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परायी महक
परायी महक
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© Neelima Sharrma

Inspirational

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कितनी मुश्किल से मनाया था उसको मिलने के लिए। एक वक़्त था,एक दिन भी बिना मिले रह नही पाती थी। बस यही कह देती थी किमेरी गली का एक चक्कर लगा जाओ बाइक से; और इस बार मिन्नतें करनी पड़ रही थीं! ना जाने कितने वादे लिए उसने, ना जाने कितनी बार समय सीमा की गुहार की…..कितनी बार दिन तय करने के बाद मुकर गयी।

ये लडकियाँ जब जिन्दगी में होती हैं तब भी दर्द देती हैं; जब नहीं होती तब भी बेदर्दी होकर ता-उम्र दर्द देती हैं। पहले सुबह उठते ही याद आता था--उफ़, उसकी छुट्टी हो गयी होगी ट्यूशन से। और भागकर चन्नी की दुकान पर जा खड़ा होता था ब्रेड लेने के बहाने और अम्मा से रोजाना गालियाँ खाता था कि रोटी नहीं खायी जाती तेरे से, जो रोजाना यह मैदा उठा लाता हैं। 

आह! और कितना इंतज़ार करना होगा उसका? आएगी भी या नहीं! कहीं इस बार भी मैं उसके झूठे वादे पर विश्वास कर गया!!

आज आएगी वो। विश्वास कर मैं एक घंटा पहले ही पहुँच गया था। देखना चाहता था--अब कैसी लगती है। दस साल हुए उसे देखे, पहचान भी पाऊँगा या नहीं? उसकी आँखें क्या आज भी वैसे ही चमक उठेंगी जैसे तब चमकती थीं? क्या आज भी वो गोलगप्पे खाने की जिद करेगी न्यू मार्किट में?--सोचों में गुम था कि घर से फ़ोन आ गया। सुनते-सुनते अचानक लगा--कोई है पीछे। जैसे मैंने मुड़कर देखा--आहा !!! नीले सूट में पहले से भी ज्यादा खूबसूरत। उफ़! उस वक़्त कितना अफ्सोस हुआ अपनी किस्मत पर मैं जानता हूँ या मेरा रब।

आर्किड रेस्त्रां की पहली मंजिल पर हम पहले भी घंटों बैठा करते थे। पर अब उसने कहा--नहीं, यहीं नीचे ही ठीक हैं; उप्पर तो………। समझ आ गया मुझे--वही, उसका पराया होना। … मेरी आँखें कुछ ढूढ़ रही थीं, पर नहीं ढूढ़ पा रही थीं। क्या था जो छूट गया था।… उसकी हंसी आज भी दिलकश थी पर उसमें खनक गायब थी। उसकी रंगत आज भी गुलाबी थी पर उसमें मेरा रंग नहीं था। उसकी महक आज भी मादक सी थी, पर करीब आने को आमंत्रित नही कर रही थी।

पूरे बीस मिनट तक वो मेरे साथ थी; न उसने ज्यादा कुछ बोला न मैंने कुछ ज्यादा पूछा। बस यही कि "वक़्त कैसे गुजरता है?" मैंने कहा, "गुजर ही रहा है बस तुम्हारे बिन।"

सच है, पुरुष वक़्त निकाल ही लेते हैं और स्त्रियाँ वक़्त काट ही लेती हैं।सोचता था--जब मिलेगी तो यह बात करूंगा, वो बात करूंगा; पर बात ही कुछ न हुई और उसकी समय-सीमा ख़तम हो गयी। एक महक जो मैं कई बरसो से भीतर समाये था अपने; आज वहीं छोड़ आया हूँ। वो महक अब मेरी-सी नहीं थी।

मुझे जीना होगा अब उस महक को सीने से लगाकर, जो पिछले 5 साल से एक फ्रेम में जड़कर मेरे सिरहाने मुस्कुराती है; और मेरे साथ वाले बिस्तर पर चुपचाप सो जाती हैं…अक्सर उदास-सी।

महक स्त्री पुरुष

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