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छोटी सी भूमिका
छोटी सी भूमिका
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© Sandhya Bakshi

Drama Tragedy

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फरवरी की गुनगुनी धूप बगीचे में पसरी हुई थी। पुष्पा ने मेरे लिए, मेज़-कुर्सी और चारपाई लगा दी थी। मैंने डायरी व पेन मेज़ पर रखे और चारपाई पर कमर सीधी करने लेट गई। बालों में जहाँ रबर-बैंड बंधा था, वहां से बाल अभी भी गीले थे तो वह भी यह सोच कर हटा दिया कि अब जो उलझने हैं सो उलझेंगे ही, कम से कम सर तो नहीं दुखेगा।

भूमिका आती ही होगी.... बस आते ही चिल्लाएगी, "क्या मम्मी, बाल उलझ रहे हैं ! … देखो, मिट्टी में टच हो रहे हैं, बांधो इन्हें।" फिर खुद ही ढीली-सी चोटी गूंथ देगी और रबर-बैंड लगा देगी। पास ही मुंडेर से लिपटी हुई बोगनवेलिया की बेल से, बड़ा सा गुच्छा लेकर, मेरे बालों में लगाकर, बड़ी अदा से कहेगी, "वाओ, हीरोइन लग रही हो !" पता है ना मुझे, रोज़ के यही ड्रामे हैं उसके।

जब से बारहवीं कक्षा में आई है, कुछ अधिक ही चंचल और वाचाल हो गयी है। मार्च में इम्तेहान हैं, उँगलियों पर गिनने लायक दिन बचे हैं पर मजाल है ज़रा भी सीरियस हो जाये इसके पापा से कहती हूँ तो, सीमित सा जवाब मिल जाता है, "बच्ची है,.... हमेशा पीछे न पड़ी रहा करो। उसको पता है, उसे कब और कितना पढ़ना है।" मैं भी सोचती, ठीक है भई, पता है तो पढ़ लेगी, मैं क्यों अपना जी जलाऊँ। पर सच कहूँ तो, यही तो दिन हैं इसके हँसने- खेलने के, फिर बाद में तो, औरत को जीवन में मुस्कराने की भी, कब फुर्सत मिलती है ?

भूमिका, आते ही चाय मांगेगी, इन दिनों उसे भी अदरक वाली चाय अच्छी लगने लगी है।

"पुष्पा, ओ पुष्पा !" मैंने आवाज़ लगाई।

"जी मेम-साब"

"दो कप चाय चढ़ा दे और हाँ ,कांच वाली केतली को ......."

"जी मेम-साब, पता है ,कांच वाली केतली को गरम पानी से धोकर, उसमें छानना।" मेरी बात पूरी होने से पहले ही पुष्पा बोल पड़ी।

"अरे वाह ! बड़ी सयानी है तू तो, कप भी गरम पानी से धोकर, ट्रे में उलटे लगा कर लाना।"

"जी, मेम-साब।"

"भूमिका,उफ़ ! ,साफ़-सफाई के मामले में तो मेरी माँ की भी माँ है वह। इसीलिए उसके लिए स्पेशल बोरोसिल की केतली लाई हूँ, जो चाय के दाग जमने की कोई गुंजाइश ही ना रहे। आते ही दस तो कमियाँ गिना देगी, "ट्रे साफ़ नहीं है, कप सीधे रखे हैं, कोई मक्खी बैठ गई होगी तो ?……… आप ही पी लो !"

फिर मेरा उसको मनाना,"अरे बच्चे ! पी ले ना, ठहर, मैं दोबारा धो के लाती हूँ।"

"अब रहने दो ,और ठंडी हो जाएगी ,…पी लेती हूँ।"

फिर हम दोनों चाय पीते हैं। मुझसे भी लम्बी है। कद अपने पापा पर है, पर हरकतें, बस वही बच्चों जैसी।

मेरे डायरी और पेन उठाते ही, झट से पेन छीन लेगी, हाथ में पेन नाचते-नाचते हुए कहेगी,

"नो ! नो, नो, नो !…… लेखिका महोदिया, सर्व-प्रथम कुछ वार्तालाप कर लें ? तत्पश्चात, शौक़ से आप अपना लेखन कार्य निर्विघ्न संपन्न करें।" …… इस पर मैं अगर मुस्करा दूँ, तो और शह मिल जाती है। झट से पेन छुपा देगी।

फिर हम माँ-बेटी थोड़ी सी गप-शप करते हैं, थोड़ी शिकायतें होती हैं, थोड़ी मनुहार होती है। तब तक धूप भी मेरी मेज़-कुर्सी से खिसक कर, बोगनवेलिया के फूलों को आगोश में ले लेती है और वहां बैठी सारी गिलहरियाँ नीचे उत्तर आती हैं। तब हमारी यह शहज़ादी, छुपाया हुआ पेन हमें लौटाकर, फरमान ज़ारी करती हैं,"अब लेखनी मुखर हो !" ....... और खुद इन नन्ही गिलहरियों में मशरूफ हो जाती हैं।

है तो पूरी नटखट और चुलबुली ,पर बहुत प्यारी…हाँ ,सबसे प्यारी। गोरा-गट चेहरा और परियों जैसे बाल हैं उसके। नवीं, दसवीं तक तो अक्सर तेल लगवा लेती थी पर अब....... अब तो बस सर धोने से एक घंटा पहले तेल लगाएगी और घंटे भर बाद धो डालेगी। अब कैसे समझाए कि तेल और वक्त दोनों की बर्बादी है…?

उस पर तुर्रा ये कि, "इसके पीछे साइंटिफिक रीज़न है…आप नहीं समझोगी !"

"ठीक है भई ! साइंस तो बस इन्हीं के बाप की जागीर है, हमने तो कभी पढ़ी ही नहीं जैसे।" मैं भी यूँ ही बड़बड़ा कर चुप हो जाती। आज आएगी तो तेल भी लगा दूंगी, कल रविवार है, कम से कम रात भर तो सर तर रहेगा।

"पुष्पा …"

"जी मेम-साब"

"ज़रा लोहे की ढूंड़ी में तेल सीलमिटा कर के दे-दे,…… भूमिका बस आती ही होगी.... और हाँ ढककर लाना, खुला देखेगी तो बस शुरू हो जाएगी, "धूल-मिट्टी गिर गई होगी.... मैं नहीं लगवाऊँगी।"

पुष्पा चाय रख कर चली गयी। भूमिका अभी तक नहीं आई, ज़रा भी परवाह नहीं है कि माँ इंतज़ार कर रही होंगी, लेट आना था तो फोन तो कर ही सकती है। मैं इन्हीं ख्यालों में थी कि उसके पापा आ गए।

"सुनिए, भूमिका अभी तक नहीं आई.... चाय भी ठंडी हो रही है, सर में लगाने के लिए तेल भी गरम करवाया है, मैं उतावली होकर बोल पड़ी।

"कब तक यूँ ही चाय बना कर उसकी बाट जोहती रहोगी ? कब तक रोज़ तेल गरम करवाती रहोगी ? हकीकत को मान क्यों नहीं लेती ? हम दोनों की कहानी में उसकी बहुत छोटी सी भूमिका थी, वह अब नहीं है,…कहीं नहीं है !", भूमिका के पापा ने ज़ोर से झकझोरा तो मेरा दिवास्वप्न टूटा, कटु यथार्थ में लौट आई।

अविरल अश्रुओं साथ वे मुझे समझाए जा रहे थे,… "हमारी कहानी लिखने से पहले विधाता ने उसकी 'भूमिका' लिखी,…जिसमे लिखा की यह नन्ही परी इस संसार लिए कुछ ज्यादा ही खूबसूरत है इसलिए इसकी जगह मेरी गोद में है। …वह ईश्वर के पास है, सुरक्षित है।"

सब शांत सा हो गया, विचारों की लम्बी शृंखला को विराम लगा हो जैसे।

तभी हल्की बयार चली…बोगनवेलिया से एक फूलों का गुच्छा मेरे बालों में आकर अटक गया और एक नन्ही गिलहरी हाथों में पेन उठाए मेरे पैरों के पास आकर बैठ गई, जैसे कह रही हो,…

"अब लेखनी मुखर हो !"

बेटी ईश्वर माँ

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