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© Sandhya Tiwari

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रात्रि भोज के लिये खाने की मेज पर बैठे बैंक मैनेजर मिस्टर एस लाल पचास साल पीछे की सीढियां उतर गये ,जब वह सुखिया हुआ करते था। बस जब गाँव की पाठशाला में हाजिरी होती थी तब सुखलाल नाम सुनाई पड़ता था। नही तो ये सुख्खी, ये सुखिया ऐसे सम्बोधन ही अन्तरमन पर गुदे हुये थे। उसे अच्छी तरह याद है गाँव का नाम, सौंखिया था। लेकिन गांव में जाति के आधार पर टोले बटें थे जैसे पसिया टोला, कुम्हारनटोला और उसका बाला था चमारन टोला।
>> उफ्फ !! झुरझुरी आ गई एस लाल को। पूरी खाल में चामरौधे की सडान्ध भिद गई।
>> "खाना लगा दिया है "पत्नी मायावती की आवाज से वह वर्तमान में लौटे
>> "कुसुम कहां है? खाना नहीं खायेगी क्या?" एस लाल ने पूछा
>> "अपने कमरे में है आती होगी ।आज ऑफिस से देर से आयी थी। कह रही थी, ऑडिट है, थोडा काम करना है।"
>> "हूंऽऽऊं ।अरे वाह ! आज तो पनीर और खीर दोनो मेरी मनपसन्द चीजे बनायीं हैं क्या बात है, कुछ कहना है क्या?
>> "जी" मायावती कुछ संकुचाते हुये बोली "कुसुम के साथ एक लडका काम करता है.. अच्छी पोस्ट पर है... और दोनों एक दूसरे को पसन्द भी करते है, आप कहें तो........?"
>> "ठीक हैऽ ,ठीक हैऽ ,भाई । हमें क्या आपत्ति हो सकती है ।" खीर गटकते हुये उन्होने
>> पत्नी को प्यार से देखा ।
>> "लेकिन वह............."पत्नी हकलायी
>> "लेकिन क्या ? "एस लाल विराम चिह्न से प्रश्नवाचक बन गये थे।
>> "जी वह..... मु......स......ह....र "
>> अचानक खीर के बर्तन में सुअरों को अपनी थूथन घुसाते देख सुखिया से एस लाल बने सुखलाल अगिया बेताल बन गये।

haklaana botal prashan

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