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© Rupa Bhattacharya

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'माँ मुझे यह टैडीबियर चाहिए।'

नहीं माँ मुझे ' गन ' चाहिए ---।

घर में खिलौने वाला आया था। मधु और सोमु दोनों खिलौने देखकर अपनी -अपनी पसंद के खिलौने लेने की ज़िद कर रहे थे।

सोफे पर बैठी ललिता देवी बोली बहु !"सोमु को गन दिला दो"

रीता जाऽऽऽ टैडीबियर खरीदने की जरूरत नहीं है, जा के अपनी माँ का हाथ बँटा ! अभी से धीरे- धीरे काम - काज सीख---

कितना भी पढ़ ले, ससुराल में अपने हाथों से खाना पका के देगी तो सभी खुश होंगे

सोमु मधु को अंगूठा दिखाते हुए 'गन' पसंद करने लगा 'मधु 'यानी की "मैं" आँखों में आँसू लिए माँ से सटकर खड़ी हो गई,

जानती थी दादी के सामने माँ की एक न चलेगी । ऐसा हमेशा होता था। सोमु की हर ज़िद पुरी होती थी।

वह अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता था, मेरी शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई थी। मुझे कभी "कुछ" न मिलता, अगर मिलता भी तो भाई के साथ शेयर करो ,

भाई को दो---।।

पापा और दादी के बर्ताव के कारण मुझे अपने भाई से जलन होती। हर समय पराई धन हो, ससुराल जाना है, सास -ससुर की सेवा करनी है आदि बातों से कान पक गए थे। उस समय मुझे तो यह भी समझ नहीं आती थी कि यह" ससुराल " है क्या !

भाई को अंग्रेजी के छोटी- छोटी लाइनें बोलते देख मुझे लगता काश मैं भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ती !


दिन गुजरते गए, मैं क्लास में टाॅप करती पर मुझे प्रोत्साहन के रूप कुछ न मिलता जबकि सोमु केवल पास करता और उसे ढेरों उपहार मिलते।

मैं अच्छे नंबरों से पास कर कॉलेज में गई। ग्रेजूएशन के बाद घर में मेरी शादी की बात चलने लगी थी। मुझे आगे पढ़ने का मन था। पापा ने रिश्ते देखना शुरू कर दिया था। लेकिन इस बार माँ ढाल बन कर मेरे सामने खड़ी हो गई। उन्होंने घर में अनशन शुरू कर दिया ,

कहा "मधु ज़रूर आगे पढ़ेगी, अपने पैरों पर खड़ी होगी, तभी इसकी शादी होगी।" माँ का यह रुप देखकर सब अवाक हो गये।

दादी ने ज्यादा हो- हल्ला नहीं किया और मेरी दाख़िला एम. बी.ए. में हो गया।

एम.बी.ए. कर मैं जाॅब करने लगी। इस दौरान मेरा परिचय "रितेश" से हुआ। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे।

घर में फिर से मेरी शादी की बात चलने लगी थी, मैंने माँ से रितेश के बारे में कहा। माँ बोली "मधु तुम यह क्या कर बैठी? ?"

तुझे तो दादी और पापा के बारे में पता है----वे कभी नहीं मानेंगे---।

माँ ने पापा से बात की, पापा गुस्से से आग -बबुला हो उठे, दादी ने सारा दोष माँ पर डाल दिया। माँ बोली बेटी इस बार मैं तेरा साथ न दे पाऊंगी !

इस बार मेरी अनशन भी काम नहीं करेगी। मेरी ख़ातिर मान जा, उस लड़के का ख्याल छोड़ दे ! अपनी पापा के पसंद के 'लड़के' से

शादी के लिए हाँ कह दे !


मैं निरूत्तर हो गई और उनके द्वारा खोजे लड़के से विवाह के लिए हाँ कह दी ! हांलाकि कई बार मेरे मन में आत्महत्या तक के विचार आ चुके थे।

पर इससे मेरी माँ के 'सम्मान' को बहुत ठेस पहुँचती और मुझे यह गवारा न था। बुझे मन से मैंने फोन पर रितेश को अपनी असमर्थता बता दी।

मेरी शादी हो गई, सारे रस्मो- रिवाज संपन्न हो गये। मैं घूँघट में ही रही, मुझे एक बार भी दुल्हे को देखने का मन न हुआ। विदाई के समय मैं बहुत

रो रही थी, ससुराल जाने का उमंग ज़रा सा भी न था। रोते- रोते अचानक मेरी कानों में एक आवाज़ गूँजी "मधु अब बस भी करो !अब मत रो ---

चेहरा सूज जाएगा- -!।

मुझे यह आवाज़ जानी पहचानी लगी- -'

मैंने घूँघट उठाकर चेहरा ऊपर उठाया, तो देखा कि दूल्हे के वेशभूषा में रितेश खड़े थे।

माँ मुस्कराते हुए रितेश का हाथ मेरे हाथों में देते हुए बोली, "ले अपना 'उपहार'! इसे संभाल कर रखना, तुझे इसे किसी से शेयर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"

माँ ऽऽऽ मैं खुशी से झूम उठी थी,और रोना भूल कर माँ के गले लग गई। आस-पास सब हँसने लगे थे।

पता नहीं अंदर ही अंदर माँ ने क्या चाल चली कि रितेश रूपी बेशकीमती "उपहार" मेरी झोली में आ गई ।


सम्मान विवाह दोष

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