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मुखौटे
मुखौटे
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© Bhavana Shukla

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राघव अनपढ़ विधवा से प्यार कर बैठता है और शादी अपनी मर्जी से कर लेता है। घर पर सिर्फ दादी को छोड़कर किसी ने भी वानी को  मन से नहीं अपनाया। वानी ने कहा राघव तुम परेशान मत हो, एक न एक दिन मैं सबका मन जीत लूंगी। लेकिन घर के लोग अक्सर वानी की गलतियां गिनाते उससे ठीक से पेश नहीं आते। वानी परेशान रहने लगी। सास ने कहा तेरा यहाँ मन नहीं लग रहा तो तू मायके जा, वानी बोली मैं नहीं जाऊँगी मैं ठीक हूँ। एक दिन तपती दोपहर में वानी कमरे में कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही थी, तभी उसे बड़ा गेट खुलने की आवाज आई। उसने देखा, मुरारी माँजी के कमरे की ओर जा रहा है। वह भी मुरारी का पीछा करते हुए माँ जी के कमरे तक चली गयी, वहां उसने देखा कि कमरे में मांजी, दादाजी और मुरारी आपस में पुश्तैनी धन को छिपाने की बात कर रहे हैं। दादा कह रहे थे कि सब कुछ मेरी ताईजी का हैं मेरा थोड़ा ही हैं, पर ये बुढ़िया मरती भी नहीं, यहाँ आ गई सब कब्जा करने के लिये। दादा ने कहा- मुरारी कोई चालाकी नहीं करना वरना मैं देख लूंगा तुम्हें। मुरारी ने सिर झुका कर कहा- जी मालिक, आप निश्चिंत रहिये। इतना कह कर दादा कमरे से निकल जाते हैं। तब मांजी कहती हैं- मुरारी काश उस दिन मेरे पति की जगह ये बुढ्ढा टपक जाता तो कितना अच्छा होता। ये सुनकर वानी घबराकर भागती है और कमरे के किनारे रखा गुलदस्ता गिर जाता है। ये लोग दौड़ कर देखते हैं, कौन है? लेकिन वानी अपने कमरे में पहुँच जाती है और मांजी को वहाँ एक बिल्ली घूमती नजर आती हैं तो उनकी जान में जान आती हैं कि कोई नहीं हैं वहाँ।

लेकिन दादा ने देख लिया था वानी को वहां से जाते हुए। दादा ने यह बात माँजी और मुरारी को बताई कि वानी ने घर के सदस्यों का रहस्य जान लिया है। सुबह माँजी वानी से पूछा- अरी सबकी प्यारी बहुरिया रात को क्या सुनकर भागी कमरे से हमने सब जान लिया है। वानी थोड़ी देर चुप रही फिर आहिस्ता से बोली, हमें आप सबके कारनामों  का पता चल गया है। अब सबको हम बता देंगे। उसी समय कमरे में आते हुए दादा ने हँसते हुए कहा- लेकिन तुम्हारी बात मानेगा कौन? कोई सबूत है तुम्हारे पास हमारे खिलाफ? वानी को दादाजी की बात बुरी लगी, वह उन्हें जवाब देना चाहती थी, तभी राघव आ जाता है और वानी को गलत समझता है और उसे उसकी माँ के यहाँ छोड़ देता है। वह राघव से मिन्नत करती है एक बार मेरी बात सुन लो, तब फैसला करो पर वह बिना कुछ सुने उसे उसकी माँ के यहां छोड़ आता है।

वह माँ को सब कुछ बताती है और सब उसे हिम्मत दिलाते हैं। वानी तुझे सबके चेहरों की नकाब को हटाना ही पड़ेगा। वानी को हिम्मत मिलती हैं।

और सबसे पहले वह अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिये एक टीचर दीदी का सहारा लेती है। वह उन्हें बताती है घर पर सब उसे अनपढ़ गंवार कहते थे, तब उसने सबकी चोरी से साक्षर स्कूल में जाना शुरू किया था। काफी कुछ सीख लिया। वानी ने अपना टीचर से कहा कि वह भी अपने पति की तरह वकील बनना चाहती है ताकि वह स्वयं को निर्दोष ठहरा कर दोषियों को सजा दिला सके।

दीदी, वानी को धैर्य बंधाती हैं और समझाती है कि उस मुकाम तक पहुँचने के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन अगर तुमने हिम्मत और धैर्य से पढ़ाई जारी रखी तो एक दिन तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी।

वानी ने कहा- जी, मैं राघव को पाने के लिये और अपने को बेगुनाह साबित करने के लिये सब कुछ करूँगी। तो फिर ये रोना-धोना छोड़ो और पढ़ाई पर ध्यान लगाओ।

धीरे-धीरे छह साल बीत गये। राघव का परिवार राघव पर दूसरी शादी का दबाव डालने की कोशिश करता रहा, पर राघव नहीं माना।

समय ने करवट बदली और वानी सफलतापूर्वक वकालत की परीक्षा पास कर कोर्ट जाने लगी। फिर उसने सही मौका देखकर राघव के दादा पर चोरी का और राघव की माँ पर राघव के पिता की हत्या के जुर्म और उसकी  साजिश के लिए  मुरारी पर केस कर दिया।

राघव का पारा गर्म हो गया की वानी की इतनी हिम्मत की वह इतने वर्षों बाद भी केस कर रही है।

घर में हलचल मच गई और अगले दिन कोर्ट में पेश होने के लिए सोच-विचार किया जाने लगा।

कोर्ट में सब लोग होते हैं पर वानी कहीं नजर नहीं आती। राघव अपनी माँ और दादा का केस लड़ने का फैसला करता है।

थोड़ी देर बाद आवाज लगाई जाती हैं दूसरे पक्ष का वकील कौन है? वानी वकील के रूप में कोर्ट में प्रवेश करती है और खुद अपना केस लड़ने की बात करती है। पल भर को राघव को कुछ समझ नहीं आता कि आखिर हो क्या रहा है। एक-एक कर वानी सभी बातें अदालत के सामने रखती है और जज साहब उसे अदालत में सबूत पेश करने के लिए तीन दिन का समय देते हैं और इस दौरान उन्हें हिरासत में भेजने का फैसला देते हैं।

कोर्ट की कार्यवाही के बाद वानी और राघव एक दूसरे को देखते है पास आने की कोशिश करते हैं। लेकिन राघव की माँ आवाज ‘बेटा दुश्मन से हाथ मिला रहा है’ सुनकर उलटे कदम लौट जाता है।

पढ़ी -लिखी स्मार्ट वानी राघव को आकर्षित करती है। उसे याद आता है एक बार उसने वानी से कहा था कि मेरी इच्छा है कि एक दिन तुम मेरे सामने खड़े होकर केस लड़ो। और वानी उसके सामने वकील के रूप में खड़ी थी। राघव उसका पीछा करता है।

मन में कई विचार आ रहे थे। गाड़ी एक घर के सामने जाकर रुक जाती है। वानी और एक बच्चा उतरते हैं और घर के अंदर चले गये। राघव अंदर की आहट लेने की कोशिश करता है। वानी बच्चे को राघवन कह कर पुकारती है। अरे! यह तो हमने अपने बेटे का नाम सोचा था? तो क्या यह हमारा बेटा है? राघव की आँखों में आँसू आ गये और वह चुपचाप घर लौट आया है।

वह सोच रहा था कि वानी ने मुझसे इतनी बड़ी बात क्यों छिपाई? बेचैन राघव लान में चहलकदमी करते हुए कुछ सोच रहा था, तभी माँ के कमरे से आती फुसफुसाती आवाजें सुनाई दी। उसने जो कुछ सुना उसके होश उड़ाने के लिए पर्याप्त था। मां कह रही थी- अरे वानी हमरा राज जान गई है उसे उखाड़ फेंकना ही सही है। कल कोर्ट जाने से पहले मुरारी तुम उसे ठिकाने लगा दो।

राघव को लगा जैसे उसने कुछ गलत सुन लिया हो। उसकी हालत पागलों जैसी हो गई। और वह अपने को काबू करके अपने कमरे में गया और उसे अपने आपको बहुत कोसा। तू कितना अविश्वासी हैं। वानी कहती रही लेकिन तूने भरोसा उसका नहीं, घरवालों का किया। इतने वर्ष तूने उसे सजा दी है अब किस मुँह से उसके पास जायेगा। माँ के नाम से ही घिन आ रही थी, बाबूजी की हत्या करवाई। दादाजी ने चोरी की, बेचारी अकेली सब कुछ सहती रही, हमने एक दूसरे पर विश्वास करने की कसम खाई थी, ये कैसे मैं भूल गया। अब सोचने का समय नहीं है जल्दी ही कुछ करना होगा। सुबह जागते ही हो गई। राघव जल्दी ही निकलने लगा, तो माँ ने कहा इतनी जल्दी क्या है हम सबको भी तो जाना है। राघव ने कहा, माँ मुझे कुछ और भी काम है। और इतना कहकर निकल गया। राघव निकल पड़ता है। सबसे पहले वह रास्ते से वानी की दोस्त को फोन करके घर के बाहर बुलाता है। शीना आती है और राघव उसे सारे हालात से अवगत कराता है और कहता है मुझे असलियत मालूम हो गई। अब तुम वानी को दस बजे की जगह आठ बजे ही कोर्ट पहुँचा दो। उसे कुछ मत बताना, मैं यहीं बाहर इंतजार कर रहा हूँ। तुम निकलो तुम्हारे पीछे आऊँगा। थोड़ी देर बाद दोनों अपनी गाड़ी में सवार होती हैं और राघव पीछे-पीछे जाता है। वानी कहती है इतनी जल्दी क्या हैं, शीना हम जा कहाँ  रहे हैं। शीना उसे बताती है कि राघव का फोन आया था उसने बताया कि तुम्हारी जान को खतरा हैं। इसलिये समय से पहले कोर्ट पहुँच जायेंगे तो अच्छा रहेगा। वहाँ की कैंटीन में बैठ कर इंतजार कर लेंगे। समय पर कोर्ट खुलता है, तभी दूसरी ओर से आवाज आती है कि अभी दूसरे पक्ष की वकील नहीं आई है। अरे, अब और कितना इंतजार करवायेंगे जज साहब, अब फैसला एक पक्षीय ही है। जैसे ही जज साहब फैसले के लिए कलम उठाते हैं, वानी कोर्ट रूम में प्रवेश करते देर से आने के क्षमा मांगती है। तथा मुकदमें से संबंधित सबूत कोर्ट के सामने पेश कर देती है। जज साहब सबूतों का मुआयना करते हैं। वानी राघव से कुछ सवाल करती है, लेकिन राघव उसके किसी प्रश्न का कोई जवाब नहीं देता। राघव की चुप्पी से माँ और दादा घबरा जाते हैं।

राघव से दादा कहते हैं- बेटा बोलो यह हम पर झूठा आरोप लगा रही है। राघव कहता हैं- माँ-दादाजी अब मैं वानी को और कसूरवार नहीं ठहरा सकता। मैं सच जान चुका हूँ। मेरी आँखों पर पड़ा पर्दा हट चुका है। मुझे खुद को आपका बेटा कहते हुए शर्म आ रही है। वानी ये सब देखकर चकित रह जाती है।

राघव कहता है, जज साहब आज अगर मैं चाल न चलता तो ये मुरारी मेरी वानी को मार देता। मैंने कल इनकी बातें सुन ली थीं । आप लोग इतना बताओ वानी ने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है। वो एक विधवा थी बस यहीं परेशानी थी आपको। विधवा होना कोई अपराध तो नहीं हैं। समय बदल गया पर आप लोगों की सोच नहीं बदली। आप लोग देखिये वानी केस जीत चुकी हैं। यानी सच की जीत हुई। आज उसने अपने आपको बेगुनाह साबित कर दिया। वानी मुझे माफ कर दो और वह वानी के कदमों में गिर पड़ा। वानी कहती है राघव इसमें तुम्हारी गलती नहीं क्योंकि तुम सच से अंजान रहे। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं मुखौटे उतारने में सफल रही।

                    

 

 

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