वड़वानल - 10

वड़वानल - 10

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छत के पास अलग–अलग रंगों के तारों का जाल फैला हुआ था। उन तारों के जाल के बीच की खोखली जगह में हाथ डालकर मदन ने कुछ काग़ज निकाले और उन्हें गुरु के सामने डाल दिया।

गुरु ने उन काग़जों पर नजर डाली और वह अवाक् रह गया। ये क्रान्तिकारियों द्वारा मदन को भेजे गए पत्र थे और दो–चार अन्य पर्चे थे।

‘‘जर्मनी और जापान की सेनाएँ अलग–अलग मोर्चों पर पीछे हट रही हैं। शायद इस युद्ध में जापान और जर्मनी को पराजय का मुँह देखना पड़े। आज़ाद हिन्द सेना की भी हार होगी। परन्तु यह पराजय अस्थायी होगी। इस पराजय से हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए। स्वतन्त्रता के लिए निडरतापूर्वक लड़ने का एक और मौका ढूँढ़ना होगा। महायुद्ध के कारण अंग्रेज़ी साम्राज्य जर्जर हो चुका है। यदि एक जोरदार धक्का दिया जाए तो उसे धराशायी होने में देर नहीं लगेगी। ‘अंग्रेजी साम्राज्य पर सूर्य कभी अस्त नहीं होता’ ये गर्वोक्ति कोहरे की भाँति हवा में विलीन हो जाएगी। ब्रिटिश साम्राज्य को धक्का देने की सामर्थ्य केवल हिन्दुस्तान के पास है। आज तक स्वतन्त्रता के लिए जो भी आन्दोलन हुए उनसे सैनिक दूर ही रहे हैं। अगले संग्राम में सैनिकों को भी उतरना होगा। नागरिकों के कन्धे से कन्धा मिलाकर अंग्रेज़ों के खिलाफ’ खड़े होना होगा। योग्य समय आते ही सैनिकों को बगावत करनी होगी...’’

और इसी तरह का बहुत कुछ, सैनिकों का खून खौलाने वाला, उस पत्र में था।

‘‘अब तो विश्वास हुआ ?’’ मदन ने गुरु के हाथ से काग़ज लेकर फिर से छिपा दिये। कुछ देर पहले गुरु के हाथ से जो काग़ज उसने छीना था उसे जला दिया।

सन्देह की धुमसती आग शान्त हो चली थी।

‘‘देख, हम सैनिक हैं, हमें सावधान रहना चाहिए। शत्रु हमसे ज़्यादा धूर्त है, बलवान है। आजादी के विचारों वाला तू अकेला नहीं है। जहाज़ पर हमें ज्ञात तीस ऐसे व्यक्ति हैं। तीन सौ सैनिकों के बीच सिर्फ तीस मतलब कुछ भी नहीं। हमें हिन्दुस्तान की आज़ादी चाहिए। इसके लिए हम अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हैं। एक चिनगारी भी इस आग को जलाने के लिए पर्याप्त है, परन्तु योग्य समय का इन्तज़ार करना होगा। यह तो अच्छा हुआ कि यह हमारे सामने हुआ यह काग़ज हमारे हाथ पड़ा, अगर किसी और के सामने हुआ होता तो तू अब तक सलाखों के पीछे होता।’’

‘‘मुझसे गलती हुई!’’ गुरु ने ईमानदारी से कहा - ‘‘मुझसे यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। यदि अपनी भावनाएँ व्यक्त न करता तो पागल हो जाता।’’

''It's all right." मदन उसे समझा रहा था। ‘‘एक तरह से, जो हुआ, सो अच्छा ही हुआ। तेरे जैसे हिम्मत वाले को पाकर हमारे गुट की ताकत बढ़ गई। अब तो मूड है ना ?’’ सिगरेट का पैकेट उसने गुरु के सामने रखा। गुरु ने भी सिगरेट सुलगायी। अब उसे बहुत हल्का महसूस हो रहा था। उसे विश्वास हो गया था कि वह अकेला नहीं है। 

पाँच वर्षों से चल रहा महायुद्ध लाखों लोगों की बलि लेकर समाप्त हो गया। 7 अगस्त को हिरोशिमा पर और 9 अगस्त को नागासाकी पर एटम बम से हमला करके अमेरिका ने युद्ध समाप्त किया। अमेरिका के सामने इंग्लैंड बहुत कमज़ोर सिद्ध हुआ। अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर अमेरिका एक महान शक्ति के रूप में उभरा।

आज़ाद हिन्द फौज के रूप में हिन्दुस्तान को जो आशा की किरण नजर आई थी वह लुप्त हो गई।

‘‘सुभाष बाबू अब क्या करेंगे ?’’ यह प्रश्न गुरु को सता रहा था। ‘‘सुभाषचन्द्र असली शेर है। और जब तक वह है तब तक आज़ाद हिन्द फौज बनी रहेगी। यदि युद्ध कैदियों और युद्ध में मारे गए सैनिकों को छोड़ भी दिया जाए, तो भी पन्द्रह हजार सैनिक बचते हैं। सुभाष बाबू उन सबको इकट्ठा करेंगे, सैनिकों की संख्या बढ़ाएँगे और बाहर से ही हिन्दुस्तान का स्वतन्त्रता संग्राम जारी रखेंगे।’’ आर. के. विश्वासपूर्वक कहता।

‘‘अगर उन्हें युद्धकैदी बना लिया जाए तो ?’’ बीच में ही किसी ने सन्देह व्यक्त किया।

‘‘यदि उन्हें गिरफ्तार किया जाता है और अन्य युद्धकैदियों की भाँति सजा दी जाती है तो हिन्दुस्तान का हर व्यक्ति सुलग उठेगा। अधिकांश सैनिक बग़ावत कर देंगे। हिन्दुस्तान के स्वतन्त्रता संग्राम के प्रति सहानुभूति रखने वाले हजारों लोग अंग्रेज़ों के ख़िलाफ’ हो जाएँगे। अंग्रेज़ों के लिए यह स्थिति मुश्किल होगी।’’

मदन परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए कहता।

‘‘समर्पण किया है, हथियार डाले हैं - जर्मनी ने और जापान ने, आज़ाद हिन्द फौज ने नहीं। वे लड़ते ही रहेंगे,’’ गुरु अपने आप को समझाता।

जब तक नेताजी हैं, तब तक स्वतन्त्रता संग्राम जारी रहेगा इस बारे में किसी की भी दो राय नहीं थी।

गुरु का अकेलापन खत्म हो गया था। उसे आर. के. और मदन जैसे हमख़याल दोस्त मिल गए थे। आर. के. चपटी नाक और काले रंग का था। उसकी बातों में और आँखों में जबर्दस्त आत्मविश्वास था। उसके विचार स्पष्ट होते और वह बड़े तर्कपूर्ण ढंग से उन्हें प्रस्तुत करता। पढ़ने का शौक था उसे, स्मरण शक्ति अद्भुत थी। अपने विचारों का प्रतिपादन वह आक्रामक नहीं, बल्कि विश्लेषणात्मक ढंग से करता है।

सरदार होने के बावजूद आर. के. मॉडर्न था।रोज़ सुबह साबुन का गाढ़ा–गाढ़ा फेन चेहरे पर लगाकर वह दाढ़ी बनाता। हर पन्द्रह दिन में बाल कटवाता और जब मूड होता तो सिगरेट के दो–चार कश भी लगा लेता।

उस दिन सुबह से ही आसमान पर काले बादल छाए थे। ठीक से बारिश भी नहीं हो रही थी। वातावरण में बड़ी उमस थी। काम करने के लिए उत्साह ही नहीं था। वातावरण पर छाई उदासी और कालिख किसी अपशगुन की ओर संकेत कर रही थी। सन्देह उमड़ रहे थे।

लोगों के मन बेचैन थे फिर भी रोज़मर्रा के काम चल ही रहे थे। गुरु की ड्यूटी दोपहर के बारह बजे से चार बजे तक की थी। वह काम पर जाने की तैयारी कर रहा था। खाना लेकर वह मेस में आया। मदन ऐसे बैठा था जैसे

विध्वस्त हो चुका हो।

‘‘क्या रे ? काम पर नहीं जाएगा क्या ?’’ गुरु ने पूछा।

मदन ने एक गहरी साँस छोड़ी। उसका चेहरा उतरा हुआ था। आँखें सूजी हुई लग रही थीं। गुरु के प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया। मेज़ पर सिर टिकाए वह सुन्न बैठा रहा। गुरु उठकर मदन के पास गया और उसने पूछा, ‘‘अरे, हुआ क्या है, कुछ बता तो सही ?’’

मदन चुप ही रहा। उसके मुख से शब्द नहीं फूट रहे थे। शून्य नज़र से उसने गुरु की ओर देखा। गुरु कुछ भी समझ नहीं पाया। उन पाँच–दस सेकण्डों में गुरु के मन में अनेक विचार कौंध गए, ‘‘क्रान्तिकारियों में से कोई पकड़ा तो नहीं गया ? कोई प्रसिद्ध व्यक्ति–––’’

मदन को झकझोरते हुए गुरु ने फिर पूछा, ‘‘अरे, बोल, कुछ तो बोल मैं कैसे समझूँगा ?’’

‘‘हमारा सर्वस्व लुट गया! हम बरबाद हो गए!’’ मदन अपने आप से पुटपुटा रहा था, ‘‘नेताजी गुज़र गए, हवाई अपघात में।’’

‘‘कुछ भी मत बको। किसने कहा तुझसे ?’’ गुरु ने बेचैन होकर अधीरता से पूछा।

‘‘मैंने सुना, टोकियो आकाशवाणी के हवाले से खबर दी गई थी, रेडियो पर।’’

गुरु को ऐसा लगा मानो वज्रघात हो गया है। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। शरीर शक्तिहीन हो गया। वह सुन्न हो गया। अब खाने का सवाल ही नहीं था।पोर्टहोल में अपनी थाली खाली करके वह सुन्न मन से बैठा रहा।

क्वार्टरमास्टर ने बारह घण्टे बजाए।

‘‘चल उठ! मुँह पर पानी मार और काम पर चल!’’ मदन ने कहा, ‘‘देख, चेहरे पर कोई भी भाव न आने पाए।’’

वे   मेस   से   बाहर   निकले   तब   उनके   चेहरे   एकदम   कोरे   (भावहीन)   थे।

डब्ल्यू. टी. ऑफिस पर भी मातम का साया था। रोज़ होने वाला हँसी–मजाक, चर्चा  बिलकुल  नहीं  थी।  गुरु  आज  भी  कोस्टल  कॉमन  नेट  पर  बैठा  था,  मगर काम में बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था। हर पल एक–एक युग जैसा प्रतीत हो रहा था। सोच–सोचकर दिमाग पिलपिला हो गया था और मेसेज रिसीव करने में गलतियाँ हो रही थीं.

‘‘गुरु, सँभालो  अपने  आपको।’’  रिसेप्शन  में  गलतियाँ  देखकर  गुस्से  में  आते हुए मदन सूचना    दे    रहा    था,      ''Do not Force me to take action against you.''

''I am sorry Leading! गुरु ने जवाब दिया। कुछ देर पहले भावनावश होकर हतोत्साहित हो गया मदन अब एकदम निर्विकार था। गुरु अपने मन को लगाम देने की कोशिश कर रहा था, मगर उसका मन भूत–भविष्य में गोते लगा

रहा   था।

‘‘अगर नेताजी सचमुच नहीं रहे तो... हिन्दुस्तान की आज़ादी का क्या होगा ? मार्गदर्शक   कौन   बनेगा ?   अँधेरे   में   डूबा   हुआ   भविष्यकाल...’’

दोपहर   तक   नेताजी   की   अपघात   में   मृत्यु   हो   जाने   की   खबर   पूरे   जहाज़

पर फैल गई थी। सभी फुसफुसाहट से बोल रहे थे। सभी के दिल दहल गए थे। बेचैन मन से सभी घूम रहे थे, मगर कोई भी स्पष्ट रूप से कुछ कह नही रहा था। हरेक की यही कोशिश थी कि मन का तूफान चेहरे पर न छा जाए।

‘‘गुलामी ने हमें इतना नपुंसक बना दिया है कि जिन नेताजी ने मृतवत् हो  चुके  हिन्दुस्तानी  नौजवानों  में  नये  प्राण  फूँके,  उन्हीं  नेताजी  के  निधन  पर  शोक प्रकट करने के लिए हम फूट–फूटकर रोने से भी डर रहे हैं,’’ गुरु बुदबुदाया।

‘‘सही   है   मगर   वर्तमान   परिस्थिति   में,   जब   हिन्दुस्तानी   नौजवान   संगठित नहीं हैं, तो भलाई इसी में है कि अपनी भावनाएँ प्रकट न की जाएँ। वरना गोरे सावधान   हो   जाएँगे   और–––’’   मदन   ने   जवाब   दिया।

रात  को  जब  सब  लोग  सो  गए  तो  जहाज़   के  समविचारी  सैनिक  बोट्सवाईन

स्टोर्स  की  बगल  के  कम्पार्टमेंट  में  बैठे  थे।  ये  स्टोर्स  जहाज़   के  अगले  हिस्से  में तीसरी मंजिल पर था। काम के समय को छोड़कर वहाँ अक्सर कोई जाता नहीं था। इसके दो कारण थे। पहला यह कि यह जगह कुछ दिक्कत वाली थी और दूसरा - वहाँ मेस डेक नहीं थी। उस सँकरी जगह में चालीस लोग चिपक–चिपक कर बैठे थे। गुरु को इस बात का अन्दाज़ा भी नहीं था कि जहाज़  पर उसके

जैसे   विचारों   वाले   इतने   लोग   होंगे।   

आर. के. सिंह   बोलने   के   लिए   खड़ा   हुआ।

‘‘दोस्तो!  ‘सुभाष’  ये  तीन  अक्षर  अन्याय,  गुलामी  और  अत्याचार  के  विरुद्ध विस्फोटकों से भरा हुआ गोदाम है। जब तक हिन्दुस्तान का अस्तित्व रहेगा, तब तक सच्चा हिन्दुस्तानी इस नाम के आगे नतमस्तक होता रहेगा। जिसका नाम भर लेने से हमारे हृदय में स्वतन्त्रता प्रेम की ज्योति प्रखर हो जाती है, ऐसे इस हिन्दुस्तान के सपूत की अपघात में मृत्यु होने की खबर आज सुबह प्रसारित की गई  है।

‘‘नेताजी   नहीं   रहे,   इस   खबर   पर   विश्वास   ही   नहीं   होता।   नेताजी   सन्   1941 में कलकत्ता से अदृश्य हो गए थे, वैसे ही शायद इस समय भी अदृश्य हो गए होंगे।नेताजी की मृत्यु  की अफ़वाह    हिन्दुस्तान    के    स्वतन्त्रता    प्रेमियों    को    हतोत्साहित करने के लिए फैलाई गई होगी। एक दैवी शक्ति रखने वाले जुझारू नेताजी इस तरह कीड़े की  मौत  नहीं  मर  सकते।  हथियार  डाल  दिये  हैं,  तलवारें  म्यानों में वापस रख ली हैं - जर्मनी और जापान ने। आज़ाद हिन्द फौज ने हथियार नहीं डाले  हैं।  यह  महान  सेनापति  और  उसकी  सेना  अंग्रेज़ों  से  लड़ती  ही  रहेगी - अंग्रेज़ी हुकूमत   का   खात्मा   होने   तक।

‘‘दोस्तो!  जब  हमने  यहाँ  इकट्ठे  होने  का  निर्णय  लिया,  तब  सोचा  होगा कि  शायद  हम  अपने  प्रिय  नेताजी  को  श्रद्धांजलि  देने  के  लिए  इकट्ठा  हो  रहे हैं; मगर  मुझे  ऐसा  लगता  है  कि  हम  सुभाष  बाबू  को  श्रद्धासुमन  अर्पित  करने के लिए योग्य   नहीं   हैं। वे   हिन्दुस्तान   की   स्वतन्त्रता   के   लिए   कटिबद्ध   एक   नरशार्दूल थे और हम हैं गुलामी के नरक में सड़ रहे अकर्मण्य जीव! यदि हमारे दिल में सुभाष बाबू के प्रति, उनके कार्य के प्रति प्रेम है तो आइए, हम यह प्रतिज्ञा करें कि उनके द्वारा आरम्भ किए गए कार्य को पूरा करने के लिए हम पूरे जी–जान से,  उन्हीं  के  मार्ग  से,  प्रयत्न  करते  रहेंगे।  जिस  दिन  हम  स्वतन्त्रता  प्राप्त  कर  लेंगे,

दिल्ली  के  लाल  किले  पर  अभिमानपूर्वक  तिरंगा  फहराएँगे,  उसी  दिन  हम  सच्चे अर्थों  में  सुभाष  बाबू  के  अनुयायी  कहलाने  योग्य  बनेंगे,  उन्हें  श्रद्धांजलि  अर्पण करने   योग्य   हो   पाएँगे।

‘‘सुभाष बाबू की याद ही स्वतन्त्रता प्राप्ति के कठोर पथ पर हमारा मार्गदर्शन करेगी। दोस्तो! याद रखो, सुभाष बाबू ने कहा था, ‘अंग्रेज़ों को सिर्फ बाहर से ही परेशान   करना   पर्याप्त   नहीं   है,   अपितु   हिन्दुस्तान   के   भीतर   भी   उन्हें   हैरान   करना होगा।’ आजाद हिन्द फौज देश के बाहर लड़ रही थी। हम ‘आज़ाद हिन्दुस्तानी’ देश  के  भीतर  ही  उनका  मुकाबला  करेंगे।  इसके  लिए  हमें  अपने  भाई–बन्धुओं को तैयार करना होगा। भूदल और हवाईदल को भी अपने साथ लेना होगा। कम से कम पूरा नौदल (नौसेना दल) ही अग्निशिखा के समय प्रज्वलित हो उठे! यह ज्वाला भड़कने पर हिन्दुस्तान की ब्रिटिश हुकूमत सूखे पत्तों के समान जलकर राख हो जाएगी। काम कठिन है, मगर हमें उसे करना ही होगा। हमारे साथ

किया जा रहा सौतेला व्यवहार, गोरों द्वारा कदम–कदम पर किया जा रहा अपमान - ये सब अगर रोकना हो तो हमें अपने हृदय पर सिर्फ चार अक्षर अंकित करने होंगे - ‘स्वतन्त्रता’ ; दोस्तो! यह काम कठिन अवश्य है, मगर यदि हम कमर कसकर लग गए तो मार्ग अवश्य मिलेगा। मुश्किलों के पर्वत चूर–चूर हो जाएँगे। हम सफल होंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि अन्तिम विजय हमारी ही होगी। हम नेताजी को सम्मानपूर्वक हिन्दुस्तान वापस लाएँगे। इसके लिए शायद हमें अपना सर्वस्व बलिदान करना पड़े। मगर जो आजादी हमें प्राप्त होगी उसके सामने यह बलिदान कुछ भी नहीं होगा’।’’


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