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मवाना टॉकीज भाग 7
मवाना टॉकीज भाग 7
★★★★★

© Mahesh Dube

Thriller

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अचानक भक्क की आवाज के साथ स्क्रीन रोशन हो गई और उसपर वही पुराने मंदिर वाली फिल्म चलने लगी। सोमू समझ नहीं पाया कि यह सचमुच चल रहा है या उसकी कल्पना का खेल है? पर उसने देखा कि चटर्जी की आँखें भी आतंक से फैल गई थी। अभी दोनों ने ऊपर जाकर देखा था तो प्रोजेक्शन रूम बिलकुल खाली था और अब फिल्म चलने लगी थी। आखिर इतनी जल्दी वहाँ प्रोजेक्टर आया कहाँ से? 
डॉ साहब! वह जोर से चिल्लाया, आप देख रहे हैं न? फिल्म चल रही है 
डॉ चटर्जी कुछ बोलने की हालत में नहीं थे। उनके पूरे बदन से परनाले की तरह पसीना बह रहा था। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। लेकिन जिंदगी भर की हुई पढ़ाई ने आतंक पर विजय पाई और इस घटना का तर्कपूर्ण उत्तर ढूंढने के लिए वे जोर लगाकर उठ खड़े हुए और किसी तरह लड़खड़ाते हुए वे फिर ऊपर की दिशा में बढ़े। सोमू उनके पीछे चल पड़ा। वह जल्दी जल्दी कुछ बोलता जा रहा था लेकिन डॉ चटर्जी कुछ सुन और समझ नहीं पा रहे थे। दोनों झपट कर प्रोजेक्शन रूम में पहुंचे और वहाँ का दृश्य देखकर हैरान रह गए। एक काला सा मरियल लड़का जिसकी लंबी दाढ़ी थी और जिसे देखकर लगता था कि वह कई दिनों से नहाया नहीं है, बड़े मनोयोग से प्रोजेक्टर चला रहा था। उसे देखते ही दोनों की आँखें आश्चर्य से फट पड़ी थी। अचानक थोड़ी आहट होने पर उस लड़के ने मुड़कर इन दोनों को देखा और बुरी तरह घबरा गया। घबराहट में वह अपने स्टूल से गिर पड़ा और जोर से चिल्लाया। डॉ चटर्जी ने लपक कर उसे सहारा देकर उठाया और बोले, कौन हो तुम? और यहाँ क्या कर रहे हो? 
मैं तो मनोहर हूँ, मनोहर सानप!! यहाँ का केयर टेकर। लेकिन आप लोग कौन है? वह काँपता सा बोला। 
वैसे यह जानकर कि वे दोनों भी हाड़-मांस के इंसान ही हैं वह थोड़ा सहज हो रहा था। 
मैं डॉ चटर्जी हूँ, और यह सोमू है मेरा पेशेंट! लेकिन अचानक आकर तुम फिल्म क्यों चलाने लगे? 
साहब! मनोहर थूक निगलता हुआ बोला, इस प्रॉपर्टी के मालिक नारायण मवाना साहब तो अब नहीं हैं लेकिन उनकी पहली पत्नी से पैदा हुए लड़के राजवीर लंदन में रहते हैं। उन्होंने मुझे यहाँ की देख रेख का काम सौंपा है तो मैं कभी कभी यहाँ आकर देखभाल करता हूँ साहब। 
वो तो ठीक है, लेकिन अभी कुछ समय पहले हम यहाँ आये थे तब यहाँ न प्रोजेक्टर था न तुम थे। फिर अचानक कैसे? 
साहब! मनोहर बोला, प्रोजेक्टर तो इसी दीवार में बनी अलमारी में हमेशा रखा रहता है और प्रोजेक्शन रूम के पीछे एक लोहे की सीढ़ी है जिससे होकर इसमें आया जा सकता है तो मैं घर से सीधे आकर इसमें दाखिल हुआ और फिल्म चला दी, तबतक आप लोग आ गए। राजवीर साहब का फोन आया था कि वे एक हफ्ते में आने वाले हैं तो मैं चेक कर रहा था कि सब ठीक है कि नहीं! 
चटर्जी साहब ने संतुष्टि पूर्ण ढंग से सर हिलाया और सोमू से बोले, देखा? अब समझे न? यहाँ कोई भूत प्रेत नहीं है। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो हमारी समझ में नहीं आती तो हम घबरा कर उसे भूत प्रेत की संज्ञा दे देते हैं। 
सोमू ने सहमति में सिर हिला दिया। 
चटर्जी ने आगे कहा, कल भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा, तुम्हारी उपस्थिति से अंजान मनोहर ने फिल्म चलाई होगी और तुम घबरा गए होंगे। भयानक औरत तुम्हारी कल्पना की उपज रही होगी। सत्य और कल्पना के मेल से तुमने एक भयानक कहानी बना ली। क्यों मनोहर, अब वे मनोहर से मुखातिब हुए, कल भी तुमने इसी समय आकर फिल्म चलाई थी न? 
नहीं साहब! मैं तो आज ही आया हूँ। कल तो क्या, मैं पिछले महीने भर से इधर फटका तक नहीं! चटर्जी का मुंह आश्चर्य से खुल गया। 
सोमू भी किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया।

 

भुतही कहानी

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