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सायकल रिक्शा
सायकल रिक्शा
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© Bhawna Kukreti

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5 Minutes   302    9


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रोज वह औटो मेंऑफिस से अपने होटल रुम में आती थी। हेड ऑफिस से उसे एक काम के सिलसिले में जबलपुर भेजा गया था। आज वीकएंड था और सड़क पर जबर्दस्त रश था। बडी देर वो कोशिश करती रही कि सड़क के उस पार खड़े ओटो वालों में से कोई उसे सुन ले या वो ही सड़क के उस पार हो सके। अक्सर ऐसी बिज़ी सड़क पार करने में वो किसी न किसी गाड़ी से चोट खा जाती थी या उसका तमाशा बन जाता था । 

5 मिनट तक वो ऐसे ही कोशिश करती रही। पास खड़े एक दुबले पतले अधेड़ से रिक्शा वाले ने उस से कहा " आओ मैडम सड़क पार करा दूँ ?! " सड़क पार होने पर वो बोला " कहां जाना है आपको?"

" वैष्णव हॉटल ",

"ओटोऽऽ" रिक्शा वाले ने ओटो वालों को आवाज दी" मैडम को वैष्णव हॉटल छोड़ दो।",एक ओटो वाला तुरंत ओटो लेकर चला आया । लेकिन अचानक उसका मन हुआ कि वह आज रिक्शा मेंबैठ कर होटल जाये उसने रिक्शा वाले से कहा " भैया क्या आप वैष्णव होटल ले चलेंगे ?!" ओटो वाला और रिक्शावाला ने एक दूसरे को देखा,फिर ओटो वाले ने अपना ओटो दूसरी ओर घुमा लिया।रिक्शावाला गमछे से अपनी गर्दन पोछता हुआ बोला " ठीक है मैडम जी 30 रुपया लगेगा ।"

" 30 रुपया!? ओटो तो 10 में ले जाता है "

" मैडम जी वो तो है पर मजदूरी लगती है।" 

धीमे-धीमें चलते सायकिल रिक्शा में बैठे उसे शहर अलग ही दिख रहा था ।सड़क की अगल बगल की दुकानों पर मोडर्न तरीके का रेनोवेशन हो रहा था,बीच-बीच में पुरानी दुकाने ,आढ़त ,रेस्तरां और फास्ट फूड के ठेले दिख रहे थे ।वह चारों ओर देख रही थी। आसमान में बादल नारंगी हो रहे थे।सूरज कुछ देर में डूबने वाला था । 

"मैडम ,यहां की नहींं लगतीं आप ?" 

"जी भैया" 

"किसी काम से आई हैं?"

" बस, रोजगार ले आया भैया।" 

साईकिल रिक्शा सड़क पर धीरे-धीरे चल रहा था। उसके हर तरफ दौड़ते-भागते इ -रिक्शा थे।

" भैया ये रिक्शा आपका है ?" 

" नहीं किराये का है मैडम जी ।"

" ओह! कितना किराया देते हो आप?" 

"200 रुपया दिन "

उसने अपने रिक्शा पैडल पर जोर दिया और रिक्शा थोड़ा तेज हो गया।

"परिवार में कौन कौन हैं आपके ?"

"मैडम जी मेरी 2 बिटिया 1 बेटा है , बीबी और बहन है ।" 

" गुजारा हो जाता है?!"

" हो ही जाता है, मैडम " 

"अच्छा एक बात कहूँ,अगर आप मेरे शहर में होते न तो आपको रोज के लिये ऑफिस से बांध देती। महीने का अच्छा मिल जाता आपको।कल देखती हूँ इधर के ऑफिस में बात करती हूँ ।"


वो कुछ नहीं बोला ,इधर उधर देखने लगा ,आसपास इतने ई रिक्शा थे की वो सायकिल रिक्शा उनके बीच मेंअलग ही लग रहा था। उसने फिर कहा 


"इ रिक्शा के आने से और दिक्कत होने लगी होगी न?!"

" क्या दिक्कत मैडम, रोज की जरूरतों के लायक जब तक नहीं हो जाता रिक्शा चलाता हूँ फिर रात में सीधा घर ।बाकी ये भी अपना परिवार ही पाल रहे हैं। क्या शिकायत करनी।और आज तो बच्ची का जन्म दिन भी है नये कपड़े का इन्तज़ाम भी करना है।" उसकी आवाज बोलते बोलते धीमी हो गयी।आवाज मेंचिंता साफ झलक आई थी।

"हम्म।,क्यँ नही किसी जुगत इ रिक्शा ले लेते , आमदनी बढेगी,घर परिवार अच्छा चलेगा।" हाँ, कुछ हाथ लगे तो तुरंत ही...." कह्ते ही वो एकाएक खामोश हो गया। फिर कुछ देर बाद बोला


" मैडम जी वैष्णव हॉटल सीधे रास्ते से दूर पड़ेगा ,सँझा हो रही है, चलिये आपको शार्ट कट से ले चलता हूँ ।" 


वो कुछ कहती उस से पहले उसने अगली गली में रिक्शा मोड़ दिया और तेजी से पैडल चलाने लगा। गाली संकरी थी अगल बगल सारे पूराने मकान थे, जहां ज्यादातर नीचे फूलों की दुकानें , पान की गुम्टियाँ और उपर जाती सीढीयाँ दिखती थी ।सजी संवरी औरतें बालकनी से नीचे झांक रही थीं।गाली के दो कोनो पर हर एक घर से दूसरे घर अलगनियों पर सूखते कपड़े झूल रहे थे। उसके शहर की गलियों से अलग इस गली मेंउसे अब तक कोई बच्चा दौड़ता खेलता नहीं दिखा था। ये बहुत अज़ीब सा आभास देती लग रही थी।

"भैया ये क्या जगह है" 

"बस 5 मिनट और मैडम, पहुचने वाले हैं।"

"ओके" 

उसे रास्ते मेंएक दुपट्टे शरारे की दुकान दिखी। बचपन मेंउसने एक स्कूल फंक्शन में पहनी थी।

"भैया दो मिनट उस दुपट्टे की दुकान पर ले लेना "

"क्यूँ मैडम?!"

"भैया आपकी बेटियों के लिये गिफ्ट में शरारे लेने हैं मैने " 

"अरे मैडम !!नहींं-नही ,कतई नहीं "

रात होने लगी थी।सामने से दो लोग जो शायद रिक्शा वाले के परिचित रहे होंगे हँसते हुए उसके पास आए।

" और भाई बड़े दिनो बाद दिखे ?!" रिकशे वाला ठहर गया।

इधर उसके घर से उसकी माँ का फोन आ गया ।वो फोन पर बात करने लगी ।"माँ,प्रणाम। बस पहुंचने वाली हूँ,आप बेकार चिंता करती हैं" वो फोन पर व्यस्त हो गई।


उधर उन दोनो आदमियों ने उसे रिक्शा पर बैठे देखा तो विकृत हँसी उनके चेहरे पर फैल गई।रिक्शा वाले के पास आकर बोले "आज आगे से दायें ले कर..... 11 नम्बर पर छोड़ देना,उधर गुंजायश बढिया है।" उसने हूँ हूँ किया और सर हिला कर , रिक्शा की स्पीड तेज कर दी । जल्दी जल्दी पैडल मारते और बिना दायें-बाये मुड़े मेन सड़क पर रिक्शा निकाल लाया।ये सड़क वैष्णव हॉटल की ओर जाने वाली सड़क से आगे जाकर मिलती थी।



वैषणव हॉटल आते ही उसने 30/- की जगह 50/- रुपये रिक्शा वाले की ओर बढ़ा दिये।

"नहीं, मैडम ,50/-नहीं लूंगा।"

उसने दोनो हाथ जोड़ दिये ।

" क्या हुआ मैडम ?!" हॉटल का गार्ड पास आ गया।

"क्या रे लूट रहा है ?!"वो रिक्शा वाले को धमकाते बोला ।

"नही ,नही भाई साहब मैं किराया दे रही। येनहीं ले रहे।"

वो उन दोनों को देख रहा था ।

"मैडम 30 भी नाजायज़ बोले थे मैंने ,50 नहीं ,नहीं लेना।" रिक्शा वाला बोला ।

"ले लो नहीं तो 100/- लेने पड़ेंगे।"उसने मुस्कराते हुए कहा उस से कहा ।गार्ड ने 50/- का नोट उसके हाथ मे थमाते हुए हड़काया"चल निकल अब ।"

वो रिक्शा वाला दोनो हाथों को जोड़ कर सर तक ले आया "नहीं ,नहीं। मैडम ,माफ कर दिजीये।" और ये कहकर वह 20 का नोट गार्ड को थमा कर तेजी से रिक्शा घुमा कर निकल गया ।

हॉटल के गार्ड ने पूछा 

"आप आज रिक्शा से कैसे मैम?"

"बस ऐसे ही दिल कर जाता है कभी-कभी ।"कह कर वह हॉटल की सीढियाँ चढ़ गयी।

"क्या मामला था ये मैम?"रिशैपशन में भी स्टाफ ने देखा था तो वहां भी पूछ हुई।इतने दिनो मेंसब उसे अच्छे से जानने लगे थे।

"कुछनहीं , 30 /- पर बात तय हुई थी,शार्ट कट से भी ले आया मगर पता नहीं मैं जब 50/- दी उसने नहीं लिया।"

"शार्ट कट कौन सा ? ये बगल वाला?!"

"जी , मेरी की दे दीजिये प्लीज"उसने रुम की चाबी मांगी।

"#@$%^, अगली बार ओटो से ही आइएगा मैम "

" रिसेप्शनिस्ट ने कहा ।लोकल होने की वजह से वे सब जानते थे उस बदनाम गाली को और जो अनहोनी हो सकती थी।


"गाली मत दिजीये उसे प्लीज, जानते हैं बिना कहे पहले मेरी मदद की उसने,फिर रात न हो जाय इसकी चिंता में भी था। ऐसा कौन करता है आज कल किसी अन्जान के लिये। चाहता तो 50/- ले लेता।नहीं क्या !!?"


हॉटल के कर्मचारी एक दूसरे को देख रहे थे और वो अपने रुम को चल दी।

और मैडम रिक्शे वाला

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