें चार चप्पल मेरे साइज की दिखाई।

“ काँटों वाली चप्पल” बड़बड़ाते हुए मैंने एक चप्पल उठाई। मेरी बचपन की यादें ताजा हो गयी, जब दादाजी मुझे सिर्फ काँटों वाली चप्पल ही लाकर देते थे। पैरों में उस चप्पल से होने वाली गुदगुदी का एहसास होने लगा।

“ यह चप्पल कितने की है ?”, मैंने दुकानदार से पूछा।

“ एक सौ पाँच रुपये की है।“, दुकानदार तुरंत ही बोल पड़ा।

“भैया, एक सौ एक तो प्रिंट रेट है इसका और आप...”, रितेश दुकानदार की तरफ देखकर बोला।

“ठीक है, पंचानवे दे दो।“, दुकानदार बोल पड़ा।

“ नब्बे ले लीजिए”, मैंने दुकानवाले को एक सौ का नोट देते हुए बोला। हम लोग वहाँ से निकलकर एक होटल में खाना खाये और स्टेशन की तरफ निकल पड़े।

“ इस ट्रेन के टुकड़े- टुकड़े करने वाला आइडिया जिस आदमी ने दिया, अगर वह मिल जाये, तो उसके दिमाग के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा”, मैंने बोला।

“कल से सब कुछ टुकड़ो-टुकड़ो में हो रहा है। सफर ही टुकड़ों-टुकड़ों में हो रहा है।“, रितेश चलते-चलते बोला। कुछ दूर जाते ही मेरे तलवे की गुदगुदी दर्द में बदल गया, तब मुझे बचपन के वो दर्द भी याद आ गया जो मुझे नया चप्पल लेने पर तीन-चार दिन तक होते रहता था। अब उस चप्पल में एक कदम चल पाना भी मुश्किल था। धीरे-धीरे हम लोग स्टेशन पहुँच गए और सहरसा जाने वाली ट्रेन के बारे में पूछने पर पता चला कि ट्रेन ढाई घण्टे बाद है। इस चप्पल को पहनकर प्लेटफॉर्म तक जाने में ही जान निकल गयी। एक-एक कदम चलने में गुरुजी से खाये हुए दस डंडे की मार का एहसास हो रहा था।

“आ...हा...हा... मखमल”, पालटफॉर्म पर पहुँचकर चप्पल उतारते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा।

“कहाँ है मखमल”, सम्राट ने पूछा।

“ प्लेटफॉर्म”, मैंने उत्तर दिया “ मेरे पैर में प्लेटफॉर्म मखमल जैसा प्रतीत हो रहा है।“

दोनों हँस पड़े। एक घण्टा बाद समस्तीपुर से कटिहार जाने वाली पैसेंजर ट्रेन आयी। मैंने अपने फ़ोन में चेक किया कि सहरसा जाने वाली रूट में यह कहाँ तक जाती है।

“हम लोग इससे मानसी तक जा सकते है”, मैंने अपना बैग उठाते हुए बोला।

“चलो, वही से कोई न कोई ट्रैन मिल जाएगी”, रितेश ने कहा। हम लोग बिना टिकट के ही ट्रेन में बैठ गए। ट्रैन बैलगाड़ी के स्पीड से बरौनी बाईपास तक जाकर दूसरी ट्रेनों को पास देने के लिए रुक गयी।

“मेरी बात मानकर पटना में ही रुक जाते, तो टुकड़ों-टुकड़ों के इस सफ़र से बच जाते।“, रितेश ने बोला।

“अगर रुक जाते तो, हम दोनों तुमको बोलते कि अगर सुबह ही निकल जाते, तो अब तक घर पहुँच चुके होते। आदमी को जो मिलता है, उससे वह कभी भी संतुष्ट नहीं होता है।“, मैंने उससे बोला। रितेश मेरी तरफ देखने लगा।

“वाह...”, थोड़ी देर देखने के बाद रितेश के मुँह से निकला, “तीन किलो का बात बोला।“

“आज हम लोग का सब डिसिशन गलत हो रहा है।“, सम्राट ने धीरे से बोला।

“इसलिए अब हम कोई डिसिशन ही नहीं लेंगे। यह ट्रेन जहाँ तक ले जाएगी वही जाएँगे”, रितेश ने हँसते हुए बोला। किसी ने बोला कि अब राज्यरानी ट्रैन यहाँ से पास करेगी जो कि पटना से सहरसा तक जाती है। बिना देरी किये हुए हम लोग ट्रैन से नीचे उतर गए। “ राज्यरानी यहाँ रुकेगी या नहीं, कहीं उससे पहले यही ट्रैन न खुल जाए” यही सोच कर हम लोग इसी ट्रैन के नीचे गेट के बगल में ही खड़े हो गए ताकि अगर यह ट्रेन पहले खुले, तो जल्दी से इसमें बैठ जाए। इस चप्पल में भागना भी मुश्किल था। इसने तो मेरे सफ़र को कांटों से भर दिया।

राज्यरानी के स्लो होते ही हमने उधर दौड़ लगा दी। उन दोनों के घुसने के बाद जैसे तैसे मैं भी घुस गया। अंदर जाकर थोड़ी राहत की साँस ली हमने। “अब जाकर टुकड़ों-टुकड़ों के वजाय सीधे सहरसा पहुँच जाएंगे”। सारी सीट्स पहले से फुल थी; हम लोगों को खड़ा होने की ही जगह मिली। करीब पाँच मिनट चलने के बाद ट्रैन पर गिटी का प्रहार होना शुरू हो गया। सब लोग घबरा गए। नीचे से गिटी ऊपर की तरफ उड़-उड़ कर लग रही थी। नीचे से खट-खट की आवाज़ आ रही थी। मुझे तो फाइनल डेस्टिनेशन के अलग-अलग सीन्स याद आने लगे; कैसे-कैसे लोग मरते थे।

रितेश ने एक बैग लेकर मेरे सिर के पीछे रखकर पकड़ लिया और उन दोनों ने भी अपना-अपना सिर बैग से छिपा लिया ताकि गिटी सिर पर ना लगे।

“ट्रैक पर गिटी जमा कर दिया होगा कोई इसलिए ऐसा हो रहा है।“, बगल में बैठे हुए एक बुजुर्ग ने बोला।

“लगा कि रितेश का पहला इवेंट, आखिरी हो जाएगा”, सम्राट ने खट-खट शांत होते ही बोला।

“मुझे भी यही लगा था”, रितेश बिना देरी किए बोल पड़ा।

“मैं तो कुछ और ही इमेजिन कर रहा था”, अंत में मैंने भी बोल दिया। हम तीनो एक साथ हँस पड़े। हम लोग टुकड़ों-टुकड़ों में सफर करते हुए आठ बजे रात तक सहरसा पहुँच गए। पर मेरा काँटों से भरा स्टेशन से घर तक का सफ़र अभी भी बाकी था।

ट्रैन सफर चप्पल

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