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एक भूत की असली कहानी
एक भूत की असली कहानी
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© Subhash Chander

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गाँव पहुंचकर हीरालाल वल्द किशनलाल पर ये राज़ खुला कि वह आदमी नहीं है, भूत है। उसे मरे हुए तो तीन साल गुज़र गए हैं।

पाठकों, आप लोग उलझ रहे होंगे। सो आपके इस उलझाव को दूर करने के लिए मुझे फ्लैषबैक का सुलझाव प्लांट करना पड़ेगा। सो लीजिए सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला। सुनिए एक चौबीस कैरेट सच्ची कहानी। एक भूत की असली कहानी।
यही कोई सात-आठ बरस पहले की बात होगी। हीरालाल पुत्र किशनलाल बिसौली इंटर कालेज में पढ़ने जाता था। वहीं उसकी कुमारी चंपा देवी से आँख मटक्का हुआ। हीरा जाति के यादव थे और चंपा थी राजपूत कन्या। ब्याह-शादी मुमकिन थी ना। सो हीरा बाप के कुर्ते से सात सौ रुपये और पड़ोस के गाँव से कुमारी चंपा को लेकर फरार हो गया। फिर वह पूरे तीन साल तक फरार ही रहा। वह गाँव तब ही लौटा, जब उसके साथ दो चिंगू-मिंगू थे।
जैसी कि परंपरा होती है कि प्रेम-विवाहों के बाद घरवाले कुछ दिन नाराज़ रहते हैं। पर जैेसे ही चिंगू-मिंगू पैदा होते हैं, उनका गुस्सा कम हो जाता है। प्रेमी जोड़े को माफ कर दिया जात है। पूरे देश में कमोबेश यही रिवाज़ चलता है। पर हीरा के मामले में ऐसा नहीं हुआ। इन तीन सालों में उसके अम्मा-बाबा तो ऊपर वाले की सेवा में जा चुके थे। बचे थे दोनों भाई माणिक और पन्ना। उन्होंने उसे लड़की भगाने के जुर्म में कभी माफ नहीं किया। उन्होनें उसे घर में ही नहीं घुसने दिया। गाँववालों ने भी उसे ज़्यादा तवज्जो नहीं दी। सो हीरा, चंपा देवी और चिंगू-मिंगू के साथ उल्टे पांव शहर को लौट लिया और भाइयों को गलियाते हुये अपनी फैक्ट्री की नौकरी बजाने लगा।
उन दिनों फैक्ट्री में यूनियन और मैंनेजमेंट का लफड़ा चल रहा था। एक दिन मालिक ने फैक्ट्री बंद करने की घोषणा कर दी। खूब हाय-हाय, इंकलाब ज़िन्दाबाद हुई, पर नतीजा सिर्फ मजदूरों की बेरोज़गारी निकला। वैसे भी गाँव में उसके हिस्से बारह बीघे जमीन आती थी। उसमें खेती करके वो अपना और अपने बच्चों के पेट भी भर सकता था और दोनों बड़े भाइयों की छाती पर मूंग दलने का काम भी संपन्न कर सकता था।
बड़े अरमानों के साथ वो अपने गाँव पहुंचा, पर जल्दी ही उसके अरमां आंसुओं में ढल गए। पहले माणिक ने पहचानने से इंकार कर दिया, फिर पन्ना ने तो ज़लील करके घर से ही भगा दिया। दोनों भाभियों ने भी जली-कटी सुनाई। हीरा परेशान हो गया। वह माणिक के घर के दरवाज़े पर ही जम गया। वहीं अपना खूटा गाड़ दिया और बोला, ‘‘मुझे अपने हिस्से की ज़मीन और घर चाहिए। अपना हिस्सा लिए बगैर में यहाँ से हिलूंगा भी नहीं।’’
इतना सुनना था कि दोनों भाई बिगड़ गए। माणिक बोला, ‘‘काहे की ज़मीन रे। बापू मरते समय जमीन हम दोनों भाइयों के नाम कर गए। उन्होंने तो तुझे मरा हुआ मान लिया था। जा भाग यहाँ से। यहाँ तेरी कोई ज़मीन नहीं है।’’
हीरा पहले गिड़गिड़ाया, फिर भुनभुनाया और उसके बाद सूखी पुआल की आग सा भभक उठा। गुस्साय के बोला,‘‘भैया, जे बात सही ना है। हमें पता है, हमारे बापू हमारे साथ ऐसा अन्याय कतई ना कर सकते। हमें लगै, तुम झूठ बोल रहे हो।’’
उसका इतना कहना था कि पन्ना पिनपिनाय के बोले,‘‘ दारी कै... बड़के भैया पे झूठ बोलने का इलज़ाम लगा रहो है। तुझे तो नरक में भी जगह ना मिलेगी।’’ फिर ताल ठोक के बोले, ‘‘सुन ले, पिताजी की नज़र में ही ना, सरकार की नज़र में भी मर गयौ। मुर्दों के नाम जमीन ना होती है। सो सरकार ने ज़मीन हमारे नाम कर दई है।’’
अब के माणिक बोले, ‘‘सुन ले छोरे... हमने कही है ना कि तू मर गयौ.... तो समझ ले तू मर गयौ। अब तू कहीं चला जा, पर अब ज़िदा ना होने को है .... समझी...।’’
हीरा ने अपनी परछाईं देखी। परछाई थी। अपने पैर देखे- सीधे थे। इसका मतलब अभी वह भूत नहीं बना था। भैया लोग जबरदस्ती उसे भूत बनाने को तुले थे।
वह बिगड़ गया। उसने चिल्ला-चिल्ला कर कहा, ‘‘देखो हम ज़िदा हैं। हम बोल रहे हैं, चल रहे हैं। ज़िदा न होते तो का चलते-फिरते।’’ फिर बीड़ी निकालकर सुुलगाई, भीड़ को दिखाई। बोला, ‘‘देखो, भूत कहीं बीड़ी पी सके है। वो तो आग से डरकै भागै है।’’ फिर चुन्नी दद्दा से बोला, ‘‘दद्दा, तुम ही न्याय करो। हम ज़िदा हैं कि ना?’’
चुन्नी दद्दा क्या बोलते। जब उसके सगे भाई उसे ज़िदा मानने को तैयार ना हैं तो वो कौन...? खामख्वाह...वो ज़िदा होने का प्रमाण-पत्र कैसे दे देते? सो उन्होनें बात का तोड़ यह कहकर दिया, ‘‘लल्ला, जे बात हम ना जाने। मानिक कह रये हैं कि तुम मर गए तो समझो मर गए। बड़ा भाई तो राम समान होवै है। वो भला झूठ क्यों बोलेगा। और भैया-जे तुम्हारे घर का मामला है। हम तुम्हारे फटे में टांग क्यों अड़ावैं। अच्छा चले हैं.... भैंसन का दूध काढ़नौ है।’’ कहकर चुन्नू दद्दा चल दिए। उनके पीछे-पीछे बाकी की भीड़ भी चल दी। रह गया तो अकेला हीरालाल। बहुत देर रोया-झींका। पर कुछ बात ना बनी। थोड़ी देर में दोनों भैया लट्ठ निकाल लाए। यूं तो हीरा देह से अच्छा-भला मजबूत था। पर निहत्था भी था और उसे भाइयों से मार-पीट करना अच्छा नहीं लग रहा था। तीसरा उसे खुद पर ही शक होने लगा था कि कहीं वह सचमुच में ही तो मरके भूत नहीं बन गया। सो वह वहाँ से हट गया। थोड़ी देर टसुए बहाने के बाद पीपल के पेड़ के नीचे आ बैठा। बदन पर ठंडी हवा लगी। दिमाग में भी हवा के कुछ झोंके गए। दिमाग का रोशनदान खुल गया। उसके खुलते ही हीरा ने सोचा। सब झूठ बोल लेंगे, पर पंचों में तो परमेश्वर का वास होता है। वो ज़रूर न्याय की बात करेगे। ये सोचकर वह चौपाल पर पहुँचा।
चौपाल में सरपंच जी न्याय के हुक्के में, ईमान का तंबाकू डालकर गड़प-गड़प कर रहे थे। हीरा ने पांयलागी की। सरपंच जी ने मुँह फेर लिया। हीरा समझ गया, न्याय के देवता कन्या भगाई की घटना से अब तक नाराज़ हैं। देवता चरण वंदना से प्रसन्न होते हैं, उसने दसवीं की हिंदी की किताब में पढ़ा था। सो उसने सरपंच जी के पैर पकड़ लिए। सरपंच जी भिनभिनाए, ‘‘का बात है रे... को है, हमारे पांव काहे पकड़ रहा है?’’
हीरा सकपकाया। भिनभिनाकर बोला, ‘‘सरपंच जी... मैं... मैं हीरा... किशन का छोरा... पहचाने ना का?’’
सरपंच जी मुँह टेढ़ा कर के मुसकराए।
किशन का छोरा तो उसी दिन मर गया था जिस दिन वो बलेसर की छोकरी कू भगाए कै ले गया था।’’ सरपंच जी हुक्का गुड़गुड़ाते हुए उवाचे।
हीरा रो पड़ा। रोते-रोते भी बात उगलना ना भूला, ‘‘हुजूर हमें पता है, आप हमसे छोकरी भगावे कू लेके भौत नाराज हैं। पर अब तो हम बाल-बच्चेदार हो गए। हमें अब छमा कर दो। सरपंच जी हम तो आप की काली गाय हैं, आपकी पिरजा हैं। हमारी खता माफ कर दौ।’’
सरपंच जी ने मुंह टेढ़ा ही रखा, पर जुबान खोल दी, ‘‘लल्ला, खता माफ करने लायक ना है। समझे। हमारे लिए, पूरे गाँव के लिए, तो तुम मर गए और भूतों से हम बात नहीं करते।’’ जुबान बंद हुई, हुक्के की गड़प-गड़प शुरू हो गई।
हीरा समझ गया, अब आंसुओं की नुमाईश करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। सो उसने झटपट आंखों में आंसुओं की फसल उगाई और गिड़गिड़ाकर बोला, ‘महाराज हमारी गलती पै हमें गिन के दस जूते मार लो। पर हमें हमारी ज़मीन दिला दो। हमारे दोनों भइया ज़मीन कब्जाए बैठे हैं। कहवैं हैं कि हम मर गए। पर देखियौ, हम तो आपके सामने जिंदे बैठे हैं। देखो-देखो छू कर देख लो।’’ कहकर वह खुद को छुआने के लिए आगे बढ़ा।
संरपंच जी बिदक लिए, ‘‘हट्ट...हट्ट.. हम मरे हुए आदमी को नांही छुवेंगे...हट्ट।’’
अबकी बार हीरा बुक्का फाड़कर रो पड़ा। रोते-रोते बोला, ‘‘मालिक न्याय करौ। माना आप हमसे नाराज़ हैं, हम मानै हैं, हमने गांव की इज्जत डुबोई। आपका नाम बदनाम किया। पर क्या जे नियाव है कि हमारे भैया, हमरी ज़मीन कब्जा लें, हमें मरा घोसित करा दें और आप कुछ भी ना करैं। आखिर आप गाँव के मुखिया हैं। आप कुछ तो कहो। बताओ हम मरे हैं कि जिंदा हैं?’’
सरपंच जी ने इस बार कुछ कहा। मुँह सीधा करके बोले, ‘‘देखो लल्ला, गाँव के लिए तुम सात बरस पहले मर गए और घरवालों के लिए तीन बरस पहले। जब गाँव के लिए मर गए, अपने घरवालों के लिए मर गए तो जिंदा कैसे हो सके हो?’’
उसके बाद हुक्के का एक गड़प मारके बोले, ‘‘...देखो, जे तुम्हारे घर की बात है। जब तुम्हारे घरवाले ही तुम्हें मुर्दा मान रहे हैं तो हमारी क्या हैसियत जो तुम्हें जिंदा मान लें। हां... अगर तुम्हारे भैया लोग तुम्हें जिंदा मान लेंगे तो हम भी तुम्हें जिंदा होने का परमाण-पत्र दे देंगे। अब तुम जाओ यहाँ से।’’
सरपंच जी की इस न्याय की बात और उसक बाद के आदेश के बाद भी हीरा नहीं हिला। सरपंच जी ने लठैत को हुक्म दिया, ‘‘भूत को लाठी की मार दिखाओ। मार के आगे भूत भी भगते हैं।’’
ऐसा ही हुआ जैसे ही लठैत ने लाठी उठाई, हीरा भाग लिया। कहावत भी तो सच सिद्ध करनी थी।
न्याय की दुकान से भागते-भीगते हीरा की साँस फूल गई। उसने हैंडपंप चलाकर ओक से पानी पिया। पानी से प्यास बुझाई और दिमाग को हिलाया। दिमाग में एक रोशनी कौंधी। उस रोशनाई में उसे लेखपाल यानी पटवारी का चेहरा नज़र आया। बस दिमाग की कलियां खिल गईं। कदम चल पड़े। कहना ना होगा कि उनकी मंज़िल पड़ोसी गाँव में पटवारी का घर था।
पटवारी के घर तक पहुंचते-पहुंचते हीरा की हालत टाइट हो चुकी थी। शरीर में थकान, पर मन में उमंग थी। ‘भाई धोखा कर सके हैं, गाँववाले भी साथ ना देवैं, पर कागज तो झूठ ना बोलेगा। कागज तो पटवारी के पास होगा ही।’
यही सोचते हुए हीरा ने पटवारी के घर की कुंडी खटखटाई। साक्षात पटवारी बाहर निकले। हीरा ने पटवारी जी से राम-राम की, अपना परिचय दिया। बताया, ‘‘हम हीरा हैं। बिसौली गांव के मरहूम किशन लाल के छोटे बेटे।’’
पटवारी ने इशारे से रोक दिया, बोले, ‘‘बताने की ज़रूरत नहीं है। हम तुम्हें पहचानते हैं। तुम पन्ना और माणिक के छोटे भाई हो। सात-आठ साल पहले घर छोड़कर चले गऐ थे। बताओ, कैसे आना हुआ?’’
हीरा की बांछे खिल गईं। खिली बाछों ने इशारे में कहा, ‘ले बेट्टे! हो गया काम, अब तो ज़मीन मिल गई।’’ हीरा ने खुशी के इज़हार के रूप में गुटखे से पीले दांत चमकाए और बोला, ‘‘पटवारी जी, अब तो मैं आपकी ही सरन में हूं। मेरे भाईयों ने मिस्कौट करके मेरी जमीन दबा ली है। कहते हें कि मैं मर गया हूं।’’
‘‘भईया, कह तो वे सही रहे हैं। तुम सच्ची में मर चुके हो।’’ पटवारी ने गंभीरता से कहा।
हीरा का दिमाग भन्ना गया। चिढ़कर बोला, ‘‘क्या कहते हैं पटवारी जी, हम आपके सामने जिंदा खड़े हैं और आप कह रहे हैं कि हम मर चुके हैं। मुझे लगे है कि आप भी हमारे भाईयों से मिल चुके हैं। आपको भी भगवान के घर जवाब देना है। न्याय की बात करो, पटवारी जी।’’ हीरा ने भिनभिनाकर कहा।
‘‘भईया हीरा, हम न्याय की बात ही कर रहे हैं। तुम सचमुच मर चुके हो। हमारे रिकार्ड के हिसाब से तुम तीन साल पहले ही मर चुके हो। हमारे रिकार्ड में मृतक के रूप में ही तुम्हारा नाम दर्ज है।’’ पटवारी ने झोले में रखे कागज़ खंगालते हुए कहा।
‘‘मतलब?’’ हीरा सन्नाय गया।
‘‘मतलब ये भईया कि हमारे रिकार्ड में तुम्हारे तीन साल दो महीने पहले मरने का सर्टिफिकेट लगा है। अब आदमी तो झूठ बोल सके है, पर सरकारी कागज़ तो झूठ ना बोले। बस इसी कागज़ के बल पर चकबंदी में तुम्हारी ज़मीन तुम्हारे भाईयों के नाम हो गई। ये देखो, उनका हलफनामा। अब हम क्या करते, तुम्हारे बाल-बच्चे होते तो ज़मीन उनके नाम होती। अब तुम्हारे बाल-बच्चों का तो रिकार्ड था ना, सो ज़मीन माणिक और पन्ना के नाम चढ़ गई। विश्वास न हो तो देख लो ये कागज़।’’ कहकर पटवारी ने कागज़ हीरा के सामने लहरा दिया।
हीरा ने कागज़ पढ़ा। सच में ही उसके नाम के आगे मृतक लिखा था। कागज़ के हिसाब से वह तीन साल दो महीने पहले ही मर चुका था।
हीरा चक्कर खा कर गिरा। गिरते-गिरते उसने देखा कि उसके पैर सचमुच भूतों की तरह पीछे को थे। इसके बाद बेहोश ही होना था, जो वह हो गया।
पटवारी ने पानी के छींटे डालकर उसकी बेहोशी दूर की और फिर उसके कान में फुसफुसाए, ‘‘भइया हीरा, हमारी फीस दो तो हम तुम्हें ज़िन्दा होने का रास्ता बता देंगे। बोलो दोगे फीस?’’
हीरा के दिमाग में हवा के साथ बुद्धि प्रविष्ट हुई। उसने जेब में हाथ डाला। सौ-सौ के दो नोट निकाले और पटवारी जी के हाथ में रख दिए। पटवारी जी ने फिर दो बातें बताईं।
पटवारी जी बोले, ‘‘भइया, हमारी सुनो, एक तो अपने जिंदा होने का केस फाईल कर दो। उसमें चार सौ बीसी का मुकदमा लगा दो। हो सके है, तुम कोर्ट में से जिंदा साबित हो जाओ। कोर्ट ने तुम्हें ज़िन्दा मान लिया तो तुम्हारी ज़मीन वापस मिल सकेगी।’’ कहकर उन्होंने बीड़ी सुलगाई और धूआं फेकते हुए शून्य में निहारने लगे।
हीरा दूसरी बात के बाहर आने का इंतज़ार करने लगा। पटवारी जी ने बीड़ी खत्म होने तक बात पैंडिंग रखी। फिर बोले, ‘‘भइया, दूसरी बात ये है कि जाके बिरमा यादव से मिल लो। वो ही तुम्हें इस भवसागर से पार उतार सकता है।’’ फिर हीरा को सोचते देखकर बोले, ‘‘सुनो हीरा, हम जानते हैं कि बिरमा से तुम्हारे घरवालों की पक्की दुश्मनी है। अब तुम तो गांव में रहते नहीं, सो वो दुश्मनी तुम्हारे भाईयों से निभा रहा है। अभी सालभर पहले ही फौजदारी हुई है। पन्ना का तो समझ लो, वो जानी दुश्मन है। वो पन्ना को सबक सिखाने में तुम्हारा साथ देगा, मान लो।’’
‘‘पर...।’’ हीरा मिनमिनाया।
‘‘पर...वर को डालौ चूल्हे में। याद रखो, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होवै है। फिर हम जानै हैं कि बिरमा से ज़्यादा हरामी इलाके भर में कोई ना है। तुम्हारे लट्ठों का और उसका शातिर दिमाग दोनों मिल गए तो कुछ-ना-कुछ नौटंकी तो होगी ही।’’
बात कुछ-कुछ हीरा की समझ में आई। उसने ठान ली कि लौटते में आज वो बिरमा के चौबारे पे जाएगा और उससे मदद की भीख मांगेगा। पर उससे पहले उसकी इच्छा थाने में जाकर भाईयों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने की थी। यह बात उसने पटवारी जी से शेयर भी कर डाली।
पटवारी हँसे और बोले, ‘‘भइया, जहाँ तक हम तुम्हारे भाईयों को जाने हैं, उनके पिछवाड़े में सूअर का बाल है। वे तुमसे पहले थाने पहुँच चुके होंगे। वैसे भी तुम्हारा मृत्यु प्रमाण-पत्र उनके पास है। फिर भी अपने मन-की-मन में मत रखो। कोशिश करके देख लो।’’
हीरा पटवारी से राम-राम करके चला आया। अगली मंज़िल थाना थी।
थाने में वही हुआ, जो पटवारी ने कहा था। खूब चिल्ल-पौं मची।
हीरा बोला, ‘‘थानेदार जी, बहुत परेसान हूं। मेरे भाईयों ने मेरी ज़मीन दबा ली है। उनके खिलफ रिपोर्ट लिख लो।’’
थानेदार हँसा। हँसकर बोला, ‘‘थाने में सिर्फ जीवित लोगों की रिपोर्ट लिखने का कायदा है। भूतों की रिपोर्ट लिखे जाने के आॅर्डर अब तक नहीं आए हैं।’’
हीरा भभकर बोला, ‘‘में आपके सामने ज़िन्दा खड़ा हूं ज़िन्दा हूं, भूत नहीं।’’
थानेदार बोला, ‘‘हमारा रिकार्ड कहता है कि तू मर चुका है। सरकारी रिकार्ड झूठ नहीं बोलता।’’
हीरा इस बार गिड़गिड़ाकर बोला, ‘‘हुजूर... मै। सच्ची-मुच्ची का आदमी ही हूं, मेरा विश्वास करो।’’
थानेदार फिर हँसा, ‘‘पगला कहीं का, हम तेरा विश्वास क्यों करें। हम तेरा विश्वास क्यूं करें। हम सरकारी नौकर तेरा विश्वास करेंगे कि सरकारी कागज़ का। देख तेरे भाई लोग आज दोपहर में ही तेरा मृत्यु प्रमाण-पत्र थाने में जमा करके गए हैं। ज़्यादा तीया-पांचा करेगा तो चार डंडे लगाकर पिछवाड़ा सुजा दूंगा। भाग यहाँ से...साला मरने के बाद भी रिपोर्ट लिखाने आ गया।’’
कहकर थानेदार हँसा।
हीरा लौट आया।

अब अगली मंज़िल बिरमा यादव का घर था।
उस रात हीरा बिरमा यादव के घर रुका। बिरमा ने उसकी जमकर खातिरदारी की। सारी रात उसकी मिस्कौट हुई। इसका असर अगली सुबह ही देखने को मिल गया।
हीरा का बड़का भइया माणिक हाथ में लोटा लेकर दिशा-मैदान को जंगल में जा रहा था। सामने से लट्ठ लिए आ गया हीरा। पहले भईया ‘राम-राम’ कही। फिर बिना आशीर्वाद का इंतज़ार किए, घुमाय दिया लट्ठ। फिर क्या था-दे दना...दे दन। लट्ठ की आवाज़ और माणिक की चीखों के बीच कम्पटीशन हो गया। कम्पटीशन तभी खत्म हुआ, जब माणिक की दांये हाथ की हड्डी के चट-चट करके टूटने की आवाज़ आई। हीरा ने पिटाई बंद की और नीचे पड़े, चीखते-कराहते भाई को विदाई की राम-राम कहकर आगे चल दिया।
अब अगली मंज़िल मंझले भईया पन्ना का घर था। पन्ना उस समय भैंस का दूध काढ़ रहे थे। बाल्टी लगाए भैंस के नीचे बैठे थे। हीरा पहुँच गया। पहले मंझले भैया को राम-राम की। फिर लट्ठ उठा लिया और फिर तो धर लिया भईया को। सिर, हाथ, पांव, कमर... सबकी सेवा की। पन्ना चीखे, चिल्लाए, ‘कमीने छोटा होके बड़े भाई पे हाथ उठावै है। तुझे ना छोड़ूंगा। जेल कराऊंगा। सालों चक्की पीसैगा...हाय। उनकी चीख सुनकर मंझली भाभी दौड़ी आईं।
हीरा ने भाभी को भी राम-राम की, फिर लट्ठ ने राम-राम की। मंझली भाभी लट्ठ लगते ही अंदर भागीं। उनके पतिदेव ने बाहर से और उन्होंने घर के अंदर से गालियों की बौछार शुरू कर दी। पर हीरा निर्विकार भाव से भईया की सुताई करता रहा। कुछ देर में गाँव में हल्ला हो गया। हीरा ने मौके की नज़ाकत समझ ली और चीखते-चिल्लाते भईया को छोड़कर बाहर भागा। हाँ, जाते-जाते भी भईया को राम-राम करना ना भूला। आखिर गाँव की मरजादा तो रखनी थी ना!
हीरा के लट्ठ ने माणिक और पन्ना की जमकर सेवा की थी। उसकी कृपा से माणिक के हाथ की हड्डी और पन्ना का सिर फट चुका था। पन्ना-बहू की सिर्फ पैर की हड्डी टूटी थी। पहले राउंड में उन्होंने अपनी चोटों का इलाज कराया, प्लास्टर चढ़वाया। उसके बाद वे बैलगाड़ी में लदकर रोते-कराहते पहुँचे थाने।
वहाँ जाकर थानेदार को रो-रोकर हीरा की करतूत बताई। अपने ज़ख्म, अपने प्लास्टर दिखाए। हीरा के खिलाफ ‘हत्या करने की कोशिश’ यानी दफा 307 में रिपोर्ट लिखाने की बात कही।
थानेदार हँसा। बोला, ‘‘पागल हुए हो क्या? मृतक के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने का कोई प्रावधान नहीं है। मरा हुआ आदमी किसी को कैसे घायल कर सकता है?’’
माणिक-पन्ना ने बहुतेरी आंय-बांय की, कसम-धरम खाई, पर थानेदार नहीं माना। बिगड़कर बोला, ‘‘सालो, झूठी रिपोर्ट लिखाने आए हो। तुमने ही तो कहा था, हीरा मर चुका है। वो तुम्हें कैसे मार सकता है? तुमने ही दिया था ना हीरा का मृत्यु प्रमाण-पत्र। अब वो सरकारी कागज़ो में मर चुका है तो हम उसे जिंदा कैसे कर सकते हैं? भागो यहां से, झूठी रिपोर्ट लिखवाते हो।’’
पन्ना गिड़गिड़ाकर बोला, ‘‘माई-बाप, रहम करो। हम सच्ची कह रहे हैं। हमें हीरा ने ही मारा है राम जी की सौं...। बताओ, बताओ, हम झूठ बोल सके हैं, पर हमारे ये ज़ख्म, ये हमारा प्लास्टर, ये तो झूठ ना बोलें। बताओ, उसने हमें ना मारा तो हमारे चोट कैसे लग गई?’’
थानेदार का माथा सोचने की मुद्रा में सिकुड़ा। वह सोचकर बोला, ‘‘हम्म...... चोट तो तुम्हें लगी है। हीरा तो मर चुका है, वो तो तुम्हें मार नहीं सकता। मुझे लगता है, तुम लोगों ने एक-दूसरे पर हमला किया है, तभी ये चोट लगी है। फिर हवलदार को आवाज़ देकर बोला, ‘‘अबे ओ बदरी... गिरफ्तार करो बे इन सालों को। आपस में फौजदारी की रिपोर्ट लिखो। साथ में झूठी रिपोर्ट लिखाने की कोशिश की धारा भी लगाओ।’’
अब इतना सुनना था कि माणिक और पन्ना दोनों के रंग उड़ गए। उन्होने माफी मांगी, पर पुलिस को तो अपना काम करना ही था। सो उसने अपना काम किया। सो दोनों के हिस्से में चार-चार झापड़, दर्जन-दर्जन भर गालियां और पांच-पांच हजार का दंड आया। इसके बाद वह रोते-कांखते हीरा के बदन में दो-दो मीटर के कीड़े पड़ने की दुआ मांगते हुए बाहर आए।
रात के लगभग बारह बजे होंगे। पन्ना औसारे में खाट डालकर लेटे थे। सोना कहना तो गलत होगा। कमर का दर्द हीरा को गलियाने की सहूलियत तो दे रहा था, पर सोने की इज़ाजत नहीं दे रहा था। ऐसे में भूत से हीरा प्रकट हुए। एक हाथ में वही तेल पिला लट्ठ, दूसरे में गंडासा।
पन्ना की तो अपनेआप वायु निकल गई। घबराकर बिस्तर गीला करने वाले थे कि हीरा ने आते ही पैर छुए। राम-राम की। पन्ना का लगा कि पड़ा अब लट्ठ। सुबह की याद ताज़ा हो आई। हीरा बोला, ‘‘दद्दा, डरो मत। हम मारने ना आए। हम तो समझाने आए हैं। हमारी ज़मीन वापस दे दो।’’
पन्ना पिनपिनाए, ‘‘ना हम ज़मीन वापस ना देंगे। रिकार्ड में तुम मर चुके हो तो ज़मीन किसके नाम करेंगे। मुर्दों के नाम कहीं ज़मीन होवै है?’’
हीरा बोला, ‘‘हां दद्दा, ठीक कहते हो। मुर्दों के नाम ज़मीन ना हो सकती। पर जे बताओ, अगर मुर्दा किसी कू जान से मार देवै तो उसे सजा हो सके कि ना?’’
पन्ना सोच में पड़ गए। थानेदार की बात भी याद आ गई।
हीरा बोला, ‘‘अब सुनो। अबही तो हम जा रहे हैं। पर परसों तक हमरी ज़मीन हमें ना मिली तो समझ लौ। हम तुम्हारे और माणिक भईया के पूरे खानदान कू खतम कर देंगे, कहे देते हैं।’’
पन्ना पिनपिना के बोले, ‘‘अंधेरगर्दी है का। पुलिस-थाना कुछ ना है का? फांसी हो जाएगी, समझे?’’
हीरा हंसा। बोला, ‘‘दद्दा, मुर्दों को फांसी होते सुनी है? हम तो भूत हैं, किसी को भी मार सके हैं। याद है ना थानेदार ने क्या कही कि मुर्दों के खिलाफ रपट ना लिखी जा सकती।’’
हीरा बोला, ‘‘दद्दा... और सोच लीजौ। परसों तक का टैम दे रहे हैं। दसके बाद ....फिर..जे गंडासा और.....।
बात हीरा ने अधूरी छोड़ दी। लट्ठ कंधे पर रखकर चल दिए, पर भइया को राम-राम करनी फिर भी ना भूले।
तीसरे दिन क्या हुआ? इसमें लिखने को कुछ बचा है क्या? बस इतना काफी है कि हीरा को पहले ज़मीन मिली, घर मिला उसके बाद ज़िन्दा होेने का प्रमाण-पत्र मिला। प्रमाण-पत्र दिलाने में उसके भाइयों का बड़ा हाथ रहा। जब तक प्रमाण-पत्र नहीं था, तब-तक वह डर-डर कर जीते रहे। भूत का क्या पता कब मार डाले। भूत को कोई सजा थोड़े ही मिलती है।
भगवान ने जैसे हीरा को जीवित किया, वैसे हर मुर्दे को जीवित करें।

 

 

एक भूत की असली कहानी

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