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Mahapurush
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© Jyoti Gajbhiye

Inspirational

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                             महापुरुष

लाश बिजली के खम्बे पर से ही गिरी थी, करेंट लगने की वजह से काली-नीली पड़ गई थी, मरे हुये व्यक्ति की पथराई आँखें खुली हुई थी| देखते ही देखते लाश के चारों ओर भीड़ लग गई, वैसे भी हमारे देश में तमाशबीनों की कोई कमी नहीं है ऐसे मौकों का ही उन्हें इंतजार रहता है| भीड़ जब जमा होती है तब वह चलते-फिरते उन कीड़ों का समूह नजर आती है जो गुच्छों में रहते हैं, वह भावशून्य होती है| इन भावशून्य लोगों की भीड़ में शायद कोई इन्सान भी था जिसने पुलिस को फोन कर दिया|

अब पुलिस यदि तुरंत आ जाये तो काहे की पुलिस कहलाये, सौ काम रहते हैं कहाँ फुर्सत है कि तुरंत आ जाये, करीब एक घंटे बाद पुलिस पहुँची| लाश को पास के दवाखाने में पोस्ट मार्टम के लिये भेज दिया गया हाँ उससे पहले पुलिस ने मृतक की जेब से मोबाइल अवश्य निकाल लिया था उसमें जब पहला नंबर डायल किया वह संयोगवश उसकी पत्‍नी का ही था, वह रोते-कलपते दवाखाने पहुँची उसके साथ तीन-चार बरस का बच्चा भी था किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए वह तैयार नहीं थी उससे बस इतना पता चल सका कि मृतक बिजली विभाग में काम करता था|

इस जानकारी के बल पर ही मृतक की जन्मकुंडली निकाल ली गई

नाम- सुधीर वासुदेव तायडे

उम्र- 27 वर्ष

काम –बिजली विभाग में ट्रेनी लाइनमैन

मृतक की पत्नि का नाम कुछ भी हो फर्क नहीं फिर भी हम उसे सावित्री कह कर पुकार सकते हैं, उम्र के तेइसवे वर्ष में वैधव्य का स्वागत करती हुई उसमें पौराणिक सावित्री की भांति अपने सत्यवान को लाने का बल नहीं था, वह दहाड़े मार कर रो रही थी, बच्चा कुछ न समझ पाने का भाव लिये अन्यमनस्क भाव लिये माँ का आँचल पकड़े खड़ा था, सावित्री का मस्तिष्क शून्य हो गया था वह खुद एक जिन्दा लाश की तरह प्रतीत हो रही थी| जो बिजली विभाग के लिये एक मजदूर, एक मनुष्य बल था वह किसी के लिये सर्वस्व हो सकता है यह तो किसी ने सोचा भी न था| दुर्घटनायें होती रहती हैं और लोग हाथ झाड़ कर फिर अपने-अपने काम में लग जाते हैं, एक मजदूर कोई महापुरुष तो नहीं जो लोगों के लिये अहमियत रखे| परसों भी इसी प्रकार की घटना घटी थी, इमारत निर्माण कार्य करते वक़्त एक मजदूर तीसरी मंजिल से गिर कर मर गया| ये मजदूर क्या बेकार सड़े हुये फल की तरह हैं जो ऊपर से टपक –टपक कर गिर रहे हैं, मर रहे हैं और प्रशासन है कि दखल ही नहीं लेता बस लाश हटा दी जाती है, जगह साफ कर दी जाती है, घटना भुला दी जाती है| कोई मजदूर किसी महापुरुष की तरह नहीं मरता न ही उसकी भव्य अंतयात्रा निकाली जाती है, वह गुमनामी की मौत मरता है| इन मजदूरों के लिये किसी पेंशन का भी प्रावधान नहीं होता जो उनकी मृत्यु के बाद उनकी विधवाओं को मिल सके, अपने परिवार को वह सिर्फ दुःख ओर असुरक्षा देकर जाता है| अपनी मौत के बाद छोड़ जाता है परिवार वालों को जीते जी मरने के लिये|

हाँ तो कथा चल रही थी सुधीर की, वह पास के ही गाँव का रहने वाला था, उसके पिता गरीब किसान थे| गाँव में भूखों मरने के बजाये उसने शहर आकर नौकरी करना ठीक समझा, एक साल ही बीता था बिजली विभाग में काम करते हुए अभी तो नौकरी भी पक्की नहीं हुई थी| सच पूछो तो बिजली के खम्बे पर चढ़ने का काम सीनियर लाइनमैन का होता है उन्होंने अपनी सुस्ती की वजह से सुधीर को ऊपर चढ़वा दिया और सबसे बड़ा रहस्य तो तब खुला जब उसके भाई ने आकर छान-बीन की पता चला जब वह दुरुस्ती का काम कर रहा था, बिजली का मुख्य प्रवाह बंद ही नहीं किया गया था, बहुत बड़ी लापरवाही हुई थी और सुधीर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा| एक मजदूर अपनी जान हथेली पर लेकर पोल पर चढ़ता है ओर मुख्य प्रवाह ही नहीं बंद किया जाता इन्सान के जान की कीमत इतनी कम क्यों आँकी जाती है| सुधीर के भाई सुनील ने इसी मुद्दे को लेकर काफी बवाल मचाया, कुत्ते-बिल्ली की मौत मरा था उसका भाई यह भी कोई मरने की उम्र है|

सुधीर की लाश जब उसके गाँव लाई गई तो सारे गाँव में सन्नाटा छा गया। लोगों ने चूल्हे भी न जलाये| गाँव के घरों में सभी का एक-दूसरे से कोई न कोई रिश्ता होता है, सम्पूर्ण गाँव एक परिवार की तरह होता है| एक जवान, मेहनती, मिलनसार लड़का यूँ असमय चला गया जो सुनता, दुःख से बेहाल हो जाता| बहुत ही गमगीन वातावरण में विधि-विधानों के साथ उसकी अन्त्येष्‍टि की गई|

सुधीर की देह तो अग्नि में समा गई पर उससे निकली हुई ज्वालाओं ने सावित्री के सम्पूर्ण जीवन को जीते जी भस्म कर दिया| अब उसकी अग्निपरिक्षाएं प्रारंभ हो चुकी थी सर्वप्रथम तो जीविका का प्रश्न उसके समक्ष था साथ ही मन में क्रोध था की बिजली विभाग ने ऐसी लापरवाही क्यों की? क्यों बाकी के कर्मचारी सुधीर की लाश को छोड़कर भाग खड़े हुए? दूसरों की गलतियों की वजह से क्यों उसके पति की जान गई? इन प्रश्नों ने उसके दिलोदिमाग में भूचाल मचा कर रखा था और इस बेचैन अवस्था में उससे मिलने बिजली विभाग के मुख्य अधिकारी आये उसे सांत्वना देना तो एक बहाना था दरअसल वे चाहते थे सावित्री बिजली विभाग पर केस न करे। उन्होंने कहा की वे उसे पाँच लाख देंगे और नौकरी भी, बस वह केस न करे नहीं तो सारा विभाग बदनाम हो जायेगा| सावित्री दसवीं क्लास तक पढ़ी थी वह अन्याय का अर्थ भली-भांति जानती थी पाँच लाख शायद उसका जीवन सुधारने के लिये पर्याप्त होंगे पर वे उसके पति का जीवन तो नहीं लौटा सकते, आज उसके पति की जान गई कल इस अंधी व्यवस्था में कोई और युवा मारा जायेगा वह न्याय चाहती थी उसने कड़े शब्दों में उस अफसर को इंकार कर दिया| वह अधिकारी अपना सा मुंह लेकर लौट गया| सुधीर का भाई सुनील चाहता था सावित्री अधिकारी की बात मान जाये कम से कम उसका जीवन निर्वाह तो हो जायेगा| सुनील का क्रोध चंद कागज के टुकड़े शांत कर देंगे ऐसा सावित्री ने सोचा भी न था| उसने सुनील को भी इंकार कर दिया वह अब जता कर गया था कि भविष्य में उससे कोई भी अपेक्षा न रखी जाये|

सावित्री बिजली विभाग की पोल खोलना चाहती थी और उसे आवश्यकता थी किसी की सहायता की, शीघ्र ही उसे यह सहायता प्राप्त हो गई जब बिजली विभाग के चतुर्थ वर्ग कर्मचारी यूनियन ने सुधीर के लिये शोकसभा रखी गई, वहीँ पर सावित्री को भी बुलाया गया था| यहाँ वह मिली सदाशिव से वह चतुर्थ वर्ग कर्मचारी यूनियन का लीडर था उसके भीतर कर्मचारियों के शोषण को लेकर विरोध की आग लगी रहती थी, उसके तेज-तर्रार स्वाभाव से सभी परिचित थे कई अफसर भी उससे घबराते थे, सदाशिव ने मदद का पूरा आश्वासन दिया था यह सिर्फ आश्वासन नहीं था बल्कि शीघ्र ही उसने इसे कार्यरूप में भी लाया था| बिजली विभाग के छह अधिकारियों पर मुकदमा दायर किया गया जिसमे मुख्य अधिकारी के साथ इंजिनियर और सीनियर लाइनमैन शामिल थे| सावित्री ने मुकदमा लड़ने के लिये एक लाख रुपये अपने रिश्तेदारों से उधार लिये थे| पेट में भूख लिये न्याय पाने के लिये लड़ाई लड़ना मूर्खता जैसा काम था पर किसी को तो ऐसी मूर्खता करनी ही पड़ेगी तभी देश की व्यवस्था में सुधार होगा|

सब कुछ इतना आसन नहीं होता, न्याय मांगते-मांगते गला सूख जाता है पर वह मिलता नहीं| घर की देहरी भी न लांघने वाली न्यायालय की चौखट पर गुहार दे रही थी, उसे विश्वास था कि उसकी पुकार सुनी जायेगी, न्याय की देवी ने आँखों पर जरुर पट्टी बांध रखी है पर उसके कान खुले हैं| जब भी कोर्ट की तारीख लगती मुन्ने को बहन के पास छोड़ सावित्री जाती साथ सदाशिव भी होता| जिसकी लाठी हो भैंस उसी की होती है, पूंजीपतियों के बीच टटपूंजिया कब तक टिक पायेगा कोर्ट ने आरोपियों को निर्दोष साबित कर दिया| सावित्री तिलमिला गई, उसके पति की मृत्यु के लिये जिम्मेदार लोगों को कोई सजा नहीं वह दुखी हुई थी पर निश्चय अभी भी कायम था, सदाशिव ने सलाह दी थी हाइकोर्ट में अपील की जाये। पैसों के नाम पर सास की ओर से दिया गया मंगलसूत्र और माँ की ओर से दिये हुये झुमके थे उन्हें बेच जो कुछ मिला फिर लगा दिया केस लड़ने के लिये, इस बीच वह कुछ घरों में काम भी करने लगी दसवी तक पढ़ी होने पर भी कोई नौकरी देने को तैयार नहीं था, जीवन –यापन के लिये कुछ तो करना था| मुन्ना भी स्कूल जाने लगा था उसका पढ़ाई का खर्चा सो अलग था| दुबली-पतली कमजोर सावित्री कहाँ से इतना बल बटोर लाई थी की हार शब्द उसके शब्दकोष में ही नहीं था| इस जंग की वह कमजोर सिपाही जरूर थी पर आत्मविश्वास से भरी हुई| सदाशिव के अलावा उसे साथ देने वाला कोई नहीं था|

 हाइकोर्ट में जरूर कुछ आशा बंधी थी, वकील की तगड़ी गवाहियों से विपक्ष कमजोर पड़ता नजर आ रहा था| सच्चाई कहीं तो है जो इन तूफानों तले साँस ले रही है और हिम्मत भी बंधा रही है,डरो मत अभी भी न्याय की मशाल जल रही है| विपक्षियों ने देखा घी सीधी उंंगली से नहीं निकल रहा तो उंगली टेढ़ी कर दी सावित्री और सदाशिव को लेकर कीचड़ उछाले जाने लगे, उनके मध्य अनैतिक सम्बन्ध हैं ऐसा प्रचार किया जाने लगा| सावित्री को चरित्रहीन साबित कर वे बाजी पलटना चाहते थे, सदाशिव पर झूठा मार-पीट का आरोप लगाकर उसको जेल भिजवा दिया था| अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए सावित्री को चरित्रहीन का ख़िताब मिलता है वह किसी शहीद की पत्नीी तो नहीं थी जो परमवीर चक्र की हक़दार होती एक मामूली मजदूर की विधवा थी उसे जो मिला वही उसने सर आँखों से लगा लिया पर अपनी जिद और लड़ाई नहीं छोड़ी|

सात बरस बीत चुके थे पर सावित्री के लिये सुधीर के साथ हुई दुर्घटना मानो कल की बात थी| आज सुधीर होता तो ........सब सोचने की बातें हैं, अब तो मुन्ना ही जीने का सहारा है उसे वह एक पल भी आँखों से ओझल नहीं होने देती| इस बरस वह भी दस का हो गया है माँ की लड़ाई में वह भी साथ दे रहा था पर पता नहीं क्यों आजकल केस की सुनवाई के पत्र भी आना बंद हो गये, शायद पैसे खिलवा कर केस ही बंद करवा दिया गया है| सावित्री एकबारगी फिर बिखर गई और अब तो साथ देने को सदाशिव भी न था| हर लड़ाई हमारी अपनी होती है मुश्किल है कि कोई अंत तक साथ दे पाये| कोर्ट की सीढियाँ चढ़ते-चढ़ते वह बूढी हो जायेगी और उसके साथ साथ क्या वह न्याय की देवी भी बूढी और कमजोर हो जायेगी? धूमिल पड़ती आशा को फिर से उसने झाड़ा-पोंछा , इस जन्म में तो मैं हिम्मत नहीं हारूंगी, उसके सामने सुधीर की प्रतिष्ठा का प्रश्न था| जहाँ चाह होती है वहां राह निकल ही आती है, सदाशिव के साथ काम करने वाले विष्णु ने बताया बिजली विभाग में ट्रान्सफर होकर नये मुख्य अधिकारी आये हैं वे नेक इन्सान हैं चाहे तो सावित्री उनसे मिल ले| बुझी आशा दीप्त हुई सावित्री साहब से मिलने के लिये आफिस के चक्कर लगाने लगी। कनिष्ठ कर्मचारी ही उन तक पहुँचने न देते, तब सावित्री पता पूछकर उनके बंगले तक पहुँची जहाँ गेट से भीतर न जाने दिया गया, गेट के बाहर खड़ी हो वह उनके निकलने का इंतजार करने लगी जैसे ही उनकी गाड़ी गेट पर आई वह साहब-साहब की आवाजों से उन्हें पुकारने लगी| सावित्री को देख उन्होंने गाड़ी रोकी क्या काम है पूछा| सावित्री के सब्र का बाँध टूट गया था वह फूट-फूट कर रोने लगी , सारी घटना बयान की और केस के पेपर भी दिखाये| साहब ने आश्वासन दिया की वे जरूर कुछ करेंगे , उन्होंने सचमुच सुधीर वासुदेव तायडे की फाइल फिर खुलवाई और फिर शुरू हुई सत्य के लिये लड़ाई अब इस लड़ाई में उसके साथ एक अधिकारी भी थे जो पूरे मन से चाहते थे उसे न्याय मिले| बिरले ही ऐसे मिलते हैं जो बेईमानी की खरपतवार के बीच में पुष्प की तरह खिले होते हैं, हमारा बाग इन्हींं की वजह से सुगंधित रहता है नहीं तो हर जगह फैली धर्मान्धता और भ्रष्टाचार की दलदल में इतनी दुर्गन्ध है कि जो लोगों का जीना मुश्किल कर देती है| इस बीच सदाशिव भी जेल से छूट कर आ गया था वह भी कोर्ट में गवाही देने को तैयार था|

पूरे दस बरस बाद वह आनंद का दिवस आया जब सावित्री को न्याय मिला।जिम्मेदार व्यक्तियों को सजा तो मिली ही साथ जुर्माना देना पड़ा| आज कोर्ट का निर्णय सुनते ही सावित्री के पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे आनंदाश्रु आँखों से बहे जा रहे है मुन्ना उनको पोंछता हुआ बोला – “क्यों रोती हो आई अब तो बाबा को न्याय मिल गया है?”

सावित्री आँसू पोंछते हुए बोली –“हाँ रे दुःख में तो ये आँसू न आये अब ख़ुशी में चले आ रहे हैं|”

साहब को धन्यवाद किया और मुन्ने का हाथ पकड़ कर सीढ़ियाँ उतरने लगी चेहरा आत्माभिमान से दमक रहा था| अब इसी व्यवस्था में उसे अपने मुन्ने को बड़ा करना था, साहस और बल के साथ अकेली औरत भी विजय पा सकती है सावित्री ने सिद्ध कर दिया था| मुन्ने को भी उसे वही सिखाना था अन्याय के विरोध में लड़ना और सत्य के मार्ग पर चलना, बड़ा कठिन है यह सब पर अब सावित्री को सरल चीजें अच्छी नहीं लगती|

घर आकर वह मुन्ने को बोली “ बाबा के फोटो पर हार चढ़ा दो|”

मुन्ना तो सावित्री से भी ऊँचा हो गया था लपक कर हार चढ़ा दिया|

सावित्री बोली अब प्रणाम करो दोनों फोटो के समक्ष झुक कर प्रणाम कर रहे थे, दुनिया में बहुत महापुरुष हुउ हैं पर सावित्री से पूछो उसकी नजरों में उसके पति से बड़ा महापुरुष कोई नहीं .......

                                                                       

मजदूर दुर्घटना कोर्ट

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