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महानगर की मैथिली
महानगर की मैथिली
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© Sudha Arora

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''नहीं मम्मी, पहले पानी गरम करो? कहा ना, हम ठंडे पानी से नहीं नहाएँगे। आज तो बहोत सर्दी है...क्यों, टाइम क्यों नहीं है? देर क्यों हो रही है? अभी तो सायरन भी नहीं बजा। मम्मी, आप झूठ बोल रहे हो, हमको पता है सब, आज तो कहीं भी नहीं जाना है। आज तो हॉलीडे है-'मैजिक लैंप वाला डे-संडे। कल तो आपका हाफ-डे था। फिर आज कैसे जाना है...'' मैथिली नल को कसकर थामे, दीवार से सटी खड़ी थी, ''ओफ मम्मी, एक बार कह दिया ना, हम ठंडे पानी से नहायेंगे ही नहीं...होने दो देर।''

तड़ाव् ! उधर कमरे में दीवार को खरोंचती हुई टूटे कप-प्लेट की किरचें और चाय जमीन पर बिखरी पड़ी थी। दोनों बाप बेटी एक जैसे...चित्रा भुनभुनाती हुई कमरे में दाखिल हुई 'अब आपको क्या तकलीफ हो गई?'

दिवाकर कम्बल एक ओर फेंककर अखबार सामने रखे मुँह फुलाए बैठे थे। ''सारा मूड बिगाड़कर रख दिया। यह कोई चाय है? स्वाद ही नहीं है चाय का।''

सुबह सुबह दिवाकर का मूड चाय के इर्द-गिर्द घूमता था, ''पचास बार कहा है, ग्रीन लेबल ही लाया करो।''

''बाबा वही चाय है। कभी उन्नीस-बीस हो जाती है, उसके लिए इतनी तोड़ फोड़ की क्या जरूरत है?'' चित्रा ने भी उसी तल्खी से जमीन पर फैली चाय के नजदीक जाता कम्बल ऊपर खींचा और मैथिली का छोटा-सा पलँग बड़ी बेसुरी आवाज के साथ भीतर सरकाया, ''हमारे घर में महीने की आखिरी तारीखों का ऐलान करने के लिए दो-चार कप-प्लेट गिलास टूटने बहुत जरूरी हो गए हैं। पड़ोसियों को पता कैसे चले कि महीना खत्म हो रहा है!''

चित्रा ने बड़ी फुर्ती से टूटे काँच के टुकड़े समेटे, बिखरी चाय साफ की और जाते-जाते कह गई ''साढ़े नौ बजे त्रिवेदी को चर्चगेट स्टेशन पर मिलने का कहा है और अभी घड़ी देख लो। वहीं पड़ी है।''

 

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उधर मैथिली का अपना राग चल रहा था 'मै-थि-ली। मेरा नाम मैथू है।' दूसरों बच्चों की तरह 'अमाला लाम...' की जगह सवा साल की मैथिली ने जब पहला वाक्य अटक-अटककर लेकिन एकदम साफ बोला था तब सब चौंके थे। बस, उसके बाद बोलना आते ही वह धाराप्रवाह बातें करने लगी थी। चित्रा को देखते ही वह दौड़ी चली आई, ''मम्मी हमने चप्पल पहन ली है, नहीं तो काँच चुभ जाएगा। फिर बड़ी शरारत-भरी अदा से बोली, ''पापा ने आज फिर प्लेट तोड़ी ना।''

''चुप कर!'' चित्रा ने उसे झिड़क दिया और उसे खींचती हुई बाथरूम तक ले गई। मैथू के चौकन्ने होने से पहले ही उस पर दो-तीन लोटे पानी उँड़ेल दिया।

''मम्मी...'' गुस्से में लाल सुर्ख मुँह किए वह गला फाड़कर चीख रही थी, ''हम कट्टी हैं तुमसे, ठंडे पानी से नहला दिया! डर्टी...डर्टी...मम्मी।'' और दूसरे ही पल वह सचमुच सर्दी से काँप रही थी।

चित्रा ने जल्दी-जल्दी उसे तैयार किया। मैथू ने जलती हुई आँखों से

मम्मी को घूरते हुए अपनी उँगली दिखाई-यानी कट्टी और खुद को ढीला छोड़ दिया-ठीक है, जो चाहे कर लो, लेकिन हम कट्टी तो हैं ही तुमसे।

दिवाकर शेव करते समय अपने गाल पर ब्लेड चला बैठे थे। बहते खून पर तौलिया दबाए खीज रहे थे, ''बिगाड़ रखी हैं उसकी आदतें! बारह महीने गरम पानी से नहाएँगे! देखो, कैसी बुत बनी बैठी है। चलो, मैथू बेटे जल्दी से नाश्ता कर लो, देर हो रही है।''

मैथू एकदम उठी और पलँग के कोने में दुबककर बैठ गई। तुनक कर बोली, ''इसीलिए संडे को हमारे बाल भी नहीं धुलाए और एक 'पोनी टेल' बना दी। फिर मम्मी बोलेंगी, इतनी जुएँ कहाँ से आती हैं! पाउडर भी नहीं लगाया है और ये ऊँची-ऊँचीाक पहना दी है। हम शर्मा आंटी के घर कभी येाक पहनकर जाते हैं 'मैजिक लैंप' देखने? और हमको जूते-मोजे नहीं पहनने थे, चप्पल पहननी थी...अब हमें कहीं नहीं जाना...।'' वह शिकायतों का पुलिन्दा बनी बैठी थी।

''नहीं बेटे! हम लोग तो एक आंटी को देखने चर्चगेट जा रहे हैं-हॉस्पिटल। बीमार हैं वो। हॉस्पिटल बहुत गन्दी जगह होती है। हम बहुत जल्दी आ जाएँगे...।'' दिवाकर उसे समझा रहे थे।

मैथू चहककर उठी और अपनी तीखी आवाज को भरसक मुलायम

बनाकर बोली ''पहले क्यों नहीं बताया? चर्चगेट वाले फेयर में भी जाएँगे न हम लोग? हाँ, मम्मी ने प्रॉमिस किया था कि एक दिन फिर से फेयर पर ले चलेंगे। वहाँ तुम लोग कॉफी पीना और हमें एक रुपया देना। बस्स! वन रूपी ओनली! हम चार बार झूले में बैठकर आएँगे। हमको वहाँ ले चलोगे न, पापा।''

दिवाकर ने उसे गोद में उठाकर पुचकारा था ''देखो बेटे आप तो बहुत समझदार हैं...।''

बच्चे झूठे आश्वासन का स्वर और स्पर्श पहचानने में बहुत तेज होते हैं। दिवाकर की आवाज से मैथिली ने भाँप लिया था कि वे उसे साथ नहीं ले चल रहे हैं और वह उनकी पकड़ से छूट भागी थी-''हम नाश्ता नहीं करेंगे। हमें भूख नहीं है।''

मान-मनौवल और नाश्ते का वक्त ही नहीं था। सड़क पर आते ही मैथू गुमसुम-सी दूसरी ओर मुड़ने लगी तो दिवाकर खीजे, ''वहाँ कहाँ जा रहे हो बेटा, सीधे चलो।''

''हमें साथ ले चल रहे हो?'' मैथू ने फिर उम्मीद-भरे स्वर में पूछा।

''नहीं।''

''तो हमें शर्मा आंटी के घर छोड़ दो। टी.वी. देखेंगे, फिर घर वापस आ जाएँगे। आप लोग तब तक वापस नहीं आओगे?''

''हमें देर लग जाएगी। शर्मा आंटी तो 'मैजिक लैंप' खत्म होते ही कह देंगी तुम्हारी मम्मी आवाज दे रही है, मैथू घर जाओ! हम तुम्हें ताराबाई के घर छोड़ देंगे।''

''नहीं मम्मी!'' मैथू का गला भर आया था, ''आज संडे को भी हमें ताराबाई के घर छोड़ेंगे आप! हम ताराबाई के यहाँ नहीं रहेंगे।'' और वह हाथ छुड़ाकर तेजी से दूसरी ओर भाग निकली थी।

दिवाकर उसके पीछे-पीछे दौड़े और जबरदस्ती उठाकर ले आए, ''देखो मैथू अगर तुमने तंग किया ना, तो हम सीधे तुम्हें ले जाकर हॉस्टल में डाल देंगे। अभी!''

''अच्छा'', मैथू ने पापा का गुस्सा सूँघते हुए आवाज धीमी कर दी थी 'हमको हॉस्टल छोड़ दोगे तो भी हम आपके साथ ही जाएँगे। हम ताराबाई के यहाँ नहीं रहेंगे।'

''ओफ, क्या जिद्दी लड़की है, यार तुम्हारी! कोई बात समझने को तैयार ही नहीं है। बेटा, जितना मन हो रो लो, लेकिन अपने साथ हम तुम्हें आज ले जा ही नहीं सकते। समझे!''

दूसरी गली मुड़ते ही झोपड़-पट्टी शुरू हो गई थी। इस गली को देखते ही मैथू पापा के गले में दोनों बाँहें कसकर बिसूरने लगी थी। देखा तो उसके दोनों गाल आँसुओं से तर थे। पता नहीं, इस तरह बेआवाज रोने की आदत उसमें कब से आई थी! इस तरह रोते हुए वह अचानक अपनी उम्र से बहुत बड़ी लगने लगती थी। न मुँह से कोई आवाज, न सिसकियाँ, बस, आँखों से लगातार चुपचाप आँसू बहने लगते थे।

इस बार चित्रा ने उसे दुलारा, ''बेटा रोज तो रहती हैं आप! बस, जिस दिन मम्मी पापा को काम हो, उसी दिन जिद चढ़ जाती है।''

मैथू ने रुँधे गले से बोलने की कोशिश की थी, ''लेकिन संडे को हम...'' न बोल पाने की झेंप में वह दिवाकर की गोद से उतर, बगैर उँगली पकड़े, उस सँकरे रास्ते के दूसरी ओर अकेले चलने लगी थी।

 

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कतार में ताराबाई की 'खोली' आखिरी थी। उसके बाद खुला मैदान था और दूसरी तरफ चौड़ी खाड़ी। ताराबाई का घर अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था। बाहर एक छोटी-सी खटिया भी थी, जहाँ वह चार बच्चों को एक साथ बिठा देती थी। चित्रा और दिवाकर इस मोहल्ले में नए आए थे। अभी तीन महीने पहले ही उन्होंने यह मकान बदला था। यहाँ एक ही इकलौता चौदह बाई बारह का कमरा था, जिसे उन्होंने ड्राइंग-कम-डाइनिंग-कम-बेडरूम बना रखा था। उस एक कमरे और छोटे से लम्बे किचन में जहाँ सिर्फ एक आदमी के खड़े रहने भर की जगह थी, चित्रा-दिवाकर और मैथू जैसे अढ़ाई आदमी भी भीड़ नजर आते थे। सुबह-सुबह जब आठ बजे तक सबको घर से निकलने की जल्दी होती थी, वे कमरे में चलते हुए एक-दूसरे से टकराते रहते थे। मैथू बार-बार उनके पैरों में आती थी। बस, इस नए मकान में एक यह आराम था कि छतें टपकती नहीं थीं, वरना जो मकान वह छोड़कर आए थे, वहाँ रसोई में ऐन खाना पकाते समय कड़ाही के भीतर छत से बरसात का पानी टपकता था। यह जानते हुए भी कि टपकने वाला द्रव सिर्फ बारिश का पानी ही है, खाना खाते हुए कैसी उबकाई-सी आती थी। चूँकि यह रोजमर्रा की बात थी, वह सब्जी या दूध फेंक नहीं सकती थी, और बालों तथा पीठ पर तो उसे यहाँ-वहाँ गीला महसूस करने की आदत-सी हो गई थी। बेडरूम की दीवार इस कदर भीगी थी कि तेज बरसात होने पर दीवार से छींटों की बौछार आती थी और पूरी दीवार भीग चुकने पर फर्श पर पानी बहना शुरू हो जाता था।

 

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उस मकान में बरसात का मौसम पूरी तरह उन सब पर हावी रहता था। बरसात के उन तीन महीनों में लगातार मैथू बीमार रहती थी। अपने फ्लैट में भी गीले फर्श पर चप्पलें चटखाते हुए चित्रा और दिवाकर सीलन और बाथरूम की नाली  से निकलते हुए लाल-लाल केंचुओं से आक्रान्त रहते थे। इस मकान से निकलने के बाद उनके लिए किसी भी तरह के मकान में रहना आसान हो गया था, इसलिए उन्हें घर ढूँढ़ने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, पर दूसरे मकान में वे तीन-चार महीने ही चैन से रह पाए थे कि हर रोज घर लौटने पर उन्हें उस मकान के दरवाजे पर नोटिस लगा हुआ मिलता था, जिसमें उनके वहाँ गैर-कानूनी तरीके से रहने के जुर्म को साबित किया जाता था।

वे बहुत आसानी से नोटिस का कागज मोड़कर कचरे के डिब्बे में फेंक

देते थे, पर दो महीने गुजरने के बाद आखिर एक ईमानदार और कड़े

सुरक्षा अफसर के आने पर उन्हें मय सामान सड़क पर आ जाना पड़ा।

पन्द्रह दिन किसी दोस्त के यहाँ गुजारकर आखिर इस एक कमरे के

मकान में आ गए जहाँ और सारी सुविधाएँ थीं, सिवाय इसके कि पड़ोसी बड़े सुखी, समृद्ध और आत्म केन्द्रित थे। चित्रा और दिवाकर के घर टूटते बर्तनों से उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी। सबसे बड़ी असुविधा यहाँ मैथू के लिए थी, नजदीक कहीं कोई शिशु या बाल कल्याण केन्द्र नहीं था और पूरे दिन के लिए नौकरानी मिलने या रख सकने का सवाल ही नहीं था। कई युक्तियाँ आजमा चुकने के बाद वे आखिरकार ताराबाई को ही ढूँढ़ पाए थे जो मैथू के अलावा और तीन बच्चों की आठ घंटे देखभाल करती थी और महीने के साठ रुपये लेती थी।

 

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आज रविवार था और ताराबाई के यहाँ दूसरे बच्चे नहीं थे। अपने ही चार बच्चों में से किसी एक को वह दनादन धुन रही थी। जैसे ही उसने चित्रा को आते देखा, उस नाक बहाते, मरगिल्ले-से अधनंगे बच्चे की पीठ पर उसने आखिरी धौल जमाई, ''जाऊन मर तिकड़े! हलकट कुठला!'' और नौ वारी साड़ी से अपने गीले हाथ पोंछने लगी। फिर झेंपते हुए बोली, ''बाहर जाने का है, मेम साब छोकरी किदर?''

मैथू रास्ते के दूसरी ओर चुपचाप खड़ी थी।

''ये रे मैथू, उदर किदर जाता है? मेरे कू पैछानताईच नईं?''

बुलाए जाने पर मैथू धीरे-धीरे रास्ता पार कर आई और खटिया पर बैठ गई, आँखें लाल और गाल भींगे हुए-झोंपड़ी के भीतर एकटक जैसे वह किसी शून्य में देखे जा रही थी।

''अरे, मम्मी से गुस्सा हय?'' ताराबाई उसे गुदगुदा रही थी और वह चुप।

चित्रा ने पर्स से एक पैकेट निकाला और उसे थमाया, ''ताराबाई, यह घर से कुछ खाकर नहीं आई है। अभी इसे नाश्ता करवा देना और खाने में सिर्फ चावल-दाल देना। चार-पाँच बजे तक हम लोग आ जाएँगे।''

''ताराबाई हमें जरूरी काम से जाना था।'' दिवाकर ने जैसे सफाई दी, फिर मैथू के गाल थपथपाए, ''ओ.के. बेटा हम जल्दी आ जाएँगे!''

मैथू ने दिवाकर का नहाथ झटका, न सिर घुमाया। दूसरी तरफ मुँह किए उसी तरह गुमसुम बैठी रही।

ताराबाई बोलती जा रही थी, ''सेठ, तुम फिकिर नईं करना। अबी तुम

लोग बस इसटाप तक बी नई पउंचा होएँगा, इधर मैथू का कथा-पुरान

चालू हो जाएँगा-अमारा मुलुक में इतना बड़ा घर, दादा-दादी, बुआ, मउशी-सब कितना अच्छा लोक! पपीता का झाड़, टोमैओची रोप, सब अक्खा दिन चालू रएँगा। अपना तो भेजा खलास कर देगा ये छोकरी! मेमसाब, तुम फिकिर नईं करना, ये अबी ठीक हो जाएँगा।'' ताराबाई की आवाज में चहक थी।

संभवतः इस चहक की तह में पाँच का कड़कता हुआ नोट था, जो शाम को उसे मिलने वाला था। इतवार और छुट्टी के दिन बच्चा सँभालने के वह पाँच रुपये अलग से लेती थी, जो उसकी साठ रुपये महीने की पगार में शुमार नहीं थे।

चित्रा जानती थी कि मैथू अभी थोड़ी देर में सब कुछ भूल-भालकर खेलने लगेगी, पर फिर भी उसे वहाँ छोड़कर लौटते हुए भीतर कहीं बहुत शिथिल और असहाय होती जा रही थी।

 

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बस की 'क्यू' में खड़े दोनों चुप बने रहे। बस जल्दी ही मिल गई और बैठते ही दिवाकर ने चित्रा को कुरेदा, ''अब तुम्हें क्या हो गया है? वह अभी ठीक हो जाएगी, उस दिन देखा नहीं, लौटे तो कूदती-फाँदती मिली कि इतनी जल्दी कैसे आ गए?''

''नहीं, मुझे अच्छा नहीं लग रहा। मैथू कभी-कभी एकदम बड़ों की तरह बिहेव करने लगती है।'' चित्रा रुक-रुककर बोली, ''कैसे बिना आवाज रोती है, बहुत नाराज होती है तो गुमसुम हो जाती है...एक रविवार ही तो मिलता है उसे हमारे साथ रहने के लिए...ऐसा कौन-सा जरूरी काम है हमें। तीस किलोमीटर दूर अंग्रेजी फिल्म देखने जा रहे हैं, यह ऐयाशी नहीं, तो और क्या है।''

बस! यह सुनना था कि दिवाकर आगबबूला हो गए। चलती बस में एकदम खड़े होकर बोले, ''चलो, उठो घर चलो। साल-छमाही कभी घर से निकलो भी तो सौ सिरदर्द साथ चलते हैं।''

''बैठो, बैठो, बस में तमाशा मत करो।'' चित्रा ने सँभाला, ''अपने बच्चे के लिए कुछ महसूस करना भी गलत है।''

''नहीं, बस में बैठकर ही आप महसूस करिए। पहले सोचना था यह सब।'' दिवाकर अपने तईं बड़बड़ाए चले जा रहे थे, ''आफ्टर ऑल, मैथू को बड़ा होना है। तुम तो जिंदगी भर उसे बच्चा ही बनाए रहोगी। हमारे साथ हर जगह कैसे चल सकती है वह? शी हैज टु लर्न ऑल दिस।''

दिवाकर जले-भुने खिड़की से बाहर देखते जा रहे थे। चित्रा अपनी सीट पर बैठे-बैठे निढाल हो गई थी। दिवाकर की बातों में उसे सुबह की खराब चाय की बू आ रही थी। वह शायद अब भी कप-प्लेट तोड़ने वाली मनःस्थिति में थे। चित्रा ने सोचा था, आज वह दिवाकर से उसके आफिस के समाचार सुनेगी और अपने स्टाफ के झगड़े के बारे में बताएगी। पर उनमें संवाद की स्थिति ही नहीं रही थी।

 

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इस नए मकान में आने के बाद वे दोनों व्यस्त हो गए थे। घर से चित्रा के स्कूल और दिवाकर के ऑफिस का फासला बढ़ गया था। सुबह मुँह अँधेरे पाँच बजे उठकर चित्रा के हाथ मशीनी अंदाज में रोजमर्रा के

काम निबटाते थे और तीन घंटों में तीन टिफिन के डिब्बे और अपने-अपने सामान से लैस होकर, दरवाजे पर ताला डाल दो चाबियाँ अपने-अपने साथ ले, वे तीनों घर से बाहर निकल पड़ते थे। शाम पाँच बजे तक चित्रा स्कूल से लौटते हुए सब्जी-भाजी-ब्रेड खरीदती हुई ताराबाई के घर से मैथू को साथ लाती हुई घर पहुँचती थी। तब सुबह का बिखरा घर समेटने और खाना बनाने-खाने तक वह बुरी तरह थककर चूर हो चुकती थी। आठ-नौ बजे दिवाकर ऑफिस की फाइलों से लदे-फँदे घर लौटते थे और इसके साथ ही वह खाना टेबल पर लगा, बोझिल आँखों से सोने का इंतजार करती पाई जाती थी। इतवार को चित्रा की छुट्टी होती थी और सोमवार को दिवाकर की। दोनों की कॉमन छुट्टियाँ कम पड़ती थीं और पिछले तीन महीनों में वे आपस में सिर्फ जरूरी बातें ही कर पाए थे। रोज की इस बँधी-बँधाई रुटीन में कुछ अनकहे अनजाने कारणों से दिवाकर और मैथिली दोनों कुढ़ते रहते थे। चित्रा को इन दोनों मोर्चो को सँभालना होता था। गुस्से और जिद में एक स्वभाव होते हुए बाप और बेटी में छत्तीस का रिश्ता था। दोनों हद दजें के असहनशील थे।

 

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स्टेशन के भीतर घुसते ही पाँच नम्बर प्लेटफार्म को खाली देखकर यह साफ हो गया कि डबल फास्ट ट्रेन छूट चुकी है। धीमी गाड़ी भी छूटने ही वाली थी और लोग बाहर झूल रहे थे। चित्रा को महिलाओं वाले डिब्बे में चढ़ाकर दिवाकर खुद साथ वाले डिब्बे की भीड़ में धँस गए थे। दोनों के पास द्वितीय श्रेणी के क्वार्टरली पास थे और यूँ भी दोनों भीड़ में साथ यात्रा करने की मनःस्थिति में नहीं थे।

'इतवार को भी इतने लोगों को पता नहीं कहाँ जाना होता है।' चित्रा की अनुभवी आँखें पूरे डिब्बे को टटोल आयीं, 'यहाँ दादर से पहले बैठने की जगह नहीं मिलेगी...।'

 

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...और जगह मिली भी दादर पहुँचकर ही, लेकिन परेल से ही अस्त-व्यस्त कपड़ों में एक थकी हुई महिला दो बच्चों को लेकर ऐन उसके सामने आ खड़ी हुई। एक बच्चा उँगली पकड़े था और दूसरा भूख से बिलबिलाता हुआ माँ के सीने पर मुँह मार रहा था। उस महिला ने बैठने की जगह के लिए दोनों ओर याचना-भरी नजरों से देखा, फिर खड़े-खड़े ही ब्लाउज खोलकर बच्चे को दूध पिलाने लगी। ट्रेन के हिचकोले से वह महिला इधर-उधर लुढ़क रही थी, कभी अपने कपड़े सँभालती, कभी दोनों बच्चों को।

चित्रा से आखिर बैठे नहीं रहा गया और वह कपड़े झाड़ती हुई उठ खड़ी हुई। वह औरत बड़े अकृतज्ञ-भाव से खाली हुई सीट पर बैठ गई। उसने भी औरों की तरह यही समझा कि उसे अगले स्टेशन पर उतरना होगा, लेकिन यह चित्रा की कस्बाई प्रवृत्ति थी कि वह जब-तब बूढ़ी और बाल-बच्चों वाली महिलाओं को जगह दे दिया करती थी, वरना बम्बई में उनके लिए कोई रियायत नहीं थी। लोकल का टिकट लेना हो या बस का क्यू हो, उन्हें अपने नम्बर का इंतजार सबके साथ करना पड़ता था। महिलाएँ भी उसी अनुपात में रूखी और बेदिल थीं। घर से ऑफिस तक रोज ट्रेन में आने-जाने के समय में वे पर्स और थैले बुनती थीं। रोज मिलने वाली महिला सहयात्रियों से बेखबर।

 

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शुरू-शुरू में उसे अपना रोज दस किलोमीटर की दूरी तय करके स्कूल में पढ़ाने जाना बहुत अखरता था और वह हमेशा चौंकती थी, जब दिवाकर छुट्टी के दिन अचानक दोपहर को शहर में, जो घर से हमेशा पच्चीस-तीस मील के फासले पर होता था, फिल्म देखने का प्रोग्राम बना डालते थे और वे दोनों चप्पलें पहन वैसे ही घर से निकल पड़ते थे। दिवाकर उसे चिढ़ाते कि वह बम्बई में रहते हुए भी इस महानगर को अपने तीन वर्गमील के क्षेत्र में फैले कस्बे की ही नजर से देखती है।

दिवाकर के ऑफिस में लोग ठाणा, कल्याण और उससे आगे पूना से भी रोज काम करने के लिए आते थे और उनका अधिकांश दिन सफर में ही गुजरता था। इन सबके मुकाबले उसे अपने-आपको वाकई खुशकिस्मत महसूस करना चाहिए था कि उसका स्कूल घर से सिर्फ दस किलोमीटर के फासले पर था। लेकिन हर साल गर्मी की छुट्टियों में मैथू को लेकर अपने कस्बे में डेढ़ महीना गुजारते हुए उसे वहाँ के हर आदमी से ईर्ष्या होती थी। वहाँ का हर इंसान इतना संतुष्ट, सुखी और अवकाश-प्राप्त दिखाई देता था कि अपनी बम्बई की भागदौड़ वाली मशीनी जिदंगी उसे कहीं भीतर से तोड़ती हुई महसूस होती थी। हर बार उस कस्बे से लौटने के बाद वह दिवाकर को बड़ी गम्भीरतापूर्वक राय देती कि अब वह किसी और शहर में नौकरी तलाश करे। यह महानगर तो सिर्फ गरीबों के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ कर सकता है या व्यापारियों, पैसे वालों और अफसरों के लिए है। नौकरी-पेशा निम्न मध्य वर्ग यहाँ मरते दम तक अपनी परेशानियों से उबर नहीं सकता। दिवाकर भी दो-चार दिन अखबारों की वांट्स देखते, अर्जियाँ भेजते, पर हफ्ता बीतते-न-बीतते सब कुछ फिर से फास्ट, सिंगल फास्ट और डबल फास्ट लोकल की मशीनी रफ्तार में जज्ब हो जाता।

 

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उनसे अधिक इस दफ्तर की आदी हो गई थी मैथिली, जो रोज सुबह वक्त पर उठकर अपने-आप तैयार होती थी और अपनी सारी चीजें समेटने के बाद, मम्मी-पापा के पर्स, कलम और रूमाल वगैरह तैयार कर देती थी। मुलुंड वाले मकान में वह तीन महीने बगैर किसी आया के अकेले काट चुकी थी। वहाँ मम्मी-पापा के जाने के बाद चाबियाँ सँभाल लेती, चंदाबाई के आने पर वह बाकायदा दरवाजा खोलती, उससे काम करवाती, मेज पर ढँका हुआ खाना खाती, स्कूल-जो घर से सटा हुआ ही था, जाती और लौटकर चाबियाँ घुमाती हुई इस उस पड़ोसी के यहाँ खेलती रहती। वहाँ चित्रा की पड़ोसिन बेहद भली और सीधी महिला थीं, घर और मैथिली-दोनों पर वह नजर रखती थीं। इस नए मकान में यह सुविधा और सुरक्षा नहीं थी। दिनदहाड़े यहाँ चोरियाँ होती थीं और मकान से बाहर आते ही खुली सड़क पर दो अंधे मोड़ थे, जहाँ आए दिन दुर्घटनाएँ होती थीं। इस मकान में आने पर एक बड़ा आकर्षण थी-सावित्री, जो चित्रा के साथ ही स्कूल में पढ़ी थीं। चित्रा ने सोचा था, कभी वक्त जरूरत पर उनके पास मैथिली को छोड़ा जा सकेगा, लेकिन अब वह मिसेज शर्मा थीं और शर्मा जी की अमीरी की बदौलत जब-तब घर में 'किटी पार्टीज' आयोजित करती रहती थीं। मैथू उनके यहाँ टी.वी. देखने के लालच में जाती, तो वह घंटे भर में ही मैथू को घर वापस भेज देतीं।

 

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इस मैथिली का जन्म उसी छोटे से कस्बे में अजीबोगरीब शान-शौकत के बीच हुआ था। अपने नाना और दादा, दोनों के परिवारों में वह अपनी पीढ़ी की पहली बच्ची थी और उसका नामकरण संस्कार बड़ी धूमधाम के साथ सम्पन्न हुआ था। दोनों परिवारों ने पास-पड़ोस में जी भरकर मिठाइयाँ बाँटी थीं, हिजड़ों का नाच करवाया था, जिनका प्रवेश ही उस गेट के अन्दर निषिद्ध था। कस्बे के एक जाने-माने पंडित ने बच्ची की जन्मपत्री तैयार की थी और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति समझाते हुए बताया था कि बच्ची पर जन्म से ही साढ़ेसाती चल रही है और लड़की अपने माँ-बाप दोनों पर ही भारी है। कभी माँ बीमार रहेगी तो कभी बाप।

पंडित जी को दिवाकर ने टोक दिया था ''आप यह सब सुनाकर ही हमें बीमार कर रहे हैं। नाम किस अक्षर पर है, यह बताइए।''

पंडित जी भड़क गए थे, ''हमने तो बड़े-बड़े नेताओं की बेटियों का नाम रखा है, आप तनिक धैर्यपूर्वक ध्यान देकर कुंडली सुनिए। आपकी बच्ची का नाम तो बहुत ही सुन्दर अक्षर से है-म से, मेनका रखिए या माधवी।'' उन दिनों वहाँ एक संस्थान द्वारा 'मैथिली-बनवास' नाटक खेला जाने वाला था और दादी ने बड़े चाव से अपनी पोती का नाम मैथिली रख दिया था।

 

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पिद्दी-सी उस मैथिली को सवा महीने की उम्र में ही उस कस्बे से बनवास मिल गया था। चित्रा उसे बम्बई ले आई थी, क्योंकि उसके स्कूल की छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं। बम्बई लौटने के बाद तीन दिन लगातार भाग-दौड़कर किसी तरह उसने एक चौदह साल की लड़की का बंदोबस्त किया था, अपने स्कूल जाने के बाद मैथू को सँभालने के लिए। छुट्टियों के बाद पहले दिन जब वह स्कूल गई थी, उसे यह अनुमान ही नहीं था कि वह अपने में इतना फर्क महसूस करेगी। स्कूल में दिन-भर उसका मन नहीं लगा और वह

छुट्टी होने के इंतजार में खोई-खोई-सी बैठी रही। सारा दिन उसके जेहन में नन्हें-नन्हें कुलबुलाते हाथ-पैर और चमकती हुई आँखें घूमती रही थीं, जिनमें अभी मम्मी की पहचान भी नहीं उभरी थी।

पहला दिन बहुत यातनादायक था । ज्यों ही मैथू का दूध पीने का वक्त होता, वह अपने कपड़े भींगे हुए पाती। यह सिलसिला चार-पाँच दिन चलता रहा। उधर घर में मैथू अपनी बारीक आवाज में दूध के लिए रो रही होती, इधर चित्रा अपने भींगे हुए ब्लाउज से परेशान होकर अपनी छातियों को दबा-दबाकर गिलास में दूध निकालती और वाशबेसिन में गिरा आती।

चौथे दिन उससे जब्त नहीं हुआ और वहीं स्टाफ रूम में मेज पर माथा टिकाकर वह फूट-फूटकर बेतरह रोती रही। उसकी सहकर्मी मिसेज माथुर कारण जानने पर हँस दीं कि इसी स्कूल में काम करते हुए हमने तीन-तीन पैदा किए हैं और तुम्हारा पहला है न, इसीलिए परेशान हो! अरे, बच्चे को पैदा होते ही पाउडर के दूध की भी आदत डालो और स्कूल आने से दो-चार दिन पहले अपना दूध छुड़ा लो। इस सीधी-सी चीज के लिए तुम पाँच दिन से घुल रही हो, तभी मैं कहूँ कि मिसेज दिवाकर की सूरत को क्या हो रहा है, कहीं लड़के की उम्मीद में लड़की पैदा करने के गम में तो नहीं दुबली हो रही...?

 

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धीरे-धीरे चित्रा और मैथू, दोनों को आदत हो गई थी। मैथू, सिर्फ रात को चित्रा की माँग करती और दिन भर अपनी नई-नई आयाओं से खेलती रहती। पर उसकी सेहत हमेशा औसत बच्चे से कमजोर ही रही। घर की बदलती चारदीवारियों और नई-नई नौकरानियों के बीच वह बहुत धीरे-धीरे बड़ी हुई। उसकी आदतें भी कुछ खास आयाओं की दी हुई थीं-उसकी नाक बहती रहती और वह खीजती नहीं। न ही नाक पुँछवाने की जिद करती, पेशाब करने के बाद वह देर तक गीले में ही खेलती रहती, गोद में उठाते ही वह चित्रा की कमर के इर्द-गिर्द टाँगें चौड़ी कर देती, धूल मिट्टी-रेत में वह आराम से खेलती और साफ-सुथरे कपड़े और जूते-मोजों से सजे बच्चों को सामने पाकर वह सहमकर परे हो जाती...

 

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इसी सबकी वजह से एक बार चित्रा ने तय किया था कि अपनी बच्ची की कीमत पर वह नौकरी नहीं करेगी। आया मैथू का पेट तो भर सकती थी, पर माँ के हाथों का स्पर्श और दुलार उसे नहीं दे सकती थी। यों भी जन्म के बाद से माता-पिता के रूप में वे मैथू को पाउडर मिल्क के नियमित डिब्बों और रोज बदलती नौकरानियों के साथ एक लम्बे, नाजायज एकाकीपन के अलावा क्या दे पाए थे? लेकिन लम्बे महानगरीय अभ्यास के बाद वे जान चुके थे कि इस तरह के सवालों का लम्बा सिलसिला था, जो सिर्फ मैथू के प्रति गैर-जिम्मेदारी पर ही खत्म नहीं होता था।

 

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गैर कानूनी मकानों, अनियत-कालीन नौकरी के गलत समझौतों, जिदगी की मशीनी रफ्तार और आवश्यकताओं के क्रूर अर्थगणित ने उन्हें एक असहाय, अव्यवस्थित नागरिक से उठाकर एक निहायत व्यावहारिक और स्वार्थी इंसान में तब्दील कर दिया था। क्षणिक आवेश में नौकरी छोड़ देने का निर्णय चित्रा ने दिवाकर को काफी जोश के साथ सुनाया था, लेकिन ममता का ज्वार उतर जाने पर वह दोनों की सम्मिलित आय में से अपने साढ़े चार सौ रुपये घटाकर किसी चमत्कारी मसिक बजट तक पहुँचने की कोशिश में सफल नहीं हो पाई थी। हर बार महानगर का अर्थशास्त्र उसे मात दे जाता था। दिवाकर ने कुछ भी कहने की जरूरत नहीं समझी थीं और नौकरी छोड़ देने के खयाल को चित्रा ने किसी फिजूल से भावुक सपने की तरह स्थगित कर दिया था।

जब उन्होंने चौथा मकान बदला, तब मैथिली पौने चार साल की थी। यों मकान बदलने का कोई विशेष महत्त्व नहीं था, पर मुलुंड वाले पिछले मकान की पड़ोसिन से मैथू को खासा मोह हो गया था। वहाँ से आने के बाद मैथिली ने हफ्ते भर ठीक से खाना नहीं खाया, बार-बार जिद करती कि वह मकान क्यों छोड़ा, हमें तो आंटी के पास ही रहना था।

चित्रा ने तब अपनी हैसियत से बाहर जाकर अस्सी रुपये महीने पर एक क्रिश्चियन आया रखी थी। लेकिन दस दिन के बाद ही चित्रा ने देखा कि महीने भर का राशन-पानी साफ था, आया के चेहरे की रंगत बदल गई थी और मैथू दुबली होती जा रही थी। उसने आया बदल दी और एक छोटी लड़की रख ली। पर वह लड़की दो दिन में ही बिदक गई कि वह सिर्फ उस घर में अक्खा दिन का काम करेगी जहाँ टी.वी. होगा। चित्रा-दिवाकर के पास न टी.वी. खरीदने के लिए पैसा था, न टी.वी. देखने के लिए वक्त। मैथू भी समझदार हो चली थी। खुद को बहलाने के उसने खुद ही कई साधन ढूँढ़ निकाले थे, कई शौक पैदा कर लिये थे। वह अपने आपसे बातें करती, आईने के सामने खड़े होकर तरह-तरह के मुँह बनाती, अभिनय करती। जब-तब कागज, कूची और रंगों के डिब्बे फैलाए बैठी रहती। स्कूल जाना तो उसने सवा दो साल की उम्र से ही शुरू कर दिया था।

 

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नये मकान में आते ही मैथिली 'बड़े' स्कूल में जाने लगी थी। चूँकि स्कूल ताराबाई के घर से नजदीक था, ताराबाई ही मैथू को स्कूल लेने-छोड़ने जाती थी। पहले ही दिन स्कूल से लौटने पर मैथू ने मुँह फुलाकर चित्रा से कहा, ''मम्मी, आपने हमारा इतना गंदा नाम क्यों रखा?''

''गंदा नाम?'' चित्रा चौंकी, ''मैथिली अच्छा नाम नहीं है क्या?''

''छिः, मैडम को तो हमारा नाम समझ में भी नहीं आता था। पूछ रही थी, मेठीली मतलब क्या होती है?, मैथू सचमुच नाराज थी, ''हमारी क्लास में सबके कितने अच्छे-अच्छे नाम हैं-कैथरीन, रम्या, सुरभि, लिलि, रुचि, रेश्मा। और एक सोनम है, राजुल है। रम्या कहती थी, मैथिली तो मेथी का साग होता है। हम क्या मेथी का साग हैं?''

चित्रा ने उसे समझाया, ''बेटा यह शिकायत तो हर बेटी को अपनी माँ से होती है, चाहे कितना भी अच्छा नाम रख लो। मैं जब छोटी थी न तो तुम्हारी नानी को कहती थी, मेरा नाम चित्रा क्यों रखा? अब आप बड़े होओगे तो अपना नाम बदल लेना।''

'आप बड़े नहीं हुए क्या?' मैथू पूछ उठी थी, ''फिर आपने अपना नाम क्यों नहीं बदला, हम तो अपना नाम अभी बदलेंगे। हमारा ना-म...'' उसने सोचकर कहा, ''चित्रा रख दो।''

चित्रा को हँसी आ गई। वह दो बच्चों वाली महिला, जिसे चित्रा ने बैठने की जगह दी थी, घबरा गई। चित्रा की नजरें शायद उसी पर टिकी थीं। वह औरत एहतियात से अपने ब्लाउज के बटन बन्द करने लगी कि शायद चित्रा उसका ब्लाउज ऊपर चढ़ा हुआ देखकर हँस रही है। कपड़े ठीक करने के बाद वह चित्रा को गुस्से से घूरने लगी।

 

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चर्चगेट पर दिवाकर साथ वाले डिब्बे से कूदकर आते ऐसे लगे जैसे किला फतह कर आए हों। शायद मर्दो के डिब्बे में भी उतनी ही भीड़ थी। बस की नाराजगी, बहस और स्लो गाड़ी की सुस्त चाल में खो चुकी थी। थकान के बावजूद दोनों अब फिल्म देखने के लिए मानसिक रूप से अपने को तरोताजा महसूस करने की कोशिश में थे।

जिस आसानी से वे चर्चगेट पहुँच गए थे, लौटते हुए उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतनी देर लगेगी। पर माहिम और बांद्रा के बीच पाइप लाइन फट जाने से कई गाड़ियाँ कैंसिल हो गई थीं और बसों के लिए बहुत लम्बी कतार थी। आखिरकार बस में सवा दो घंटे की यात्रा कर जब वे बोरीवली पहुँचे तो भूल चुके थे कि जिस फिल्म को देखने के लिए वे चालीस किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं, उसका विषय क्या था।

 

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ताराबाई की झोंपड़ी वाली गली तक आते ही उनके कदम धीमे हो गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि मैथू दूर से ही उन्हें देख गली के नुक्कड़ तक भागी जाएगी। काफी देर भी हो गई थी लौटने में। पर ताराबाई की खोली तक पहुँचकर भी उन्हें मैथू नहीं दिखी।

ताराबाई भीतर से निकलकर आई ''बोत देर लगाया मेमसाब! अइसा नईं करने का। मेरे वूँ  भी रविवार को घर में काम होता हय। अबी देख लेने का मैथू को, तिकड़े बसली हय। छोकरी कुच्छ खाया नईं, पीया नईं, खेलने का बी नईं, बात बी नईं करने का। अब तुमीच देखो। ये रे माथे, काय झाला, ममी आली तुझी।''

मैथू पता नहीं कहाँ से निकलकर चुपचाप आई और चलने को तैयार खड़ी हो गई।

चित्रा ने ताराबाई को रुपये पकड़ाए तो वह नोट साड़ी में खोंसकर झिझकती हुई बोली, ''मेमसाब, एक बात बोलेंगा! तुम अबी और एक पयदा करो। मैथू का साथ खेलने के वास्ते।''

''क्यों, तुझे और साठ रुपये तैयार करने हैं अपने?'' चित्रा हँसी।

दिवाकर ने मैथू को गोद में उठाना चाहा तो उसने हाथ झटक दिया।

''अरे सत्याग्रही बेटा, अभी तक नाराज हैं आप?'' दिवाकर ने उसे थपथपाया। लेकिन वह चुपचाप नाक की सीध में चलती रही।

''तुम्हारी बेटी है आखिर।'' चित्रा बोली

मकान का दरवाजा खोलते ही मैथू अन्दर भागी और जूते उतारकर वैसे ही मोजे पहने हुए पैर सिकोड़कर लेट गई। चित्रा ने देखा वह ठण्ड से काँप रही थी।

''इसकी तबीयत ठीक नहीं लग रही।'' दिवाकर ने कहा और उसे रजाई ओढ़ा दी। मैथू लेटते ही सो गई। दस मिनट बाद चित्रा ने उसे छुआ, तो वह आग की तरह तप रही थी। उसके होंठों पर कुछ अस्पष्ट-सी बुदबुदाहट भी थी।

''इसे तो बहुत तेज बुखार है।'' चित्रा घबराई।

बुखार बहुत तेजी से बढ़ रहा था और जब चित्रा ने मैथू की बगल में थर्मामीटर लगाया तो पारा एक सौ चार को छू रहा था। जिस मैथू को वे सोया समझ रहे थे, वह दरअसल सोई नहीं थी, बेहोश थी और उसी बेहोशी में वह धीरे-धीरे बुदबुदा रही थी। चित्रा ने ठंडे पानी में नमक घोलकर उसके माथे पर गीली पट्टियाँ रखनी शुरू कीं, तो दस मिनट बाद वह कुछ होश में आई।

चित्रा को उसने आँख खोलकर देखा और जैसे ही उसकी आँखों में पहचान उभरी, उसने गीली पट्टी अपने माथे से उतार फेंकी और पलँग पर जोर-जोर से पैर पटकने लगी। अगले क्षण ही उसके हाथ-पैर ऐंठने और दाँत बजने शुरू हो गए। चित्रा ने जबरदस्ती मैथू को गार्डिनल की आधी गोली खिला दी, हालाँकि वह दवा लेने को तैयार नहीं थी।

देर तक मैथू का बदन उसी तरह तपता रहा। चित्रा उसे दवा के दो डोज दे चुकी थी। दोनों बार पसीना आकर बुखार एक डिग्री नीचे उतरा, लेकिन आधे घंटे बाद ही फिर बुखार तेज था। दिवाकर दिनभर की थकान से बिना खाए-पिए, मैथू का छोटा-सा पलँग नीचे खींचकर लेट गए थे और थोड़ी ही देर में हल्के खर्राटों की आवाज हवा में उभरने लगी थी। दिवाकर की नींद गहरी हो, इससे पहले ही चित्रा ने उसे झकझोरा।

दिवाकर चौंककर उठे, ''कैसी है मैथू?''

''पहले से कम है बुखार-टू प्वाइंट टू है। बार-बार पानी माँग रही है, बस।''

दिवाकर ने करवट बदल ली-''अच्छा, मैं थोड़ा लेट लूँ।''

''सुनो!'' चित्रा ने फिर पुकारा, ''कल का क्या करना है?''

''कल?'' दिवाकर पलटे, ''कल तुम छुटटी ले लेना, और क्या!''

''सुनो तो!'' चित्रा खीझी, ''कल मैं छुट्टी नहीं ले सकती, तभी तो कह रही हूँ।''

''अब तुम जानो। मेरे ऑफिस में तो कल इंस्पेक्शन है।'' दिवाकर नींद में थे, ''अच्छा, सुबह देखेंगे। अभी कमर जरा सीधी करने दो।''

''सुबह नहीं, अभी ही तुम सुन लो। स्कूल में युनिट टेस्ट चल रहे हैं और खुर्शीद छुट्टी पर है, दोनों सेक्शन मुझे सँभालने हैं और मैंने पेपर भी सबमिट नहीं किया है। खुर्शीद ऑनरेरी टीचर है, वह जब चाहे छुट्टी ले सकती है, सुन रहे हो?'' चित्रा सुबह का मसला निबटाकर ही लेटना चाहती थी।

''ठीक है। मैं तुम्हारे स्कूल पेपर पहुँचाता हुआ जाऊँगा। तुम फोन कर देना।'' दिवाकर मुँह बिगाड़कर बोले, ''लेकिन मेरे घर रुकने के बारे में सोचना भी मत। दैट इज नॉट टु इम्पासिबल।''

''तुम समझते क्यों नहीं?'' चित्रा की आवाज तेज थी, ''तुम नहीं जाओगे तो नुकसान तुम्हारा ही होगा न। लेकिन मेरे न जाने से सवा सौ लड़कियाँ बैठी रह जाएँगी। इतनी गैर-जिम्मेदार मैं नहीं हो सकती।''

मैथू बहुत थकी आवाज में बुदबुदा रही थी, ''ममा, पानी।'' चित्रा ने चम्मच से उसके मुँह में दो-तीन बार ही पानी डाला कि उसने सिर हिला दिया, ''बस ममा।''

''आप फिर सो गए?'' चित्रा ने दिवाकर को हिलाया, ''बड़े ढीठ हो तुम''

आखिर तय हुआ कि सुबह चित्रा ही स्कूल जाएगी और कोई बंदोबस्त कर जल्दी वापस आ जाएगी। तब दिवाकर ऑफिस जाएँगे। इस नये मकान में आने के तीन महीने बाद उन्हें अच्छे पड़ोसियों की कमी बेतरह खल रही थी।

 

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रात भर मैथू का बदन तपता रहा। उससे ढाई फुट दूर लेटी चित्रा को उसके बदन की आँच और गर्म साँसें छू रही थीं। दिवाकर बहुत थके हुए थे और खर्राटों के बीच-बीच में वह अचानक जागकर पूछ लेते थे कि मैथू कैसी है। रात भर मैथू हर आधे घंटे के बाद पानी माँगती रही थी और चित्रा उनींदी-सी चम्मच उसके मुँह से लगाती रही थी।

सुबह पाँच बजे उठकर चित्रा ने पेपर तैयार किया। मैथू का बुखार देखा। अब भी एक सौ दो था। मैथू के लिए पानी उबालकर रखा। उसे लग रहा था कि ताराबाई के घर का पानी पीते रहने से उसे यह इन्फेक्शन हुआ है। हर बार मैथू के बीमार होने पर उसे उबला हुआ पानी देने का सिलसिला हफ्ते भर ही मुश्किल से चल पाता था।

 

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चित्रा ने घर के सब काम निपटाए, कुकर में चावल-दाल बनाकर रखा और जाने के लिए तैयार होने लगी। दिवाकर को उठाते हुए उसने देखा कि मैथू टुकुर-टुकुर उसकी ओर देखे जा रही है।

चित्रा उस पर झुकी, ''कैसे हैं बेटे आप?'' और उसने मैथू के माथे को चूम लिया। बुखार अब भी तेज ही था। मैथू को उसने दवा दी और कहा, ''हम जल्दी आ जाएँगे, बेटा! पापा से दवा ले लेना और थोड़ा-सा दूध भी पी लेना।'' दिवाकर मैथू के सिर पर हाथ रखे अखबार पढ़ रहे थे।

चित्रा बाहर निकलने से पहले अपने बैग के कागज देख रही थी कि हल्की-सी आवाज आई, ''मम्मी!'' चित्रा ने देखा, मैथू काँपते हाथों से पैरों के जूते पहनने की कोशिश कर रही थी। उसका चेहरा सुर्ख़ था।

''अरे बेटा आपको कहाँ जाना है?'' चित्रा उसके जूते हटाकर उसे सुलाने की कोशिश करने लगी, पर मैथू हाथ-पैर चलाने लगी।

''हम ताराबाई के घर जाएँगे तुम्हारे साथ। ''

दिवाकर ने अखबार फेंक एक ओर से मैथू को पकड़ा, ''बेटे आप बीमार हैं।''

मैथू चिल्लाने लगी, ''नहीं, हम ताराबाई के घर जाएँगे।'' और फिर अपने जूते लेने के लिए दिवाकर का हाथ झटककर पलँग से उतर पड़ी।

चित्रा-दिवाकर दोनों ने उसे थामा, पर वह हाथ-पैर पटकती, चीखती जा रही थी, ''मम्मी जाओ ऑफिस! पापा जाओ ऑफिस। हम भी जाएँगे। हमारे जूते दो, मम्मी! हमको मत पकड़ो, पापा...''

और वह दुबारा बेहोश हो गई थी।

दिवाकर कमीज गले में डाले किसी डॉक्टर को ढूँढ़ने निकले। चित्रा बार-बार घड़ी देख रही थी कि उसे टैक्सी ही लेनी पड़ेगी-यानी आठ रुपये पैंसठ पैसे।

सामने कैलेंडर था और मैथू को पाँच साल की होने में पूरे नौ दिन बाकी थे। हर साल अपनी इकलौती बेटी का जन्मदिन वे बड़ी धूमधाम से मनाते रहे हैं!   

#महानगर की मैथिली

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