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रेत पर बनते ढहते घरौंदे
रेत पर बनते ढहते घरौंदे
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© Hridayesh Mayank

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दरवाजा खुलते ही उचाट घर और भयानक सन्नाटे से सुधीर का पाला पड़ा। बटन दबाते ही पूरे घर में रौशनी फैल गई। सुधीर ने इधर-उधर नजरें दौड़ाई। सोफे पर बेटे की स्‍कूल बैग खुली बिखरी पड़ी थी। पलंग पर शर्मिष्ठा के कपड़े बिखरे पड़े थे। वह निढाल होकर पलंग पर लेट गया। आंखों से आंसू झरने लगे। उसने बेड पर पड़े शर्मिष्ठा के कपड़ों से मुंह ढंक लिया और सुबकियां लेते हुए रोने लगा। शर्मिष्ठा से पिछले एक सप्ताह से बातचीत नहीं थी। सुबह वह जब आफिस निकल रहा था शर्मिष्ठा ने कुछ भी तो नहीं कहा था। फिर पति-पत्नी के बीच अनबन तो होती ही रहती है। इस बार दोनों किसी बड़े मुद्दे पर लड़े भी नहीं थे। फिर शर्मिष्ठा का बच्चे के साथ घर छोड़ कर जाना उस पर पहाड़ टूटने जैसा था। पहले भी दोनों लड़ते रहे थे पर कभी ऐसी कोई नौबत नहीं आई कि किसी को घर छोड़ कर जाना पड़ा हो। सुधीर तो बस इतना ही चाहता था कि उसके बूढ़े मां-बाप जो गांव में अकेले रह रहे थे ठंड के मौसम में वह उन्हें ले आये और साथ रखे। शर्मिष्ठा सासु की कट-कट की वजह से ऐसा नहीं चाहती थी। इसी बात पर दोनों लड़ पड़े थे और तकरीबन सप्ताह भर से बातचीत बंद थी। सुबह सुधीर ने फोन पर पिताजी को बताया था कि वह सप्ताहान्त आकर दोनों को ले आयेगा। शर्मिष्ठा ने सुनते हुए तो कुछ नहीं कहा पर घर छोड़ने का कठोर निर्णय ले लिया था। अनबन की वजह से दिन में दोनों का संवाद भी नहीं हो सका था।

शर्मिष्ठा शुरू से ही हठी स्वभाव की थी। शर्मिष्ठा और सुधीर दोनों बचपन में एक ही चाल में रहा करते थे। गिरगांव इलाके में तब दुमंजिली चालियां हुआ करती थीं। शर्मिष्ठा के पिताजी किसी मिल में काम करते थे और सुधीर के पिता रेलवे में क्लर्क थे। पहली मंजिल पर शर्मिष्ठा का परिवार था और नीचे की तल मंजिल पर सुधीर के पिता रहते थे। शर्मिष्ठा और सुधीर दोनों की प्राथमिक शिक्षा एक ही विद्यालय में हुई थी। दोनों साथ-साथ स्‍कूल जाते और वापसी भी साथ-साथ करते। चाल के सामने जब बच्चे खेलने उतरते तो शोर-शराबे से पूरा वातावरण भर जाता था। सुधीर मिट्टी के घरौंदे बनाता और उसे जब लीप पोत कर चमका देता तब शर्मिष्ठा चुपके से आती और उसे ध्वस्त कर ऊपर भाग जाती। सुधीर भागता हुआ उसकी मां के पास जाता और शिकायत करता। उसकी मां पुचकारती और दुबारा बनाने में मदद का आश्वासन देती। यदि सुधीर की मां को इसकी भनक लगती तो वह पूरी चाल को सिर पर उठा लेती और शर्मिष्ठा की मां को बहुत बुरा-भला कहती। शर्मिष्ठा कहीं कोने में दुबक जाती। उसे सुधीर तो पसंद था पर उसकी मां तनिक भी पसंद नहीं थी।

सुबह स्‍कूल जाते वक्त वह सुधीर से माफी मांग लेती और दोनों की बट्टी हो जाती। स्‍कूल से वापस लौटते वक्त दोनों में से यदि किसी के पास भी पैसे होते दोनों मिलकर पार्ले की लेमन जूस की गोली खाते। स्‍कूल और घर में आसपास रहने की वजह से घनिष्ठता बढ़ती गई। तनिक बड़े होने पर दोनों घूमते-टहलते चौपाटी पर चले जाते। सुधीर घरौंदे बनाने में माहिर था। शर्मिष्ठा रेत इकट्ठा करती और दोनों देर तक रेत पर आकृतियां बनाते रहते। सुधीर से तनिक अनबन होने पर शर्मिष्ठा सारी आकृतियों व घरौंदों को बिगाड़ देती और तुनकती हुई घर वापस चली जाती। सुधीर पीछे-पीछे बुझे मन से घर वापस आता। दूसरे दिन तक दोनों में कट्टी रहती। पर स्‍कूल जाते वक्त दोनों एक-दूसरे को जोहते। कई बार साथ-साथ जाते पर बातचीत नहीं होती। लौटते वक्त तक बट्टी हो ही जाया करती। स्‍कूल के दिनों में जन्मी मित्रता कब प्यार में बदल गई किसी को पता ही नहीं चला। अब दोनों बिना एक दूसरे से मिले एक दिन भी नहीं बिता पाते। दोनों ने चर्चगेट के के.सी. कॉलेज में दाखिला लिया था। वे कॉलेज में कम रहते मैरीन ड्राइव से चलते-चलते चौपाटी तक आ जाते और वहीं बैठकर कल्पना लोक में विचरते रहते। सुधीर के दिमाग में उसका अपना घरौंदा बनता-बिगड़ता रहता। सुधीर और शर्मिष्ठा दोनों कोंकण के समुद्री पट्टी के रहने वाले थे। भाषा और आचार-विचार, खान-पान सबमें साम्यता थी। दोनों के पिताओं में भी मैत्री भाव था। चाल के सहजीवन में वे सक्रिय भागीदारी करते। गिरगांव की चालों में जब गणेशोत्सव आयोजित होता है तो देखते ही बनता है। त्योहारों में सुधीर और शर्मिष्ठा की बढ़ चढ़ कर भागीदारी होती। कॉलेज की पढ़ाई पूरी होते-होते सुधीर को रेलवे की नौकरी का ऑफर आ गया। उसने ज्‍वाइन भी कर लिया। शर्मिष्ठा की भी पढ़ाई पूर्ण हो गई थी वह भी नौकरी की तलाश में भटकने लगी। दोनों नियमित शाम में मिलते और समुद्र के किनारे की रेत पर अपना भविष्य उकेरते रहते। कुछ ही दिनों बाद शर्मिष्ठा को भी चर्चगेट की ही एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई। अब सुबह वे दोनों फिर साथ-साथ निकलते और शाम में साथ-साथ लौटते। दोनों की जोड़ी देखते बनती। एक तरफ दो युवा दिल धीरे-धीरे निकट हो रहे थे वहीं दोनों के माता-पिता उनके भविष्य को लेकर उधेड़-बुन में थे। शर्मिष्ठा की मां निहायत विनम्र पर सुधीर की मां तनिक कर्कश स्वभाव की थी। चाल में उसे कोई पसंद नहीं करता था। पर सुधीर के पिता का बड़ा मान-सम्मान था। वे सामाजिक-सांस्कृतिक कामों में सबसे आगे रहते। किसी के यहां शादी हो या किसी की मृत्यु हो गई हो सुधीर के पिता सबसे आगे रहते।

एक दिन शर्मिष्ठा की मां ने सकुचाते हुए सुधीर की मां से कहा, ‘‘भाभी यदि आप अनुमति दें तो मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं।’’ सुधीर की मां ने कहा, ‘‘बोलो, क्या कहना चाहती हो? यही कहोगी न कि मैं ही सबसे लड़ती रहती हूं, यही न! सच यह है कि लोग मुझसे जलते हैं, मेरा पति रेलवे में है और बेटा भी रेलवे में लग गया है। यह देख कर लोगों को अच्छा नहीं लगता। मेरे सर पर सींग थोड़े जमी है कि मैं सबको दिखाती फिरूं। बोलो और कुछ बोलना-पूछना हो तो कहो? मैंने अपनी बात पहले ही कह दी। खांटी कोंकणी हूं मेरे मन में कोई गांठ नहीं रहती। अब बोलो!’’

शर्मिष्ठा की मां ने झेंपते हुए कहा, ‘‘नहीं भाभी मैं तो आपसे कुछ और ही कहने आई थी।’’ इस पर उसे बैठने का इशारा करते हुए सुधीर की मां ने तनिक ढिलाई बरतते हुए कहा, ‘‘कहो! क्या कहना है? मुझे माफ करना मैंने समझा तुम भी वही कहोगी जो चाल की दूसरी औरतें कहती हैं। सबने मुझे ही झगड़ालू घोषित कर रखा है जबकि मैं ऐसी नहीं हूं जैसा लोग मुझे समझते हैं। मैं दिल की नेक हूं। किसी का बुरा नहीं चाहती इसीलिए बच्चों के बारे में सबको सचेत करती रहती हूं। घर, रास्ता साफ-सुथरा रखना चाहती हूं। लोग मच्छी चाव से खाते हैं पर कूड़ा चाल की सीढ़ियों पर फेंक देते हैं। कई बार ऊपर से आलू के छिलके, अंडे के छिलके, बची रोटियां नीचे फेंक देते हैं, इस पर मैं यदि लड़ूं न तो तुम्हीं बताओ क्या करूं? हां, अब बताओ तुम्हें क्या पूछना है? मैं तो वही सब बकने लगी जो औरों को सुनाया करती हूं।’’

शर्मिष्ठा की मां ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘भाभी, सुधीर अब काम पर लग गया है। शर्मिष्ठा भी काम पर जाने लगी है। दोनों की जोड़ी भी बहुत ही सुंदर है। यदि आप अनुमति दें तो शर्मिष्ठा के पापा को सुधीर के पापा से बात करने को कहूं?’’

सुधीर की मां झेंप-सी गई। उसने कहा, ‘‘अरे, मैंने आप से क्या-क्या कह डाला। आप इतने शुभ प्रसंग के साथ आर्इं थीं और मैंने न जाने क्या-क्या बक डाला।’’ सुधीर की मां किचन में गई और गुड़ की डली लाकर शर्मिष्ठा की मां का मुंह मीठा कराया। सुधीर की मां ने कहा कि ‘‘दोनों की जोड़ी ईश्वर ने बनाकर ही भेजा है। साथ-साथ पढ़े, साथ-साथ खेले और ईश्वर ने चाहा तो साथ-साथ जीवन भी बितायेंगे। आप इतना शुभ-शुभ सोचती हैं, मुझे तो इसका भान ही नहीं था। आप शर्मिष्ठा के पापा को इनसे बात करने के लिए कहें। दोनों की जोड़ी तो राम-सीता की जोड़ी होगी।’’ सुधीर की मां ने घर में बने छोटे से मंदिर को सर नवाया और शर्मिष्ठा की मां को यह कहते हुए विदा किया कि अब बच्चे बड़े हो गये हैं। अपना भला-बुरा समझने लगे हैं। दोनों एक दूसरे को जानते भी हैं। वे तो हामी भर ही देंगे। हम बुजुर्गों का क्या आज हैं कल नहीं रहेंगे। बच्चे सुखी व प्रसन्न रहें यही तो ईश्वर से प्रार्थना है।

शर्मिष्ठा की मां प्रसन्न होती हुई अपने घर वापस आई और अपने पति से इस रिश्ते को प्रस्तावित करने का अनुरोध किया।

प्रस्ताव मिलते ही सुधीर के पिता ने हामी भर दी और बच्चों की राय ले ली जानी चाहिए ऐसा कहा। दोनों की स्वीकृति के बाद ‘साखर-पूड़ा’ की रस्म पूरी कर ली गई। विवाह का मुहूर्त देख कर तिथि निश्चित कर दी गई। गाजे-बाजे के साथ विवाह संपन्न हुआ और सुधीर और शर्मिष्ठा अब दो जान पर एक देह में परिणित हो गये। दोनों ने अपने श्रम व मेहनत की वजह से शीघ्र ही अपने लिए एक आशियाना गोरेगांव की एक बिल्डिंग में तलाश लिया। दोनों साथ रहते हुए बिताये दिनों की याद करते और सपने बुनते रहते। कभी एक दूसरे से अनबन होती तो सुधीर चौपाटी की रेत पर बैठ कर शर्मिष्ठा का इंतजार करता और उसे यह देखकर आश्चर्य होता कि शर्मिष्ठा वहां हाज़िर हो जाती। दोनों एक दूसरे से लिपट जाते और रेत पर देर रात तक घरौंदे बनाते रहते। इस बीच गिरगांव की चालें ध्वस्त कर दी गर्इं। नई-नई इमारतों का निर्माण शुरू हो गया। दोनों के मां-बाप रिटायरमेंट के बाद कोंकण के अपने-अपने गांवों में रहने लगे थे। यदा कदा जब वे शहर आते तो सुधीर और शर्मिष्ठा दोनों उनकी सेवा करते। स्वभावतः सुधीर की मां शर्मिष्ठा में अपने को खोजती। पड़ोसियों से शर्मिष्ठा की विनम्रता उसे खलती। वह शर्मिष्ठा को उनसे कड़क व्यवहार रखने की हिदायत देती। शर्मिष्ठा को यह सब पसंद नहीं आता था। वह सुबह उठकर पड़ोसी के कचरे के डिब्बे को उसके द्वार की तरफ सरका देती ताकि द्वार खुलते ही उसका कचरा उसके सामने आ जाये। एक-दो बार पड़ोसी चुप रही पर तीसरी बार वह लड़ाई पर आमादा हो गई। सुबह-सुबह जब सुधीर और शर्मिष्ठा आफिस के लिए तैयार हो रहे होते उसी समय पड़ोसी की चक-चक उन्हें व्यथित कर देती। पड़ोसी झगड़ा बढ़ाने के लिए अपने द्वार का कचरा सुधीर के दरवाजे की ओर सरका देते जिसका खामियाजा उन्हें दिन भर भुगतने को मिलता। थोड़े दिन में सुधीर की मां ने पड़ोसियों के नाकों चना चबवा दिया। शुक्र था कि गणेशोत्सव आते ही वे पुन: वापस कोंकण चले गये। उनकी वापसी पर शर्मिष्ठा ने बड़ी मुश्किल से पड़ोसियों से अपना व्यवहार सुधारा था। उस दिन सुबह फोन पर सुधीर को जब उसने यह कहते सुना कि वह सप्ताहान्त उन्हें फिर मुंबई लायेगा उसके होश उड़ गये। उसने आनन-फानन में घर छोड़ने का निर्णय ले लिया था।

सुधीर पलंग पर औंधें पड़ा था। शर्मिष्ठा के कपड़ों से उसने अपना मुंह ढंक रखा था। वह सुबकने लगा। उसने शर्मिष्ठा से फोन पर बात करनी चाही। शर्मिष्ठा ने फोन नहीं उठाया। उसने मन में उठ रही तरह-तरह की आशंकाओं के साथ रात बिताई। सुबह तैयार होकर आफिस गया। दिन भर उसने शर्मिष्ठा को फोन नहीं किया। शाम थके-हारे मन से वापस घर आया। पत्नी और बेटे को घर में न पाकर वह बहुत व्यथित हुआ।

इधर शर्मिष्ठा बेटे के साथ निकल कर गिरगांव की पुरानी चाल के पास रह रहे अपने भैया-भाभी के पास आ गई थी। घर में पहुंचते ही उसने देखा कि भैया और भाभी दोनों गांव से आये उसके मां-बाबूजी की सेवा में लगे हैं। बाबूजी गांव से फनस और अपनी बाड़ी में उपजे नारियल लाये थे। शर्मिष्ठा को देखते ही दोनों बुजुर्ग चहक उठे। बोले बेटी आओ तुम्हें फनस बहुत प्रिय है न आते वक्त तेरे लिए हिम्मत न होते हुए भी ले आया हूं। फनस पका है उठा लाओ मैं तुम्हें कोए निकालकर खिलाता हूं। फिर तनिक रुक कर पूछे, ‘‘आज तो वर्किंग डे है क्या तुम्हें हमारे आने की खबर थी? या ऐसे ही सुधीर से लड़कर आई हो।’’

शर्मिष्ठा को परेशान देख दोनों की समझ में आ गया था कि कुछ गड़बड़ अवश्य है वरना यह काम के दिन कैसे आती और साथ में कुणाल को भी ले आई है। शर्मिष्ठा दौड़ कर मां से चिपक गई और रोने लगी। मां और भाभी ने ढाढस बंधाया और उसे फनस के कोए निकाल कर खिलाने लगी। भैया-भाभी द्वारा मां-बाबूजी की सेवा करते देख जैसे उसकी आंख खुल गर्इं हो। उसे अपने किये पर पश्चाताप हो रहा था। मां और भाभी दोनों ने उसे समझाया और सुधीर को फोन करने को लगाया। शर्मिष्ठा फोन कर रही थी पर सुधीर ने उसका फोन नहीं उठाया।

शाम को शर्मिष्ठा सज-धजकर चौपाटी पर आ गई। जैसे उसे यकीन था कि सुधीर उसे मनाने अवश्य आयेगा। वह ठीक उसी जगह घरौंदे बनाने लगी जहां सुधीर बनाया करता था और वह कई-कई बार बिगाड़ दिया करती थी। सूरज ढलने को था शर्मिष्ठा ने देखा शाम के छह बजने वाले थे पर सुधीर तो कहीं दूर तक दिखलाई नहीं पड़ रहा था। कुणाल ने कहा मम्मी पापा नाराज हैं वे नहीं आयेंगे चलो हमीं अपने घर चलते हैं। शर्मिष्ठा ने कहा नहीं वे जरूर आयेंगे आज नहीं तो कल। चलो आज यहीं मम्मी के पास चलते हैं। शर्मिष्ठा और कुणाल गिरगांव भैया भाभी के पास वापस लौट आये। रात में शर्मिष्ठा मम्मी की गोद में लिपट कर सोई।

मां बेटी के सुख-दुख के संवादों में रात कब गुजर गई किसी को पता नहीं चला। शर्मिष्ठा सुबह उठते ही सुधीर को फोन लगाने बैठ गई। सुधीर जैसे भाव खाये बैठा था। वह फोन को साइलेंट कर रखा था। वह जब आफिस पहुंचा तब तक शर्मिष्ठा के पूरे २५ मिस्‍ड काल्स थे। वह काम में लग गया पर उसका मन काम में नहीं लग रहा था। बेटा, जिसके बगैर वह कभी सोया ही नहीं था, दो दिनों से दूर था। पत्नी रूठ कर इसलिए चली गई थी कि वह अपने प्रिय मां बाबूजी को ले आने वाला था। वह मां बाबू जी जिन्होंने अपनी हड्डी पसली गला कर उसकी परवरिश किये थे। आज वह जो भी था उन्हीं की वजह से। ठीक है वे दोनों अभी स्वस्थ हैं और अपने गांव की देखभाल कर रहे हैं। पर ठंडक भर यदि वे दोनों उसके पास रहते तो शर्मिष्ठा का क्या बिगड़ जाता। उन दोनों के रहते कुणाल कितना प्रसन्न रहता है। वह सोचता रहा और शर्मिष्ठा की जिद पर क्रोधित भी होता रहा। उसने दिन भर न तो शर्मिष्ठा को फोन ही किया और न ही उसका फोन उठाया। शाम होते-होते उससे रहा न गया। वह चर्चगेट दफ्तर से निकला पर चर्नी रोड उतर कर गिरगांव की उन गलियों के चक्कर लगाता रहा जहां उसका और शर्मिष्ठा का बचपन गुजरा था। पास की बिल्डिंगों में शर्मिष्ठा के भैया-भाभी रह रहे थे पर जानकर भी कि शर्मिष्ठा यहीं है वह वहां नहीं गया। वह घूमते-घूमते उस प्राथमिक विद्यालय तक गया जहां वह और शर्मिष्ठा पढ़ा करते थे। स्‍कूल के सामने वाली उस छोटी दुकान पर भी गया जहां से दोनों पार्ले का लेमनचूस लिया करते थे। उसे देखते ही बूढ़ा दुकानदार पहचान गया और पूछ लिया बेटा कैसे हो शर्मिष्ठा बिटिया कैसी है? सुधीर ने बताया कि दोनों अच्छे हैं। दुकानदार का हालचाल पूछने के बाद पूछा कि काका पार्ले वाले लेमन चूस हैं क्या? काका ने भरनी खोलकर चार-पांच चूस उसके हाथों में रख दिया। मुस्कुरा कर पूछा भी कि ‘बेटे चूस अभी भी खाते हो अब के बच्चे तो डेरी मिल्क मांगते हैं।’ सुधीर चूस को पाकेट में रखते हुए पुरानी खट्टी-मिट्टी यादों में खो गया। उसके कदम अपने आप चौपाटी की ओर बढ़ रहे थे, उसे पता ही नहीं चला। वह तेज कदमों से उसी ओर बढ़ने लगा जहां वह और शर्मिष्ठा घरौंदे बनाया करते थे और बाद के दिनों में भी जब भी अनबन होती दोनों वहीं आ जाते और दोनों में बट्टी हो जाया करती। वह समुद्र की रेत पर पांव रखता जाता और रेत पांव के नीचे से खिसकती जाती। उसके मन में आशंका थी कि कहीं शर्मिष्ठा भी जिद न कर बैठी हो। उसे पश्चाताप भी हो रहा था कि उसने उसका फोन क्यों नहीं उठाया? थोड़ी देर बाद उसने देखा कि ठीक उसी जगह शर्मिष्ठा कुछ बना रही है जहां वह घरौंदे बनाया करता था। कृणाल गीली रेत बटोर कर लाता और वह उससे आकार बना रही है। उससे रहा न गया। वह दौड़ कर शर्मिष्ठा से लिपट गया। दोनों देर तक एक दूसरे से लिपटे रहे। कुणाल गीली रेत लाकर सामने खड़ा था। उसने देखा कि उसके पापा का पांव ठीक उस जगह पड़ने वाला था जहां शर्मिष्ठा ने गीली रेत से दादा-दादी का कमरा बना रखा था। वह चीखा पापा - यहां पांव न रखें यह दादा-दादी का कमरा है। सुधीर ने शर्मिष्ठा को और भी चिपका लिया। तीनों वापस घर लौटे। रास्ते में सुधीर ने पार्ले के लेमन चूस कुणाल के साथ शर्मिष्ठा को भी दिये। रास्ते में उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं था। शर्मिष्ठा ने माफी मांग ली थी। सुधीर क्षमा भी कर चुका था शर्मिष्ठा की इस शर्त पर कि, मां-बाबूजी गांव से आते वक्त उसकी वाड़ी के फनस और नारियल अवश्य लाएंगे।

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