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दोस्ती - एक लिफाफा
दोस्ती - एक लिफाफा
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© Tanha Shayar Hu Yash

Drama

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दोस्ती, कहा जाता है कि दोस्ती दुनिया का सबसे अनमोल खज़ाना है। यह जिसके पास हो उसे दुनिया की कोई ताक़त हरा नहीं सकती। दोस्ती भी प्यार की तरह ही होती है, अगर यह दिल से जुड़ी हो तो फिर इसे दुनिया की कोई चीज़ हरा नहीं सकती न ही ख़त्म कर सकती है। प्यार के बाद दोस्ती या प्यार से पहले दोस्ती आती है, यह तो एक अलग बात है पर आप जिसको ज़्यादा महत्व देते हैं - वह ही पहले है, मैं “तनहा” ऐसा ही मानता हूँ बल्कि कोई भी रिश्ता वह ही पहले है जिसे आप महत्व देना चाहते हैं या देते हैं। पर मैं फ़िलहाल दोस्ती पर लिख रहा हूँ तो बाकियों की कहानी फिर कभी।

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे आप खुद बनाते हैं, खुद ही आगे बढ़ाते हैं, खुद ही मिटा भी देते हैं, अब दोस्ती जरूरी नहीं कि तभी पक्की हो जब आप हमउम्र हो, यह किसी से भी हो सकती है कभी भी हो सकती है। यह कहानी भी ऐसे ही दो दोस्तों की है।  

तो पहले मैं दोनों के बारे में थोड़ा आपको बता देता हूँ सुधीर - ना काम करने की टेंशन, ना काम करने की फ़िक्र, माँ बाप ने बहुत पैसा छोड़ रखा है और सही बात यह है कि इन्हें काम करके कमाने खाने की थोड़ी कम आदत है और मेहनत भी नहीं होती। तो जो भी पैसा माँ बाप ने कमाया है उसे ही इस्तेमाल करके अपना जीवन हँसी - ख़ुशी निकाल रहा है।

दूसरा रघु - पढ़ा लिखा पर कोई नौकरी देने को तैयार नहीं, माँ बाप दोनों ही भगवान को प्यारे हो चुके हैं और ज़िंदगी से लड़ने के लिए छोड़ गए रघु को। 

इन दोनों की दोस्ती की भी अजीब कहानी है। इन दोनों की दोस्ती रेड लाइट पर हुई थी, जब एक बार सुधीर अपनी कार से रात को ज्यादा पीकर रेड लाइट पर ही सो गया था तब रघु ने उसे होश दिलाया, उठाया और उसी दिन से सुधीर जब भी उस लाइट से गुज़रता रघु से मिलकर जाता था। ऐसे इनकी दोस्ती ना जाने कब जान से प्यारी हो गई पता ही नहीं चला। अब आपके दिमाग में एक सवाल और होगा ये रघु ज़्यदातर रेड लाइट पर ही क्यों मिलता है ? अरे भाई यह भिखारी है जो और चार पांच लोगों के साथ मिलकर यह काम करता है और अपना और अपने साथियों का पेट भरता है।

एक दिन सुधीर ने रघु से कहा,

"यार रघु, मैं बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रहा था तुमसे, सोचा आज कह दूँ।"

रघु : "सुधीर, जानता हूँ तू क्या कहना चाहता है, यही ना कि मैं यह सब छोड़ दूँ और तेरे साथ रहने लगूँ ?"

सुधीर : "जब जानता है तो मेरे साथ क्यों नहीं रहता ?" 

रघु : "यार मैं यहाँ खुश हूँ और मैंने बहुत दुनिया देखी है और फिर इन सबको कौन देखेगा, इनका मेरे सिवा और मेरा तेरे सिवा अब है कौन ?"

सुधीर पहले भी ऐसी कई नाकाम कोशिशें कर चुका था पर रघु यहाँ से जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। फिर सुधीर ने इस बात को खत्म करते हुए कहा,

"अच्छा चल कोई बात नहीं, यह बात तेरी मान ली पर तुझे भी आज मेरी एक बात माननी पड़ेगी।"

रघु : "हाँ, इसके अलावा कोई भी बात मान लूंगा, तू एक बार बोल।"

सुधीर : "मेरा मन है कि हम दोनों एकसाथ पार्टी अटेंड करें, खूब नाचेंगे और पिएंगे।"

रघु : "वैसे तो मैंने कभी पी नहीं। तुझे पता है और यह डांस पार्टी वगैरह भी, अच्छी नहीं लगती पर तू कहता है तो तेरे साथ एक बार जरूर चलूँगा। पर…।"

कहते - कहते रघु रुक गया। सुधीर भी समझ गया था की रघु की यह किन्तु, परन्तु , पर क्या है ? वह बहुत गरीब है और उसके पास ऐसे कपड़े भी नहीं है कि वह उसके साथ पार्टी में जा सके।

सुधीर : "यार अब पर के पर मत लगा। मुझे भी पता है कि तू क्या सोच रहा है ? तू किसी बात की फ़िक्र मत कर, बाकी सब मुझपर छोड़ दे।"

बस फिर क्या था, सुधीर रघु को अगली रात अपने साथ एकदम हीरो बनाकर कर ले गया और दोनों ने वहाँ खूब धमाल मचाया, रघु ने भी सुधीर के कहने पर थोड़ी पी ली थी और बहक गया था। पर दोनों ने खूब मस्ती की, खूब नाचे और फिर सुधीर रघु से बोला -

"चल यार, आज तू मेरे घर चल। वहीं सो जाना।"

रघु : "नहीं यार, आज मैंने तो बहुत खा पी लिया पर ना जाने मेरे उन साथियों का क्या हुआ होगा ? उन्हें आज भर पेट खाना भी मिला होगा या नहीं ? मुझे अब चलना चाहिए।" 

सुधीर के लाख समझाने के बाद भी रघु नहीं माना तो सुधीर खुद ही उसे रेड लाइट पर छोड़ आया और जबरदस्ती उन सबके लिए खाना भी दे दिया। यहाँ रघु ने भी सुधीर की बात मान ली। और सबको खाना बाँट दिया।

ऐसे ही कहानी आगे चलती रही और दोनों की दोस्ती गहरी होती गई पर एक दिन सुधीर का एक आदमी रघु के पास आया और बोला कि सुधीर की तबीयत अचानक बहुत ख़राब हो गई है और वह आखिरी स्टेज पर है। उसकी दोनों किडनी ख़राब हो गई हैं ज़्यादा शराब पीने से…।

रघु अस्पताल पंहुचा तो पता चला कि उसकी जान बचाई जा सकती है अगर किसी की किडनी उसकी किडनी से मिल जाए। रघु के टेस्ट कराने के बाद पता चला कि रघु की किडनी सुधीर की किडनी से मिल रही है और रघु, सुधीर के लिए जीवन दान बन सकता है। डॉक्टर्स से बात करके रघु ने ऑपरेशन की डेट ले ली और सुधीर से मिलने उसके रूम में गया। 

सुधीर : "यार मैं तुझे ही याद कर रहा था, सोचा अगर तुझसे मिले बिना मर गया तो मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।"  

रघु : "अब तू ज़्यादा मत बोल, तुझे डॉक्टर्स ने कम बात करने के लिए बोला है और तुझे कुछ नहीं होगा। मैं हूँ न तेरे साथ , तू बिलकुल भी चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा।"

सुधीर : "अब कुछ ठीक नहीं होने वाला यार, बहुत देर हो गई। देख कुदरत का खेल, तू इतना पढ़ा - लिखा होकर भी क्या कर रहा है और मेरे पास सब कुछ होने के बाद भी मैंने कुछ नहीं किया।"

रघु : "यह सब जाने दे यार, और अपना ध्यान रख तुझे कुछ नहीं होगा।"

सुधीर : "तू आ गया मुझे चैन मिल गया। मुझे तुम्हे कुछ देना है ।"

उसने अपने तकिये के नीचे से एक लिफाफा निकला और रघु को दिया,

"यह रख लो, यह तुम्हारे लिए है।"

रघु : "नहीं, मैं यह नहीं लूँगा।"

सुधीर : जानता हूँ कि तुम बहुत खुद्दार हो इसीलिए पैसे नहीं दे रहा। पढ़ लेना कुछ लिखा है तुम्हारे लिए।"  

रघु : "ठीक है। रख लेता हूँ , अब तुम आराम करो।"

यह सब कहकर रघु सुधीर को सुलाकर वहाँ से निकल जाता है। निकलते - निकलते रघु को बहुत देर हो जाती है, उधर जाकर पता लगता है कि आज रेड लाइट पर रह रहे लोगों को पुलिस ने निकाल भगाया है और आज उनको खाना भी नसीब नहीं हुआ। यह बात रघु को हिलाकर रख देती है और रघु सोच में पड़ जाता कि अगर एक दिन में इन लोगों का यह हाल हुआ है तो अगर मैंने ऑपरेशन कराया तो ये सब तो भूखे ही मर जायेंगे। रघु अपने दिल पर पत्थर रख लेता है और ऑपरेशन वाली डेट पर नहीं जाता। और दो तीन दिन बाद उसे पता लगता है कि सुधीर ने अपनी अंतिम सांस ले ली। 

सुधीर का अंतिम संस्कार हो जाता है पर रघु वहाँ भी नहीं जाता। क्योंकि अब रघु भी टूट चुका था और रो - रोकर उसका भी बुरा हाल था। कुछ दिन बाद रघु को उसके दिए लिफाफे की याद आती है। वह उसकी अंतिम निशानी समझ कर उसे खोलता है और पढ़ता है। 

"कैसा है मेरा खुद्दार दोस्त ? मैं जानता हूँ कि तू मुझे बहुत प्यार करता है और ना जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तेरी किडनी मेरी किडनी से मिल जाएगी और तू अपनी किडनी मुझे दिए बिना नहीं रहेगा। पर यार तेरे पीछे से इन सबका ख्याल कौन रखेगा ? ऑपरेशन के बाद दो महीने तक बिस्तर से उठ नहीं पायेगा। मैंने तो अपनी मौत खुद बुलाई है। तू ऐसा न करे इसलिए मैं आज ही खुद को ख़त्म कर रहा हूँ और यह पेपर लेकर तुम इस कंपनी के मैनेजर से मिल लेना। ये कंपनी मैंने गरीब लोगों के लिए बनाई है जो यहाँ मेहनत करके, काम करके अपना जीवन आगे चला सके, और जिसको अब तुझे ही संभालना है। और हो सके तो इस कंपनी में हर जरूरत वाले आदमी को काम देना और इसे बहुत बड़ी कंपनी बनाना। मैं भी पागल हूँ, ये तो तू कर ही लेगा ! बस एक गुज़ारिश है कि मुझे जलाना से पहले मुझे एक बार गले लगा लेना। अच्छा दोस्त, अलविदा ! चलता हूँ...।"

[ आपका अपना दोस्त ©तनहा शायर हूँ ]

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