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अजगर
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© Tulsi Tiwari

Drama

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‘‘बुढ़िया का फैशन देखा ! यह क्या मरने वाली है जल्दी ? मिले तो मरद कर ले।’’ उसने सुना था लक्ष्मी किसी से फोन पर बतिया रही थी।

’’हाँ अब क्या रह गया जीने के लिए, सारे दायित्व पूरे हो गये। बस जमा पूंजी पकड़ाओ बहू लक्ष्मी को, और रुखसत हो।’’ वह पूरी रात रोई थी, बार-बार भगवान् से अपनी मौत माँगी थी।

कुछ कर बैठने का मन भी हो रहा था, किन्तु वैभव का लस्त-पस्त चेहरा उसकी आँखों के आगे आ जाता और वह अपने को बुरी तरह विवश पाती जीने के लिए ‘‘यह तो मेरे बच्चे की दुर्गति कर देगी।’’ इतने दुलार का मेरा बच्चा ! कैसे अकेले सह पायेगा इतना बड़ा सदमा ! पेंशन भी तो इस जीवन से हीे है।’’

‘‘ममा, जो किया उसे तो भरना ही होगा, इस तरह मुँह लटका कर मत बैठो ! जैसे कोई मर गया हो।’’ लक्ष्मी का जहरीला स्वर उसके कानों मंें पड़ा।

‘‘मरने से कम भी नहीं है बहूरानी! इतना बड़ा धोखा देगा वह इन्सान, यह तो मंैने सपने में भी नहीं सोचा था।’’ ललिता की आवाज जैसे गहरे कुएँ से आ रही हो।’’

‘‘इसमें भी आप की ही गलती है, जब आप बेटा-बेटा कर रहीं थीं तो हम कैसे विश्वास न करते ?’’ वह उसके सिर पर काँय-काँय कर रही थी।

‘‘अच्छा ठीक है सब कुछ मैंने ही किया, पाँच लाख में घर बैंक में गिरवी मैंने रखा, एक लाख उधार मैंने लिया, साड़ी वाली से, सारा रूपया बैंक से निकालकर मैंने ही दिया, तुम लोगों ने कुछ नहीं किया, अब हटो यहाँ से...ऽ ....ऽ....!’’ वहशियाने ढंग से चिल्लाई वह। एक पल को लक्ष्मी सहम गई परन्तु दूसरे ही पल उससे भी ऊँची आवाज में चिल्लाई ।

‘‘अब जाओ भीख माँगो कटोरा लेकर।’’ हम क्या कर सकते हैं ?’’ वह हाथ झटकती कमरे से बाहर हो गई।

शाम ढल रही थी, नीम अंधेरा उस छोटे से कमरे में गहराने लगा था, गर्मी और उमस से लग रहा था, प्राण निकल जायेंगे। फर्श पर सिलाई मशीन के आस-पास रंग-बिरंगे कपड़े बिखरे थे, लगता था जैसे काम बीच में छोड़ कर वह उठी हो।

‘‘आण्टी ! कपड़े हो गये क्या ? पेकिंग करनी है,’’ दरवाजे पर पड़ोस में रहने वाली नम्रता खड़ी थी पसीने से लथ-पथ किन्तु उत्साह से भरी हुई।

उसने जरा सा सिर उठा कर उसे देखा।

‘‘अभी तो नही हुआ बेटा, तबियत थोड़ी खराब है, देखो आप के ही कपड़े बिखरे हुए हैं, कट गये हैं, बस सिलना बाकी है।’’ उसने लगभग कराहते हुए कहा था। उसका सिर कई मन बोझ से बोझिल हो रहा था। कनपटियों पर हथौड़े पड़ रहे थे, आँखें खोलना भारी पड़ रहा था। चेहरा काला, होंठ पपड़ियाये, बताने की आवश्यकता नहीं थी कि वह अस्वस्थ है।

‘‘ये तो गलत बात है आण्टी ! परसों मेरे भाई की शादी है, दुल्हन के सारे कपड़े काट कर रख दिये हैं आपने। आपके ऊपर तरस खाकर दिये हैं हमनें, नहीं तो क्या टेलर की कमी है, शहर में ?’’ वह अपनी रौ में बड़बड़ाती जा रही थी।

‘‘मैं क्या करूँ, ? शरीर नहीं चल रहा है मेरा ?’’ वह असहाय स्वर में बोली थी।

‘‘तो वापस कर दो ! दूसरी जगह सिला लेंगे।’’ वह बिगड़ पड़ी।

‘‘कपड़े कट गये है, थोड़ा अच्छा लगते ही सिलने बैठ जाऊँगी, मुझे भी चिन्ता है।’’ वह फिर बोली।‘

’‘वह सब हम कुछ नहीं जानते, आपके काटे कपड़े कौन सिलेगा ? सिलकर कल तक दो नहीं तो दंड भरने को तैयार रहना, बीस हजार के कपड़े काट रखे हैं आपने।’’ वह पैर पटकती चली गई। उसकी बातों से ललिता और आहत हो गई। समय-समय की बात है जब गोविन्द थे, यही नम्रता दिन भर घर में खेलती-खाती पड़ी रहती थी, माँ छोड़कर काम पर चली जाती थी, अब लड़का लायक निकल गया, घर में चार पैसे आने लगे तो कैसे बोलना आ गया ?

‘‘यदि कपड़े नहीं दिये तो लोगों का विश्वास भी तो उठ जायेगा ललिता के ऊपर से, लक्ष्मी से यह भी तो नहीं हो सकता कि तुरपाई, हुक आदि का काम ही करवा दे।’’ उसने अपनी हथेलियों के बीच अपना सिर लेकर दबाया।

‘‘मेरा बेटा भी तो लायक है ! चला था एक दिन में करोड़पति बनने ! और इस लक्ष्मी के भी तो जैसे पंख लग गये थे उन दिनों, बेटी को जनम दिया था, माँ बनने के बाद रंग जरा सा निखर आया था, वह इस प्रकार गर्वोन्मत्त हो रही थी जैसे और किसी ने बच्चा पैदा ही न किया हो। दिन रात बस बिटिया का मुख निहारा करती, सारा घर बाहर ललिता के जिम्मे था।

वह भी एक ऐसी ही शाम थी, दरवाजे पर आकर एक नई कार रुकी, उसने सोचा ’’पड़ोस में किसी के घर कोई आ रहा होगा परन्तु यह वैभव वहां क्या कर रहा है ?

वह उस साँवले से सुटेड-बुटेड युवक को लेकर आ रहा था।

आँखों में प्रश्न लिये वह दरवाजे पर खड़ी थी।

‘‘माँ है भाई !’’ वैभव ने परिचय दिया और वह व्यक्ति तुरन्त उसके कदमों में झुक गया था।

‘‘माँ ! माँ ! अब तक मैं बिना माँ के था, आज माँ मिल गई।’’ वह विह्वल हो रहा था, लगता था वह उसकी गोद में सिर छिपा लेगा। ललिता ऐसे व्यवहार के लिए तैयार नहीं थी। गरमी की परवाह न करते हुए वह अन्दर आकर एकदम बेतकल्लुफी से खाट पर बैठ गया। उसके एक हाथ में उसकी कोट से मैच करता ब्रीफकेश था, पाँचों अंगुलियों में भाँति-भाँति की रत्नजड़ित अंगूठियाँ चमक रहीं थीं।

‘‘हे भगवान् ! यह कौन है ? हम इसे अपने घर में कहाँ उठाये-बैठायें ? ढंग के गिलास, कप भी तो नहीं हैं अवश्य आज हमारी तकदीर चमकी है जो ऐसा मेहमान घर आया। वाह बेटा ! वैभव नाम के अनुसार मित्र अब पाये हो जाकर।’’ वह गर्व से भर उठी थी।

‘‘लक्ष्मी ! बेटी थोड़ा शुद्ध घी होगा डिब्बे में, मेहमान के लिए हलवा बना दो।’’ उसने लक्ष्मी के कानों में फुसफुसा कर कहा था। बगल वाले कमरे में सीलिंग फेन चल रहा था, कुछ प्लास्टिक की कुर्सियाँ भी थीं, जिन्हें रात के समय तरपरी रखकर वैभव और लक्ष्मी अपनी खाट बिछा लेते थे। ऊपर का माला उसने किराये पर दे रखा था। जो ही चार पैसे आये हाथ में।

हलवा लेकर अभी लक्ष्मी कमरे के सामने ही पहँुची थी कि उसने लपककर पूरी श्रद्धा से उसके पैर छुए थे।

‘‘मेरी लक्ष्मी भाभी’’ ! कब से कह रहा था वैभव से कि मुझे मेरे घर ले चलो, यह मानता ही नहीं था, आज तो मैंने जिद्द ही कर लिया कि मैं घर चलूँगा, माँ से मिलने। वह अपने आगे किसी को बोलने का मौका ही नहीं दे रहा था, घंटा भर बीत गया दो बार चाय नाश्ता हो गया। बेटी के हाथ में पाँच सौ रूपये का एक नोट भी थमा दिया था उसने।

‘‘यह तो कुछ भी नहीं, अभी आगे देखिये मैं क्या-क्या करता हूँ अपने परिवार के लिए।’’ उसने स्वयं अपनी दरिया दिली की प्रशंसा की थी।

लक्ष्मी गद्गद् ! आज तक किसी रिश्तेदार ने भी पाँच सौ नहीं धराये मेरी बेटी को, बड़ा भला आदमी लगता है।’’

‘‘आज के जमाने में इतना प्रेमिल और निश्छल व्यक्ति भाग्य से ही मिलता है’’।। ललिता ने अपने नये बेटे को वैभव से ऊँचा स्थान दे दिया था।

दूसरी बार वह अपनी पत्नी और बच्चे के साथ आया था। गहनों से लदी वह एक साँवली सी युवती थी, उतनी ही श्रद्धा से उसने सास और जेठानी को अपनाया। शिष्टाचारवश ललिता को पाँच सौ बहू और पाँच सौ पोते के हाथ में रखना पड़ा। ऐसा लगने लगा था उसे जैसे उसने एक नहीं दो बेटों को जन्म दिया हो, वैभव और पवन।

‘‘यह करता क्या है वैभव कहाँ से मिल गया तुझे, कुछ अता पता बतायेगा’’ ? किसी पर आँख मूंदकर भरोसा करना भी ठीक नहीं है, उसने अपनी बुद्धिमत्ता और सावधानी का परिचय दिया।

‘‘बहुत बड़ा कारोबार है माँ, इसके पास बड़ी-बड़ी कंपनियों के शेयर हैं, रातों-रात लाखो-करोड़ों कमाता है बैठे-बैठे, जमीन है इसके पास, उस पर घर बनाकर बेचता है, पाँच ठो तो कार है इसके पास’’ वह लहक-लहक कर बता रहा था।

‘‘है कहाँ का, तुमसे कैसे परिचय हो गया’ ?’’

‘‘उड़ीसा तरफ के हैं, माँ, यह कहो कि तकदीर ही इसके पास ले गई, मैं जिस दुकान में काम करता हूँ, वहीं आया था यह अपनी कार के लिये सामान लेने, बस ! देखते ही कहने लगा - ‘‘तुम्हारा माथा इतना ऊँचा है तुम्हारे पास रूपये की क्या कमी है जो इस वर्कशॅाप में काम कर रहे हो ? तुम्हें देखकर मुझे लग रहा है जैसे मेरा तुम्हारा पिछले जन्म का कोई नाता है।’’ मैंने पहले ही दिन इसे दस हजार का सामान बेचा, सेठ भी खुश और मैं भी। वहीं से परिचय बढ़ा। न मेरा कोई भाई था न उसका बस एक दूसरे के हो गये’’। वैभव को इतना खुश तो उसकी शादी में भी नहीं देखा था उसने।

उस दिन पवन वैभव के घर आने से पहले से ही आकर बैठा था माँ-बेटे अपने- अपने अनुभव बाँट रहे थे। शादी के बाद से वैभव को भी कहाँ इतना समय है कि माँ के पास दो घड़ी बैठ कर उसका हाल-चाल पूछ ले। हजार काम रहते हुए भी पवन अपनी मुँह बोली माँ के लिए समय निकालता है, अच्छा लगता था ललिता को । वैभव कुछ अनमना सा लौटा था ड्यूटी टाइम से दो घंटे लेट । उसकी हालत देख कर पवन उसके प्रति हमदर्दी से भर कर कहने लगा था।

‘‘माँ ! मैं सोच रहा हूँ कि मेरी मेहनत का फल मेरे भाई को भी मिले। रूपया रूपये को कमाता है यदि आप दस लाख लगा दो, तो छः माह में पाँच करोड़ कमाकर दे देंगे दोनों भाई।’’

‘‘पाँच करोड ! ! ! और वह भी दस लाख लगाने पर ? लगा दो माँ ! हमारा जीवन सुधर जायेगा।’’ लक्ष्मी उसकी परिक्रमा करने लगी थी। ।

‘‘वही दस लाख जीवन-मरण का सहारा है खाली हाथ होकर बैठ जाऊँ’’ ? उसने संशय भरे स्वर में कहा।

‘‘कैसी बात करती हो माँ ?’’ तुम्हें हम पर भरोसा नहीं है क्या ? हमारे पास जब इतना रूपया होगा तो तुम्हें क्या कमी रहेगी ? आखिर तुमने हमारे भविष्य के लिए ही तो बचाकर रखा है ना .....ऽ....ऽ...?.क्या तुम नहीं चाहती कि तुम्हारा बेटा बड़ी-बड़ी कार में सफर करे ? तुम्हारी बहू गहनों से लदी रहे ? हम बंगले में रहें, नौकर चाकर भरे रहें।’’ वैभव उसकी गोद में सिर रखे लाड़-लड़ा रहा था।

‘‘बेटा ! हम साधारण लोग हैं, वे रूपये तेरे बाप की जिन्दगी भर की कमाई के हैं हाथ नहीं उठता खर्च करने के लिए।’’

‘‘रखने से रूपये जैसे के तैसे पड़े रहेंगे, बैंक कितना ब्याज देगा ? उसे पूँजी बनाने की हिम्मत करो माँ ! फिर देखना तुम्हारे बेटे क्या कमाल करते हंै।’’ पवन ने समझाया था।

‘‘इतना है तो तुम्हीं लगा दो न बेटा, इसका मेहनताना दे देना, जो दूसरों को देते हो।’’उसने लगभग इंकार कर दिया था।

‘‘दे तो देता माँ, परन्तु मैंने अपनी पूरी पूँजी लगाकर बीस एकड़ जमीन खरीदी है। प्लान यह है कि बैंक से लोन लेकर उस पर फ्लेट्स बनाये जायेंग,े फिर उन्हें बेचकर लंबा धन कमाया जायेगा, किन्तु हमें कम से कम दस लाख का काम दिखाना पड़ेगा, तब बैंक से लोन मिलेगा।’’ उसने पूरी योजना समझा दी।

‘‘ठीक है मुझे जमीन और उसके कागजात दिखाओ तब सोचूँगी।’’ उसने पिण्ड छुड़ाया था, पूरे समय बेटे-बहू आगे पीछे डोलते रहे, लक्ष्मी पैर दबाने आ गई। सुख की कल्पना में खोई थी वह। दूसरे दिन वह कार लेकर आ गया। उसने शहर से बाहर एक बड़ी सी जमीन दिखाई बंजर-उबड़-खाबड़ और रजिस्ट्री के कागज भी।

‘‘आप चाहो तो कुछ जमीन वैभव के नाम रजिस्ट्री कर दूँ ?’’ उसने मन लेने के लिए कहा। स्टाम्प पेपर पर अनुबंध लिखा हुआ था, जिसके अनुसार बैंक का कर्ज और दोनों की लागत निकालने के बाद बचे लाभ पर दोनों का बराबर-बराबर हक होगा। रूपया निकाल कर दे दिया था ललिता ने।

उसे लगने लगा था जैसे हवा पर सवार हैं वे लोग, आसपास के लोगों से अलग, बस थोड़े ही समय बाद काम प्रारंभ हो जायेगा, काम देखकर बैंक लोन पास करेगा, फिर कितनी देर लगेगी फ्लेट बनने बिकने में ?’’

‘‘कितनी प्रगति हुई बेटा तुम्हारे काम में ?’’ वह मालकिन वाले अंदाज में पूछती।

‘‘नक्शा बन रहा है, पहले उसे पास कराना है फिर नींव भरना होगा कुछ फ्लेट्स के। लगे हैं उसी में दिन रात।’’ पवन ने बड़ी व्यस्तता से कहा। अब घर में बैठे रहेंगे तो काम कब होगा ? वह समझती थी, वैभव गाँव देहात में मजदूर तय करने में लगा था, मन हुलस रहा था ललिता का।

एक दिन वह जरा आराम से बैठा था बातें चल पड़ीं -

‘‘मैं वैभव को अपना सगा भाई मानता हूँ ? जहाँ-जहाँ मैं कमाऊँगा, उसे भी दूँंगा, मैंने दुःख-सुख सभी कुछ देखा है इसी जीवन में, जानतीं हैं मैं कैसे बढ़ा ?’’ उसने उसकी आँखों में अपनी निगाहें जमा दी।

‘‘कैसे बेटा ?’’

‘‘छोटे-छोटे शेयर खरीदता था, बड़ी बड़ी कंपनियों के, भाग्य ने साथ दिया। मेरे सस्ते शेयर काफी महंगे में बिके, लाभ का रूपया फिर शेयर में लगाया और बचे रूपये से ठेकेदारी का काम शुरू किया।’’ उसने जैसे अपना सारा राज खोल दिया।

’’ अब तो हमारे पास कुछ भी नहीं बचा बेटा। फ्लेट्स बेच कर जब लाभ होगा तब देखा जायेगा, उसने ध्यान नहीं दिया।

‘‘मैं बता सकता हूँ उपाय, यदि आपको जँचे तो करना नहीं तो कोई बात नहीं, और मैं नहीं दूँगा आपके ही पास से निकलेगा पैसा।’’ उसने प्रबल आत्म विश्वास से कहा।

‘‘क्या मजाक करते हो भइया, माँ के पास अब कुछ नहीं है।’’ लक्ष्मी ने भी भाग लिया बातचीत में।

‘‘मैं जानता हूँ मेरी माँ लक्ष्मी है, उसके पास से जितना निकालेंगे उतना ही बढ़ता जायेगा।’’ वह बेहद उत्साह में था।

‘‘अच्छा चलो बता दो !’’ उसने कह दिया था।

‘‘इस घर को बैंक में गिरवी रखने पर पाँच लाख आसानी से मिल जायेंगे। पाँच लाख तक के आप दोनों के जेवरात होंगे, दस लाख के शेयर यदि आज लेते हैं तो तीन साल बाद शुद्ध बीस लाख मिलेंगे मैंने ले रखा है, इसमंे छिपाना क्या ?’’

‘‘कहाँ मिलता है शेयर ?’’ लक्ष्मी पूछ बैठी।

‘‘मेरा एक बड़ा अच्छा दोस्त है, आर. के. कम्पनी के शेयर बेच रहा है। बहुत बड़ी कम्पनी है देश-विदेश में शेयर बिकते हैं, जैसे ही खुलते हैं लूट मच जाती है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिस दिन रूपया जमा हुआ उसी दिन तीन साल बाद की दुगुनी रकम का चेक कंपनी की ओर से जारी हो जाता है। अन्य को बेचना चाहो तो अपनी मर्जी, कंपनी के मुनाफे में हिस्सा तो मिलना ही मिलना है।’’ उसने ऐसे हाथ झारे जैसे सारे काम पूरे हो गये हों।

वह चला गया, घर में गहन विचार-विमर्श प्रारम्भ हो गया था।

बहू-बेटे दोनों चाहते थे कि पवन की बताई योजना पर अमल किया जाये। जमीन वाले में समय लगेगा मेहनत लगेगी और उसमें न हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा होना था।

‘‘बैंक का कर्ज पटेगा कैसे, यह भी सोचा है तुम लोगों ने ?’’ वह गंभीर थी, उसकी छठी इन्द्री उसे इस कदम के प्रति सचेत कर रही थी।

‘‘मैं कुछ तो कमाऊँगा ही, जो भी पाँच दस हजार ब्याज आयेगा, मैं पटाता जाऊँगा, तुम्हारी पेंशन, घर का किराया, फिर तुम दोनों थोड़ी तकलीफ कर लेना, बस थोडे़ दिन, माँ ! रिस्क उठाये बिना कोई आगे नहीं बढ़ता, अमीर बनने के लिए इतना तो करना ही होगा।’’ वैभव ने जोरदार सिफारिस की।

‘‘एक बार तो उसने दृढ़ता से मना कर दिया था। पवन का दोस्त घर आकर और रिझा गया।

‘‘मैं तो लोकल आदमी हूँ, धोखा देकर कहाँ जाऊँगा ? अपना समझ कर ही कहा है पवन ने, अन्यथा सारे शेयर तो ईशू होने के दो दिन के अन्दर ही बिक जाते हैं।’’

अपने पूरे गहने निकालकर लक्ष्मी ने रख दिये, ललिता को भी रखना पड़ा, कुल चार लाख बने पूरे बेचकर, एक लाख साड़ी वाली से ले आई लक्ष्मी, बैंक ब्याज दर पर, पाँच लाख में घर गिरवी हुआ, और बीस लाख का चेक ललिता की पेटी में आ गया।

उस समय तो वैभव पवन के साथ ही लगा था, अतः बैंक की किश्त पेंशन से देना शुरू किया ललिता ने। घर खर्च के लिए उसने सिलाई का काम प्रारम्भ कर लिया। बहुत पहले सीखा हुनर काम आया। सब बहुत खुश थे। बस यही मना रहे थे कि जल्दी से जल्दी समय बीते, फ्लेट के लिए लोन मिले, शेयर के बीस लाख रूपये मिले, लक्ष्मी मन ही मन अपने आपको सच की लक्ष्मी देवी मानने लगी थी।

कैसे दमक रहा था सलोना चेहरा बहू का, उन दिनों ? उसके आगे सब कुछ चलचित्र की तरह नाच रहा था।

सौ मजदूर तैयार कर लिए वैभव ने, बस नक्शा पास होने की देरी थी, इधर कई दिनों से पवन से मुलाकात नहीं हो पा रही थी, सफलता की सूचना देने वैभव जब उसके घर गया तो वहाँ ताला लटक रहा था। पूछने पर पता चला कि वह घर खाली कर दूसरी जगह चला गया।

चेहरे पर बारह बज रहे थे, वैभव बड़ी मुश्किल से साइकिल चलाकर घर आया था, ललिता ने धीरज दिया - ’’कोई बात होगी बेटा, फोन लगाओ उसे।’’

फोन नंबर सेवा में नहीं है की आवाज आई।

’’हम ठगे गये बेटा ! बुरी तरह ठगे गये।’’ जमीन पर लेट गई थी वह।

’’वह आयेगा अम्माँ! ऐसा थोड़ी होता है जैसा आप समझ रहीं हैं।’’ लक्ष्मी की आवाज एकदम धीरे से सुनाई दी।

’’अरे हमें बता तो देता, पेट में घुसकर खंजर घोंप दिया पापी ने।’’ ललिता अपना सिर पीट रही थी।

लक्ष्मी ही जरा हिम्मत दिखा रही थी, वर्ना वैभव का भी वही हाल था उसने खाना-पीना घर से निकलना सब बंद कर दिया।

‘‘धन गया सो तो गया हीे यदि बच्चे को कुछ हो गया तो वह धन धरम दोनो से चली जायेगी। उसने वैभव को संभाला। हम पुलिस में जायेंगे बेटा चिन्ता मत कर! जब शेयर वाला बीस लाख मिलेगा तब सारा कर्ज चुका देंगे, समझेंगे हमने कोई काम नहीं किया या फिर कोई लुटेरा लूट कर ले गया।’’

पुलिस की छानबीन में रजिस्ट्री के कागज फर्जी पाये गये। वह जमीन किसी बड़े उद्योगपति की थी। पवन और भी कई लोगों को ठग कर भागा था, वह कुंँवारा था। पता चला कि पत्नी बच्चे किराये के थे उसके।

अभी वे परिस्थिति से समझौता करने की दिशा में बढ़ ही रहे थे कि एक दिन सुनील घर आया। एक साँस में हजारो गालियाँ पवन को दी, सहानुभूति का पिटारा उलट दिया इनके आगे।

‘‘आपका तो दोस्त था न ?’’ लक्ष्मी ने पूछा।

‘‘मेरा दोस्त कैसे होगा ? मेरे लिए कस्टमर लाता था मैं कमीशन देता था बस, आपके मामले में भी एक लाख दिया है मैंने।’’

सबके चेहरों पर मुर्दनी छा गई थी।

‘‘मैं धोखे बाज नहीं हूँ माताराम ! अब आर. के. कंपनी में मेरा जम नहीं रहा है, घाटा तो मेरा बहुत हुआ है, परन्तु मैं आप लोगों को पीड़ा नहीं पहुँचाऊँगा, सब एक जैसे नहीं होते हैं संसार में।’’ उसकी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई थी।

‘‘फिर हमारा रूपया ? आपने चेक दिया है वह भुन तो जायेगा ना ?’’ उसके दिल में संशय ने सिर उठाया।

‘‘माताराम, पहले वाला चेक वापस कर दो ! कंपनी दिवालिया हो गई है। अपने नंबर का मैं दस लाख का चेक देता हूँ, छः माह बाद में रूपये निकाल कर कर्जा-वर्जा पटाओमैं चाहे जैसे हो रूप्ये जमा कर दूंगा !’’उसने जैसे बड़ा एहसान किया हो।

मरता क्या नहीं करता, ललिता को लगा चलो कुछ आस बंधी, कर्जे का तनाव भुगतना उसके लिए बहुत मुश्किल हो रहा था।

उसने चेक देकर नया दस लाख का चेक ले लिया था।

एक दिन में हजार बार दिन की गिनती करती थी वह। कैसे कटे थे दिन कहा नहीं जा सकता। वैभव ने खाट पकड़ ली। इलाज के लिये कहाँ जाये ललिता ? गोविन्द के लिहाज के कारण रेलवे के अस्पताल में बीमारी का इलाज हो जाता था, टूटे मन का इलाज किस अस्पताल में होता है ?

लक्ष्मी की निराशा कुछ और ही रूप में फूटी है, दिन रात ताने तिस्ने, सास से बढ़कर कोई शत्रु नहीं है संसार में, यहाँ-वहाँ बैठकर माँ बेटे को गालियाँ देते वह स्वयं सुन चुकी है।

प्यास से गला सूखने लगा था, उसका।

आज किस प्रसन्नता से उठी थी सुबह, कह नहीं सकती, चेक भुनाकर बैंक का कर्ज चुका देगी, ब्याज सहित एक लाख पच्चीस हजार साड़ी वाली का, शेष जमाकर देगी अपने अंतिम दिनों के लिए, बस चिन्ता हटी तो सब कुछ ठीक हो जायेगा। गोविन्द की पेंशन ही पर्याप्त है दाल-रोटी के लिए। दिन तो लक्ष्मी भी गिन रही थी।

मैं भी चलूँ माँ रूपया खाते में जमा करा देंगे अपने खाते से ही लोन पट जायेगा।’’

उसे अच्छा लगा था, चलो जैसे भी हो स्थिति सामान्य तो होगी, फिर अच्छी भी हो जायेगी। बच्चे रहेंगे तो पैसा फिर आ जायेगा।

वह हिम्मत करके उठी थी कमरे में अंधेरा था, उसने स्वीच दबाकर उसे रोशन किया। नम्रता की भाभी के कपड़े उसके पैरों तले कुचल रहे थे।

‘‘बाप रे ! बीस हजार दंड बोल के गई है, ईमान के सिवा क्या मेरे पास।’’ इस विचार ने जैसे उसे हिम्मत दी कपड़े सिलने की।

उसने एक अंगड़ाई के साथ अपने ऊपर से गर्दिश की गर्द झाड़ी, प्रसाधन से वापस आकर, उसने मुंँह धोया, मटके का ठंडा पानी पीया। मन हो रहा था फिर लेट जाय ‘‘नहीं मन ! खटना पड़ेगा !’’ सारे कपड़े कल शाम तक जोड़ जाड़कर दे देना होगा।’’

पड़ोसिनों के साथ आई थी माया, सभी सहानुभूति जताने कम जी जलाने ज्यादा आईं थीं।’’

‘‘चेक बाउन्स होना हँसी खेल नहीं है दीदी ! कोर्ट में केस करो। जेल चला जायेगा छैः महिने के लिए।’’ उसके पति वकील थे, कानून जानती थी सो अपनी राय दी।

‘‘चेक बाउन्स, क्या कहें ? बैंक आॅफ इन्डिया में कभी उसका खाता था ही नही।’’ ललिता के होठ बड़े धीरे से हिले, एक घायल निःश्वास खारिज हुई थी उसके मुँह से।

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