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एक स्कूल की मौत
एक स्कूल की मौत
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© सुनील धनखड़

Drama Inspirational Tragedy

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मम्मी के मुंह से गब्बर का नाम सुनकर भले ही रामपुर के बच्चे ना डरते हों, लेकिन अटल सत्य था, हेडमास्टर जी के पहुंचने की खबर शानपुर के सरकारी स्कूल में सन्नाटा भर देती। हर बच्चा इतना शांत और गंभीर बन जाता मानों इस साल राष्ट्रपति खुद आकर उसे बेस्ट स्टूडेंट का अवॉर्ड देंगे। टीचर सांस नाप-तौल कर लेते, इस डर में कि नाक की तेज आवाज कहीं हेडमास्टर जी का ध्यान उनकी तरफ ना मोड़ दे। जैसे ही उनका बजाज चेतक स्कूटर स्कूल के मुख्य गेट से घुसता, चौकीदार और चपरासी ब्लैक कैट कमांडो की तरह अकड़ कर तैनात हो जाते। उस सनसनी का नाम था चंपूलाल।

जिस छात्र-टीचर ने हेडमास्टर जी के नाम को हल्के में लेने की ग़लतफहमी पाली, उसे ऐसा सबक दिया गया कि पूरी जिंदगी वजनदार लगने लगी। हेडमास्टर जी की काबिलियत के चर्चे आसपास के सभी गांवों में थे। शानपुर की पंचायत से लेकर तमाम बूढ़े-बुजुर्ग खुद को नसीबवाला समझते थे कि ऐसे काबिल हेडमास्टर के हाथों में उनके बच्चों का भविष्य बन रहा है।

चंपूलालजी पहले फौजी स्कूलों में अध्यापक थे, रिटायर होकर सरकारी स्कूल के हेडमास्टर बने। विद्यालय में साफ-सुथरी कमीज-पतलून में पहुंचना लेकिन पास के गांव में घर पहुंचते ही फटा-पुराना कुर्ता-पायजामा धारण कर शुद्ध देहाती किसान बन जाना। जैसा कुर्ता-पायजामा था, वैसा ही गर्ररर करता पुराना ट्रैक्टर भी उनके खौफ के नीचे दबा रहता।

बोर्ड परीक्षा होने की वजह से कक्षा 8 और 10 को अंग्रेजी पढ़ाने की कमान इस बार चंपूलाल जी ने अपने हाथों में ले ली। बोर्ड परीक्षा के परिणाम से स्कूल की छवि बनती है, स्कूल की छवि से चंपूलाल में लालिमा आती है। इसलिए हेडमास्टर साहब जोखिम नहीं लेना चाहते थे। वैसे उन्हें मालूम था कि दूसरे इंग्लिश टीचरों को सिर्फ A फॉर अनार और B फॉर भैंस वाली अंग्रेजी आती है।

10वीं क्लास, 9वीं से ही होनहार थी। इससे हेडमास्टर जी की पुरानी जान पहचान थी। क्योंकि इस कक्षा का मॉनिटर मनोज अपनी टीम के साथ जिस भी प्रतियोगी परीक्षा में हिस्सा गांव से बाहर जाता, हमेशा पुरस्कार के साथ लौटता। सभी से बर्ताव में भी बेहद विनम्र। काबिलियत का जरा भी घमंड नहीं। मनोज के साथ किरण और तमाम बाकी विद्यार्थी बेहद होनहार थे।

लेकिन 7वीं से 8वीं में आई दूसरी पलटन मानों चांडालों की फौज थी। इस कक्षा का मॉनिटर सुनील छल-कपट से जरा भी नहीं चूकता। सुनील ही क्या, मंगल हमेशा अमंगल सोचता। सतीश देखने में दुबला-पतला लेकिन पॉलिटिक्स में चाणक्य का भी बाप ! राकेश जो कभी सबकी आंखों का तारा था, 8वीं तक पहुंचते-पहुंचते, 'किलमिश' के डॉयलॉग 'अंधेरा कायम रहे' को ही बुदबुदाता रहता। इन 3-4 छछुंदरों के अलावा बाकी भी एक से बढ़कर एक। लेकिन पट्ठे इस बार चंपूलाल के हत्थे चढ़े थे !

सुनील एक तरफ कक्षा में सबके सामने हेडमास्टर जी के हाथों पिटने, डांट खाने के डर की वजह से खौफ में था, वहीं दूसरी तरफ उसे खुद की 'अंग्रेजी रट्ने' की योग्यता पर पूरा भरोसा था। इसलिए मन ही मन उन मंजरों को सोचकर खुश हो जाता, जब हेडमास्टर जी के सवाल का वो जवाब देकर बच जाएगा, लेकिन मंगल, सतीश या राकेश फंस जाएंगे। तब कितना मजा आएगा ! यही सपने देख सतीश-मंगल भी हेडमास्टर जी के कक्षा में प्रवेश का इंतजार कर रहे थे।

आखिर वो दिन आ ही गया जब चंपूलाल जी स्कूल के कोने में बने हेडमास्टर ऑफिस से निकल कक्षा 8 की तरफ बढ़ चले। कमरे के फर्श पर बिछे टाट पर छात्रों की तीन कतारें बैठी थी। प्रथम पंक्ति में सतीश ने प्रथम छात्र का रुतबा हासिल कर रखा था। आखिरी लाइन में सबसे आगे राकेश और बीच में विराजमान थे कपटी मॉनिटर साहब।

सुनील को लगा कि हवा पूरी तरह रुक गई है। पूरी दुनिया में सिर्फ सन्नाटा छा गया है। उसने बाकी छात्रों से कहीं बढ़कर अपनी आंखें पैरों के बीच में रखी पुस्तम में गड़ा ली। कक्षा 8 पूरे दम से चुप्पी साध महान शिक्षक का इंतजार कर रही थी।

आज से पहले इन बच्चों ने सीनियरों से चंपूलाल जी के हाथों भयंकर पिटाई के किस्से सुने थे। क्या मारते थे ! ऐसा मारते थे कि बच्चों में भूकंप आ जाता, लेकिन छुड़ाने कोई नहीं आता। एक बार जो मारना शुरू करते, बस मारते चले जाते। लेकिन डर पिटाई का नहीं था, डर था उनके बब्बर शेर की तरह चिल्लाने का। ऐसे दहाड़ते थे जैसे छात्र कातिया हैं और हेडमास्टर जी घातक फिल्म के सन्नी देओल।

वक़्त बढ़ता गया, लेकिन हेडमास्टर जी कक्षा में नहीं आए। छात्रों के तीन गुटों के तीनों मुखियाओं ने सबसे आगे बैठे होने की वजह से हेडमास्टर जी को ऑफिस से निकलते देखा लिया था, लेकिन वो गए कहां ? हर तरफ छाया सन्नाटा उनके करीब होने पर मुहर लगा रहा था। लेकिन वो गए कहां ? पुस्तक से नजरें उठाकर किवाड़ के उस पार झांकने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

मंगल ने सोचा मुंडी उठाकर जरा देख लूं, लेकिन फिर ख्याल आया कहीं हेडमास्टर जी दरवाजे में खड़े होकर उसे ही घूर रहे होंगे तो....नहीं, नहीं। इसी खौफ में धमाल मचाने वाली पूरी क्लास 'पिन ड्रॉप साइलेंस' साध बैठे रही। तभी...तभी तीन-चार कमरे दूर एक लड़की के चीखने की आवाज आई।

छठी क्लास की छात्रा सुनीता कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ा रही थी। इस बार जो उसने प्लेन को दरवाजे से बाहर हवा में टेक ऑफ कराया, रॉकेटनुमा जहाज सामने से आ रहे चंपूलालजी के नाक से टकराकर क्रैश हो गया। शरारती छात्रा साक्षात हेडमास्टर जी को देख हिल गई, उलटे पांव सीट की तरफ दौड़ी और जमीन से चिपक कर ऐसे बैठ गई मानों 100 साल से वहीं बैठी है।

दौड़े तो पीछे-पीछे हेडमास्टर जी भी थे, उनके पीछे दरबो ताई ने भी दौड़ लगाई। (दरबो ताई हमेशा हेडरमास्टर जी के पीछे-पीछे चलती थी। स्कूल में चपरासी दरबो ताई का काम मास्टर जी का डंडा संभाले रखना था, ये डंडा बेहद विशेष होता था)। लेकिन दुष्ट छात्रा कमरे में उधम मचाते बाकी बच्चों की भीड़ में खुद को छुपाने में कामयाब हो गई।

चंपूलाल जी ने जैसे ही छठी कक्षा के दरवाजे से अंदर कदम रखा, मोर की तरह नाच रहे बच्चों में सबसे पहले उनके सामने अनिता आ गई। अनिता कॉपी के कागज से नाक का द्रव्य पौंछकर फेंक रही थी, गाय की तरह सीधी लड़की अनिता की बदकिस्मती थी कि बदबूदार कागज उसके हाथों से निकलकर सीधा चंपूलाल जी के खूंखार चेहरे पर जा लगा।

चंद क्षणों में बगावत की 2 वारदातें देख चंपूलाल जी ज्वालामुखी की तरह रौद्र हो गए और दहाड़ मारी

खामोशशशशश। इस आवाज की तरंगे सबसे पहले अनिता के कोमल कानों से गूजरी, सो डर के मारे उसी की चीख से स्कूल गूंजा था। जिसकी आवाज 8वीं कक्षा ने भी सुनी थी।

हेडमास्टर जी जब भी किसी छात्र को रंगे हाथ पकड़ लेते थे, उनका फौजी दिमाग खुब ब खुद बाकी शैतानी वारदातों की कड़ी उसी छात्र से जोड़ देता। सो इस बार 'जहाजी हमले' का दोषी भी खुंखार सुनीता की बजाए, मासूम अनिता को माना गया। हेडमास्टर जी ने हाथ ऊपररररर का आदेश सुनाया। और दरबो ताई की तरफ पलटकर देखा। ताई समझ गई। और शुद्ध देसी सरसों का तेल पिला-पिलाकर तैयार किया गया बांस का वो डरावना डंडा हेडमास्टर जी के हाथों में सौंप दिया।

बाकी बच्चे मोर की तरह नाचते वक़्त जैसे खड़े थे, चंपूलाल जी के आदेश के बाद वैसे ही धड़ाम हो गए। अपनी जगह खड़ी अनिता के हाथ ऊपर की तरफ खड़े थे, लेकिन उसकी नाक से नॉन स्टॉप नीचे बहे जा रहे पानीनुमा द्रव्य पर हेडमास्टर जी के आदेश का असर नहीं था। अगर जगह कोई और होती तो अनिता जीभ की मदद ले पाती। लेकिन चंपूलाल जी की मौजूदगी में उसका दिमाग जम गया।

किस टीचर की क्लास है येयेयेयेये ? चंपूलाल जी की गर्जना का छठी क्लास के बच्चों ने ऊंचे स्वर में जवाब दिया- फूलवती मैडम की हेडमास्टर जीईईईईई..। हूंहूंहूंहूं। लंबी सांस छोड़ते हुए हेडमास्टर जी ने नजरें दरबो ताई की तरफ घुमाई। हेडमास्टर जी की अम्मा की उम्र की दरबो ताई ने भी पलटकर नजरें स्कूल के मैदान की तरफ घुमा दी। और फिर मुंडी निराशभाव में वापस सामान्य कर ली।

चंपूलाल जी चहलकदमी करते किवाड़ के बाहर गए और दार्शनिक भाव में मैदान को ताकने लगे। बच्चों को लगा खतरा टल गया और फुस्फुसाहट शुरु कर दी। खामोशशशशशशशशश, फिर हेडमास्टर जी दहाड़े। बच्चे फिर अपनी जगह से चिपक गए। बस अनिता के नाक का विद्रोह जारी था।

'फूलवती मैडम का कुछ करना पड़ेगा, कक्षा से ही गायब रहती हैं' सोचते-सोचते हेडमास्टर जी 8वीं की तरफ बढ़ चले। दरबो ताई को जब अहसास हुआ कि मास्टर जी अब पलटने वाले नहीं हैं, तो वो भी पीछे-पीछे दौड़ी।

बच्चे अभी भी साइलेंस जोन में ही थे लेकिन मासूम अनिता का फ्यूचर किसी को नहीं पता था ! उसे हाथ ऊपर रखने हैं, या बैठ जाना है ? लेकिन उसे खुशी थी कि मास्टर जी का सरसों के तेल में नहाया ब्रह्मस्त्र उस पर नहीं चला।

दुश्मन से बड़ा होता है दुश्मन का डर बैठ जाना ! इसी साइकोलॉजी से घिरी 8वीं क्लास के लिए हर क्षण पहाड़ जैसा था। तेज होता सन्नाटा हेडमास्टर जी के पास आते जाने की पुष्टि कर रहा था। मंगल की धड़कन बढ़ चली, उसे आज अमंगल होने का पक्का यकीन था। तभी वो फौजी बूट अंदर दाखिल हुए.....

क्षण में सभी छात्र ऐसे खड़े हुए मानो बैठकर गप्पे हांकने का वक्त अब कभी लौटकर नहीं आएगा। 3 कतार में खड़े 36 झंडुओं में से किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनको घूर रही चंपूलाल जी की नजरों से नजरें मिला सके।

हेडमास्टर जी की तरफ नहीं देखना है, कुछ पूछ लिया तो...मंगल के अमंगल दिमाग ने सोचा। नए मेहमान के आते ही मुस्कान से चापलूसी के बैक टू बैक तीर छोड़ने वाला सतीश डेढ़े-मेढ़े पैरों पर इस तरह जमा पड़ा था जैसे फेविकोल से चिपका दिया गया है।

छात्रों को भस्म कर देने वाली नजरों से घूरते हेडमास्टर जी ब्लैक बोर्ड के पैरलल सामने वाली दीवार तक गए। सबको निहारा...स्टाक से पलटे, फिर फौजी बूट दरवाजे की तरफ चल पड़े। दरवाजे के करीब पहुंचकर चेहरे का रुख सतीश की कतार में बैठे छात्रों की तरफ मोड़ दिया।

सतीश से लेकर उसके पीछे खड़े 11 छात्रों का खून सूख गया। हर एक को भरोसा था कि हेडमास्टर जी के ब्रह्मास्त्र का श्रीगणेश उसी के पिछवाड़े से होगा। लेकिन हेडमास्टर जी कतार में जो बढ़े, बढ़ते ही चले गए।

अब चंपूलाल जी सबके पीछे खड़े थे। 36 प्रतिमाएं सामने देख रही थी, किसी को कोई खबर नहीं। किसी में हिम्मत नहीं, नजरें गिरगिट की तरह घुमाकर इधर-उधर देख पड़ोसी की हालत का अंदाजा ले सकें।

हेडमास्टर जी बोले- कितनी उम्र है तुम्हारी.....लेकिन किसी को समझ नहीं आया, जवाब किसे देना है ? फौजी बूटों की तेज आवाज राकेश की पंक्ति के ठीक बीचों-बीच पहुंचकर रुक गई। तुमसे पूछा- कितनी उम्र है... छोटे पंडित की छोटी-छोटी भयभीत आंखें उपर उठी और साक्षात बब्बर शेर जैसे भारी भरकम चेहरे को देख जबान चली- मैंअअअअअ मास्टर जी!!!!!

हां तुम। हेडमास्टर जी मोटी-मोटी आंखों से घूरते हुए बोले।

जी अंम् अंम् 13 साल का हो गया हूं, और अब 14वें साल में चल रहा हूं...

इतने छोटे क्यों लगते हो ? छोटा पंडित कुछ बोलता इससे पहले ही चाणक्य बुद्धी सतीश दूर से बोल पड़ा, ये बचपन से ही छोटा है मास्टर जी। हेडमास्टर जी ने सिर पीछे घूमाकर चेहरा ऐसे बनाया मानों सतीश के पिचकू चेहरे से शुरु कर टेढ़ी-मेढ़ी टांगों तक को निगल जाएंगे।

वकील है तू...वकील है ? हैं, वकील है ? गांववालों से पिटकर आए कालिया और उसके 2 साथियों पर जैसे गब्बर गुस्साया था...हैडमास्टर जी वकील है,,,वकील है तू,,, कहते हुए सतीश की तरफ चल पड़े।

ग़लती हो गई मास्टर जी, ग़लती हो गई, आज के बाद नहीं होगी। सतीश के पैरों को कांपता देख...हेडमास्टर जी ने सवाल किया- तेरी कितनी उम्र है- 14 साल, सतीश ने तड़ाक से जवाब दिया।

अबे तेरी नहीं, सुनील की कतार में सबसे पीछे खड़े, लेकिन लंबी दूरी से लंबे नजर आ रहे लड़के की तरफ चंपूलाल जी पहुंचे और आंखों को लगभग आसमान में तान, मांगेराम की नजरों से नजरे मिलाकर पूछा।

पक्का तो पता नहीं, होगी 20-22 साल मास्टर जी। मांगेराम ने भी डायनासोर जैसा मुंह फाड़ा। दूसरे ग्रह का प्राणी है क्या ? क्या मतलब पता नहीं, स्कूल में जन्म की तारीख लिखवाई नहीं है क्या ? हेडमास्टर जी के सवाल पर मांगेराम की आवाज ने पलटवार किया- मैं क्या करूं मास्टर जी, घरवालों को भी नहीं पता, मेरा जन्म कब हुआ था? 8वीं क्लास में 6 फुट के पहाड़ जैसे छात्र का ऐसा जवाब सुनकर चंपूलाल जी हिल गए। तेज आवाज में बोले- बैठ जाओ सभी....

छात्र बैठे ही थे, तभी फिर से चिल्लाए- लिखोोोो, लिखोो, बफैलो की स्पेलिंग लिखो।

कक्षा के हर छात्र का परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा था। गाय-भैंस-बकरी हर आंगन में बंधी थी लेकिन बफैलो सुनकर बैठते छात्रों की आंखें एक-दूसरे से सवाल कर रही थी, ये हेडमास्टर जी कौन से रॉकेट की बात कर रहे हैं ?

लिख दी मास्टर जी, मॉनिटर सुनील अति उत्साह में चिल्लाया। अभी तक बाकी छात्र जमीन पर बिछे टाट पर कूल्हे रगड़ते हुए बैठ ही रहे थे।

लिख दी तो गोल्ड मेडल पहना दूं.... हैं ? कुर्सी पर बैठते हुए हैडमास्टर जी ने अपने ठीक आगे बैठे सुनील को बिना देखे जवाब दिया। चतुर सुनील समझ गया कि अब कुछ भी बोलना जानलेवा हो सकता है। वो चुप रह गया। इसके तुरंत बाद सतीश ने बैठे-बैठे हाथ उठा लिया।

अब तुझे क्या हुआ ? हेडमास्टर जी ने नजरें तानी। बफैलो की स्पेलिंग लिख दी है मास्टर जी। सतीश ने पियानों जैसी प्यारी आवाज में कहा।

तो....अबे सबको लिखनी है। बंदर की तरह मत उछलो। उठाकर खिड़की से बाहर फेंक दूंगा।

फुल सन्नाटा छा गया। सबकी हालत ठीक वैसी हो गई जैसे हेडमास्टर जी के दाखिल होने से पहले थी। जमीन पर बैठे छात्रों ने नजरें पैरों के उपर रखी कॉपी में टिका ली। और कलम ऐसे चलाने लगे जैसे कलयुग के गीता-पुराण लिख रहे हैं।

हेडमास्टर जी पढ़ाना शुरु करने से पहले कक्षा के छात्रों का ज्ञान और चरित्र परख रहे थे। उन्हें जासूस रामनारायण मास्टर जी ने पुख्ता जानकारी दी थी कि कक्षा 8 के 40 फीसदी छात्र बाकी सभी सब्जेक्ट में ठीक-ठाक हैं। लेकिन अंग्रेजी में हर एक को काला अक्षर भैंस बराबर नजर आता है। शायद इसलिए चंपूलाल जी ने भैंस के अंग्रेजी नाम से ही शुरुआत की थी।

हेडमास्टर जी ने कहा- जब सब बफैलों की स्पेलिंग लिख लें और दोबारा जांच कर लें। तब उन्हें बता दिया जाए। वो एक-एक की स्पेलिंग चैक करेंगे।

कमरे की उखड़ी छत को देखते हुए हेडमास्टर जी का मूड खराब हो रहा था, मन ही मन सोच रहे थे कि सफेदी की पपड़ी छात्रों पर गिरती होगी। टूटी खिड़की पर भी नजरें तरेर रहे थे। बारिश में पानी अंदर आता होगा ? खुद से चंपूलाल जी ने सवाल किया ! सफेद पायजामा और नीली शर्ट पहने ज्यादातर बच्चों की युनिफॉर्म मैली-कुचैली थी। हेडमास्टर जी का निरीक्षण जारी था।

खुद का ध्यान दिए गए काम पर लाते हुए चंपूलाल जी ने महसूस किया कि कुछ बच्चे एकदम बुत की तरह बैठे हैं, कुछ नॉन स्टॉप लिखे जा रहे हैं। लेकिन बफैलो कि स्पेलिंग में इतना कहां लिखना होता है ?

बस। सभी कॉपी नीचे रख दो। चंपूलाल का आदेश कमरे में गूंजा।

चापलूसी हेडमास्टर जी को कभी पसंद नहीं थी लेकिन हक किसी का नहीं मारते थे। चतुर सुनील ने सबसे पहले बफैलो की स्पेलिंग लिखने का दावा किया था। पहले उसी को मौका दिया गया। कहा- दिखाओ। पूरे विश्वास से सांवला लड़का उठा, उठकर एक कदम आगे बढ़ाया और कुर्सी पर बैठे हेडमास्टर जी की तरफ कॉपी कर दी।

लिखना कहां से सीखा है बेटे ? हेडमास्टर जी ने सुनील से पूछा। सुनील को स्पेलिंग पर पूरा भरोसा था। उसे भरोसा था कि उसका रट्टा फेल नहीं हो सकता है। सुनील ने साहस कर कहा- स्पेलिंग सही है हेडमास्टर जी।

चुपपपपपप। हेडमास्टर जी ने कहा, तुम्हारी लिखाई समझने के लिए मुझे ऐनक का नंबर बढ़ाना पड़ेगा।

सुनील की फजीहत होते देख मंगल को बहुत मजा आया। उसे खुशामदी हँसी हँसने का मन कर रहा था। लेकिन डर था कहीं हेडमास्टर जी बुरा ना मान जाएं। बावजूद इसके डरते-डरते उसके चेहरे पर चापलूसी वाली मुस्कान आ ही गई। मंगल के जबड़े में फ्रंट का नीचे वाला दांत टूटा हुआ था। हमजोली उपर वाला दांत बाहर निकला हुआ था। ऐसे थोबड़े के साथ जब वो डरते-डरते हँस रहा था तो हेडमास्टर जी ने कुर्सी पर बैठे-बैठे गर्दन से चेहरे को आगे बढ़ाया और उसकी तरफ घूरते हुए पूछे- तुझे क्या हुआ ?

मंगल का दिमाग चकरा गया, महसूस हुआ जिस अमंगल का डर था, वो हो ही गया। कुत नहीं, कुत भी तो नहीं हेदमास्तर दी। होशियार होने के साथ-साथ मंगल तोतला भी था।

क्या कहा, क्या कहा ? हेडमास्टर जी ने गर्दन के उपर का चेहरा बैक लेकर, कान उसकी की तरफ मोड़ दिए, ताकि मंगल ने जो बुदबुदाया था वो सुन सकें। लेकिन मंगल का आशंकित चेहरा सफेद पड़ गया। वो समझ गया कि अब तो उसकी जबान पहले से भी ज्यादा तुतलाकर बोलेगी। इसलिए उसने मुंह खोला ही नहीं। बस नजरों से कुछ इशारे कर रहा था। हेडमास्टर जी भन्ना गए। सुनील की कॉपी उसे वापस करते हुए मंगल से कहा- कॉपी लेकर इधर आओ।

रट्टेबाज सुनील ऐसे खामोशी से कॉपी वापस लेने वाला नहीं था। मॉनिटर होकर और सही स्पेलिंग लिखकर भी अगर उसके नाम की वाह-वाही नहीं होती, तो उसे सत्ता कायम रखने में परेशानी होती। सांस दम लगाकर अंदर खीची और बाहर छोड़ते हुए चंपूलाल की हां सुनने के लिए पूछा- मास्टर जी स्पेलिंग सही है ना ?

आज ही गोल्ड मेडल लोगे ! लिखावट ठीक करो। सही लिखकर भी कीड़े-मकोड़ों जैसे अक्षर लिखोगे तो क्या फायदा ! हेडमास्टर के ये शब्द सुनील को बेहद ओजस्वी लगे। गोल्ड मेडल तक चंपूलाल जी का चेहरा सख्त था, लेकिन वाक्य के अंत में सुधार की बात करते-करते नरम हो गए।

सुनील ने कहा- जी मास्टर जी, लिखावट सुधारने पर पूरा जोर लगा दूंगा। विजयी योद्धा की तरह पलटकर आसन ग्रहण किया। मन ही मन बेहद जोर से मुस्कुराया। हेडमास्टर जी के जाने के बाद सबको बता दूंगा, दिखा दूंगा, मैं ही चैंपियन हूं लेकिन तब उसे ख्याल आया। अभी तो मजा शुरु हुआ है क्योंकि शायद ही पूरी क्लास में और किसी को बेफैलो की स्पेलिंग का पता हो। अब सबकी पिटाई देखने में मजा आएगा, बहुत मजा आएगा। रोशनी की रफ्तार 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड होती है, लेकिन कपटी सुनील का मन उससे भी तेज गति से सोचते हुए असीम आनंद की अनुभूति कर रहा था।

और 3 लाख से बस जरा कम थी मंगल के दिल की धड़कन। उसकी हालत ऐसी थी जैसे रेलवे ट्रैक पर ट्रेन के सामने आकर कोई वक़्त भूल जाए। लोग दूर से चिल्ला रहे हैं, हट जाओ, हट जाओ। लेकिन सुनते हुए भी पांव हिल ना पा रहे हों।

खूंखार हेडमास्टर की नजरों में नजरें मिलाए, बिना पलक झपकाए मंगल चल पड़ा। वो डर में यहां तक भूल गया कि उसने क्या लिखा है, क्या नहीं ? चंपूलाल के सामने जा खड़ा हुआ और उनकी तरफ देखता ही रहा। हेडमास्टर उसे देख रहे हैं और वो हेडमास्टर को। पूरी क्लास इन दोनों को।

ऐसे प्राणी से हेडमास्टर जी की भिडंत शायद भूतकाल में नहीं हुई थी। वो समझ नहीं पाए कि मंगल का दिमाग कंप्यूटर की तरह हैंग हो चुका है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है। चंपूलाल जी ने चुपके से अपना हाथ आगे बढ़ाया, मंगल के हाथों से कॉपी ली। चैक की। स्पेलिंग सही थी। उससे कहा, जाओ बैठ जाओ. मंगल रोबोट की तरह मुड़ा और जाकर बैठ गया। हेडमास्टर जी ने राहत की सांस ली।

सुनील, सतीश और कक्षा के बाकी बच्चे समझ नहीं पाए कि आखिर ये क्या हो गया, कैसे हो गया। कौन हारा, जीत किसकी हुई है। 80 कोस को डराए रखने वाले चंपूलाल क्या आज हार गए हैं ? क्या मंगल जीत गया है। पहले मंगल का दिमाग हैंग था, अब पूरी क्लास का !

शानपुर के सरकारी स्कूल की 8वीं कक्षा कोई साधारण क्लास नहीं है। बड़े-बड़े आए और गच्चा खाकर ठंडे हो गए। ये चुगली अंग्रेजी के टीचर गुलाब सिंह, प्यारी मैडम के साथ कर रहे थे। गुलाब सिंह इस कक्षा को सातवीं में अंग्रेजी पढ़ाते थे, लेकिन इस बार उन्हें मौका नहीं दिया गया, इसलिए उनके मन में जलन थी। गुलाब-प्यारी मैडम की बातचीत को लहरिया चौकीदार ने छिपकर सुन लिया था। निचोड़ को मिलावट के साथ हेडमास्टर जी के कान में घोल दिया। हालांकि ये बात बताने पर चंपूलाल जी ने चौकीदार को डांट भी मारी थी।

खैर, चंपूलाल जी आगे बढ़े और सतीश को न्योता भेजा। कॉपी लाओ। आज तक किसी को समझ नहीं आया, सतीश बैठता कैसे है ? बैठा हो तो खड़ा कैसे होता है ? दरअसल बैठते-खड़े होते वक्त उसकी टांगे बड़ी उलझ-पुलझ जाती थी, बावजूद इसके वो सामान्य इंसान की तुलना में कहीं तेजी से बैठता और खड़ा हो जाता। हालांकि वो बिलकुल सामान्य बालक था, बस अंदाज निराला था।

हेडमास्टर जी भी ये अंदाज देखते रह गए ! मंगल के बर्ताव के बाद उनके सामने दूसरा अजीब वाक्या हो रहा था, हैरतभरी आंखों के साथ सतीश की कॉपी हाथ में लेकर बेफैलो की स्पेलिंग चैक की। और कहा- सही है। इसके बाद चंपूलाल जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सतीश ने बड़े आत्मविश्वास से उनके हाथ से अपनी कॉपी ले ली। और स्टाइल से मुड़कर मॉनिटर सुनील की तरफ आंख मारी। आंख मारने का मतलब था कि इस क्लास का हीरो वो है। कपटी सुनील का खून खौल उठा।

हेडमास्टर जी सोचने लगे कि उन्हें इस कक्षा के बारे में गलत खूफिया जानकारी दी गई है। बेफैलो जैसे कठिन शब्द की स्पेलिंग सभी छात्रों ने सही लिखी है। हालांकि छात्र कुछ बेढ़ंगे हैं, लेकिन होशियार हैं।

दार्शनिक भाव से मंथन कर रहे हेडमास्टर की नजर एक और अजीब लड़के पर पड़ी। जो बाकियों की तुलना में कहीं बढ़कर चंपूलाल जी को निहारे जा रहा था। जैसे वो बालक हेडमास्टर को देख रहा था, आज तक किसी ने ऐसे नहीं देखा। छात्र की इतनी खोजी नजर देखकर उनसे रुका नहीं गया, एकदम कुर्सी छोड़ दी और सीधे उसके पास पहुंच गए। कहा- कॉपी दिखाओ तुमने सही लिखा है या नहीं।

बैल जैसा मुंह बनाकर लंबा-चौड़ा लड़का ऐसे खड़ा हुआ कि चंपूलाल जी को समझ में नहीं आया। इसे शर्माना कहा जाए या डरना। छात्र ने खड़े होने के साथ कॉपी छिपा ली। हेडमास्टर ने कहा- कॉपी दिखाओ। छात्र कॉपी दिखाने से झिझक रहा था। हेडमास्टर जी ने खुद से लंबे लड़के के हाथ से कॉपी लगभग झपट ली। और पन्ने पर बना मंजर देखते ही उनका गला दहाड़ उठा। दरबो, डंडा लेकर आओ....

जैसे प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के मीटिंग में व्यस्त होने पर, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप के कमांडो कमरे के बाहर मुस्तैद रहते हैं, उसी तरह चपरासी दरबो ताई चंपूलाल जी की परछाई थी। वो कमरे के बाहर बरामदे में खड़ी थी। उनके हाथों में चंपूलाल जी का ब्रह्मस्त्र था। वो बांस का डंडा जो रोजाना शुद्ध सरसों के तेल में नहलाया जाता था। ताकि वक्त आने पर जब उसका प्रहार हो, तो सामने वाले की गदा, गूंज उठे।

हेडमास्टर जी का आदेश सुन, दरबो ताई लगभग दौड़ने के अंदाज में कमरे में दाखिल हुई। हेडमास्टर जी का पारा सातवें आसमान से ऊपर जा चुका था। चंपूलाल जी ने गर्दन पकड़ते हुए लड़के को झुक जाने का आदेश दिया। गर्दन पकड़ते हुए हेडमास्टर जी को अहसास हुआ कि छात्र अंदाजे से ज्यादा मजबूत है। छात्र क्षमा की प्रार्थना कर रहा था। कक्षा में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि बलबीर नाम के उस छात्र ने ऐसा क्या लिख दिया कि चंपूलाल जी को ऐसा भयानक गुस्सा आ गया है।

हेडमास्टर जी दोनों हाथों से गर्दन पकड़ झुक जाओ की रट लगा रहे थे, बलबीर जवाब में बार-बार क्षमा की प्रार्थना कर रहा था। दरबो ताई को समझ नहीं आ रहा था कि हेडमास्टर जी के दोनों हाथ तो व्यस्त हैं, वो डंडा कहां पकड़ाए !

बात बढ़ती गई, छात्र झुक नहीं रहा था, लेकिन चंपूलाल कोई सामान्य हेडमास्टर नहीं थे। अगर आज इस लड़के को झुका नहीं पाए तो कल उनकी क्या इज्जत रह जाएगी ? सुनील-मंगल-सतीश की खोपड़ियां सोच रही थी कि बलबीर ने जरुर कुछ बड़ा कांड कर डाला है ?

हेडमास्टर जी ने पूरा दम लगा बलबीर को थोड़ा झुका दिया, एक हाथ पीछे ले गए और उसकी पीठ में खुले हाथ से थप्पड़नुमा घूसा छोड़ दिया। ज्यों ही हेडमास्टर जी का हाथ ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ा, बलबीर ने सिद्ध योगी की तरह कमर को जकड़कर मजबूत कर लिया। जब हाथ-पीठ का संगम हुआ, तब हेडमास्टर जी को लगा कि उनका हाथ बिरला सीमेंट से बनी दीवार में जा टकराया है।

चंपूलाल जी ने दहाड़ मारी...तोड़ दियायययया, अबे हाथ तोड़ दिया, दरबो डॉक्टर बुलाओ, हाथ तोड़ दिया...

हेडमास्टर जी जब भी बोलते थे, ऊंचा बोलते थे। जब दहाड़ते थे, तब ऊंचा दहाड़ते थे। अब तो दर्द से चीख रहे थे। उनकी दर्द भरी आवाज स्कूल के हर कोने को पार कर गई। दूसरे टीचर आठवीं कक्षा की तरफ आशंका से दौड़े।

छात्र बलबीर के पिता कुल्हाड़ी से लकड़ी काट फर्नीचर तैयार करते थे। आलसी आदमी खुद कम काम करता, बलबीर बचपन से काम में आगे रखता। लकड़ी काटने-फर्नीचर बनाने का मुश्किल काम करते-करते बलबीर फौलाद बन चुका था।

हेडमास्टर जी थे तो ताकतवर, लेकिन अब उम्रदराज हो चले थे। यही बात वो भूल गए। सांड जैसे लड़के की पत्थरनुमा पीठ पर पंजा खोल मुक्का मारने की कोशिश की। उन्हें लगा कि हाथ जब तक ऊपर से नीचे जाएगा, हाथ का खुला पंजा एकजुट हो मुक्का बन जाएगा।

दूसरी तरफ बलबीर माफ कर दो-माफ कर दो की रट के साथ, हमले से बचने की फिजिकली तैयारी कर रहा था। पहले कमर ज्यादा झुकी थी, जैसे ही हेडमास्टर जी का हाथ आसमान से उसकी तरफ बढ़ा, पंजे के बंद होने से पहले ही उसने पीठ ऊपर उठा दी। शरीर को जकड़ एक कर लिया। भिडंत से पहले हेडमास्टर जी का खुला पंजा एकजुट हो मुक्का बन ही नहीं पाया और बलबीर की पत्थरनुमा पीठ से उंगलियां अलग-अलग जा टकराई। नतीजा उनकी चीखनुमा दहाड़ थी।

कमरा अस्त-व्यस्त हो चुका था। दूसरे टीचर हालात को समझने में लगे थे। भयभीत बलबीर खुद को फांसी पर टांग दिए जाने का इंतजार कर रहा था। कपटी सुनील उस कॉपी तक जा पहुंचा, जिसमें राज छिपा था। जमीन पर उलटी पड़ी कॉपी को सीधा किया तो पाया उसमें हेडमास्टर जी का कार्टून बना हुआ है। हेडमास्टर जी रावण की तरह सिंहासन पर विराजमान हैं। और टूटे दांतों को दिखाकर हँस रहे हैं। उनके दाएं मंगल किसी अप्सरा की तरह खड़ा है। सबको पता था कि मंगल और बलबीर की कभी नहीं बनी।

सुनील ये सोच रहा था कि बाकी टीचरों को राज से वाकिफ कराया जाए या मन में दफन कर लिया जाए पर मॉनिटर अकेला नहीं था जो खोजी वैज्ञानिक की तरह सच के पीछे पड़ा था, उसके कंधे के ठीक उपर से राकेश और सतीश की चार आंखें सब कुछ देख चुकी थी। बात निकली तो पल में जंगल की आग की तरह फैल गई। फिर तो वो कॉपी एक टीचर से दूसरे के हाथ में पास होती गई। हर अध्यापक शर्मनाक-बेशर्म-बदमाश जैसे अलंकारों से बलबीर को नवाज रहे था। हालांकि ड्राइंग के टीचर ने कार्टून देख ना बुरा कहा-ना भला।

चौकीदार ने चंपूलाल जी को सहारा देकर हेडमास्टर ऑफिस ले जाने की कोशिश की लेकिन मुख्यअध्यापक ने उसे एक तरफ झिड़क दिया। धीरे-धीरे कक्षा 8 के कमरे से सारा घटनाक्रम हेडमास्टर ऑफिस में ट्रांसफर हो गया। बच्चे कक्षा में अनाथ बैठे थे। दूसरे छात्रों की नजरें बलबीर को और डरा रही थी, मानों अब तो उसे काले पानी की सजा मिलेगी।

घंटी बजती, नया टीचर आता, वही सवाल दागता जो पहले वाले ने पूछे थे, बच्चे ज्ञानी तोते की तरह रीपीट जवाब मारते। बलबीर अछूत की तरह सबसे आखिर में अकेला बैठा रहा। डॉक्टर आकर चंपूलाल जी के हाथ में भारी भरकम कपड़ा लपेट गया। कुछ देर बाद गणित के अध्यापक ने हेडमास्टर जी के चेतक स्कूटर की लगाम संभाली, चंपूलाल जी पीछे बैठे थे। दिन बिना पढ़ाई के बीत गया। हालांकि उसके बाद बलबीर को किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन वो डरा हुआ था।

अगले दिन हेडमास्टर जी स्कूल आए। उनके हाथ में प्लाटर चढ़ा था। तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। कक्षा 8 में भी कुछ देर के लिए आए। सब हैरान थे कि उन्होंने कोई गुस्सा नहीं किया। बलकी पहली बार बच्चों ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा। और फिर पढ़ाई में मन लगाने की नसीहत देते हुए चले गए। तीसरे दिन भी हेडमास्टर जी स्कूल से जल्दी घर के लिए निकल गए।

हेडमास्टर जी के चले जाने पर स्कूल का मंजर बदल जाता। टीचरों का बर्ताव बाकी सरकारी स्कूलों की तरह मनमौजी हो जाता था। टीचर ही मजे ले रहे हैं फिर बच्चे तो उनके बाप थे। पढ़ाई की बजाए पूरे दिन मस्ती चलती। हेडमास्टर जी लगातार छुट्टी पर चल रहे थे। बच्चे बस ये सुनते थे कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। बलबीर उनकी खराब तबीयत के लिए खुद को दोषी समझता। लेकिन किसी भी दूसरे टीचर ने बलबीर को कुछ नहीं कहा।

दिन बीतने लगे, हेडमास्टर जी स्कूल नहीं आ रहे थे। स्कूल में पढ़ाई बस नाम मात्र की होती। बच्चों को यही सुनने में आता कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। अब स्कूल में वो रोमांच नहीं रहा, जो पहले होता था। कुछ रोज हेडमास्टर जी की गैरमोजूदगी मजेदार लगी। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद मानो पूरे स्कूल को आलस ने लपेट लिया था।

अब गुलाब सिंह 10वीं और 8वीं को अंग्रेजी पढ़ाने लगे। जैसा अधकचरा काम पहले होता था, जारी रहा। एक रोज अचानक हेडमास्टर जी का चेतक स्कूटर मुख्य गेट से अंदर दाखिल हुआ। लेकिन उसे अंजान शख्स चला रहा था। जब स्कूटर ऑफिस के करीब पहुंचा तो सबने देखा कि चालक के पीछे हेडमास्टर जी भी बैठे हैं। लेकिन बेहद कमजोर हो गए हैं। उनको पैदल चलने में भी दिक्कत हो रही है।

कुछ देर ऑफिस में रुककर वो हर कक्षा में गए। बड़े प्यार से छात्रों को देखा। ज्यादा बोल नहीं रहे थे, बस दोनों हाथ उठाकर मानों आशीर्वाद दे रहे थे। अध्यापक नारायण जी के साथ स्कूल का चक्कर लगाकर ऑफिस वाले कमरे में लौट गए। वो अकेले ही कमरे में बैठे थे। पता चाल कि स्कूटर को चलाकर उनका बेटा लाया था। जो विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा था।

सुनील को पुस्तकालय में किताब वापस रखने जाना था। लेकिन दरवाजे पर ताला लगा था। अशोक जी स्कूल के क्लर्क थे, उन्होंने देखा तो कहा कि वो हेडमास्टर जी के कमरे से दाखिल होकर अंदरवाले दरवाजे से पुस्कालय में चला जाए, क्योंकि मुख्य दरवाजे की चाबी वो घर भूल आए हैं।

हेडमास्टर ऑफिस और पुस्तकालय एक-दूसरे से सटे हुए थे। दोनों कमरों को जोड़ता अंदर एक दरवाजा था। सुनील अशोक जी के आदेश के मुताबिक हेडमास्टर रूम का ढका दरवाजा खोल अंदर दाखिल हो गया। विशाल कमरे में बड़ी मेज की दूसरी तरफ चंपूलाल जी लवली को बांहों में लेकर सहला रहे थे। चंपूलाल जी बच्चे की तरह उससे खेल रहे थे। मुंह से म्याऊ-म्याऊं की आवाज निकाल रहे थे। लवली प्यारी सी बिल्ली थी। जो हमेशा स्कूल में रहती थी। सुनील ये मंजर देखकर हैरान रह गया।

आगे बढ़ते छात्र को हेडमास्टर जी ने देख लिया, लेकिन बड़े प्यार से पूछा- क्या बात है बेटे। सुनील ने कहा हेडमास्टर जी पुस्तक वापस रखने आया हूं। उन्होंने खेलते हुए कहा, हां, हां रख दो। किताब रखकर सुनील खेलते-हँसते हेडमास्टर जी को देख खुद भी हँसने लगा। फिर लौट आया।

फिर चंपूलाल जी बेटे के साथ स्कूटर पर बैठ चले गए। दिन बीतते गए। उनकी कोई खबर नहीं। शानपुर का स्कूल बदल गया। इसलिए नहीं कि वहां हंसने-खेलने की आवाज नहीं आती थी। लेकिन अब उस स्कूल से अनुशासन जाता रहा। टीचर खुद ही बातचीत में, गप्पेबाजी में व्यस्त रहते। बच्चे भी लड़ाई-झगड़े-खेल-कूद में उलझे रहते।

एक सुबह प्रार्थना के बाद जमा सभी बच्चों को बताया गया कि हेडमास्टर जी को कैंसर है। मेडिकल हॉस्पीटल में उनका इलाज चल रहा है। वो काफी दिन से वहीं भर्ती हैं। इसलिए सभी बच्चे 2 मिनट मौन धारण कर उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करेंगे।

गांव में बातें शुरू हो गई। बड़े-बुजुर्ग कहने लगे, ऐसा हेडमास्टर स्कूल को दूसरा नहीं मिलेगा। चंपूलाल जी दशक भर से शानपुर में तैनात थे। उनके आते ही स्कूल का नाम रोशन होना शुरू हो गया था। लेकिन बीमार पड़ने के कुछ महीनों बाद ही सब कुछ बदल गया।

मंगल-सतीश-सुनील-बलबीर सभी बच्चे बात करने लगे। वो अब समझ रहे थे कि हेडमास्टर जी के सख्त रहने की वजह से ही बाकी टीचर पढ़ाई पर ध्यान देते थे। हेडमास्टर जी मन से बहुत अच्छे इंसान थे। अच्छी शिक्षा देते थे। वक़्त के कितने पाबंद थे। कभी छुट्टी नहीं करते थे। उनके मार्गदर्शन की वजह से ही शानपुर के बच्चों ने बाहर जाकर हर प्रतियोगिता में ईनाम जीते थे।

एक रोज जब बच्चे स्कूल पहुंचे तो अजीब माहौल लगा। प्रार्थना के बाद सबको बताया गया कि चंपूलालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे। सभी 2 मिनट का मौन धारण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। मनोज रो रहा था। सभी मौन धारण कर चुप हो गये। उसके बाद स्कूल की छुट्टी कर दी गई।

दिन बीते और नए हेडमास्टर ने ड्यूटी ज्वॉइन की। वो कार से स्कूल आते थे। स्कूल में आने के बाद चौकीदार हर रोज उनकी गाड़ी की धुलाई करता। हेडमास्टर जी रोजाना कुछ टीचरों के साथ बरामदे में कुर्सी लगा बैठ जाते। और बातचीत के लंबे दौर चलते।

कुछ टीचर-कुछ बच्चे ये फर्क बड़ी गंभीरता से महसूस कर रहे थे, उन्हें अब घुटन हो रही थी। सबसे बड़ा संकट गांव के उन गरीब माता-पिता, बुजुर्ग दादा-दादियों पर था जो सरकारी स्कूल से बच्चों का सुनहरा भविष्य बनने का सपना देख रहे थे लेकिन अब समझ चुके थे, शानपुर का स्कूल अब गांव की शाान नहीं रहा।

हेडमास्टरजी मौत पढ़ाई

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