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शुभ चिंतक
शुभ चिंतक
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© Bharti Suryavanshi

Drama Romance

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सुबह के 8 बज रहे थे प्रिया के लिए आज बहुत ही खास दिन था। ऑफिस में उसके बनाये हुए डिजाइन का प्रेजेंटेशन करना था। प्रिया एक फैशन डिजाइनर थी। अपना शहर छोड़कर प्रिया पिछले 6 महीनो से मुंबई की एक फैशन कंपनी स्ट्रीट फैशन के लिए डिज़ाइन कर रही थी। लेकिन आज ये उसका पहला मौका था जब उसे एक बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। ऑफिस के लिए तैयार होकर उसने अपनी रूम मेट नीलम को अलविदा कह दरवाजा खोला तभी उसके पैरों के नीचे कुछ आया उसने देखा एक सुंदर लीली के फूलों का गुलदस्ता था। जिस पर एक छोटा सा कार्ड था। प्रिया ने कार्ड खोलकर देखा उस पर लिखा हुआ था।

प्यारी प्रिय ,"आज तुम्हारी ज़िन्दगी का बहुत महतवपूर्ण दिन है। भगवान पर भरोसा रखना और शांत रहना। सफलता जल्द ही तुम्हारे कदम चूमेगी... तुम्हारा शुभ चिंतक" अपने लिए शुभकामनाएं पढ़ प्रिया के चेहरे पर उन सुंदर फूलों जैसी ही मुस्कान खिल उठी।

वैसे ये पहली बार नही था जब इस अनजान शुभ चिंतक ने प्रिया का हौसला बढ़ाया था।

आज से लगभग तीन महीने पहले एक रोज़ प्रिया काफी निराश थी। ऑफिस में बस वो एक जूनियर डिज़ाइनर थी। जिसकी खुद की कोई खास पहचान नही थी। बड़े बड़े ख्वाब लेकर वो सपनो की नगरी मुम्बई आयी थी पर अपनी पहचान बनाने में असफल रही। हर रोज़ की तरह वो भी एक दिन था जब रोज़ की तरह ही वो आफिस जा रही थी लेकिन इसी तरह घर के दरवाजे पर कोई गुलदस्ता और ख़त छोड़ गया था। उस पर लिखा था “प्यारी प्रिय , तुम इतनी जल्दी उम्मीद कैसे खो सकती हो। क्या ये वही प्रिया है... जिसने अपने सपनो के लिए सबकुछ छोड़ दिया और अब इतनी दूर आकर हार मान रही है| इस मुकाम पर तुम हिम्मत नहीं खो सकती। तुम्हे ऐसा कुछ करना होगा के तुम्हारा काम बेहतर है ये नोटिस किया जाए। उम्मीद मत हारो। कामयाबी जल्द ही तुम्हारी होगी।" - तुम्हारा शुभ चिंतक

उस ख़त के बाद प्रिया को एहसास हुआ के वो इतनी आसानी से अपने सपनो को नही छोड़ सकती। उसने अपने बेहतरीन डिजाइन बनाये और कुछ दिनों बाद हिम्मत की अपने बॉस को जाकर डिजाइन दिखाने की। उस वक़्त उसके बॉस ने कुछ नही कहा और डिजाइन वापस कर दिये। वो सोच में तो थी के ‘ऐसा क्यो हुआ होगा’ पर समय समय पर उसके शुभ चिंतक का ख़त आ जाता जो उसे हिम्मत हारने नही देता था। कुछ दिनों पहले प्रिया ने फिर कोशिश कर नए डिजाइन बॉस को दिखाए इस बार भी वो कुछ बोले नहीं पर थोड़ी देर बाद प्रिया को बुलाकर इस बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी जिसका आज प्रेजेंटेशन था, प्रिया उन सफ़ेद लीली के फूलों के साथ आफिस पहुंची, आकांक्षा जो प्रिया की सहकर्मी थी उसने कहा ”अरे वाह... प्रेजेंटेशन से पहले ही बधाई मिल गयी...क्या बात है।” और प्रिया बस मुस्कुरा कर वहां से चली गयी। वो थोड़ी नर्वस थी पर पूरे विश्वास के साथ उसने अपनी प्रेजेंटेशन पूरी की।

ऑफिस में उसका प्रेजेंटेशन सबको काफी पसंद भी आया। इसके बाद उसे प्रमोशन और खुद का केबिन मिला। वो बहुत ही खुश थी और उस शुभ चिंतक को धनयवाद कहना चाहती थी पर कहती कैसे वो जानती भी तो नही थी के वो है कौन।

शाम को घर आकर उसने नीलम को ये खुश खबरी सुनाई, नीलम उसके लिए बहुत खुश थी, दोनों हॉल के सोफ़े पर बैठ पुरानी यादों को याद कर रहे थे तभी नीलम ने उससे कहा “तेरा मन नहीं होता उस अजनबी से मिलने का।” प्रिया ने अफसोस के साथ कहा “होता है ना। मुझे पहले लगा के ऑफिस का ही कोई होगा। पता है वो राज़ ... कितना भाव देता था मुझे...उससे भी बातों बातों में पता लगाने की कोशिश की पर वो नहीं था। कभी कभी सोचती हूं के गलती से कोई और उसका क्रेडिट ना ले जाए इसलिए जानने की कोशिश ही बंद कर दी।”

“हम्म… पर मेरे पास एक रास्ता है जानने का ...अगर तू चाहे। रिस्की है साथ देगी।” नीलम ने पूछा।

प्रिया ने थोड़े आश्चर्य से पूछा “रिस्की क्यों?” “क्यों तेरे ऑफिस में सबके PC चेक करना आसान है क्या?” नीलम ने कहा।

“क्या ?...पर यह कैसे करेंगे तुझे पता है ऑफिस में CCTV लगे हुए हैं।” प्रिया ने कहा

“अरे यार... तभी तो यह काम ऑफिस समय के बाद होगा ना! तू बस इतना बता के CCTV के कनेक्शन कहा से बंद होते हैं ये तुझे मालूम है ना…! नीलम पूरी प्लानिंग कर चुकी हो ऐसे पूछा।

प्रिया ने उसे बताया के CCTV से ज़्यादा प्रॉब्लम तो उसके बॉस कारण की है वो कई बार देर तक ऑफ़िस में रुका करते है। लेकिन परसो वो दिल्ली जानेवाले है तो तब ये काम हो सकता है। उन दोनों को ये यकीन था के अगर वो आफिस का ही कोई स्टाफ है तो ज़रूर उसके PC में कुछ न कुछ मिल जाएग। कहानी जारी है.....

फूल बधाई ख़त

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