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दीदी का पेड़
दीदी का पेड़
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© Yogesh Kanava

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शाम से ही काफी गहमा-गहमी थी, लोगों का आना शुरू हो गया था। भागदौड़ कर सभी बातें देखनी थी। कहीं कोई चूक ना हो जाए। सभी मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी ना रहे। आज पूरे एक वर्ष की हो गयी है मेरी बेटी, बस उसी के जन्म दिन की डिनर-पार्टी रखी थी काॅलोनी में ही। खाना बनाने वाले से लेकर सारी व्यवस्थाएं देखनी थी। ठीक सात बजे मैंने बेटी के हाथ से एक नीम का पौधा मेरे क्वार्टर के बाहर ही लगवाया। सभी मेहमानों ने इस पर अपने-अपने हिसाब से राय ज़ाहिर की। कोई पर्यावरण की बात कर रहा था, कोई लम्बे समय तक याद रखने वाली सौगात बता रहा था। बस इसी गहमागहमी में रात काफी हो गई थी। सभी मेहमानों को विदा कर अब हम भी तीनों प्राणी- मैं, मेरी पत्नी और मेरी बेटी आराम करना चाह रहे थे। मैं मन ही मन बहुत खुश था कि पूरी काॅलोनी का डिनर अरेंज किया है और खाना भी काफी अच्छा बना है। बड़ी ही धूमधाम से पूरा दिन निकल गया। बेटी मेरी गोद में ही सो गई थी उसे बैड पर सुलाकर अब हम आज की पूरी व्यवस्था और पार्टी में आए मेहमानों के बारें में बातचीत करते हुए सो गए।

वक़्त की रफ़्तार बहुत तेज होती है। पता ही नहीं चलता है कि कब हाथ से फिसल जाता है। बेटी अब पूरे सात साल की हो गई थी। हर साल एक पौधा लगाना उसके जन्म दिन मनाने के साथ ही एक हिस्सा बन गया था। मेरी तनख्वा के हिसाब से मुझे अब बी टाईप के क्वार्टर के बजाए सी टाईप के क्वार्टर में शिफ्ट होना था। बेटी का लगाव पुराने क्वार्टर से ही था, उसमें वह पली-बढ़ी सो लगाव होना स्वाभाविक ही था, और उस पर उसके जन्म दिन पर हर साल लगाए गए छः पेड, धीरे-धीरे बड़े हो गए थे। पहला पेड़ काफी बड़ा हो गया था। हम लोगों ने अब सी टाईप के क्वार्टर में शिफ्ट कर लिया था। पुराने वाले क्वार्टर में दफ़्तर का ही एक अन्य कर्मचारी रहने लगा था। एक दिन उसने नीम के बड़े वाले पेड़ को जो बेटी के पहले जन्म दिन पर लगाया था छंगवा दिया। या यूँ कहें कि लगभग सारी बड़ी टहनियाँ कटवा दी। अब केवल मूल और ऊपर की दो तीन मोटी डालें ही बिना पत्तों की दिख रही थी। मेरी बेटी जैसे ही स्कूल से वापस आयी वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। बड़ी मुश्किल से उसने बताया कि पुराने वाले क्वार्टर में जो अंकल आए हैं, उन्होंने मेरा पेड़ काट दिया है। मेरे पेड़ को बहुत दर्द हो रहा है, बहुत गन्दे हैं ये अंकल। वो एक छोटा सा डण्डा लेकर चलने लगी। कहने लगी इस डण्डे से उन अंकल को मारूँगी। उन्होंने मेरा पेड़ काट दिया, बहुत गन्दे हैं ये अंकल। बस इसी तरह से पूरा दिन रोती रही हमारे लाख समझाने पर भी वो नहीं मानी और ना ही उसने खाना खाया। बस रोते-रोते ही सो गई। हमे भी काफी दुःख हो रहा था पर उसे कैसे समझाए कि उस पेड को छंगवाना जरूरी हो गया था वर्ना चूरु की आँधियाँ उसे मूल से उखाड़ देती ।

कुछ समय के बाद उस पेड पर फिर से नई पत्तियाँ दिखाई देने लगी। मेरी बेटी बहुत खुश थी। शाम को मैं जब दफ़्तर से वापस घर आया तो काॅलोनी के मेन गेट पर ही वो खड़ी मेरा इन्तज़ार कर ही थी। बहुत खुश थी आज वो। जैसे ही उसने मुझे देखा चहक कर बोली पापा मेरे वाले पेड के बहुत सुन्दर पत्ते आए है चलो दिखाती हूँ। मैं काफी थका हुआ था लेकिन बेटी का मन रखने के लिए मैं उसके साथ चल पड़ा। आज उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। काॅलोनी के सारे बच्चों को एक ही बात कह रही थी कि मेरे पेड़ के पत्ते आ गए। मेरे पापा सही कहते थे, नए पत्ते आएंगे, उसमें आ गए।

अब मेरी बेटी 13 साल की हो गयी थी। उसी समय मेरा स्थानान्तरण हो गया। जब हम लोगों ने दूसरे शहर के लिए जाना तय किया तो बेटी सबसे ज़्यादा उदास थी। वो बार-बार काॅलोनी में लगाए अपने पेड़ों के पास जाकर उनके पास बैठ रही थी। पूरे बारह पेड़ थे। बारी-बारी से वो सभी पेड़ों के पास जाकर बैठ रही थी मानो कह रही थी तुम ठीक से रहना, अपना ख़याल रखना। अब शायद दोबारा नहीं आऊँगी यहाँ, पर तुम मुझे भूलना मत, मैं भी नहीं भूलूँगी।

नए शहर में मैंने अपना घर खरीद लिया था। शहर बड़ा और जगह की कमी थी। ऐसे में घर के बाहर पौधे लगाना असंभव था। इस बार के जन्मदिन पर पौधा कहाँ लगाए, यही चिन्ता मुझे और मेरी बेटी को सता रही थी। बहुत विचार के बाद घर के सामने पार्क में एक बील्वपत्र का पौधा लगाने पर सहमति बनी। हमने एक पौधा फिर से बेटी के हाथों लगवा दिया। इस बार एक पौधा मेरे बेटे ने भी लगाया। रोज़ाना पानी देना, उसकी देखभाल करना दोनों की दिनचर्या का हिस्सा हो गया था लेकिन अब हर बार एक पौधा लगाना सम्भव न था। आस-पास जगह की कमी और दूर जाकर पौधा लगाने का अर्थ है उसे लावारिस छोड़ना, जिसका कोई अर्थ नहीं है। यही सोचकर अब केवल गमले में एक पौधा हर वर्ष लगाने की बात सोची।

पिछला शहर छोड़े हमें लगभग 7-8 साल हो गए थे। अचानक ही मुझे एक विभागीय कार्य से मेरे पुराने दफ़्तर चूरू दौरे पर जाने का आदेश मिला। मैं सोच रहा था चलो इस बार पुराने लोगों से कई बरसों बाद मुलाक़ात होगी। वैसे तो एक दो लोगों से मेरा सम्पर्क अभी तक लगातार बना हुआ है लेकिन केवल टेलीफोन से ही बातचीत हो पाती है, मिले हुए अरसा बीत गया। शाम को दफ़्तर का काम ख़त्म कर जब मैं घर पहुँचा तो मैंने बताया कि मुझें तीन दिन के सरकारी काम से चूरू जाना है। बेटी बहुत ही खुश हुई अरे वाह चूरू जाना है, लेकिन पापा अभी मत जाओ ना, मेरी एग्ज़ाम हो जाए तब चलना-ना, मैं भी मेरे पेड़ों को देखकर आऊँगी। मैंने कहा बेटा सरकारी काम है ना, अभी जाना पड़ेगा। मैं सुबह ज़ल्दी ही बस से चूरू के लिए रवाना हो गया। सात-आठ बरसों में काफी तेजी से बदलाव आ गया था। फतेहपुर से चूरू जाने वाली सड़क अब राजमार्ग बन चुकी थी। बस सरपट दौड़ी जा रही थी। मैं पुरानी यादों में खो गया। कहाँ वो दिन थे जब फतेहपुर से चूरू का यह 36 किलो मीटर का छोटा सा टुकड़ा ही पूरे दो घण्टे का सफ़र होता था। हिचकोले खाती बसें पेट में खाया-पिया सब हिलाकर रख देती थी। पूरा शरीर टूट सा जाता था। और आज देखो केवल 30 मिनट मे ही यह सफ़र पूरा हो गया है। भई वाह! विकास तो बड़ी ही तेज गति से हो रहा है। कोई पाँच घण्टे के सफ़र के बाद मैं अपने गन्तव्य पर पहुँचा। वहाँ का नज़ारा देखकर तो मैं दंग ही रह गया। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, सड़कों पर डिवाइडर, लाइटें मानो पूरा शहर ही बदल गया हो। मैं सबसे पहले होटल जाकर अपना सामान रखना चाह रहा था और मैंने वही किया। ठीक ग्यारह बजे मैं अपने दफ़्तर पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। जिनको मैं भुला-चुका था वो ही मेरे स्वागत का सबसे पहले जैसे इन्तज़ार कर रहे थे। मैं विश्वास नहीं कर पा रहा था, हाँ मेरे पाले हुए कौअे, मेरे दोस्त जिनको मैं अब कभी कभार ही याद करता था वो मुझे इतने बरसों के बाद भी भूल नहीं पाए। मैं दफ़्तर के दरवाज़े पर ही पहुँचा था कि चालीस-पचास कौअे काँव-काँव की आवाज़ के साथ मेरी तरफ आए। मानो उनमें होड़ लगी हो कि पहले मेरे से कौन मिलता है। मैं वहीं बाहर ही रूक गया। अपने इन निःस्वार्थ दोस्तों के प्रेम से विभोर उनको दुलारता रहा। मैं अपने अतीत में खो सा गया था। यही मेरे दोस्त, जिनके लिए मैं क्वार्टर की छत पर घण्टों खड़ा रहता था। इनसे बातें करता था। ये भी तो कभी मेरे कंधों पर, कभी सर पर बैठ जाते थे। लोग मुझे पागल समझते थे। कई बार कहते थे कौअे का सर पर बैठना बड़ा ही अपशकुन होता है, कोई टोटका करो। मैं लोगों की बातों को सुना-अनसुना कर, बस अपनी ही दुनिया में मस्त- अपने परिवार और अपने दोस्त कौओं के साथ। मुझें विश्वास ही नहीं था कि इतने बरसों के बाद भी ये मुझे इस तरह से मिलेंगे।

दफ़्तर के बाहर, कौओं की तेज काँव-काँव सुनकर कुछ लोग बाहर आए। मुझे देखकर उनको काँव-काँव का कारण समझ आ गया था लेकिन डर के मारे वो नज़दीक नहीं आ पा रहे थे कहीं कोई कौआ गुस्से में आकर चोंच ना मार जाए। दफ़्तर के लोगों से मिलने के लिए, अपने इन दोस्तों को प्यार से दुलारकर मैं दफ़्तर में चला गया। नए लोगों के लिए यह नज़ारा अविश्वसनीय लग रहा था। भला कौआ भी आदमी का इतना गहरा दोस्त और वो भी इतने बरसों बाद।

लगभग सो घेर कर ज़बरदस्ती मुझे काॅलोनी जाने के लिए विवश कर दिया। मेरे आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा, जब वो मुझे ज़बरदस्ती उस पेड़ के पास लेकर गए, बेटी के पहले जन्म दिन पर लगाया था। पेड़ को पूरी तरह से काट दिया गया। अब केवल एक ठूंठ ही बचा था। सब कौअे जैसे मुझे शिकायत कर रहे थे- देखो दीदी के पेड़ का क्या हाल किया है इन लोगों ने। मुझे देखकर बड़ा ही दुःख हुआ। आखिर ये बेज़ुबान पेड़ क्या कष्ट दे रहा था लोगों को। मैं वहीं बैठ गया। शायद मुझ से ज़्यादा दुःख उन कौओं को था लेकिन वे बेचारे कर कुछ भी नहीं पाए थे। तभी उस क्वार्टर में रह रहा कर्मचारी बाहर आया उसने बताया कि इन कौओं ने उस मज़दूर का सर चोंच मार-मार लहुलुहान कर दिया था जिसको यह पेड़ काटने का ठेका दिया था। कौओं के डर के मारे वो ये ठूंठ आज तक लेने नहीं आया।

यह बात सुनकर मैं उन कौओं के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने लगा। उन्हें अपने साथ लाया बचा खाना खिलाया जैसे पहले हर दिन सुबह-सुबह खिलाता था। मैं उस रात सो नहीं पाया। सोचता रहा इंसानों से तो ज़्यादा समझदार ये बेजुबांन हे जो अपना लालच नहीं जानते। उस पेड़ काटने वाले मज़दूर को भगाने के लिए इन कौंओं के प्रयास की कल्पना कर रहा था कि किस तरह से इन्होंने मेरी बेटी के लगाए पेड़ की रक्षा की है। धन्य है ये ही सच्चे मित्र है मेरे प्रकृति के और पर्यावरण के, इंसानों से तो बस केवल विनाश की ही उम्मीद कर सकते हैं लेकिन ये कभी विनाश नहीं कर सकते।

तीन दिन तक मैं उन दोस्तों के साथ घण्टों बतियाता था। आखि़र आज वापसी का समय आ गया था। मुझे उनसे बिछुड़ना बहुत भारी लग रहा था। उनको शायद यह समझ आ गया था कि मुझे वापस लौटना है। आज शाम वे ज़्यादा उछल-कूद नहीं कर रहे थे। शान्त बस एकदम शान्त। मेरे बरबस ही आँसू आ गए, मैं चुपचाप वहाँ से चल दिया बिना कुछ बोले।

दीदी का पेड़

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